मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

तीन लाइन


तीन लाइन 

एक प्रखर संत रामचरित का गान करने के लिए शहर में पधारे हुये थे।आयोजक मण्डल की
व्यवस्था के अनुसार हर दिन पाठ के आरम्भ होने से पहले व्यासपीठ पर विराजमान संत
का स्वागत करना होता था।एक दिन के लिए मेरा भी नाम स्वागतकर्ता में लिखा था।

       मैं उहापोह की स्थिति में था।मेरे मन में बार-बार एक सवाल कौंधता था कि श्री संत
के स्वागत करने के योग्य मैं  हूँ? मैं आत्मचिंतन करता रहा।

        नियत दिन मेरा नाम भी स्वागतकर्ता के रूप में मंच से पुकारा गया। मैं मंच पर नहीं
पहुँचा क्योंकि मेरी आत्मा मुझे मना कर रही थी।

       कथा के विराम के बाद आयोजक मंडल के सदस्य ने मुझसे पुछा -"आप संत श्री का
स्वागत करने मंच पर नहीं पहुंचे ,क्या आप नियत समय पर नहीं आये थे?

  मेने कहा -"ऐसी बात नही थी,मैं कथा श्रवण के लिए सही समय पर पहुँच गया था लेकिन
मैं उनके स्वागत करने के योग्य खुद को नहीं पा सका।

   आयोजक मंडल के सदस्य ने पूछा - आपने खुद को छोटा क्यों समझा ?

 मेने कहा -उसके कुछ कारण थे।जब आध्यात्मिक संत के स्वागत करने की बात आई तो
मैं पुराने ख्यालो में खो गया था। जब मैं कक्षा दौ का विद्यार्थी था,हमारे शिक्षक श्रुतिलेख के
समय एक वाक्य लिख देते थे और हमें उस लाइन को बार-बार लिखना होता था। हमारे
शिक्षक लिखाते थे -
                          1.सदा सत्य बोलो।

                          2.बड़ों का आदर करो।

                          3.दीन- दुखियों की सेवा करो।

मैं अभी तक इतने सालों के बाद भी पूर्ण रूप से ये तीन बातें भी अमल नहीं कर पाया हूँ
इसलिए मेरा साहस नहीं हो पाया कि मैं संत के स्वागत कर्ता के रूप में मंच पर हाजिर
हो पाऊं।            

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