शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

लूट सके तो लूट .......

लूट सके तो लूट .......

ये तुलसी के राम नाम की लूट तो नही है मगर इसके काफी करीब जरुर है।राम के नाम
की लूट में इस लूट में कुछ फर्क है,राम नाम की लूट पर सबका समान अधिकार है और
इस लूट में जिसके हाथ में लाठी है उसके हाथ ही भेंस है।तुलसी के राम नाम को नही लूटने
पर पछताना पड़ता है और इस लूट में भी पछताना पड़ता है सिर्फ समय का फेर है तुलसी
अन्तकाल में पछताने की बात करते हैं तो इसमें पाँच साल की ही मर्यादा है उसके बाद
जनता चाहे तो एक्सपायरी डेट डाल सकती है।

      लूट डाकू भी करते थे सा'ब, मगर अक्ल से नही करते थे सिर्फ दुसाहस के बल पर करते
थे  मगर यह लूट दुसाहस के बल पर नही अधिकार पा कर और पाने के पश्चात दुरूपयोग
करके की जाती है। डाकूजी की लूट में बेचारे को काफी तकलीफ थी क्योंकि सिस्टम का
सहयोग नही था  मगर इसमें वो तकलीफ नही है सिस्टम के टूटे भागे अस्थि पंजर पूरा
सहयोग करते हैं। डाकू को लूट के पश्चात बीहड़ों का रुख करना पड़ता था मगर इसमें यह
परेशानी नहीं है,लूट के पश्चात आराम से कुर्सी पर चिपक सकते हैं।लूट के पैसे को भी डाकू
देश की गुफाओं और  घने बीहड़ों  में छिपाते  थे  मगर इस लूट में  बेखटके लूट का पैसा
सात समुंदर पार भेज सकते हैं।

   तुलसी की लूट में समय की मर्यादा बीच में जाती है क्योंकि रात-दिन तो लूट नहीं सकते
राम का नाम,आवश्यक काम में तुलसी की लूट में व्यवधान आ जाता है  मगर इस लूट में
व्यवधान नहीं है जब आपका जी जाता ,लूट मचा लो,इस लूट को अंजाम देने के लिए पहले
दिमाग की जरूरत भी नहीं थी  मगर कुछ समय से विद्रोही चिंचडे इस कदर चिपकने लग
गये हैं कि सावधानी आवश्यक है।

     तुलसी के राम नाम की लूट में और इस लूट में एक बुनियादी फर्क भी है।राम नाम की
लूट जो लुटेरा बनता है उसके खाते में ही जमा होती है ,लूट के धन का हस्तांतरण नहीं है,
मगर इस लूट में हस्तांतरण आराम से किये जा सकता है।इस लूट को  बेटे,दामाद किसी
के नाम पर भी हस्तांतरण कर सकते हैं या किसी के नाम पर भी ऋण दिखा कर भी जमा
कर सकते हैं।

    तुलसी के राम नाम की लूट में परलोक सुधरता है ,वर्तमान लोक में सुधार हर किसी की
नजर नहीं आता क्योंकि तुलसी की लूट में दिखावा नहीं होता ,जगत पर कम और आत्मा
को लाभ ज्यादा होता है मगर इस लूट में लोक सुधरता है और परलोक होता भी है इस पर
सोचने की जरूरत नहीं है।यह लूट जगत को दिखाई देती है और उड़ते पंखिड़े चाटुकारिता के
गीत भी गाते हैं।

  तुलसी के राम के नाम को लुटने के लिए ध्यान ,सुचिता,शुद्धता और एकाग्रता की जरूरत
पडती है मगर  इस  लूट  में  इसमें में से एक भी गुण की जरूरत नहीं पडती है। इस लूट में
ईमानदारी का नकाब पहन कर भी लाभ पाया और दिलाया जा सकता है।इसमें समान विचार
वाले लुटेरे जनता की सेवा,पूजा,अर्चना के नाम पर मिलझुल कर लूट सकते हैं।

   तुलसी के राम नाम की लूट में पापी और परोपकारी का भेद नहीं है जैसे ही राम नाम का
रंग लगता है पाप भी तिरोहित होने लग जाता है मगर अफसोस ...इस लूट में यह सुविधा
नहीं है। इस लूट में आम जनता को अलग रखा जाता है क्योंकि वही तो बकरा है ......!!         

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