मंगलवार, 13 नवंबर 2012

दीपक और आतिशबाजी

दीपक और आतिशबाजी 

दीपक टिमटिमाता हुआ अँधेरे को चित्त कर रहा था ,तभी उसके पास पड़ी आतिशबाजी ने
कहा -दीप अब टिमटिमाना बंद करो।इस जमाने में तुझे कौन पूछता है।मुझे देखो ,मैं
आकाश की ऊँचाइयों को छू कर जगमगाती हूँ।

दीप ने कहा - तुम्हारा अहंकार ठीक नहीं है आतिश! ये सही है कि तुम दूर आकाश में जाकर
जगमगाती हो,मगर तेरी वह जगमगाहट क्षणिक है ,कुछ पलों के बाद तेरा अस्तित्व खत्म
हो जाता है मगर मैं जमीन पर रहकर भी लम्बे समय तक अँधेरे से संघर्ष करता हूँ और
लोगो को अँधेरे से लड़ने की प्रेरणा देता रहता हूँ

सार - मिथ्या आडम्बर से बचकर लोक हित का कार्य करने वाला श्रेष्ट होता है।    

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