सोमवार, 31 दिसंबर 2012

हम नहीं चाहते हैं कि बुराइयाँ रुके ........

हम नहीं चाहते हैं कि बुराइयाँ रुके ........

अँधेरे का विकराल अस्तित्व तब तक कायम है जब तक कोई लौ जलती नहीं है।हम कब तक
अँधेरा -अँधेरा पुकारते रहेंगे और एक दुसरे से कहते रहेंगे कि देखो,अँधेरा कितना भयावह हो
गया है।हमारे चीखने और चिल्लाने भर से अँधेरा खत्म हो जाता तो अब तक हुआ क्यों नहीं ?
हम गला फाड़ -फाड़ कर सालों से चिल्ला रहे हैं।हम दोष दर्शन कर रुक जाते हैं,हम दुसरे पर
दोष डालने के आदी हो गए हैं।हम चाहते हैं कि मैं कुछ भी कर सकता हूँ मगर दुनिया सदैव
मेरे साथ अच्छा सलूक करे।

        समस्या मूल रूप से यह है कि हम खुद को नैतिक,ईमानदार,सदाचारी और निर्भीक नहीं
बनाना चाहते हैं मगर हम चाहते हैं कि मुझ को छोड़कर सब नैतिक बन जाये!!

    भ्रष्टाचार की लड़ाई में लाखों लोग झुड़े मगर किसे ने भी सामूहिक रूप से सच्ची निष्ठा के
साथ यह कसम नहीं खायी कि मैं और मेरे बच्चे अब से भ्रष्ट आचरण नहीं करेंगे।नतीजा
ढाक के तीन पात .......

  बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर हमने खूब प्रदर्शन किया मगर किसी ने भी सामूहिक
रूप से सच्ची निष्ठां के साथ यह कसम नहीं खायी कि अब से हम या हमारे परिवार से किसी
को बलात्कारी नहीं बनने देंगे .....

  हमने सामजिक बुराइयों को हटाने के लिए कभी ठोस संकल्प नहीं लिया।हम चाहते हैं की
सामाजिक बुराई से कोई और व्यक्ति लड़े और मैं दूर से देखता रहूँ ,यह स्वप्न कैसे सच हो
सकता है ?

   हम या हमारा पुत्र जब रिश्वत का पैसा घर लाता है तो हम खुद को बुरा या पुत्र को बुरा नहीं
कहते हैं हम उसे समझदारी मान लेते हैं और दूसरा वैसा ही काम करता है तो हमारा नजरिया
बदल जाता है और वह भ्रष्ट आचरण लगने लगता है ,यह दोहरा नजरिया ही समस्या का मूल
है।

   जब हम गलत काम करते हैं और पकड़े जाते हैं तो खुद को निर्दोष साबित करने की पुरजोर
कोशिश करते हैं और दूसरा वैसा ही कर्म करता है तो उसे अपराधी मान लेते हैं।यह दोगलापन
कभी सभ्य और सुंदर समाज का निर्माण नहीं कर पायेगा।

 हम चाहते हैं कि पहले मैं या मेरा परिवार अकेला ही क्यों सुधरे,पहले वो सुधरे जिन्होंने बड़ा
अपराध किया है।हम खुद के अपराध को छोटा मानते हैं और दूसरों के अपराध को बड़ा।हम
इन्तजार करते हैं कि पहले जग सुधर जाए, खुद को बाद में सुधार ही लेंगे।

   यदि हम देश को सुधारने के फेर में पड़ेंगे तो बहुत समय गँवा देंगे मगर उससे ज्यादा नहीं
उपजा पायेंगे।यदि हम खुद को सुधार ले तो देश सुधरने में वक्त नहीं लगेगा।

  हम अनैतिकता का डटकर विरोध करे यह कदम अति आवश्यक है लेकिन साथ ही साथ
हम सामुहिक रूप से दृढ संकल्प करे कि हम खुद नैतिक और सदाचारी बनेगें।क्या हम
ऐसा करेंगे .... ? या यह प्रतीक्षा करेंगे कि पहले दुसरे लोग ऐसी प्रतिज्ञा करे और उसका पालन
करे ,यदि दुसरे लोग सुधर जायेंगे तो हम भी सुधर जायेंगे।

  देश के निर्माण के लिए हम ना तो अपराध करे और ना ही अपराध सहें।अच्छे परिणाम के
लिए हमे अपने कर्म अच्छे बनाने पड़ेंगे,यही एक रास्ता है जिस पर देर सवेर चलना पड़ेगा।
                      

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

कहाँ आकर खड़े हो गये हम ?

कहाँ आकर खड़े हो गये हम  ?

पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करते-करते हम कहाँ आ गये ? हमने अपनी संस्कृति छोड़ी
अपनी सभ्यता छोड़ी अपने सदग्रंथ छोड़े अपना परिवेश छोड़ा।हम बिना विचार किये छोड़ते
गये अपने आचार-विचार को अपनी वेशभूषा और संस्कृति को और अंधे होकर खोटे - खरे,बुरे-
भले का विचार किये बिना ही नए विचारों के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता को अपनाते गये ,
नतीजा हम दिशा विहीन हो गये हैं और आज राष्ट्र अनेक समस्याओं से ग्रसित हो गया है।

              हमने अपनी आश्रम जीवन प्रणाली को छोड़ा अपनी गुरुकुल प्रणाली को छोड़ा ,
उसकी जगह सह -शिक्षा को अपनाया ,मूल्यांकन कीजिये कि हमने क्या अर्जित किया।
हमारे युवा जो पहले वीर्यवान, उर्जावान, नैतिक, सुसंस्कृत, विद्वान,सदाचारी और सद्
व्यवहारी थे अब उनमे सभी सदगुणों की कमी झलकती है ,क्यों तथा इसके लिए
जिम्मेदार कौन ?

          ब्रह्मचर्य  आश्रम में 25 वर्ष की आयु तक रह कर विद्या अर्जन करना तथा सुयोग्य
नागरिक बनना होता था।इस काल में गुरु अपने शिष्यों को सुयोग्य नागरिक बनाता था,
विद्वान व्यक्ति बनाता था यानी गुरु अबोध बालक का सृजन करता था मगर वह व्यवस्था
लोप होने के बाद स्कुली शिक्षा पद्धति आई और उसके साथ ही सह शिक्षा।क्या यह शिक्षा
पद्धति हमारी संस्कृति का गौरव बढ़ा पायी है ?

            हम कहते हैं कि ये तो आदम के जमाने की सोच है?इस युग में यह संभव नहीं।आज
 विश्व कहाँ पहुँच गया है!विज्ञान कितना आगे निकल गया है!! ये सब तर्क हम दे सकते हैं
मगर मुद्दा यह है कि फिर सामाजिक समस्याएँ बढ़ी क्यों ? यदि हम आधुनिक हो गए हैं
तो हमारे समक्ष समस्यायें नहीं होनी चाहिए थी ?

            सह शिक्षा ने नारी का क्या भला किया ? सह शिक्षा ने इस देश की संस्कृति का क्या
भला किया ?हमे तुलनात्मक विचार करना ही पड़ेगा।

          हमने अपना परिवेश छोड़ा,क्या हमारे पूर्वज अपने परिवेश से असभ्य लगते थे ?
विवेकानंद और गांधी के चरित्र को जानने वाले,तिलक और पटेल को समझने वाले  इस पर
क्या तर्क देंगे ? जिस देश में युवा नारी शक्ति और लक्ष्मी के रूप में पूजीत है उस देश की नारी
पर आज जुल्म क्यों हो रहे हैं ? आज देश की नारी का स्वतंत्रता के नाम पर जितना शोषण
हो रहा है उतना इस देश की नारी का कभी नहीं हुआ था।वैदिक नारी का परिवेश और ज्ञान
आज से अच्छा था।वैदिक नारी की बोद्धिक योग्यता और व्यवहार ऊँचे दर्जे का था। भारतीय
परिवेश सोम्य था।पहनावा विकृतियों को कम कर देता है ,क्या यह सही नहीं है ?

        हर कोई कह रहा है कि समय बदल गया है,नैतिकता का ह्रास हो रहा है। बात सही है
परन्तु इसके लिए जबाबदार कौन ? इसके लिए हम सब कहीं ना कहीं जबाबदार हैं। विकृतियों
को रोकने के लिए कानून ही कठोर हो ,यह पूर्ण हल नहीं है।कानून कठोर हो और उसका पालन
भी पूर्ण रूप से शासन करवाए मगर हम भी नैतिक बने ,सद व्यवहारी बने,सौम्य परिधान
अपनाएँ, अपनी संस्कृति के अनुसार आचार विचार करे।सही और गलत परम्पराओं पर गहन
विचार करे आधुनिक बनने के लिये विचारों का स्तर ऊँचा होना चाहिए।

      हमारे चित्रपट,संचार साधन जो फूहड़ता दिखा रहे हैं उन्हें भी सोचना होगा क्योंकि वो जो
दिखाते हैं उसका असर अपरोक्ष रूप से करोड़ों लोगों पर पड़ता है।नारी देह को केन्द्रित कर
विज्ञापन दिखा कर व्यवसाय बढ़ाना या सिनेमा में फूहड़ दृश्य दिखाना क्या समस्याओं को
अनजाने में ही बढ़ावा देना नहीं है?

    सभ्य समाज के निर्माण के लिए कानून व्यवस्था, नागरिक,आध्यात्म,संस्कृति,विज्ञान
कला सभी क्षेत्र को एक मंच पर आकर सोचना होगा,तभी नए समाज का निर्माण होगा ।                             

रविवार, 23 दिसंबर 2012

माँगने गये न्याय और मिला क्रूर अत्याचार

माँगने गये न्याय और मिला क्रूर अत्याचार 

जलियाँवाला  काण्ड फिरंगियों ने गुलाम भारतीयों  पर किया उसे भूलना मुश्किल है
क्योंकि इस देश में आजादी के बाद भी आजाद भारतीयों पर इस तरह के क्रूर काण्ड
होते रहते हैं।

कानून जनता के लिए, जनता के द्वारा, होता है मगर इस देश के अहंकारी नेता इस तथ्य
को भूल जाते हैं। जब-जब भी इस देश में कोई अनाचार, अत्याचार होता है इस देश की
सरकार या तो खोटे  लुभावने वायदे करती है या कोरे आश्वासन देती है मगर पीड़ा का
माकूल ईलाज नहीं करती है , यह प्रश्न युवा भारतीयों से सहा नहीं जाता है और इसका
ठोस उत्तर पाने के लिये जब भी देश की संसद की ओर कूच करता है उसे मार-ठोक कर
भगा दिया जाता है।

जब -जब भी देश में कानून व्यवस्था पंगु और जर्जर हुयी है उसका खामियाजा आम
जनता को ही भुगतना पड़ा है क्योंकि विशिष्ट लोगों की सुरक्षा हो जाती है। संसद में
अच्छी लच्छेदार भाषा में बहस हो जाती है और स्वार्थी पक्ष देश हित को गौण करके
बहुमत के जोर पर कुछ भी करा लेने में सक्षम हो जाते हैं।क्या इसे ही सच्ची और सही
आजादी कहा जाएगा?

एक बेटी की इज्जत सरे आम देश की राजधानी में तार-तार हो जाती है परन्तु इस देश
की सरकार उस बेटी से अपनी जर्जर व्यवस्था के कारण हुए क्रूर अत्याचार के लिए उस
बेटी से माफी के दौ शब्द तक नहीं कह पाती है,यह सरकार देश को यह भी आश्वासन नहीं
दे पाती है कि आगे से हमारी व्यवस्था में ठोस परिवर्तन किये जायेंगे और किसी भी बेटी
को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का सामना नहीं करना पडेगा।

   यदि यह बेटी किसी बड़े नेता की होती तो क्या संसद चुप बैठ जाती ?क्या जो बेटे न्याय
की गुहार लगाने सडकों पर उतरे वो यदि किसी नेता के होते और उस पर पुलिस अमानवीय
तरीके से लाठियाँ बरसाती तो नेता चुपचाप सहन कर लेते? आम जनता को कह देते हैं कि
सब्र रखिये कानून अपना काम कर  रहा है मगर यह वाकया किसी विशिष्ट के घर पर घटता
तो न्याय की परिभाषा तुरंत नहीं बदल जाती? मगर आम जनता की किसे पड़ी है? वह  तो
वोट दे दे और पाँच साल के लिए सहती रहे।

     मुझे गर्व होता है उन युवाओं पर जो अपरिचित बेटी,बहन के लिए सरकार से टकरा रहे हैं
मुझे गर्व है उन बहनों पर जो लाठियां खाकर भी इस संग्राम में खड़ी है।मुझे गर्व है उन वृद्ध
पुज्यनीयों पर जो भयंकर सर्दी में भी कड़े कानून के लिए ठिठुर रहे हैं ,मगर हमारे सिस्टम
का जर्जरित ढाँचा देश का सिर झुक देता है।

    जो नेता देश की अस्मिता की कसम खाते हैं वे देश की बेटियों को त्वरित कानून देने में भी
ढील कर रहे हैं,यह देश का पहला बलात्कार नहीं है ,जनता सहन करती आई है इसलिए और
सहन करती रहे क्या यही व्यवस्था बची रह जायेगी?

  जब भी कोई जन आन्दोलन देश करता है चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ हो या लच्चर व्यवस्था
के खिलाफ ,सरकार अपनी कमी को सुधारने की जगह जनता पर ही दमन कर देती है। इस
नजरिये को बदलना पड़ेगा क्योंकि आज का युवा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बन रहा है।               

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध

विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध 

बुरी चीज शीघ्र फैल जाती है क्योंकि उसमें शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं पडती है।
किसी चीज के निर्माण में काफी समय लगता है और उसकी निरंतर देख-रेख रखनी
पडती है मगर उस चीज का विध्वंश करना हो तो बहुत ही कम समय लगता है।

         बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इस के लिए दोषी को कठोर दंड होना भी
चाहिए मगर केवल पुरुष वर्ग को ही दोषी ठहरा देना पूर्ण सत्य नहीं है।

         कोई भी अपराध विकृत कल्पना में जन्म लेता है वही विकृत कल्पना विचार
बन जाती है।विकृत विचार एक परमाणु के समान है जो नष्ट नहीं होता है और वह
उस विकृत पुरुष के अवचेतन मन में दबा रहता है।विकृति जब दबी रहती है तो
वह अतृप्त इच्छा बन जाती है और उसे पूरा करने के लिए जो कर्म होता है उसे हम
अपराध कहते हैं।

          हर काम के पूर्ण होने में कुछ परिबल कारण बनते हैं जैसे-समय,स्थान,स्थिति,
बल,सहायक आदि। जब ये चीजें एक साथ मिल जाती है तो काम पूर्ण होने की संभावना
बढ़ जाती है। काम उपकार का हो अपराध का कुछ परिबलों का मिलना अनिवार्य होता है।

         विकृतियों से संघर्ष करने के लिए या उनका उन्मूलन करने के लिए केवल दण्ड
नीति ही पर्याप्त है ऐसा मानना सही हल नहीं है।दण्ड से विकृति कम हो सकती है पर
समाप्त नहीं होती है।केवल बाहरी ईलाज ही काफी नहीं है मानसिक ईलाज भी साथ
चलना चाहिए।

      बलात्कार जैसी विकृत समस्या से निपटने के लिए हमें कुछ सावधानियां रखनी
होगी -

        दण्ड की सूक्ष्मतम व्याख्या करना और विधान को कठोर बनाना।

        नारी वर्ग की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करना परन्तु स्वच्छंदता को कम करना।

        नारी के कार्य का समय रात्रिकालीन बहुत कम रखा जाएँ और यदि अति आवश्यक
        है तो उसकी समुचित सुरक्षा व्यवस्था की जबाबदेही निश्चित की जाये।

        नारी पुज्य रूप में प्रतिष्ठित रहे इसलिए घर के बड़ों को चाहिए कि उसके वस्त्र
       चयन में सौम्यता झलके वैसे वस्त्र ही उसे पहनाएं क्योंकि वस्त्र यदि फूहड़ होंगे तो
       उनसे भी विकृति उत्पन्न होंगी।

       पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण ना हो उसकी अच्छी बाते ही अपनाई जाये।

       विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जीवन मूल्यों ,मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं,
       तथा लोक व्यवहार की शिक्षा अनिवार्य रूप से पढाई जाये।              

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

मोदी की जीत का कारण: मोदी

मोदी की जीत का कारण: मोदी 

गुजरात के चुनाव के बाद नतीजे की देश प्रतीक्षा कर रहा है।मोदी जीतेंगे ,यह गुजरात का
सच है।इस बार युवा मतदाताओं के कारण, मोदी का जादू 140+ विधायक निश्चित रूप से
लायेगा।जिन सीटों पर BJP पिछली बार कम मतों से हारी थी वे तो झोली में हैं ही मगर
कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर पर हो रही आलोचना भी कांग्रेस को गुजरात से हासिये पर धकेल
देगी!!

मोदी की जीत के तीन प्रमुख कारण होंगे -

 मोदी की कार्यशेली
 मोदी की विकास नीति
 मोदी के गरीब मेले की सफलता

कांग्रेस की हार के तीन प्रमुख कारण होंगे - 

केन्द्र सरकार में हुये बड़े-बड़े गपल्ले यानी भ्रष्टाचार!
बेतहाशा बढती महँगाई और गलत आर्थिक नीतियाँ !
गुजरात में बिना नेता का टोला !    

गुजरात की जीत मोदी की जीत है।जनता ने वोट सिर्फ मोदी के नाम पर दिये हैं! 

गरीबी खत्म हो चुकी है!!

गरीबी खत्म हो चुकी है!! 

महँगाई को,
सरकारी आंकड़े,
कच्चा ही खा रहे हैं,
दिन -प्रतिदिन,
सिकुड़ते गरीब को,
धनवान बना रहे हैं!
जबसे-
गरीबी हटाओ का,
नारा दिया है,
तब से-
बत्तीस के धनवान!
नित्य- निरंतर,
देश में पनप रहे हैं!!
महँगाई को कोसना,
देश के अमीरों की,
आदत बन चुकी है;
फाईल कहती है,
चार रुपल्ली में,
दौ जून की रोटी,
आराम से मिल रही है!
चीखना चिल्लाना,
बिलखना और रोना,
इस देश की जनता की,
आदत बन चुकी है!
आंकड़ों के मुताबिक,
इस देश से गरीबी,
कब की ख़त्म हो चुकी है!!!






  

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

ये कैसा फर्ज


ये कैसा फर्ज 

माँ -बाप के प्रति श्रद्धा मेरे देश में कम होना मन को ठेस पहुँचाता है।पुत्र की कामना के
लिए भगवान् की चोखट पर मन्नत मांगने वाले माँ -बाप जब पुत्र पा जाते हैं और उसमे
अपने सुखद बुढ़ापे के सपने देखते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है।बच्चों के लिए अपनी
हर सुविधा को न्योछावर कर जब वे बूढ़े हो जाते हैं। यदि  उनका जवान बेटा उनके सपनों
को निर्ममता से तहस -नहस कर देता है तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी ,इस बात
को महसूस करने के लिए  एक छोटा सा वृत्तांत दे रहा हूँ जो सत्य है-

               बात करीब दस साल पुरानी है।मेरे एक परिचित मुलत: राजस्थान के रहने
वाले हैं।उनके पिताजी ने इकलोते बेटे के लिए जीवन भर पुरुषार्थ कर पाई-पाई जोड़ी
और बेटे को सुरत में कपड़े की थोक व्यापार की दूकान करवा दी। बाप के द्वारा मिले
धन से बेटा सुरत में सेट हो गया और अपने व्यापार को काफी फैला लिया।

              एक दिन मैं उनकी दूकान पर बैठा था तब उनके गाँव से उनके पिताजी की
चिट्ठी आई।उन्होंने चिट्ठी पढ़ी और मुझे बताया कि उनके पिताजी की तबियत ठीक
नहीं है और उन्हें मिलने के लिए गाँव बुलाया है।

            मेने कहा-आपको गाँव पड़ेगा ,क्योंकि आप उनके इकलोते बेटे हैं?

उन्होंने कहा- बात तुम्हारी सही है परन्तु इस समय सीजन चल रही है।शादी ब्याह का
समय है।इस समय कपड़े में काफी बिक्री रहेगी और गाँव चला गया तो 15-20दिन लग
सकते हैं ऐसे में उन्हें संभावित बिक्री से होने वाले फायदे से वंचित रहना पडेगा।

मेने कहा- लेकिन आपके पास कोई विकल्प भी नहीं हैं ?

वो बोले- एक विकल्प है ,मैं उन्हें 20000/- का ड्राफ्ट भेज देता हूँ,शायद उनके पास पैसे
नहीं होंगे इसीलिए बुला रहे होंगे।पैसे मिल जाने से वे अपना इलाज करा लेंगे।

  बात यहीं पर हम दोनों के बीच उस दिन आई गई हो गयी और अगले दिन उन्होंने
20000/- का बैंक ड्राफ्ट बना कर गाँव भेज दिया।

       8-10के बाद उनके पास गाँव से रजिस्टर्ड पोस्ट से एक लिफाफा आया जो उनके
पिताजी ने भेजा था उन्होंने उस पत्र को पढ़ा और मुझसे कहा- मेरे पिताजी एकदम
बचकाना हरकत कर रहे हैं।मैने उनको 20000/-भेजे, उन्होंने वापिस लौटा दिए हैं।

मेने पूछा- ......वापिस क्यों लौटा दिए ?कुछ लिखा होगा ?

वो बोले- हाँ ,लिखा है ....और उन्होंने वह पत्र मुझे दे दिया। मेने उस पत्र को पढ़ा।
उसमे लिखा " बेटे,तुम्हारा जबाब मिला और साथ में ड्राफ्ट भी।मेने अपनी तबियत
अस्वस्थ थी इसलिए तुझे गाँव आने का लिखा था।तूने जो रूपये भेजे हैं वो तो मेरे ही
दिए हुए थे उसका कोई तकाजा मेने नहीं किया इसलिए ये रूपये वापिस भेज रहा हूँ।
मेने तो अपने बेटे को बुलाया था जो इस अवस्था में मुझे सहारा दे सकता था लेकिन
पैसे कमाने की चिंता मेरे स्वास्थ्य से बढ़कर है तेरे लिए,यह जानकार मुझे दु:ख हुआ।
तुम वहां सुखी रहो ,मेरी चिंता मत करना।मैं जैसे तैसे अपनी गाडी चला लूंगा।

    मेने वह पत्र अपने परिचित मित्र को वापिस दे दिया।कुछ दिनों बाद मालुम चला
कि मेरे परिचित व्यापारी के पिता का देहांत गाँव में हो चूका है और उनका इकलोता
बेटा  सुरत से सपरिवार अंतिम संस्कार के लिए गया है।

     यह घटना मुझे झकजोर गयी थी।मेरे भारत की यह तस्वीर कैसे बन गयी क्योंकि
मेरी संस्कृति सिखाती है-मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: ....कहाँ खो गयी वो भावनाएँ ......                       

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

क्या गुजरात की आलोचना करना फैशन बन गया है?

क्या गुजरात की आलोचना करना फैशन बन गया है?

चुनावी गहमागहमी में राष्ट्रीय नेता गुजरात के चक्कर लगा रहे हैं और गुजरात के विकास की
मनमाफिक व्याख्या प्रस्तुत कर आलोचना करते हैं। मोदी की आलोचना हो सकती है
यह तो राजनीती की बात है मगर गुजरात की गलत आलोचना क्यों?

         आलोचना यदि तथ्यात्मक हो और उसमे दम हो तो सुनने में ठीक लगती है मगर
गलत तथ्य से की गई आलोचना केवल देश और दुनिया में गलत भ्रम पैदा करती है और
गुजरात इस देश का मानवता विहीन प्रदेश हो ऐसा सबको जानबूझ कर महसूस करा के क्या
ये राज नेता देश का भला कर रहे हैं?

          चुनावी जंग में सब दल अपनी बात रखे और वास्तविकता से जनता को परिचय कराए
यह बात स्वस्थ है लेकिन जो सत्य से विहीन बात है उसे रखना राष्ट्रिय राजनेताओं को शोभा
नहीं देता है।

            गुजरात में कुपोषण देश के अन्य राज्यों से ज्यादा है और कुपोषण के लिए श्री लंका
के कुपोषित बच्चे का चित्र जनता के सामने रख दिया जाता है क्या यह दू:खद नहीं है गुजरात
के लिए।

           गुजरात में प्रति व्यक्ति कर्ज बढ़ गया है ? गुजरात ने कर्ज लिया लिया और धन का उपयोग
विकास के कामो में किया तो क्या क्या यह कर्ज राज्य की सुविधा और सम्पति को पतन के मार्ग
में ले जाने वाला है ,यदि नहीं तो फिर भ्रमित बातें क्यों?

          गुजरात में जनता असुरक्षित जीवन जी रही है ,यह आरोप मनमोहन साहब ने लगा दिया
आरोप लगाने से पहले यह नहीं सोचा कि महाराष्ट्र में फेस बुक पर कामेंट करने से शाहीन को
प्रताड़ित किसकी सरकार में होना पड़ा और वह लडकी अपना सुरक्षित भविष्य गुजरात में क्यों
देखती है? उत्तर सीधा है गुजरात एक दशक से शांति से जी रहा है।

         गुजरात का किसान बेहाल है यह आरोप लगाने से पहले राष्ट्रीय नेता यह नहीं देखते हैं की
पैदावार के हिसाब से गुजरात अग्रिम पंक्ति में खड़ा है ,उन्हें महाराष्ट्र,बिहार,उत्तरप्रदेश के किसानो
की हालत नहीं दिखती जो BPL हैं उन्हें तो गुजरात का समृद्ध किसान भी गरीब दीखता है और
उसे सिद्ध करने के लिए समाचार पत्रों के विज्ञापन में दुसरे प्रदेश के किसान की फोटो लगा कर
झूठ फैलाया जा रहा है।

         गुजरात शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है ,कैसा बेबुनियाद आरोप है। गुजरात के अंतर्राष्ट्रीय
कक्षा के विश्व विद्यालय उन्हें क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं ?गुजरात के बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में दौड़
लगा रहे हैं आने वाला समय गुजरात के ज्ञान और प्रतिभा का ही होगा।

        गुजरात का उद्योग आज मजदूरो की कमी से झुझ रहा है।manpower की कमी सब जगह है
अन्य  प्रदेशो से आने वाले लोग भी उस कमी को पूरा नही कर पा रहे हैं यह हकीकत है मगर आरोप
राष्ट्रीय नेता यह लगाते हैं की गुजरात में बेरोजगारी बढ़ रही है।गुजरात पुरुषार्थी लोगो का तीर्थ
स्थान है यहाँ काम करने वाला हर व्यक्ति समृद्ध है और जिसे काम नही करना है वह तो स्वर्ग में
भी बेरोजगारी फैला सकता है।

          गुजरात में बिजली और पानी की व्यवस्था नही है ऐसा आरोप कांग्रेस लगाती है लेकिन
आज इतने उद्योगों को 24 घंटे बिजली कौन दे रहा है ,सरदार सरोवर का पानी किसे मिल रहा है ?

       गुजरात में बड़े उद्योग ही पनप रहे हैं यह आरोप पाया बगेर है क्योंकि गुजरात में बहुत
बड़ी SSI  है छोटे और मध्यम उद्योग जाल की माफिक फैले हुए हैं।

         मोदी प्रसिद्धि घोटाला कर रहे हैं ,कोई भी घोटाला नहीं मिला तो राष्ट्रीय नेता जल भुन कर
मोदी की हर जगह हो रही काम की प्रशंसा को ही मुद्दा बना रहे हैं,क्या आज भारतीय इस नेता का
बखान कर रहा है तो मोदी से कुछ पाकर कर रहा है? क्या विदेशी लोग गुजरात के बिना भारत
अधुरा समझते हैं तो मोदी से कुछ लेकर समझते हैं? आत्म विश्वास वहीं पनपता है जो काम
करना जानता है सिर्फ बातों से कुछ नहीं होता है।

         राष्ट्रिय नेताओं ने गुजरात में आकर गुजरात की आलोचना की,उन्हें गुजरात की विशिष्टताएँ
क्यों नही दिखाई दे रही है?किसी भी राष्ट्रीय नेता ने आरोप जरुर लगाये परन्तु एक भी सकारात्मक
बात नहीं रखी। किसी भी दल ने गुजरात की प्रजा को यह विश्वास नहीं दिलाया की मोदी सरकार
ने जो विकास के झंडे गुजरात में गाड़े हैं उससे बड़े झंडे हमारी पार्टी गाड देगी क्योंकि गुजरात के
बेहतर भविष्य के लिए उनके  पास मोदी से बढिया सोच और योजना है और इमानदारी से अमल
करने का साहस है।

         गुजरात के कर्मठ लोग कर्म में विश्वास रखते हैं,गुजरात की राजनीती को समझना है तो
गुजराती मानसिकता का अध्ययन करना होगा।यह कर्मठ भूमि है ,विकास लोगो के खून में
समाया हुआ है,यहाँ काम ही पूजा है और इसी तथ्य को समझ मोदी शासन कर रहे हैं,अजेय
बने हुए हैं तथा बाकी दल सिर्फ केंकड़ा वृति में फंसे है।                   

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

मिलन

मिलन 

रात ढ़लती गई, हम गुनगुनाते गये
शमा जलती रही, हम पिगलते रहे

रात घुटती गई, चाँद चमकता गया
हुस्ने-आग में खुद  को  जलाते रहे

लटा उड़ती गई, तारे झलकते रहे
रात भर गेसुओं से यूँ उलझते रहे

आँखें जगती गई, नशा छाता रहा
वक्त को थामने जाम छलकाते रहे

प्यास बढती गई, लब मचलते रहे
खुद को बचाने में खुद को डुबाते रहे

साँसे रूकती गई,चाँद छिपता गया
फूल खिलता रहा  भँवरे  गाते  रहे  

     

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

विषं विषमेव सर्वकालम

विषं विषमेव सर्वकालम 

विष सदा विष ही रहता है कभी अमृत नहीं होता जैसे विष अपना स्वभाव नहीं बदलता 
इसी प्रकार अविश्वासी स्वभाव वाला मनुष्य कभी विश्वास योग्य नहीं बना करता।
                                                                                                                 ( चाणक्य )
कभी-कभी राजनीती में जनता भी धोखा खा जाती है और धूर्त के  माथे पर भी राजमुकुट 
रख देती है। क्या जनता के हीन कर्म का भोग धूर्त  को भोगना पड़ता है? ...नहीं,क्योंकि 
वह तो पहले ही सारहीन था बाद में भी सारहीन रहेगा । कर्म का सिद्धांत है जो करता है 
वही भोगता है।पर कर्म का एक सिद्धांत यह भी है कि करे कोई और भरे कोई।विचित्रता
तो तब होती है जब करने वाला भी भोगता है और दूसरा भी भोगता है।

            यदि लोग यह सोच कर नागराज को पालते हैं कि इसको तो मैं रोज दूध पिलाता 
हूँ इसलिए यह मुझे नहीं डसेगा या डस भी लेगा तो रोज दुध पीने के कारण नागराज का 
जहर भी अमृत बन गया होगा और उसका कोई दुष्प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ेगा।हम अंधे 
होकर किसी तथ्य की मनमाफिक व्याख्या करने में स्वतंत्र हैं मगर हमारी गलत व्याख्या 
करने से तथ्य नहीं बदल जाता है क्योंकि विष सदैव विष ही रहता है।दुर्जन उदारता का 
व्यवहार पाकर भी अवसर पाते ही अनिष्ट करने से नहीं चुकता है।

             विषेले साँप को कभी भी यह भय नहीं होता है कि विष के कारण समाज में उसका 
अपमान या तिरस्कार होगा।

              जो हो रहा है अच्छे के लिए हो रहा है।जो हुआ वह अच्छा ही हुआ।धूर्त का चरित्र 
जान और परख लेने का सुअवसर मिलने के कारण निकट भविष्य में जो अवसर आ रहा 
है उस पर सही निर्णय अवश्य ही भुक्त भोगी लेंगें क्योंकि वे जान गए है कि अयोग्य फैसला 
लिया तो नतीजा उन्हें भी भोगना है और दुसरो को भी मज़बूरी में भी भोगना पडेगा।            

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

FDI ,नेता और आम भारतीय

FDI ,नेता और आम भारतीय 

रिटेल में FDI पर सरकार और नेता क्या कहते हैं इस बात को महात्मा गांधी की विकास
नीति से शुरू करेंगे। महात्मा गांधी वो  शख्सियत है जिसको नमन सब पार्टियां करती है
परन्तु उसकी विचारधारा से भी पर्याप्त  दुरी भी सब ने बना रखी है।गांधी को नमन भी
उनके नाम पर वोट मिल जाते हैं इसलिए ज्यादातर करते हैं।

              महात्मा गांधी के कहने भर से देशवासियों ने विदेशी कपड़ो की होली जला दी
और खादी  के वस्त्र धारण कर लिए ,क्यों हुआ होगा उस समय ऐसा ? क्योंकि उस नेता में
देश प्रेम छलकता था और देशवासी उसका अनुकरण करते थे। गांधी ने कुटीर और लघु
उद्योगों के द्वारा देश के विकास का खाका खींचा क्योंकि गांधी को मालुम था भारत के प्राण
गाँवों में बसते हैं मगर इस विचारधारा को तुरंत ही  हांसिये पर धकेल दिया गया।

              गांधी ने फिरंगियों को बाहर किया ताकि देशवासियों का शोषण भविष्य में ना हो।
क्या उस समय भारत की गरीबी को गांधी नहीं जानते थे?गांधी जानते थे की गरीबी और
गरीब की मज़बूरी क्या होती है इसीलिए तो वे अध नंगा फकीर बने रहे। जो व्यक्ति भारत
की गरीबी को जानता हो क्या उसके पास उसका समाधान नहीं था? समाधान था,इसीलिए
गांधी कुटीर और लघु उद्योग चाहते थे ,सबको स्वाभिमान से जीता देखना चाहते थे,मगर
उनकी नीति को नहीं अपनाया गया इसलिए आज गरीब मिटता जा रहा है।

             अब बात FDI की ,सरकार तर्क देती है कि FDI से बिचोलिये खत्म हो जायेंगे।
यह बात सच है कि करोड़ो बिचोलिये खत्म हो जायेंगे,आत्म हत्या कर लेंगे या भिखारी
बन जायेंगे;मगर ये बिचोलिये हैं कौन? क्या वे भारतीय लोग नहीं हैं या ये विदेशी लोग हैं।
करोड़ो भारतीयों को बिचोलिये  बना कर सरकार उनकी रोटी छिनना क्यों चाहती है?जो
लोग खुद की व्यवस्था बना कर ,खुद की अल्प पूंजी लगाकर,खुद पुरुषार्थ और मेहनत कर
सरकार पर बिना भार बने अपना परिवार पाल रहे हैं वो बिचोलिये कैसे हो सकते हैं वो
तो भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग हैं।उन करोड़ो भारतीयों को बेरोजगारी के खप्पर
में क्यों होमना चाहती है सरकार?

           सरकार का दूसरा तर्क है कि बिचोलिये जब हट जायेंगे तो भारतीयों को सस्ते दामों
पर वस्तुए उपलब्ध हो जायेंगी।किन भारतीयों के लिए चीजें सस्ती होगी? 90%गरीब लोगों
के लिए या 10%अमीर लोगों के लिए ?क्योंकि 90% भारतीय तो गरीब है।क्या भारत में जीने
का वास्तविक अधिकार 10% के लिए ही होना चाहिए ?क्या सिर्फ 10%लोगो के लिए FDI
को लाकर 90%लोगो का शोषण वाजिब होगा?

           सरकार कहती है कि किसान FDI को अपना माल ऊँचे मूल्य पर बेच कर शोषण
मुक्त हो जाएगा ,क्या FDI समर्थित मूल्य से ऊपर दाम किसानो को देगा ?भारत की खेती
छोटे-छोटे भूमि के टुकडो में बँटी हुई है।ज्यादातर किसानो के पास पाँच -सात एकड़ जमीन
भी नहीं है।यदि एक एकड़ में तीन से चार बोरी गेंहू का उत्पादन मान लिया जाए तो 20-25
बोरी गेंहू किसान की पैदावार हुयी ,उसमे से किसान अपने उपयोग के लिए 10-12 बोरी गेंहू
रख लेता है और बाकी बाजार में बेचता है तो क्या FDI गाँव-गाँव जाकर वह धान लेगी ?
हर खेत की उपज का दाना अलग-अलग होता है ,क्या FDI सबके अलग-अलग किस्म के
धान को ऊँचे भाव में खरीद पाएगी?अगर नहीं तो फिर उस धान को कौन खरीदेगा ?बिचोलिये
को तो आप खत्म कर देंगे!

            सरकार कहती है किसान की फसल का 30-35%भाग वर्तमान में नष्ट हो जाता है।
कैसे हो जाता है ?जो किसान दिन रात मेहनत करके सोना उपजाता है वह उसे नष्ट होने देगा ?
किसान  की फसल में प्रमुख रूप से चावल,गेंहूँ मक्का,बाजरा,जीरा,सरसों,चना,मुंग आदि दाले
आती है ,क्या ये फसलें सड़ के खराब हो जाती है?.....फिर क्यों अनर्गल बातें की जाती है।

किसान सब्जियों में आलू,प्याज,लहसुन बड़ी मात्रा में पैदा करता है उसको सहेजने के लिए
कोल्ड स्टोरेज गाँव-गाँव में चाहिए,क्या FDI गाँव-गाँव में कोल्ड स्टोरेज का निर्माण करेगी
और कहेगी -हे किसान!तुम कोल्ड स्टोरेज में अपनी फसल रख लो और जब सही भाव आये
तब बेच लेना!! जो काम सरकार को करना चाहिए वह तो हो नहीं रहा और हम दूसरों के भरोसे
देश को छोड़ देना चाहते हैं।

             सरकार कहती है कि कोई नुकसान देश को नहीं होगा,देश की तरक्की होगी FDI के
आने से ?क्या FDI कोई परोपकारी संस्था है जो अपने देश का धन भारत में लुटाने आयेगी ?
FDI भारत से कमा कर अपने देश में धन ले जाने के लिए आएगी। FDI की दुकाने हर गली
नुक्कड़ में नहीं लगने वाली है इसलिए सब खुदरा व्यापारियों को नुकसान नहीं होगा,यह
सरकार कहती है,मगर 100/-के पिज्जा बर्गर की होम डिलेवरी करने वाली FDI 1000/-के
सामान की होम डिलेवरी नही करेगी?कीमतों को डम्पिंग करके छोटे किराना को नहीं डकार
जायेगी?

       हमारा ही आलू ,हमारा ही प्याज,हमारा ही आटा , मैदा ,हमारे ही आदमी उनका सिर्फ
बनाने का तरीका और उसके बदले में ले लिया चोखा नफा ...यह है FDI .  
                 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

भीड़ का टोटा

भीड़ का टोटा 

नेताजी की,
चुनावी सभा का,
आयोजन तय हो गया।
शामियाना वाला
सस्ते में, 
भोंपू वाला
पांच पर पांच फ्री
स्कीम में,
फूल वाला
पहनी माला वापिस लेकर
आधे में सेट हो गया।
बचा है मसला-
ताली बजाने वालो का,
जो रेट से अपसेट है,
पिछली बार से इस बार,
चढ़े तीन गुणे रेट है।
नेताजी ने पूछा -
ताली बजाने के रेट,
क्यों बहुत ज्यादा है?
महंगाई का दर,
पाँच साल से,
सिर्फ दस टका है।
कार्यकर्त्ता ने कहा -
भीड़ वाला
कुछ यूँ कहता है, 
दस टका का आंकड़ा,
पूरी तरह खोटा है।
इसलिये बाजार में,
ताली बजाने वाली
भीड़ का भारी टोटा है।
      

रविवार, 2 दिसंबर 2012

पतन का कारण


पतन का कारण 


हम सब सफलता चाहते हैं मगर फिर भी लक्ष्य दूर हो जाता है।लक्ष्य के दूर होने का
 कारण क्या है?

शास्त्र पतन के तीन कारण बताते हैं -1. लोभ  2. प्रमाद (आलस्य )3.विश्वास 

लोभ :- लोभ चाहे धन की प्राप्ति का हो,काम की प्राप्ति का हो या सम्पति की प्राप्ति का
     प्रारम्भ में आकर्षक लग सकता है मगर उसका अंत खराब ही रहता है।धन
    यदि बुध्धि से सात्विक प्रयत्न करके पुरुषार्थ से प्राप्त किया जाता है तो सफलता की
    पहचान होता है मगर प्राप्त धन का केवल संग्रह ही हो तो वह धन भी लोभ को बढ़ा
    देने में सक्षम हो जाता है और मन में असन्तुष्टि पैदा कर देता है।बहुत से चरित्रवान
    लोग सामाजिक,राजनैतिक या धार्मिक क्षेत्र में आते हैं और उन में से बड़ी संख्या में
   लोग उस क्षेत्र में आने का असल उद्धेश्य भूल जाते हैं और लालसा ,इच्छा ,लालच के
   चक्रव्यूह में फँस जाते हैं।लोभ जैसे ही उन पर बलवान होता है उनसे अनैतिक काम
   करवा लेता है परिणाम यह होता है कि वे मृत्यु तुल्य दू:ख भोगते हैं।
                   धन कमाना अच्छी बात है परन्तु उसका सदुपयोग करना उससे भी अच्छी
  बात है।धन के सदुपयोग का आडम्बर भी दु:ख देता है,मन को अशांत कर देता है।कीर्ति
  और वाहवाही का लोभ भी शान्ति नहीं देता चाहे क्षेत्र परमार्थिक भी क्यों न हो।

               काम का लोभ नाना प्रकार के बन्धनों में डाल देता हैऔर अपयश का कारण
   बनता है।काम का लोभ रावण की मौत का कारण बना,काम के वशीभूत होकर कामी
  दुराचार में रच जाता है और समाज में अशांति उत्पन्न कर खुद अपराधी का जीवन
  भोगता है।

          जमीन,सम्पति का लोभ महाभारत के भयानक युद्ध का कारण बना।ताकत के बल
   पर,अन्याय के जोर पर,बाहुबल का भय पैदा कर सम्पति का अर्जन कभी भी सुखद
   भविष्य नहीं देता है।


प्रमाद (आलस्य):-  हर काम में प्रमाद की आदत बना लेना पतन का मार्ग है।प्रमाद समय
    के मूल्य को नहीं पहचानता है और समय पुन: आता नहीं है। प्रमाद किसी भी उम्र में हो
    हानि ही पहुंचाता है।विद्यार्थी यदि प्रमाद करता है तो अकुशल रह जाता है,व्यापारी यदि
    प्रमाद करता है तो हानि सहता है,राजा यदि प्रमाद करता है तो सत्ता दुश्मन के हाथ चली
   जाती है, सेवक यदि प्रमाद करता है तो दण्ड का भागी बनता है।परिवर्तन का होते रहना
   एक सिद्धांत है और उसको रोकने की चेष्टा प्रमादी ही करता है जो कुचेष्टा के भयंकर
   परिणाम भी भोगता है।वेद चरेवेति -चरेवेति का मन्त्र देते हैं।विवेका नन्द उठो!जागो!का
   मन्त्र देते हैं।प्रमाद नहीं करने वाला सामान्य प्राणी है और सामान्य गति ही रख पाता है
  तो भी देर सवेर लक्ष्य को पा लेता है।


विश्वास  :- विश्वास  एक विराट शब्द है और उसका सही अर्थ नहीं करने पर पतन का
     कारण बन जाता है। सम्यक विश्वास ,अति विश्वास ,अंध विश्वास या शंका का
     स्वभाव ; इन सब में विश्वास सम्यक होना चाहिए सजग होना चाहिए। विश्वास
    तराजू है ,किसी पर भी विश्वास करने से पहले उसे विश्लेषण पर रखना चाहिए,
    परखना चाहिए,तथ्यात्मक जाँच करनी चाहिए।अति विश्वास आत्मघाती होता
    है ,अंध विश्वास मृत्यु तुल्य परिणाम देता है और शंका का स्वभाव तुच्छ  बना
    देता है।


यदि हम सफल होना चाहते हैं तो इन पर सतत निगाह रखनी चाहिये।              

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

चुहिया और शेर

चुहिया और शेर 

जँगल का राजा शेर एक सरोवर के पास बैठा सुस्ता रहा था।शेर को वहाँ देख पानी
पीने के लिए आने वाले पशु दूर से ही वापिस निकल जाते,मगर शेर भी वहां जम
कर बैठ गया था।बेचारे पशु क्या करे ,इन्तजार के सिवा कोई उपाय नहीं बचा था।

   सरोवर से दूर काफी पशु इकट्टा हो गए। सांड ने हाथी से कहा- दादा ,आप तो
शेर से काफी बड़े हैं ,वजनदार डील है फिर शेर से क्यों डर रहे हैं ?

  हाथी बोला- बात डर या मोटे होने का नहीं है दरअसल इस सरोवर में पानी कम
है इसलिए सोचता हूँ कि यदि मैं अकेला सारा पानी पी गया तो आप सब प्यासे
रह जायेंगे इसलिए पानी पीने का विचार बदल चूका हूँ।

   तभी वहां पर गेंडा आ गया उसने भी शेर को देखा तो वहीँ रुक गया। उसे रुकते
देख हाथी ने कहा -गेंडा बेटे ,सरोवर पर पानी पीने आये हो तो यहाँ क्यों रुक गए?

  गेंडे ने कहा-दादा, मैं तो आपको देख कर यहाँ तक चला आया,मुझे प्यास नहीं है
बस आपसे भेंट नहीं हुयी थी इसलिए आपको देख ईधर चला आया।

     थोड़ी देर में बाघ भी पानी पीने आ गया ,मगर शेर को देख वह भी हाथी ,सांड
और गेंडे के पास रुक गया।सांड ने बाघ से कहा -आप बहुत प्यासे लग रहे हैं ,क्या
सरोवर पर जा रहे हैं?

   बाघ ने कहा-नहीं ,मैं तो गुफा की तरफ जा रहा था आप सब को देख इधर चला
आया।यहाँ हाथी दादा,गैंडा भैया को देख मिलने चला आया।

  थोड़ी देर में एक प्यासी चुहिया वहां आ गयी।हाथी,गेंडे,सांड,बाघ को देख वह भी
वहां रुक गयी।गेंडे ने कहा -चुहिया बहन ,क्या पानी पीने जा रही हो?

 चुहिया बोली -हाँ भैया, प्यास लगी है मगर आप सब यहाँ क्या कर रहे हैं ?

सांड बोला- बहन हम तो गप शप के लिए रुक गए हैं।तुम सरोवर तक जा रही हो
तो शेर आका को जगा देना।

  चुहिया सरोवर की तरफ चल पड़ी और सरोवर पर सुस्ता रहे शेर के पंजे पर
खुजाली करते बोली -आका उठो?

 शेर ने कहा-मैं यहाँ सुस्ता रहा हूँ ,शाम तक यहीं रुकुंगा,तुम जाओ।

चुहिया ने फिर खुजाली करते हुए कहा-आका उठो।

शेर ने कहा-तुम चली जाओ ,मुझे सुस्ताने दो।

चुहिया फिर शेर के पंजे पर चढ़ कर बोली-आका उठो।

शेर को आराम के वक्त चुहिया का खलल जँचा नहीं।उसने जोर से दहाड़ कर पंजा
घुमाया , पंजे पर बैठी चुहिया सरोवर के बीच में जा गिरी और मर गयी।

सार- बिना सोचे समझे किसी की बात पर अमल करना  मुसीबत को सामने से न्योता देना है।