शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

संस्कृति का फर्क

संस्कृति  का फर्क 

नवरात्रि के पर्व पर दौ संस्कृतियाँ एक साथ देखने को मिल रही है।एक और भारतीय
संस्कृति का गौरव है तो दूसरी और पाश्चात्य संस्कृति का पतन।
   
मैं शाम के समय मंदिर में गया था।   वहां पर एक अपूर्व  सुन्दरी   चितचोर  के साथ
खड़ी है।उस अपूर्व सुन्दरी  के  अंग-अंग  से सौन्दर्य  टपक रहा है मगर फिर भी लोग
शांत हैं। मुग्धता  के साथ   अपूर्व सुन्दरी को निहार रहे हैं।किसी की नजरो में अश्रद्धा
नहीं है।  अहोभाग्य हैं  उस युग  के लोग  जिन्होंने  साक्षात  राजदुलारी  सीताजी  को
निहारा होगा और राजाराम की निकटता पायी होगी।इनकी पत्थर की प्रतिमा में आज 
भी अद्भुत ताकत है कि जनकदुलारी जो युवा हैं ,उनको सभी बच्चे बूढ़े नौजवान आदर
से प्रणाम कर रहे हैं श्री राम के श्री विग्रह के समक्ष शीश झुका रहे हैं।

 जब में यहाँ से बाहर निकलता हूँ और थोड़ी ही दुरी पर चल रहे गरबा नृत्य के पंडाल
की ओर चला जाता हूँ। यहाँ भी  पाश्चात्य  परिधान  में कसी  हुयी  युवा नारियां जीती
जागती खड़ी है ,यहाँ भी सैंकड़ो लोग खड़े हो कर नृत्य देख भी रहे हैं मगर देखने वालो
की नजरो में श्रद्धा का भाव नहीं है ,सब और विकार भरा है,कामुकता का साम्राज्य है।

   मेरे मन में एक प्रश्न कौंधा - क्या कारण है कि  जिस  भारतीय  नारी  की पत्थर की
प्रतिमा को  देख  कर  मन  में नारी  के समक्ष सर झुक जाता है, जिस भारतीय नारी के
प्रतीक  चित्र को  सामने  देख  हम  शक्ति  स्वरूप से हाथ जोड़ते हैं , जिस भारतीय युवा
नारी के  विग्रह  को देख  कर ही  मन  के पाप  धुल जाया  करते  हैं  मगर जो नारियां
पाश्चात्य  परिधान  में ,बदन  से कसे  हुए कपड़ो में ज़िंदा खड़ी है,नृत्य कर रही हैं उनको
लोग विकार से देखते हैं ,कामुकता से देखते हैं ,उन को ललचाई नजरो से देखते हैं?

    लोग , जो मंदिर में थे और नारी के स्वरूप को हाथ जोड़े श्रद्धा से खड़े थे वे मन्दिर
से बाहर आकर श्रद्धा क्यों भूल गए ? क्यों आया  यह प्राचीन और अर्वाचीन भारतीय
नारी के रूप में फरक ?क्या पुरुष समाज आडम्बर कर रहा है या भारतीय नारी
पश्चिमी संस्कृति अपनाने के चक्कर में अपना गौरव खोती  जा रही है ?       

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