शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

गुण-अवगुण


गुण-अवगुण 

एक हलवाई चीनी के बताशे बना रहा था।चीनी के गोल में एक कंकड़ गिर गया और कड़ाई
में तल कर बताशे से चिपक गया। उस कंकड़ ने बताशे से कहा - तेरे साथ तला जाने के
कारण अब मैं भी बताशा बन गया हूँ।

बताशे ने कहा - मेरे आवरण में छिप जाने से तेरे अन्दर छिपी कठोरता कम नही हो जाने
वाली है।तुम मेरे सम्पर्क में जरुर आ गये मगर तुम्हारी कठोरता और अहं कम नहीं हुआ
है।तेरा यह झूठा दिखावा भविष्य में सामने आने ही वाला है।

  अगले दिन उस हलवाई की दूकान से एक ग्राहक ने बताशे खरीद लिये।वह कंकड़ भी
बताशे के मोल बिक गया।उस कंकड़ ने बताशे से कहा -तुम तो कह रहे थे कि मेरी कठोरता
सामने आ जायेगी मगर देख,आज मैं तेरे मूल्य के बराबर हो गया हूँ।

बताशे ने कहा -गुण और अवगुण कभी छिपते नहीं हैं,समय आने पर प्रगट हो जाने वाले हैं।

          उस ग्राहक ने बताशे घर लाकर दूध में डाल दिये।दूध के सम्पर्क में आते ही बताशे ने
 कंकड़ से कहा -अपने-अपने गुण-अवगुण की परीक्षा का समय आ गया है ,मैं तो अपने मूल
स्वरूप रस में परिवर्तित हो जाऊँगा और तुम कंकड़ ही रह जाओगे ?

  कंकड़ ने कहा - तुम स्वरूप बदल सकते हो तो मैं भी रूप बदल कर महीन रेत में बदल
जाऊँगा।

 उबलते हुए दूध में बताशे और कंकड़ ने रूप बदल लिया।कंकड़ बारीक रेत  बन गया  और
बताशा रस बन गया । उस ग्राहक ने उस दूध को पी लिया और कंकड़ तथा बताशा उसके
शरीर में पहुंच गये।शरीर में पहुंचने के उपरान्त महीन मिट्टी बने कंकड़ ने बताशे के
रस से कहा -मैं भी तुम्हारे साथ दूध में घुल कर यहाँ आ गया हूँ ,अब बोलो गुण और अवगुण
में क्या फर्क रहा।

           बताशे ने कहा- गुण और अवगुण में काफी फर्क होता है।समय आने पर मालुम पड़
 जाएगा।

 शरीर की ग्रन्थियों ने बताशे के रस को अलग किया और उसे  मनुष्य के खून में पहुंचा दिया
और महीन रेत  बने कंकड़ को अलग किया और अवशिष्ट मार्ग से बाहर निकाल दिया।

सार- छली लोग साधुता का संग करे या वेश बदल ले मगर उनके अवगुण देर-सवेर प्रगट
हो ही जाते हैं।        

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