सोमवार, 26 नवंबर 2012

जुगाड़ और तिकड़म

 जुगाड़ और तिकड़म


राजनीतिक दल का,
सदस्य बनने की जुगाड़ में,
हम-
दल के दफ्तर में पहुँचे,
परचा भरा,
सदस्य बन गये;
सभा में बैठे,
कुछ की सुन के,
कान  पक गये,
हम अपने आप उठे ,
और बोले -चुप बे  चोर!!
इतना कहते ही,
मच गया वहाँ,
अफरातफरी और शोर,
तभी
एक सफेदपोश उठा,
और चिल्लाया-
किसने दी?
इस ईमानदार को,
राष्ट्रीय दल में ठोर ?
यह,
हमारे चरित्र को पढ़ता है!
हमें नापता है,तौलता है!
हम जो बोलते हैं, उसे समझता है!
हर बात को भाँपता है,परखता है! 
नहीं समझ पायेगा यह,
देश की राजनीती का यह दौर!!
फेँक दो इसे फिर से सड़क पर,
लगा कर दोनों हाथों का जोर।

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हमने पूछा-
गुरु,
राजनीति और तिकड़म में,
अब  फर्क  क्या?
वो बोले-
वत्स,
गांधी के साथ,
राजनीती और तिकड़म,
थे,
सीधी रेखा के दौ छोर।
गाँधी के बाद, 
समय के साथ,
रेखा की कमर को,
झुकाने का चला खेल!
वो मरोड़ते गये, 
वो झुकती गयी,
झुकते -झुकाते,
अब हो चुके ,
उस रेखा के छोर गोल-मटोल !! 

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