शनिवार, 22 दिसंबर 2012

विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध

विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध 

बुरी चीज शीघ्र फैल जाती है क्योंकि उसमें शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं पडती है।
किसी चीज के निर्माण में काफी समय लगता है और उसकी निरंतर देख-रेख रखनी
पडती है मगर उस चीज का विध्वंश करना हो तो बहुत ही कम समय लगता है।

         बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इस के लिए दोषी को कठोर दंड होना भी
चाहिए मगर केवल पुरुष वर्ग को ही दोषी ठहरा देना पूर्ण सत्य नहीं है।

         कोई भी अपराध विकृत कल्पना में जन्म लेता है वही विकृत कल्पना विचार
बन जाती है।विकृत विचार एक परमाणु के समान है जो नष्ट नहीं होता है और वह
उस विकृत पुरुष के अवचेतन मन में दबा रहता है।विकृति जब दबी रहती है तो
वह अतृप्त इच्छा बन जाती है और उसे पूरा करने के लिए जो कर्म होता है उसे हम
अपराध कहते हैं।

          हर काम के पूर्ण होने में कुछ परिबल कारण बनते हैं जैसे-समय,स्थान,स्थिति,
बल,सहायक आदि। जब ये चीजें एक साथ मिल जाती है तो काम पूर्ण होने की संभावना
बढ़ जाती है। काम उपकार का हो अपराध का कुछ परिबलों का मिलना अनिवार्य होता है।

         विकृतियों से संघर्ष करने के लिए या उनका उन्मूलन करने के लिए केवल दण्ड
नीति ही पर्याप्त है ऐसा मानना सही हल नहीं है।दण्ड से विकृति कम हो सकती है पर
समाप्त नहीं होती है।केवल बाहरी ईलाज ही काफी नहीं है मानसिक ईलाज भी साथ
चलना चाहिए।

      बलात्कार जैसी विकृत समस्या से निपटने के लिए हमें कुछ सावधानियां रखनी
होगी -

        दण्ड की सूक्ष्मतम व्याख्या करना और विधान को कठोर बनाना।

        नारी वर्ग की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करना परन्तु स्वच्छंदता को कम करना।

        नारी के कार्य का समय रात्रिकालीन बहुत कम रखा जाएँ और यदि अति आवश्यक
        है तो उसकी समुचित सुरक्षा व्यवस्था की जबाबदेही निश्चित की जाये।

        नारी पुज्य रूप में प्रतिष्ठित रहे इसलिए घर के बड़ों को चाहिए कि उसके वस्त्र
       चयन में सौम्यता झलके वैसे वस्त्र ही उसे पहनाएं क्योंकि वस्त्र यदि फूहड़ होंगे तो
       उनसे भी विकृति उत्पन्न होंगी।

       पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण ना हो उसकी अच्छी बाते ही अपनाई जाये।

       विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जीवन मूल्यों ,मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं,
       तथा लोक व्यवहार की शिक्षा अनिवार्य रूप से पढाई जाये।              

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