शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता  !

कोई कुर्सी दे दे बाबा ! भ्रष्टाचार के नाम पर कोई  पद दे दे बाबा !!कोई छोटा मोटा पद ही दे दे
बाबा! बाहर से किसी की पुकार सुनकर मैं हतप्रभ रह गया।मन में उत्सुकता जगी और घर
के दरवाजे को खोल कर बाहर की  ओर झाँका, एक खुबसुरत जवान खड़ा था चोखट पर !

  मेने उससे पूछा -अरे! नौजवान ,किस तरह से माँगता है, टेर लगानी भी नहीं आती तुझे?

वह बोला -आपको गलतफहमी हो रही है श्रीमान ,मैं सही टेर लगा रहा हूँ।इस देश में भगवान्
के नाम पर न्याय नहीं मिलता है।मैं जब तक भगवान् के नाम पर माँगता था तब तक फटे-
हाल था मेरे पर मौन अटेक की  नीति कथा सुना दी जाती थी।मेने  ऊपर नजर दौड़ाई,मगर
वह भी मेरा मन मौह न सका ,पेट को राहू ल गा। आँधी छा गयी सपनों पर।

अब क्या चाहते हो ?

कुर्सी! कैसी भी हो, चलेगी।तुम बेवकूफ बन कर झूठे,मक्कार,फरेबी या धूर्त को भी दरवाजे पर
आने पर अपना भाग्य तक दे देते हो।मैं तुम्हें सच कह कर माँग रहा हूँ ,मुझे भी एक बार दे दो।

टूटी हुई  कुर्सी से क्या हासिल हो जाएगा जवान! मेने पूछा।

वो बोला- टूटी हुयी कुर्सी भी भ्रष्टाचार की संगत से चेहरा बदल लेगी।या तो दाता उसे दुरुस्त
कर देगा या नई दे देगा।

ऐसा कैसे हो सकता है प्यारे?

कुर्सी के खेल में ऐसा ही होता आया है सा,ब।जिसकी  जैसी बाजीगिरी वैसी ही ऊँची कुर्सी। मैं
भी अव्वल बाजीगर बनूँगा ,बस एक बार मदद कर दीजिये बाबू।एक बार आप देकर देखिये,
इतना बड़ा अहसान फरामोस बनूंगा की तू पुकारेगा तब भी याद नहीं करूंगा।गन्दी नाली का
कीड़ा समझूंगा ....सच कहता हूँ बाप ,बस कुर्सी दिला दो सा,ब।

मेरे को गाली देकर मुझसे ही कुछ उम्मीद लगा बैठे हो ?

तुम तो बरसों से मूढ़ थे बाप, कोई तेरे कंधे पर हाथ रख कर ले गया और गाल पर मार कर
छोड़ दिया मगर मैं ऐसा नहीं हूँ अन्नदाता।मैं कोई उम्मीद दिखा कर डकेती नहीं कर रहा
हूँ ,मैं सच कह कर मांग रहा हूँ।भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे बाबा।

मैं देने को मना कर दूँ तो ?

वह बोला-तो तेरा ही नुकसान होगा दाता।मुझे नहीं देगा तो किसी बेवफा के जाल में फंसेगा।
माथा धुन धुन कर रोयेगा और कहेगा उस मनहूस घड़ी में किस पर मुहर छाप दी ......

वह अगले घर की तरफ बढ़ गया था और जोर से टेर लगाई-कोई टूटी फूटी कुर्सी दे दे बाबा,
भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !!            
          

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