शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

आक और केक्टस

आक और केक्टस 

एक जंगल में आक और केक्टस के पौधे पास-पास में लगे
हुए थे।केक्टस पर कांटे और सुन्दर फूल लगे थे।केक्टस के
पास लगे आक के पौधे पर भी फूल लगे थे मगर कुरूप थे।

केक्टस अपने पर लगे लुभावने फूलों को देख मन ही मन
हर्षित हो रहा था ,उसने पास लगे आक के बड़े-बड़े पत्तों वाले
पौधे से कहा -
आक,तेरे में कुछ भी अच्छा नहीं है ,तू विष से भरा दूध
वाला विषैला पौधा है तेरे हर अंग में जहर है तथा तेरे
फूल भीअजीब सी दुर्गन्ध फैलाते हैं।




आक उत्तर दिया -  केक्टस,
मैं मानता हूँ कि तुम पर सुन्दर फूल आते हैं,मगर बिना सुगंध
वाले फूल सिर्फ देखने में ही अच्छे लगते हैं किसी के  काम  नहीं
आते तुम  खुद  भी  कंटीली झाडी हो ,तुम फूलों के साथ मोहक
लगते हो लेकिन किसी को सुन्दर बना नहीं सकते। मेरा आकार
और रंग रूप भले ही कुरूप है।मेरेशरीर में विषैला दूध जरुर है
मगर फिर भी मैं लोकोपयोगी हूँ। मेरा अंग-अंग उपयोगी है जो
मनुष्यों के चरम रोग ,वायुविकार,अंधेपन को ठीक कर देता है।

सार -मनुष्य यदि सिर्फ खुद के लिए ही जीता है तो वह
समाज के लिए सारहीन है चाहे वह दिखने में सुन्दर या
धनी क्यों न हो। कडवे स्वभाव वाला बैडोल व्यक्ति यदि
लोक उपकारक काम करता है तो समाज के लिए वह
स्तुत्य है।

                                                                                                                 (छवि- गूगल से साभार)                 


                                                                                                                                                    

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