गुरुवार, 29 नवंबर 2012

नस पकडिये और दबाइये!!

नस पकडिये और दबाइये!!

नस पकड़ना भी एक विद्या है ,यह कला स्कुल या कॉलेज में नहीं पढाई जाती है।इसको सिखने
के लिए कई शातिर या घाघ लोगों के चरित्र पर PHD करनी पडती है।नस दबाने से जीवन
में सफलता बिना कुछ करे कराये मिल जाती है।जो लोग कहते हैं कि सफलता का बाई पास
नहीं होता उसे नस पकड़ने और उचित समय पर दबाना सीखना चाहिए।

                  हमारे पहचान वाले एक दुस्साहसी ने एक आम आदमी की नस पकड़ी।बेचारा आम
आदमी उसके चरण पखारने लगा और उसकी चरण रज को माथे चढाने लगा।दुस्साहसी को
आम आदमी धीरे-धीरे भेंट चढाने लगा अब तो द्स्साह्सी के मजे हो गए।उसके मजे एक कोतवाल
की आँखों की किरकिरी बन गये और कोतवाल ने उस दुस्साह्सी की नस पकड ली और दबाई।
नस दबाते ही दुस्साहसी घबराया और टें -टें  करने लगा।अब कोतवाल के भी मजे हो गए।जब
मन करा नस दबा दी और सेवा पूजा कराने लगता।

                   कोतवाल की नस विद्या अफसर को समझ पड़ी तो अफसर ने भी विद्या सिख ली और
कोतवाल की नस दबा दी।कोतवाल इशारे पर नाचने लगा और अफसर के मजे हो गये।अफसर की
राजाशाही से उपरी अफसर जल उठा ,मैं बडासाहेब होकर भी मजे नहीं और ये अफसर मजे लूट
रहा है ,बड़े अफसर ने खोज की , नस विद्या की जानकारी हासिल की तो उसका प्रयोग भी कर
दिया छोटे अफसर पर।विद्या ने असर दिखाया और बड़े साहेब के भी ऐश हो गयी।

                 बड़े साहेब की ऐश नेताजी को मालुम पड़ी तो नेताजी ने जांच बैठा दी।जांच से जो रिपोर्ट
आई उसे पढ़कर नेताजी भोंच्चके रह गए।उन्होंने भी जन सेवा का काम दूर करके नस पकड़ने की
विद्या सिख ली,अब तो सब कुछ व्यवस्थित हो गया,सब एक दूजे की नस पकडे थे।सबके मौज थी.
सबको मजे में देख पराये पक्ष के नेता का पेट दर्द करने लगा उन्होंने सबको मस्त देखा तो गहन
छानबीन में लग गए और नस विद्या के कोर्स को सिख गए।अब तो वो भी नस पकड के दबाते रहते
हैं और सुख भोग रहे हैं।

                   नोट:- इस विद्या में सज्जन कहलाने वाले सरल लोग नापास होते रहे हैं और होते रहेंगे।                      

सोमवार, 26 नवंबर 2012

जुगाड़ और तिकड़म

 जुगाड़ और तिकड़म


राजनीतिक दल का,
सदस्य बनने की जुगाड़ में,
हम-
दल के दफ्तर में पहुँचे,
परचा भरा,
सदस्य बन गये;
सभा में बैठे,
कुछ की सुन के,
कान  पक गये,
हम अपने आप उठे ,
और बोले -चुप बे  चोर!!
इतना कहते ही,
मच गया वहाँ,
अफरातफरी और शोर,
तभी
एक सफेदपोश उठा,
और चिल्लाया-
किसने दी?
इस ईमानदार को,
राष्ट्रीय दल में ठोर ?
यह,
हमारे चरित्र को पढ़ता है!
हमें नापता है,तौलता है!
हम जो बोलते हैं, उसे समझता है!
हर बात को भाँपता है,परखता है! 
नहीं समझ पायेगा यह,
देश की राजनीती का यह दौर!!
फेँक दो इसे फिर से सड़क पर,
लगा कर दोनों हाथों का जोर।

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हमने पूछा-
गुरु,
राजनीति और तिकड़म में,
अब  फर्क  क्या?
वो बोले-
वत्स,
गांधी के साथ,
राजनीती और तिकड़म,
थे,
सीधी रेखा के दौ छोर।
गाँधी के बाद, 
समय के साथ,
रेखा की कमर को,
झुकाने का चला खेल!
वो मरोड़ते गये, 
वो झुकती गयी,
झुकते -झुकाते,
अब हो चुके ,
उस रेखा के छोर गोल-मटोल !! 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

हो-हा मन्त्र !

हो-हा मन्त्र !

हो-हा करना सिर्फ मूर्खो की ठेकेदारी नहीं है इसके बेहतरीन फायदे देख अच्छे  भले लोग भी
हो-हा करते नजर आ रहे हैं।इस देश में हो-हा मन्त्र से गरीब को नुकसान होता है क्योंकि
यह मन्त्र सिर्फ इस बेचारे की कुंडली में ही नीच घर में बैठा होता है।हो-हा करने से कई बड़ी
गलतियों के कुफल से मुक्ति मिल जाती है।यह मन्त्र अकेले में कम प्रभावशाली मगर
सामूहिक रूप से जपने पर तुरन्त मोटा प्रभाव छोड़ता है। इस मन्त्र का प्रथम अक्षर दम
लगाकर लम्बे श्वास से बोला जाता है।सामूहिक जाप में इसे एक लय में नहीं गाया जाता
है। समूह के लोग जो इसका तुरंत प्रभाव चाहते हैं इसे एक के बाद एक क्षण दौ क्षण के बाद
जोर से चिल्ला कर बोले। 

     हो-हा करने के कई फायदे हैं-

     1.अगर आवश्यक या प्राथमिक काम पूरा नहीं हुआ है या शुरू ही नहीं किया है और उस की
        जाँच होनी हो तो हो-हा करके बचा जा सकता है।

     2.अगर  कोई जबाबदारी थी और उसे निभाया नहीं गया हो तो हो-हा करके बचा जा सकता
        है।

     3. ऐसा  काम जिसके करने से लुच्चई को फंदा लगता हो और बिना लुच्चई के काम नहीं
         चल सकता हो तो हो-हा करना एक वैकल्पिक जरुरत बन जाता है।

      4. अगर झूठ की पोल खुलती हो और उससे झूठ के साबित हो जाने की प्रबल सम्भावना
          हो तो हो-हा का प्रयोग किया जा सकता है।

      5.तेजाबी सत्य जो व्यक्तित्व को नंगा करने पर तुला हो और तथाकथित आबरू नीलाम
          होने की कगार पर हो तो हो-हा करना ही अंतिम ब्रह्मास्त्र होता है।

      6. पुराने इल्जाम और पाप का घड़ा फूटने ही वाला हो तो हो-हा सिरप की तरह काम करता
          है।हो-हा के बीच पाप का घड़ा फूट भी जाए तो आवाज ही नहीं आती है।

      7. हो-हा आसुरी मन्त्र है जिसे असुर और नकली सभ्य समान रूप से जप सकते हैं।यह मन्त्र
          कारगर यानि अनुभूत सिद्ध है जिसका प्रयोग आये दिन (अ)पथ-प्रदर्शक करते रहते हैं।

      8. स्कुल,कॉलेज,सभा,खेल,राजनीती सब जगह, हो-हा प्रभावी उपाय के रूप में काम करता
           है।यदि पढ़ना नहीं है तो हो-हा मचाये , मूल मुद्दे से सभा को भटकाना हो तो हो-हा कीजिये
           कोई बढ़िया या घटिया काम जिसे नहीं होने देना या होने देना है तो हो-हा कीजिये।

      9. हो-हा मन्त्र का उपयोग बच्चे,किशोर,युवा,अधेड़,बुजुर्ग,स्त्री,पुरुष,नपुंसक सभी समान रूप
          से कर सकते हैं।

    10. हो-हा मन्त्र से अखाद्य वस्तुएँ आसानी से व्यावहारिक तरीके से हजम हो जाती है।तेज
          चीख-पुकार में देशी- डालडा सब स्वाहा हो जाता है।

   11. धोखा,विश्वासघात,धूर्तता,छल,ठगी आदि कार्य में इस महामंत्र का सामूहिक जाप कुछ
         मिनिट तक किया जाए तो तुरंत सफलता मिलती है।

   12. चोर,मक्कार,लुटेरे,कर्तव्य विमूढ़,ढ़ोंगी,द्रोही हो-हा मन्त्र का खूब इस्तेमाल करते हैं और
        यह प्रभावी मन्त्र मन चाहा फल भी तुरन्त दे देता है।           

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

दीपक और आतिशबाजी

दीपक और आतिशबाजी 

दीपक टिमटिमाता हुआ अँधेरे को चित्त कर रहा था ,तभी उसके पास पड़ी आतिशबाजी ने
कहा -दीप अब टिमटिमाना बंद करो।इस जमाने में तुझे कौन पूछता है।मुझे देखो ,मैं
आकाश की ऊँचाइयों को छू कर जगमगाती हूँ।

दीप ने कहा - तुम्हारा अहंकार ठीक नहीं है आतिश! ये सही है कि तुम दूर आकाश में जाकर
जगमगाती हो,मगर तेरी वह जगमगाहट क्षणिक है ,कुछ पलों के बाद तेरा अस्तित्व खत्म
हो जाता है मगर मैं जमीन पर रहकर भी लम्बे समय तक अँधेरे से संघर्ष करता हूँ और
लोगो को अँधेरे से लड़ने की प्रेरणा देता रहता हूँ

सार - मिथ्या आडम्बर से बचकर लोक हित का कार्य करने वाला श्रेष्ट होता है।    

रविवार, 11 नवंबर 2012

मच्छर पुराण के महत्वपूर्ण अंश .............

मच्छर  पुराण के महत्वपूर्ण अंश .............

मच्छ पुराण  सनातन काल से है और मच्छर पुराण का उल्लेख ताजा है।विकास की 
परिभाषा में मच्छर कहीं फिट नहीं बैठता है मगर फिर भी नई ऊर्जा उत्पन्न कर देता 
है यह आज का सच है ।

मकड़ियाँ जाले बुनती है, उनमे खुद सुरक्षित रहती है और मच्छरों को फँसा कर पेट
भरती है मगर मच्छर मकड़ियों को डंक मारे और मकड़ी दर्द से बिलबिलाये ऐसा 
सनातन में नहीं परन्तु इस नये दौर का सच है। 

मच्छर के काटने पर खुजला कर आत्म संतुष्टि प्राप्त करना सनातन है मगर अब सिर्फ 
खुजलाने से काम नहीं बनता है।अब मच्छर के जहर से अधिक खुद के खून में जहर 
पैदा करना जरूरी है।

मच्छर गंदगी से फैलता है यह सनातन है मगर गंदगी में रचे बसे कीड़े फलफुल रहे हैं 
और मच्छर कभी कभी भिनभिनाते हैं यह आज का सच है।

मच्छर के काटने पर बैचेनी आती है यह वेद भी कहते हैं मगर किसी दुश्मन को मच्छर 
काटने पर आनन्द हिलौरे मारता है यह वर्तमान का आठंवा सुख है और मच्छर अपनों 
को डंक मारे तो महान दू:ख है ।

मच्छर रोग फैलाते हैं यह सनातन है मगर मच्छर रोगी को बार बार काटे और उसका 
परिणाम निरोगी शरीर का बनना हो यह भी कटु सत्य है।

मच्छर के संगीत से मन उचाट खा जाता है यह सार्वभोमिक है मगर जोंक का मन ही 
उचाट खाए और बाकी का मन खुश हो जाये यह अभी का दर्शन है।

मच्छर से बस्ती परेशान यह सर्वत्र जन का कहना है मगर मच्छर से सिर्फ सत्ता परेशान 
और बस्ती मौज में यह आधुनिक सिद्धांत है।

मच्छर मच्छर होता है यह पोराणिक सच है मगर मच्छर की भी बड़ी औकात होती है 
यह इस जमाने का सच है 

मच्छर के काटने पर आदमी की मौत यह होता आया है मगर मच्छर के काटने से कोबरा 
की मौत यह अभी का सच है  

   
  

शनिवार, 10 नवंबर 2012

भीड़ तंत्र

भीड़ तंत्र 

वो -
काले दाग, 
जो सत्य की कब्र में दफन थे, 
एक मुँह फट की बदोलत, 
सफेद खादी के घेरे को तोड़,
देश भर में बिखर गए हैं।
किसी अकेले के दाग होते 
तो- 
लीप पोत कर साफ कर देते ;
मगर- 
ये तो भ्रष्ट मोतियों की लड़ी है,
जिसका धागा,मोती और पेंडल 
सब काला और वक्र है।
एक काला दुसरे को काला बता रहा है! 
एक चोर दुसरे को चोर बता रहा है !
असमंजस में आम आदमी ? 
चोरो से वफा की बातें सुन रहा है!
और वो  काला- 
किराये की भीड़ को, 
खुद की बेगुनाही का चाँद 
खुद के हाथ में दिखा रहा है!
मगर- 
भीड़ को
उसकी कहाँ परवाह, 
कि, 
वह काला है या सफेद? 
वह तो टकटकी बांधे 
उस ओर देख रहा है,  
जो -
चंद नोटों से इन्हें खरीद लाया है।      

रविवार, 4 नवंबर 2012

झूठा सच

झूठा सच 

देश में फर्जी आंकड़ो के तहत झूठ फैलाना तथाकथित  शिष्ट लोगो के जीवन का अंग बनता
जा रहा है। सिक्के के एक पहलू  को दिखा कर भ्रम पैदा किया जा रहा है।

आंकड़ा आया देश की 40% फसल उचित व्यवस्था के अभाव में नष्ट हो जाती है 

एक किसान से पूछा गया -आपके पास कितना बीघा खेत है?

उत्तर था- तीन बीघा।

आपके खेत में एक फसल कितने बोरी होती है?

गेंहू बोने पर आठ बोरी।

क्या तुम्हारे पास साधन नहीं होने से तीन बोरी गेंहू नष्ट हो जाता है?

उत्तर था- क्यों मेरा मजाक कर रहे हैं बाबू, मेरी पूरी पैदावार से पांच सेर गेंहू नष्ट हो जाता
है क्योंकि फसल को भरने के बोरे नहीं हैं मेरे पास,अगर बोरे  मिल जाते तो सेर भर भी
खराब नहीं होते।
                       ----------------------------------------------

एक माली से पूछा गया - आप सब्जी की बाड़ी में सब्जियां उगाते हैं?

उत्तर था -जी,आधा बीघा जमीन पर बाड़ी की है,चार-पांच तरह की सब्जियाँ बोता  हूँ।

आपके पास सब्जियों को मंडी तक ले जाने के पर्याप्त साधन नही होने से आधी सब्जियां
सड़ जाती है ?

माली बोला -बाबू, आधी सब्जी कैसे सड़ने दूंगा? हर दिन बाड़ी की देखरेख करता हूँ,जो
सब्जी पैदा होती है उसे ताज़ी ही साईकिल पर रख कर कस्बे में ले जाता हूँ और बेच
देता हूँ।
                      --------------------------------------------------

एक फल वाले से पूछा - आपने क्या बोया है।

उत्तर था -चीकू की फसल लेता हूँ।

क्या आपके पास साधन नही होने के कारण चीकू पेड़ पर या खेत में पड़े-पड़े सड़ जाते हैं

उत्तर था -बाबू,आप शहर से आये लगते हैं।पेड़ पर चीकू पका हुआ नहीं पैदा होता।फल को
लगाने और पकने में समय लगता है।हम अधपका चीकू  उतारते रहते हैं और बाजार में
बेचते हैं।अधपका चीकू सप्ताह भर तक खराब नहीं होता है।

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 एक किसान से पूछा -आपने खेत में क्या बोया था ?

उत्तर था- इस बार जीरा लगाया था

क्या जीरे की फसल का उचित भंडारण नहीं होने से जीरा  40% तक सड़ जाता है

उत्तर था-सा,ब, आपको कागजी ज्ञान है व्यवहारिक ज्ञान में कोरे लगते हो।आगे से ऐसा
सवाल किसी से ना करो इसलिए बता देता हूँ कि जीरा सालों तक सड़ता नहीं है।

                         --------------------------------------------------

हम आगे बढे और एक किसान से पूछा -आपने क्या बोया है
उत्तर था -ग्वार
क्या आपके गाँव में शीत गृह है जिसमे गवार की फसल को रखा जा सके ताकि ग्वार सड़े
नहीं।
उत्तर था -हा-हा-हा- ग्वार दस साल तक भी नहीं सड़ता है बाबू ! मगर तुम ये सब क्यों
पूछ रहे हो !!

मेने कहा -भाई ,सरकार कहती है कि किसान जो उपजाता है उसका 40%भाग साधन
नहीं होने के कारण नष्ट हो जाता है।उसकी उपज नष्ट नहीं हो इसलिए देश को FDI की
आवश्यकता है जो घर बैठे आपकी फसल खरीद लेगी और उचित भाव भी देगी।

उत्तर था- किस सरकार की बात करते हो भाई ,जो किसान को अच्छा बीज और खाद भी
मुफ्त में नहीं दे सकती है ,बीजली का भारी बिल भरवाती है और समय पर बिजली भी
नहीं देती है, रही बात फसल बेचने की तो इतनी समझ तो हम में भी आ गयी है कि खेत
पर फसल नही बेचना है ,उचित भाव बाजार में मिलने तक इन्तजार करना है।

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ये सब सुन कर क्या अब भी रिटेल FDI की जरुरत किसान के लिए महसूस करेंगे ,
देश को गुमराह ना करे।रिटेल में FDI सिर्फ बेरोजगारी उत्पन्न करेगी।पेट दुखता है
माथा दबाने से क्या फायदा ?FDI हर बिमारी का राम बाण इलाज तो नहीं हो सकती है                   
   

    

शनिवार, 3 नवंबर 2012

तेरी भी वाह -मेरी भी वाह!

तेरी भी वाह -मेरी भी वाह!

एक चोर ने दुसरे चोर पर आरोप लगाते हुये कहा -तूने जमीन लुटी!
दुसरे ने कहा -तुमने खजाना लुटा !!
पहले ने कहा -तूने दोनों लुटे !
दुसरे ने कहा -तूने भी दोनों लुटे और साथ में दलाली भी !
पहले ने कहा -ये सब तो तूने भी किया और साथ में फर्जीवाड़ा भी !
दुसरे ने कहा -तेरे को मौका मिले तो तू क्या पीछे रहेगा ?
पहले ने कहा -मौका मिलने पर करूंगा ,अभी तो तू जेब भर रहा है।
दुसरे ने कहा -छुटपुट चिल्लर तो तुझे भी लुटने दे रहा हूँ।
पहले ने कहा - तू मुझे बदनाम करता है
दुसरे ने कहा -तू भी तो मुझ पर कालिख पोतता है।
पहले ने कहा- तू मुझ पर आरोप लगाता है।
दुसरे ने कहा -तू कौनसा मुझे बख्शता है।
पहले ने कहा -मुझे अपनी दूकान चलानी है!
दुसरे ने कहा- मुझे कौनसा धंधा बंद करना है !
 
 इतने में तीसरे को आता देख दोनों एक साथ चिल्लाये -

चुप कर बे,लगता है मालिक आ रहा है ,तू मेरी वाह कर और मैं तेरी .


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता  !

कोई कुर्सी दे दे बाबा ! भ्रष्टाचार के नाम पर कोई  पद दे दे बाबा !!कोई छोटा मोटा पद ही दे दे
बाबा! बाहर से किसी की पुकार सुनकर मैं हतप्रभ रह गया।मन में उत्सुकता जगी और घर
के दरवाजे को खोल कर बाहर की  ओर झाँका, एक खुबसुरत जवान खड़ा था चोखट पर !

  मेने उससे पूछा -अरे! नौजवान ,किस तरह से माँगता है, टेर लगानी भी नहीं आती तुझे?

वह बोला -आपको गलतफहमी हो रही है श्रीमान ,मैं सही टेर लगा रहा हूँ।इस देश में भगवान्
के नाम पर न्याय नहीं मिलता है।मैं जब तक भगवान् के नाम पर माँगता था तब तक फटे-
हाल था मेरे पर मौन अटेक की  नीति कथा सुना दी जाती थी।मेने  ऊपर नजर दौड़ाई,मगर
वह भी मेरा मन मौह न सका ,पेट को राहू ल गा। आँधी छा गयी सपनों पर।

अब क्या चाहते हो ?

कुर्सी! कैसी भी हो, चलेगी।तुम बेवकूफ बन कर झूठे,मक्कार,फरेबी या धूर्त को भी दरवाजे पर
आने पर अपना भाग्य तक दे देते हो।मैं तुम्हें सच कह कर माँग रहा हूँ ,मुझे भी एक बार दे दो।

टूटी हुई  कुर्सी से क्या हासिल हो जाएगा जवान! मेने पूछा।

वो बोला- टूटी हुयी कुर्सी भी भ्रष्टाचार की संगत से चेहरा बदल लेगी।या तो दाता उसे दुरुस्त
कर देगा या नई दे देगा।

ऐसा कैसे हो सकता है प्यारे?

कुर्सी के खेल में ऐसा ही होता आया है सा,ब।जिसकी  जैसी बाजीगिरी वैसी ही ऊँची कुर्सी। मैं
भी अव्वल बाजीगर बनूँगा ,बस एक बार मदद कर दीजिये बाबू।एक बार आप देकर देखिये,
इतना बड़ा अहसान फरामोस बनूंगा की तू पुकारेगा तब भी याद नहीं करूंगा।गन्दी नाली का
कीड़ा समझूंगा ....सच कहता हूँ बाप ,बस कुर्सी दिला दो सा,ब।

मेरे को गाली देकर मुझसे ही कुछ उम्मीद लगा बैठे हो ?

तुम तो बरसों से मूढ़ थे बाप, कोई तेरे कंधे पर हाथ रख कर ले गया और गाल पर मार कर
छोड़ दिया मगर मैं ऐसा नहीं हूँ अन्नदाता।मैं कोई उम्मीद दिखा कर डकेती नहीं कर रहा
हूँ ,मैं सच कह कर मांग रहा हूँ।भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे बाबा।

मैं देने को मना कर दूँ तो ?

वह बोला-तो तेरा ही नुकसान होगा दाता।मुझे नहीं देगा तो किसी बेवफा के जाल में फंसेगा।
माथा धुन धुन कर रोयेगा और कहेगा उस मनहूस घड़ी में किस पर मुहर छाप दी ......

वह अगले घर की तरफ बढ़ गया था और जोर से टेर लगाई-कोई टूटी फूटी कुर्सी दे दे बाबा,
भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !!