रविवार, 2 दिसंबर 2012

पतन का कारण


पतन का कारण 


हम सब सफलता चाहते हैं मगर फिर भी लक्ष्य दूर हो जाता है।लक्ष्य के दूर होने का
 कारण क्या है?

शास्त्र पतन के तीन कारण बताते हैं -1. लोभ  2. प्रमाद (आलस्य )3.विश्वास 

लोभ :- लोभ चाहे धन की प्राप्ति का हो,काम की प्राप्ति का हो या सम्पति की प्राप्ति का
     प्रारम्भ में आकर्षक लग सकता है मगर उसका अंत खराब ही रहता है।धन
    यदि बुध्धि से सात्विक प्रयत्न करके पुरुषार्थ से प्राप्त किया जाता है तो सफलता की
    पहचान होता है मगर प्राप्त धन का केवल संग्रह ही हो तो वह धन भी लोभ को बढ़ा
    देने में सक्षम हो जाता है और मन में असन्तुष्टि पैदा कर देता है।बहुत से चरित्रवान
    लोग सामाजिक,राजनैतिक या धार्मिक क्षेत्र में आते हैं और उन में से बड़ी संख्या में
   लोग उस क्षेत्र में आने का असल उद्धेश्य भूल जाते हैं और लालसा ,इच्छा ,लालच के
   चक्रव्यूह में फँस जाते हैं।लोभ जैसे ही उन पर बलवान होता है उनसे अनैतिक काम
   करवा लेता है परिणाम यह होता है कि वे मृत्यु तुल्य दू:ख भोगते हैं।
                   धन कमाना अच्छी बात है परन्तु उसका सदुपयोग करना उससे भी अच्छी
  बात है।धन के सदुपयोग का आडम्बर भी दु:ख देता है,मन को अशांत कर देता है।कीर्ति
  और वाहवाही का लोभ भी शान्ति नहीं देता चाहे क्षेत्र परमार्थिक भी क्यों न हो।

               काम का लोभ नाना प्रकार के बन्धनों में डाल देता हैऔर अपयश का कारण
   बनता है।काम का लोभ रावण की मौत का कारण बना,काम के वशीभूत होकर कामी
  दुराचार में रच जाता है और समाज में अशांति उत्पन्न कर खुद अपराधी का जीवन
  भोगता है।

          जमीन,सम्पति का लोभ महाभारत के भयानक युद्ध का कारण बना।ताकत के बल
   पर,अन्याय के जोर पर,बाहुबल का भय पैदा कर सम्पति का अर्जन कभी भी सुखद
   भविष्य नहीं देता है।


प्रमाद (आलस्य):-  हर काम में प्रमाद की आदत बना लेना पतन का मार्ग है।प्रमाद समय
    के मूल्य को नहीं पहचानता है और समय पुन: आता नहीं है। प्रमाद किसी भी उम्र में हो
    हानि ही पहुंचाता है।विद्यार्थी यदि प्रमाद करता है तो अकुशल रह जाता है,व्यापारी यदि
    प्रमाद करता है तो हानि सहता है,राजा यदि प्रमाद करता है तो सत्ता दुश्मन के हाथ चली
   जाती है, सेवक यदि प्रमाद करता है तो दण्ड का भागी बनता है।परिवर्तन का होते रहना
   एक सिद्धांत है और उसको रोकने की चेष्टा प्रमादी ही करता है जो कुचेष्टा के भयंकर
   परिणाम भी भोगता है।वेद चरेवेति -चरेवेति का मन्त्र देते हैं।विवेका नन्द उठो!जागो!का
   मन्त्र देते हैं।प्रमाद नहीं करने वाला सामान्य प्राणी है और सामान्य गति ही रख पाता है
  तो भी देर सवेर लक्ष्य को पा लेता है।


विश्वास  :- विश्वास  एक विराट शब्द है और उसका सही अर्थ नहीं करने पर पतन का
     कारण बन जाता है। सम्यक विश्वास ,अति विश्वास ,अंध विश्वास या शंका का
     स्वभाव ; इन सब में विश्वास सम्यक होना चाहिए सजग होना चाहिए। विश्वास
    तराजू है ,किसी पर भी विश्वास करने से पहले उसे विश्लेषण पर रखना चाहिए,
    परखना चाहिए,तथ्यात्मक जाँच करनी चाहिए।अति विश्वास आत्मघाती होता
    है ,अंध विश्वास मृत्यु तुल्य परिणाम देता है और शंका का स्वभाव तुच्छ  बना
    देता है।


यदि हम सफल होना चाहते हैं तो इन पर सतत निगाह रखनी चाहिये।              

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