रविवार, 29 दिसंबर 2013

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव 

अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो कहा था कि इस देश को भारतवासी नहीं चला पायेंगे
और यह फिर से गुलाम हो जायेगा ,क्यों कहा था उन्होंने ऐसा ?क्योंकि वह जानते
थे हम भारत को ऐसी शिक्षा प्रणाली देकर जायेंगे जिसको पढ़ कर युवा दिशा हिन हो
जायेगा और भटक जायेगा।

आज इस देश के सामने मुख्य दौ समस्याएँ हैं पहली भ्रष्टाचार और दूसरी बेरोजगारी
इन दोनों समस्याओं ने कई नयी समस्याओं को जन्म दिया है जैसे- ध्वस्त होती
संस्कृति,महिला असुरक्षा ,जातिवाद,कर्तव्य बोध का अभाव आदि।

मुख्य समस्या भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से भारत ने निपटने के प्रयास किये और
वे प्रयास असफल होते गये और देशवासी इन समस्याओं से तालमेल बैठाकर जीना
सीख गए हैं और नतीजा यह कि ये बीमारियाँ बढ़ती ही जा रही है।

इन मुख्य समस्याओं से झुंझने का प्रयास सिर्फ फोरी तोर पर समय -समय पर
होता रहा है जैसे -आरक्षण,धरना ,आंदोलन प्रदर्शन या कानून लिख कर। ये उपाय
स्थायी नहीं हैं क्योंकि इससे समस्याओं की जड़ को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
क्या कठोर सजा ही सब समस्याओं का हल है ?समाज विज्ञान इसे नहीं मानता।
हमारे देश में अब बच्चे भी अवैधानिक काम कर के पकडे जा रहे हैं,प्रश्न यह उठता
है कि बच्चों के मन में अपराध को अंजाम देने के भाव आये कहाँ से ?ये अपराध
बच्चा सीखा कैसे ?इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?

विडंबना है कि इन बातों पर हमारे जनसेवक कभी संसद में चर्चा नहीं करते ,ना
सामाजिक सगंठन इस विषय पर चर्चा करते हैं। बड़ा दुःख है कि हम लीव इन
रिलेशन लाते हैं ,हम समलैंगिगो के लिए संवेदना लाते हैं.हम गर्भपात को बढ़ावा
देते हैं,हम महिलाओं कि असामान्य वेशभूषा को प्रोत्साहित करते हैं मगर शिक्षा
पर कभी बृहद चर्चा नहीं करते जो की मुख्य है।

गणतंत्र भारत को कैसी शिक्षा प्रणाली की जरुरत है इस पर कभी कोई NGO
आंदोलन या धरना नही करता।शिक्षा का स्वरुप कैसा हो इस पर कभी जनमत
नहीं लिया जाता ,जबकि अनैतिक जोड़ गणित के लिए जनमत होते रहते हैं
कारण यही की इससे सत्ता नहीं मिलती।

देश के नेता इस पर चर्चा नहीं करते जबकि चुनाव के समय अपने लिए वोट की
गुहार लगाने घर-घर योजना बद्ध तरीके से पहुँच जाते हैं।

KG से कक्षा पाँच तक का सेलेबस क्या हो ?क्योंकि बच्चा इस समय कोमल मन
का होता है उसे जो सिखाया जाता है वह उसे ग्रहण करता है और यही बाल संस्कार
उसके जीवन को गढ़ते हैं। कक्षा 6 से 8 तक का सेलेबस क्या हो ?इस उम्र में बच्चा
सीखता है और सोचता है। हमारी शिक्षा यहाँ आकर किताबी बन जाती है। बच्चा
किताबों में उलझ जाता है और कीड़ा बनने का प्रयास करता है जबकि सर्वांगीण
विकास हमारा लक्ष्य होना चाहिए।हम यहाँ से बच्चे को संविधान का धर्म नहीं
पढाते हैं ,सँस्कार और संस्कृति को लिखना सिखाते हैं मगर उसे जीवन में उतारना
नहीं सिखाते। कक्षा 9 से 12  जिसमे बच्चा बालिग़ होने लगता है तब तक वह
केवल यही जानता है कि तोता रटन्त परीक्षा पास करने के लिये जरुरी है।
अभिभावक भी कुछ नहीं कर पाते और शिक्षा प्रणाली के अनुरूप बच्चों को तोता
रटन्त करवाते हैं नतीजा बच्चा संस्कार, संस्कृति, सदाचार,नैतिकता को जीवन
में उतारने का अवसर खो देता है।

मेरे देश में कक्षा 12 के बाद बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ना छोड़ देते हैं और ये अनगढ़
बच्चे भारत निर्माण में लग जाते हैं ,ये बच्चे कैसा और कितना योगदान श्रेष्ठ
भारत निर्माण के लिए दे पायेंगे ,जरा आप खुद सोचे।

कॉलेज और मास्टर डिग्री के छात्र सिर्फ जीवन यापन के लिए पढ़ते हैं ,वे इस
कर्तव्य से अनजान हैं की उनकी समाज के लिए कोई जबाबदेही है। हमारी
कागजी डिग्रियाँ जब रोजगार का निर्माण नहीं कर पाती तो युवा हताश हो जाता
है और छोटी मोटी सरकारी नौकरी के लिए चक्कर लगाता है और उसे पाने के
लिए भ्रष्टाचार से समझौता कर लेता है और यही से वह खुद भ्रष्ट जीवन जीने
को धकेल दिया जाता है।

शिक्षा स्वावलम्बी हो ,सभ्य समाज का निर्माण करने वाली हो ,संस्कृति और देश
भक्ति प्रधान हो। इस व्यवस्था के बिना सुराज्य संभव नहीं है             

भू-लोक तन्त्र !!

भू-लोक तन्त्र !! 

एक गाँव के प्रवेश द्वार के पास एक कँटीला पेड़ था और उस पेड़ से कुछ दुरी पर
एक साधु की कुटिया थी। पेड़ के बड़े-बड़े काँटों से आये दिन कोई न कोई आदमी
चुभन का शिकार होता रहता।

एक दिन किसी राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से बिलबिला उठा। उसे लगा
की कुछ ऐसा काम कर दूँ ताकि अन्य राहगीर को काँटे न चुभे। अगले दिन उसने
एक बड़ा बोर्ड बनाया और पेड़ से कुछ फलाँग पहले लगा दिया। उस बोर्ड पर लिखा
था -"सावधान ,आगे काँटे का पेड़ है "
साधू ने उस बोर्ड को देखा और मुस्करा कर कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद दूसरे राहगीर को काँटा लग गया ,वह राहगीर भी दर्द से बिलबिला
उठा। कुछ समय बाद वह एक कुल्हाड़ी लेकर वापिस आया और पेड़ कि कुछ टहनियाँ
जो रास्ते पर आ रही थी उनको काट डाला।
साधु उस राहगीर के पास आया और मुस्करा के अपनी कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद फिर तीसरे राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से चिल्ला उठा और
गुस्से से भरा दौड़ता हुआ घर पर गया और घर से आरा लाकर उस पेड़ के तने को
काट डाला। पेड़ को कटा देख सब गाँव वाले इकट्टे हुये और उसे कंधों पर बिठा कर
उत्साह से नाचने लगे।

साधु गाँव वालों के पास गया और सब तमाशा देख चुपचाप मुस्कराता हुआ कुटिया
में चला आया। गाँव वाले कुछ दिन सुकून से रहे। किसी ने उस बोर्ड को वहाँ से हटा
दिया मगर कुछ ही महिनों में वह पेड़ फिर से फलफूल गया और राहगीर फिर से
घायल होने लग गये।

आने जाने वालों ने फिर से बोर्ड लगा दिया ,किसी ने फिर से बड़ी टहनियों को काटा
तो कोई आरा लेकर फिर से तने को काट डालता। तने को काटने वाले को गाँव वाले
कंधों पर बैठाते और नाचते। साधु हर बार घटना क्रम को देखता और मुस्करा कर
कुटिया में चला जाता।

पेड़ का तना कटने के बाद कुछ दिन गाँव में शान्ति रहती और जैसे ही पेड़ वापिस
फलफूल जाता वापिस वही  चक्र शुरू हो जाता। बार-बार के इस चक्र से गाँव वाले
परेशान हो गये और इस समस्या का स्थायी हल ढूंढने के लिए साधु के पास उपाय
पूछने गये।

साधु ने कहा -"आप सब मिलकर इस पेड़ को जड़ सहित उखाड़ दो ,यह इस समस्या
का स्थायी हल है "

गाँव वालों में से एक बोला -हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इस उपाय से हम नेता
विहीन हो जायेंगे ,हम में से जो बोर्ड लगाता है वह सेवा भावी कहलाता है जो कुछ
टहनियाँ काटता है वह समाज सुधारक कहलाता है और जो आरा लेकर तना काटता
है वह नेता कहलाता है.इस चक्र ने हमें सेवाभावी ,समाज सुधारक और नेता दिये हैं
इसके रुकने पर सब बराबर हो जायेंगे। यह उपाय नामंजूर है  …
गाँव के सेवा भावी ,समाज सुधारक और नेता इस उपाय से असहमत थे।

उन सबकी बात सुनकर साधू जोर-जोर से हँस पड़ा और बोला -हाय! भू-लोक तन्त्र !!       

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

नयी परिभाषा

नयी परिभाषा 

इस देश के नेता कब क्या कह जाते हैं यह सोच कर की जनता याद नहीं रखती। आये दिन
नयी परिभाषाएँ बनाने की जुगत में हर कोई लगा है चाहे वह अपनी सोसायटी के किसी
पद पर है या फिर समाज,गाँव ,शहर राज्य या देश के किसी नेता पद पर।
कुछ शब्दों कि नयी सीमा रेखाएँ -

सच :- मैं जो कहूँ और जिसे मानू  वही सत्य 

सरलता :- जो व्यक्ति मेरे  गलत इशारे पर भी नाचे वह सरल 

नैतिक :- जो मुझे रूचिकर लगे और लोग उस पर अँगुली ना उठाये 

वादा :- वो शब्द जिसे मेरी मर्जी से तोडा या टुकड़े टुकड़े कर जोड़ा जा सके  

कसम :- लोग तब भी विश्वास करे जब मैं इसे तोड़ मरोड़ दूँ 

वफादार :- जो मेरे काले कारनामों को दबा दे ,मिटा दे 

ईमानदार :- जो व्यक्ति मेरे पक्ष में खड़ा हो सके 

भ्रष्ट :-मेरा विरोधी तथा मेरे पक्ष में रहकर आँखे और कान खुले रखता हो 

व्यवहार :- उचित काम करने पर दी जाने वाली अनुचित राशी 

होशियारी :- मैं कसम तोड़ता जाऊँ और जनता समर्थन देती रहे 

समझदार :-नाव डूबती देख विरोधी का पल्ला थाम ले 

सेवा :- जिस काम को खूब प्रचारित जा किया जाये और आडम्बर भी फैले 

त्याग :- अपराध सिद्ध हो जाने पर पद से लिया गया इस्तीफा 

अहँकार :- विरोधी द्वारा कहा जा रहा कड़वा सच 





रविवार, 22 दिसंबर 2013

जनमत तो श्री राम के साथ भी था …।

जनमत तो श्री राम के साथ भी था  …। 

केजरीवाल के दाँत क्या खाने और दिखाने के अलग हैं ?यह प्रश्न सहज है ,क्योंकि वे युवा
भारत को नैतिकता और ईमानदारी का स्वराज्य देने का सपना दे रहे थे। जिस भ्रष्टाचार
से लड़ने की बात किया करते थे वो केजरीवाल अब कहाँ गायब हो गया ?क्या सत्ता की
भूख हर बार नैतिकता पर भरी पड़ जाती है ?

"आप" कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ वोट माँग रही थी और जब राजा बनने की
बारी आयी तो कांग्रेस से समर्थन पाकर राज जमाने की तैयारी में लग गयी है। क्या
यही नैतिकता है या यही स्वराज्य का स्वरुप था केजरीवाल का। क्या जनता ने इसलिए
केजरीवाल को वोट किया था। नहीं ,जब जनता ने वोट किया था तो उसकी सोच कांग्रेस
के शासन से मुक्ति की थी और "आप"के निर्दोष नए चेहरे थे। जनता ने इस विश्वास के
साथ "आप"को वोट दिया कि उसे नया स्वराज्य मिलेगा।

जब जनता ने केजरीवाल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया तो उसे भी भाजपा कि तरह सत्ता
को हाथ जोड़ देना चाहिए था ,लेकिन हाथीके दाँत खाने और दिखने के अलग होते हैं उसी
तरह "आप" ने सत्ता का सुख भोगने का शॉर्ट कट लिया उसका अर्थ यह था कि सत्ता मिल
गयी तो राज करते रहेंगे और काँग्रेस ने हाथ हटाया तो जनता को कह देंगे कि हमने तो
आपके कहने पर यह सब पाप किया।

  मुझे रामायण का वह खंड याद आता है जब राम के वनवास कि बात सुन अयोध्या की
प्रजा ने राजा दशरथ का साथ छोड़ श्री राम को राजा मान लेने का निर्णय कर लिया था।
खुद दशरथ भी राम से कह चुके थे कि -"बेटा ,मुझे कारावास में बंदी बनाकर तुम राज कर
लो "मगर श्री राम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि उनके इस आचरण का
दूरगामी प्रभाव प्रजा पर पडेगा और वह भी धीरे -धीरे अनैतिक हो जायेगी। राम ने वनवास
को सुराज्य कि स्थापना के लिए स्वीकार किया था। श्री राम ने उस समय जनमत के
विरुद्ध आचरण करके वन जाना स्वीकार क्यों किया ?उन्होंने जनमत का आदर क्यों नहीं
किया जो उन्हें उसी समय राजा के रूप में स्वीकार कर चूका था।

केजरीवाल जनता कि भावुकता और सरल ह्रदय का फायदा उठाने कि सोच चुके हैं ,अगर
जनता ने भावावेश में कोई निर्णय कर लिया तो इसका मतलब यह नहीं की केजरीवाल
सिंहासन पर बैठ जाये। केजरीवाल और उनकी टीम ने कभी भी जनता से यह प्रश्न नहीं
किया कि हमें वापिस जनता के पास जाना चाहिए ,क्यों ? आप जनता से हाँ या ना क्यों
पूछ रहे थे ?उनको यह क्यों नहीं समझा रहे थे कि काँग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना
अनैतिक है ?

इसके जबाब में "आप"यह तर्क दे कि जनता इतना जल्दी चुनाव का खर्च नहीं बर्दास्त
कर पायेगी लेकिन इस बात में कोई दम नहीं है क्योंकि जनता जानती है की उसने सही
बहुमत नहीं दिया इसलिए वापिस चुनाव का खर्च उठाना पडेगा। देश की जनता मौका
परस्त नहीं है ,देश कि जनता नैतिकता के प्याले में अनैतिकता का घोल पसंद नहीं
करती है मगर उससे छद्म और छल से गलत फैसला करवा कर हम किस ढ़ंग की
नैतिकता की स्थापना करने जा रहे हैं यह शोचनीय है

   

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

क्या हर चावल से पूछोगे .............

क्या हर चावल से पूछोगे      ............. 

माँ चावल पकाने के लिए चूल्हे पर तपेले को रख रसोई के दूसरे काम निपटा रही थी
और कभी कभार तपेले की ओर नजर कर लेती थी। पानी गर्म होकर उबल रहा था
और उसमें रखे चावल भी पक रहे थे। मैं टीवी ऑन कर समाचार सुनने लगा। ताजा
खबर दिल्ली कि उलझी गुत्थी थी। "आप "के विरोधी केजरीवाल को सरकार बनाने
का न्यौता और समर्थन दे रहे थे मगर केजरीवाल जनता से राय सुमारी की बात
कर रहे थे। 25 लाख लोगों से राय लेकर फैसला करने को कह रहे थे। मुझे यह बात
हजम नहीं हो रही थी। केजरीवाल कैसे मालूम करेंगे की उनकी राय सुमारी में उनके
समर्थक शामिल है या विरोधी ? क्या उनको मिली सीट और वोट से वे नतीजे पर
नहीं पहुँच सकते थे ?यह सब सोचता मैं उठकर माँ के पास रसोई में चला गया।
मेने देखा कि माँ ने तपेली से कुछ चावल के दाने निकाल कर चिमटी से दबाये और
चूल्हा बंद कर दिया।
मेने माँ से पूछा -माँ आपने दो चार दाने तपेली से निकाल कर देखा और चावल पक
गए ऐसा मानकर चूल्हा बंद कर दिया  .............
माँ ने मेरी बात काटते हुए कहा -तो क्या सब चावल को दबा कर देखती ?
मेने कहा -नहीं ,पर एक चौथाई तो देखने ही थे
माँ ने कहा -मैं कोई अनाड़ी थोड़े ही हूँ केजरीवाल की तरह जो सबसे पूछता फिर रहा
है कि सरकार बनाऊ या ना बनाऊ
मेने पूछा - तो केजरी अंकल को क्या करना चाहिए ?
माँ बोली -मेरी तरह व्यवहारिक निर्णय लेना सीखना चाहिए।     

रविवार, 15 दिसंबर 2013

व्यवहार

व्यवहार 

 एक बार किसी ने सूर्यदेव से पूछा -आप बहुत ही तेजस्वी हैं आपके तेज से समस्त लोक 
आलोकित होते हैं मगर जब भी आप चंद्रदेव से मिलते और बिछुड़ते हैं तब आप सोम्य 
और शीतल क्यों हो जाते हैं ?

सूर्यदेव ने कहा -यही तो जीने की सरल और सुंदर पद्धति है और यही नीति का सार है 
यदि सामने वाला सोम्य और शीतलता से मिलता है तब हमे भी सारा ऐश्वर्य ,तेज और 
बल भूल कर सोम्य और शीतल व्यवहार करना चाहिए।सज्जन को बल और तेज के 
घमंड से मित्र नहीं बनाया जा सकता उसे मित्र बनाना है तो हमे अपना खुद का व्यवहार 
सुधार लेना चाहिए और बिना कारण अनुचित समय में अपने बल को दिखाकर खुद को 
अहँकारी भी नहीं बनाना चाहिये।  

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

दिल्ली की गुत्थी !

दिल्ली की गुत्थी !

दिल्ली में २८ सीटे जीत कर अरविन्द केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए काँग्रेस और
भाजपा से अपने मुद्दों पर समर्थन माँगा और गेंद दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के पाले में डाल
कर अपरोक्ष रूप से चुनाव फिर से हो इसकी घोषणा कर दी।

  श्री अरविन्द की शर्तों को मानकर यदि भाजपा उन्हें उनके मुद्दों पर समर्थन दे देती है
तो इसका बड़ा फायदा भाजपा को राष्ट्रीय लोकसभा के चुनाव में हो सकता है क्योंकि
अरविन्द के मुद्दों पर समर्थन करके भाजपा इन्ही मुद्दो को आने वाले लोकसभा चुनाव
में अरविन्द से छीन सकती है और खुद  की छवी को राष्ट्रीय फलक पर और ज्यादा
निखार सकती है क्योंकि अरविन्द के मुद्दे काफी हद तक मोदीजी के विचारों से मेल
खाते हैं और भाजपा के विचार -भय, भूख और भ्रष्टाचार से मिलते हैं।

   अरविन्द को सहकार नहीं देने पर "आप" जब जनता के पास फिर से जायेगी तो
वह इस बार भाजपा को मुख्य प्रतिद्धन्दी मानकर चुनाव लड़ेगी इसमें मुख्य लड़ाई
"आप "और भाजपा की रहेगी ,हो सकता है भाजपा इस बार बाजी मार भी ले मगर
उसे एक राज्य में अपनी सरकार बनाने के फायदे से ज्यादा फायदा मिलना सम्भव
नहीं लगता क्योंकि दिल्ली की लोकसभा सीटों पर "आप"के कारण से उसे नुकसान
भी हो सकता है।

 "आप "जब भी भला बुरा कहती है तो सबसे ज्यादा चोट काँग्रेस पर ही करती है और
इन चुनावों में भी उसने काँग्रेस का वोट बैंक तोड़ा है। काँग्रेस यदि उन्हें समर्थन उनके
मुद्दों पर देती है तो उसे भविष्य में भी नुकसान होने कि सम्भावना प्रबल रहने वाली है

देखिये अब गोटी कौन किस तरह से चलता है। फिर से चुनाव ,जिसकी सम्भावना
दिखती है या बड़ी जीत के लिए छोटा तथा पीछे हटने का कदम भाजपा का। …           

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

उच्चतम न्यायलय ने भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया

उच्चतम न्यायलय ने भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया 

हमारी संस्कृति पर अन्य जातियों ने वर्षो से हमले किये और उसे नेस्तनाबूत करने की
नाकामयाब कोशिशे आज तक जारी है। भला हो उच्चतम न्यायालय का जिसने "गे "
दुराचरण के खिलाफ फैसला दिया।

 हमारी संस्कृति और सद साहित्य को मिटाने पर दूसरी जातियाँ मौके की तलाश में
रहती है ,हिंदुत्व की जीवन शैली को अन्य जातियाँ  पुरानपंथी ठहराकर खुद के कुसंस्कार
के जहरीले बीज हिंदुस्तान में रोपना चाहती है। "गे " जीवन पद्धति भारतीय संस्कृति के
दर्शन के खिलाफ है। हमारे आदर्श राम और कृष्ण जैसे सर्वशक्तिमान दिव्यात्मा हैं ,
हमारा साहित्य वेद और उपनिषद है। हमारे वेदों में "गे "जीवन का उल्लेख तक नहीं है।
हमारे ऋषि मुनियों के लिखित यौन शास्त्रों ने इस प्रकार जीने की सोच वाले निकृष्ट
सोच वाले कुंठित लोगों का जिक्र करना भी उचित नहीं समझा। फिर सवाल यह उठता
है कि विश्व की अन्य जातियाँ जो खुद "गे "जीवन की निकृष्टता के दलदल में फँसी है
वो इस दलदल से बाहर आने का उपाय ढूंढने की जगह अन्य जातियों को इस विष का
पान कराने को क्यों आतुर है ?
       
     क्या अप्राकृतिक यौन संबंध हमारी दैव संस्कृति से मेल खाते हैं ?क्या स्वतंत्रता के
नाम पर निकृष्ट ,अनुपयोगी ,अप्राकृतिक और हेय विचारों पर चिंतन ,मंथन या बहस
जायज है ?
   
     यह इस देश का प्रतिकुल समय है क्योंकि भारतीय संस्कृति से अनजान, भारतीय
साहित्य से अनजान, भारतीय जनता की भावनाओं से अनजान राजनेता के पुत्र "गे "
जैसे निकृष्ट प्राणियों के अधिकारों के पक्ष में बात करते हैं।

अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अब जग कर हुँकार भरने का समय आ गया है।
ये विदेशी दुराचरण भारत में पग पसारे उसके पहले उसे नष्ट कर दे। हमारी उच्च तम
न्यायलय ने इस विचार धारा को अपराध की श्रेणी में रखा इसके लिए साधुवाद  …।           

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

क्या राजनीति से कभी नैतिकता का जन्म हुआ ?

क्या राजनीति से कभी नैतिकता का जन्म हुआ ?

आज देश में एक शोर सुनायी दे रहा है कि देश को राजनीति के गर्भ से नैतिकता दे देंगे।
क्या बबुल भी कभी आम का फल देते हैं ,नहीं ना ; तो फिर देशवासियों को यह आशा
क्यों जगायी जा रही है ? क्या धर्म ग्रंथ सदाचरण की शिक्षा के सार से लबालब नहीं है ?
फिर क्यों हर जगह अनैतिकता फैलती जा रही है ?क्या कठोर कानून से समाज नैतिक
बन जाएगा ?यदि ऐसा हो सकता था तो सजा ए मौत ही हर अपराध को रोकने में
समर्थ होती।

 राजनीति से नैतिकता लाने कि बात करने वाले नेता देश और समाज को भ्रमित कर
खुद का स्वार्थ ही पूरा करते हैं। आम जनता नैतिकता की बात करती है और चाहती भी
है कि कोई ऐसा सूत्र या उपाय मिल जाए जिससे अपराध कम हो जाये और यही कारण
है कि वह जो भी नैतिकता कि बात करता है उसका बिना सोचे समझे समर्थन करने
निकल पड़ती है वह यह नहीं देखती है कि सामने कोई ढोंगी बाबा है या कुशल विक्रेता।

  राजनीति के क्षेत्र में नैतिकता का झण्डा लेकर कुछ व्यक्ति निकल सकते हैं मगर
उनके पीछे चल रही करोड़ो कि भीड़ नैतिक है ,इसमें पूरा सन्देह है। सन्तो के प्रवचन
को सुनने वाले सभी सात्विक और धार्मिक प्रवृति के लोग होते तो यह देश कभी का
सात्विक बन गया होता ,अगर सात्विक विचारों का प्रवाह लोगों का नैतिक नहीं बना
सकता है तो फिर राजनीति से नैतिकता का जन्म कैसे हो सकता है क्योंकि राजनीति
में तो छल बल छद्म सब कुछ जायज है।

 सत्ता से नैतिक मूल्यों कि स्थापना हो सकती थी तो राजकुँवर सिद्दार्थ को राजा
बन जाना चाहिए था उसे बुद्ध क्यों बनना पड़ा ?सत्ता के परिवर्तन मात्र से देश या
समाज नैतिक और स्वच्छ बनता है तो कितनी सत्ता हजारों वर्षों में बदली लेकिन
नैतिकता का पतन क्यों होता गया ?

नैतिकता का सपना दिखा कर वोट और सत्ता पा लेना सरल है मगर सत्ता से नैतिकता
की स्थापना का सपना दिखाना समाज को मुर्ख बनाना है। कोई कहता है कड़ा कानून
ले आओ ,कोई कहता है मुझे आजमा कर देखो  ये सब आडंबर से देश का क्या भला होगा ?

 कोई संत चोरों की बस्ती में जाकर बढ़िया प्रवचन दे दे और उपस्थित लोग उनकी बात
का समर्थन भी कर दे तो क्या यह मान लिया जाए कि वहाँ नैतिकता का साम्राज्य हो गया ?

 नैतिकता के लिये मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए किसी राजनैतिक पार्टी की
जरूरत नहीं होती है ,उसके लिए खुद को अपने परिवार को सुधारने कि आवश्यकता होती है
यदि मनुष्य खुद स्वत: नैतिक बनने का संकल्प करता है तभी नवचेतना आ सकती है

पार्टी बनाने ,आलोचना करने,दुसरो में खामियाँ ढूंढने से नैतिकता नही आने वाली है और
इसीलिए शायद गाँधीजी पद से दूर कर्म से ये साबित करते रहे और उनका अनुकरण
करते अन्ना हजारे दिखायी पड़ते हैं  ……………           

रविवार, 8 दिसंबर 2013

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

चार राज्यों के चुनावी नतीजे भारतीय मतदाता की परिपक्वता दर्शाता है , भारतीय युवा
मतदाता अब अपना भला बुरा सोचने लगा है और यह बात इस चुनाव में यह बात उभर
कर सामने आयी है. भारतीय अब जिंदाबाद और मुर्दाबाद से ऊपर उठ कर देश का सही
मायने में विकास देखना चाहता है।

 कुछ सच्चाईयाँ जो चुनावी परिणाम से सामने आयी है - 

        जनता की स्मरण शक्ति कमजोर होती है और वह गलतियों को नजर अंदाज कर
देती है यह बात अब बीत चुकी है।

         जनता मुर्ख होती है उसे मुर्ख बनाने की कला को राजनीति की कभी परिभाषा कहा
जाता था लेकिन अब यह परिभाषा खत्म हो चुकी है।

        जनता आज तक नेता चुनती थी लेकिन अब जनता जनसेवक चुनने कि दिशा में
आगे बढ़ रही है।

        जनता अपने कर के पैसे को कहाँ खर्च किया जा रहा है उसे गहराई से देख रही है
और जैसे ही कोई पार्टी उस धन का दुरूपयोग करने लगती है उसे जनता गेट आउट कहना
सीख चुकी है।

      जनता अपना उचित हक़ हर कीमत पर चाहती है वह किसी नेता या पार्टी की भीख
या दया नहीं चाहती है।

      जनता नेताओं के किए गए वायदो को ध्यान से सुनती है और उसे खुद की सोच के
तराजु पर तोलने के बाद निर्णय लेती है।

        जनता हर मीडिया को सुनती है और खुद निर्णय पर पहुँच रही है कि मीडिया कितना
झूठ या सच है ,वह खबरों पर अँधा विश्वास नहीं  कर रही है।

       जनता जनसेवक का सम्मान तभी करेगी जब जनसेवक अपने कर्मो से यह साबित
करे कि वह राजनीति में पैसा बनाने के लिए नहीं सेवा करने के लिए आया है।

    जनता आंकड़ो के मायाजाल के फेर में नहीं पड़ कर यथार्थ को देखने लगी है जनता को
जब भी उद्घाटन के पाटिये चिड़ाते हैं तो जनता उस नेता को ही चिढ़ा देती है।

    जनता को हाथ जोड़कर वोट ले जाने वाले नेता जब खुद को जनता का राजा समझने
लगता है तो जनता उस अभिमानी को वापिस जनता बना देती है।

  जनता अब तभी बदलाव चाहती है जब सरकारें उसके मिजाज के खिलाफ काम करती
है जब तक जनता कि मर्जी के काम होते रहते हैं तब तक जनता दखल नहीं देती है।

   जनता टीम के कप्तान को ही नहीं पूरी टीम और सरकारी अफसरों को भी ईमानदार
देखना पसन्द कर रही है।

 जनता न तो छद्म धर्मनिरपेक्षता चाहती है और न ही छद्म राजनीति ,जनता धुर्त लोगों
पर कालिख पोतना सीख चुकी है।

जनता का मिजाज अब बदल गया है वह सीधा और सपाट कह रही है  -अपना मेहनताना
लो और देश की सेवा करो और सेवा की जगह मेवा पाना है तो रास्ता नापो  …… 
           

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

नारे ले लो ,आरोप खरीद लो

नारे ले लो ,आरोप खरीद लो 

भर दोपहर में एक आवाज ने नींद ख़राब कर दी। बाहर  कोई फेरिया चिल्ला रहा था -"
नारे ले लो ,नारे नए पुराने ,आरोप एकदम ताजे ,चमत्कारी भाषण ले लो। "

मेने बाहर ताकझाँक की ,देखा एक युवा फेरिया गली में घूम रहा है। घर से बाहर
निकल कर मैं उसके पास गया और बोला -क्या क्या माल है तेरे पास ?

वो बोला -आप किस पार्टी से हैं ?चाबुक चलाने वाली पार्टी से हो या चलाने कि मंशा
रखने वाली पार्टी से ,इन दोनों में नहीं हो तो मौका देख रँग बदलने वाले हो ?

मेने कहा -मैं तो चाबुक खाने वाले में से हूँ ,सोचता हूँ कुछ सस्ता तुझ से मिल जाए
तो नयी पैकिंग में आगे सरका दूँ।

फेरिया को लगा मैं उसके काम का हथियार हूँ इसलिए उसने जाजम बिछा कर
अपनी दुकान दिखानी शुरू कर दी - देखिये जनाब ,ये कुछ नारे हैं ,पानी पर ,बिजली
पर ,सड़क पर ,रोजगार पर ,महँगाई पर.............इस तरफ जो मसाला है उसमे
आरोप हैं ,कुछ सच्चे ,कुछ बिलकुल झूठे ,कुछ अधूरे ,आपको भ्रष्टाचार पर ,चरित्र
हनन पर,साहेबगिरी पर ,रंग रास पर ,विकास पर ,सीनाजोरी पर  जिस पर भी
चाहो नए नवेले करारे ताजा आरोप मिल जायेंगे  ……… इस कोने में जो पड़े हैं
वो सब भाषण हैं जिन्हे सुनकर लोग हँसते हैं ,तालियां पीटते हैं ,चिल्लाते हैं
गुस्सा करते हैं और बफारा निकालने इ वी एम पर बटन दबाने पहुँच जाते हैं।

मैं बोला -कुछ सदाबहार कुछ नए नारे बता  …

फेरिया बोला -सदाबहार नारो में गरीबी हटाओ ,मीठा पानी ,खेतों में चौबीस घंटे
बिजली ,पक्की सड़क वाले नारे ही चल रहे हैं और रेट भी सबसे कम हैं  …

मेने पूछा -इनके रेट कम क्यों हैं ?

फेरिया बोला -जनता जानती है इनका कोई मूल्य नहीं है ,इन बातों पर विश्वास
नहीं करना है!

मैं बोला -अभी आरोप का बाजार कैसा है ?

फेरिया बोला -सा'ब , यह हाथो हाथ बिकने वाला माल है और दाम भी नेता के ग्रेड
पर निर्भर है। बड़े नेता पर आरोप लगाना है तो रेट ज्यादा और छोटे पर कम।
अभी चरित्र हनन के आरोपो का दौर है ,जनता भी मजे से सुनती है और तालियां
भी बजती है  … !!!

मेने पूछा -खरीदने वाले को वोट भी मिल जाते हैं या नहीं  …!

फेरिया बोला - वोट तो देना ही है ,वोट मुद्दे से नहीं पर्ची के अंकों से पड़ते हैं !!!

मेने कहा -भैया ,मेरे को तो भाषण बता दे दे !

फेरिया बोला -भाषण कौनसे वाले चाहिए -चटाकेदार ,चुट्कुलेवाले ,आरोपवाले
तथ्यहीन ,मिया मिठ्ठू वाले  …… !

मेने कहा -जो मुनाफे से बिक जाए !!

वो बोला - चटाकेदार ,सफेद झूठ वाले,रंगीन आरोप वाले अभी सुपर डुपर है,तथ्यहीन
का बाजार भी गर्म है !

मैं बोला -देश को इनसे कुछ मिलेगा ?

फेरिया बोला -मुझे लगता है आपको खरीदना नहीं है ,अपना रास्ता नापो और
मुझे जाने दो।

 फेरिया दूकान समेत कर आगे बढ़ा और टेर लगायी -चकाचक नारे ले लो ,रंगीन
आरोप ले लो ,तथ्यहीन भाषण ले लो  ………………………। 
  

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

चुनाव पूर्व सर्वेक्षण, परिवर्तन का शंखनाद ?

चुनाव पूर्व सर्वेक्षण, परिवर्तन का शंखनाद ?

चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में चार बड़े राज्यों में काँग्रेस लड़खड़ा रही है ऐसा समाचारों में
दिखाया गया है। कांग्रेस की लड़खड़ाहट के संभावित कारण !!
1. अहँकारी नेता
2. तथ्यों से परे सपनों में जीना
3. जन लोकप्रिय नेताओं का टोटा
4. भ्रष्टाचार को रोक पाने में असफलता
5. असफल विदेश नीति
6. मूल्य खोता रुपया
7. कागज पर सफल योजनाये ,धरातल पर असफल
8. नकारात्मक चुनावी प्रचार
9. आक्रमण की जगह बचाव की नीति
10. युवा शक्ति का मोह भंग होना
11. छद्म धर्मनिरपेक्षता का सहारा
12. जनता में भरोसा जमाने में नाकामयाब आभामंडल
13. लोकलुभावन योजनाओं की पुरानी थ्योरी
14. साथी दलों का हावी रहना
15. घोषित कामो का न हो पाना
16. निष्प्रभावी आर्थिक नीति
17. बिना सेनापति के चुनावी रण
18. जनता की अभिव्यक्ति को समझने में असफल
19. परिवार वाद का आरोप
20. घटता रोजगार    

सत्ताधारी दल चुनाव तक अपने को कैसे संभालता है यह आने वाला समय तय
करेगा। क्या चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सही होंगे ? क्या देश कि जनता निर्णायक बदलाव
लाएगी या तिराहे पर देश को खड़ा कर देगी।

कौनसा दल सरकार बनायेगा यह मुख्य नहीं है ,सुदृढ़ लोकतंत्र के लिए जरुरी यह 
है की कितने प्रतिशत लोगों ने अपने वोट के अधिकार का उपयोग किया।  

चुनावी भाषण

चुनावी भाषण    

आपके दर्शन को नैन हर पाँच साल बाद प्यासे हो जाते हैं और मरते डूबते हर हाल 
में आपके किवाड़ खटखटाने पड़ते हैं। 

पीछे बैठे दादा सही फरमा रहे हैं कि मैं पिछली तीन यात्रा आपके तीर्थ की कर चूका 
हूँ मेने हर यात्रा पर इस तीर्थ के विकास की कहानी सुनायी थी ,इस क्षेत्र का विकास 
जरुर होगा जब मेरी अंतहीन कहानी खत्म हो जायेगी। 

मेने सबसे पहले इस तीर्थ की सड़क की बात करी थी और चौथी मरतबा भी मैं सबसे 
पहले सड़क कि बात ही करूँगा। पहली बार आपने जब मुझे चुना तो मेने यहाँ की सड़क 
का काम प्रमुखता से लिया था और आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि काम प्रगति 
पर है ,काम अभी तक पूरा नहीं हुआ इसका कारण आपसे मेरा लगाव है यदि काम 
उस समय हो जाता तो आपके दर्शन का मुझे चौथी मरतबा सौभाग्य नहीं मिलता। 
यह टूटी सड़क और इसके गड्ढे मुझे हर बार आपको विश्वास बँधाने के काम आते हैं 

जब मैं दूसरी दफा आपके इलाके में आया था तब आपको पक्की सड़क के साथ 
बिजली देने का वादा किया था। मेरा मानना है कि ये सड़को के गड्ढे जैसे ही इतने 
गहरे हो जायेंगे कि बिजली के तार इन गड्ढो से खिंचवा दूँ इसलिए उस समय की 
राह देख रहा हूँ ,ये सड़क के गड्ढे गहरे हो जाए छठी मरतबा तक ताकि बिजली के 
तार ऊपर से लटकाना ना पड़े   

मैं जब पिछली मरतबा आया था तब सड़क ,बिजली और पानी तीनों की बात करी 
थी सड़क का काम प्रगति पर है ,बिजली कि व्यवस्था सड़क के साथ पूरी होने 
वाली है और पानी कि बात भी इन्ही सड़क के गड्ढो से ही पूरी होगी। मैं आशा 
करता हूँ कि सातवी बार तक ये गड्ढे छोटे छोटे सरोवर में तब्दील हो जायेंगे और 
बारिस के पानी के भरने से मिठ्ठे पानी कि व्यवस्था हो जायेगी। 

मैं इस मरतबा आपके पास सड़क,बिजली पानी के साथ रोटी कि व्यवस्था भी 
करने को आया हूँ। मैं जानता हूँ आप अभी तक इन सुविधाओ के बिना भी जिन्दा 
हैं ,वादे के जज्बे के साथ आपके जीने के अंदाज को सलाम करता हूँ और आपसे 
वादा करता हूँ कि इस बार बेड़ा पार लगाईये मैं आपको फोकट कि रोटियाँ तोड़ने 
के काबिल बना दूंगा ,भरपेट रोटी खाईये और चेन से पांच साल की झपकी 
लीजिये। 

भरपेट और फोकट में रोटी के सपने के आगे सड़क बिजली और पानी के क्या 
मायने रह जाते हैं। मैं आपके पेट तक फोकट में रोटी पहुंचाऊ इसके लिए मुझे 
कुर्सी तक आप पहुंचा दीजिये। हर बार आपने मेरे वादे को सुना ,समझा और 
सुकून लिया है ,इस बार भी इस गोल गोल रोटी के वादे पर भरोसा कीजिये। बस 
आप मुझे हर बार की तरह चौथी बार भी खूब वोट कीजिये 



मंगलवार, 5 नवंबर 2013

छद्म ढ़ोंगी बाबा और सन्त समाज

छद्म ढ़ोंगी बाबा और सन्त समाज 

संत समाज से विश्व समुदाय ह्रदय से जुड़ा है इसका कारण है संत का स्वभाव।
संत एक पेड़ की तरह है जिसकी छाया और फल उसके लिए नहीं होकर दुसरो के
लिए होते हैं ,संत एक नदी कि तरह है जो जिधर से भी गुजरती है उस स्थान को
हरा भरा बना देती है और अपने शीतल जल से सभी को तृप्त करती आगे बढ़ती
रहती है। संत उस दीपक कि तरह है जो स्वयं कष्ट सहन कर के भी दुसरो के मार्ग
को लक्ष्य कि ओर गति देता है उनके अन्धकार भरे जीवन में प्रकाश भरता है ,संत
अन्वेषण करता है ,सत्य के तत्व को जानने का प्रयत्न करता है और जितना जाना
उसे सब में बाँट देता है। यह सब हम एक गृहस्थ में ,एक वैज्ञानिक में ,एक सन्यासी
में भी पा सकते हैं।
एक गृहस्थ संत हो सकता है यदि वह देना सीख जाता है ,यदि गृहस्थ पाने की लालसा
से ऊपर उठ जाता है और शुभ तत्व को देना अपना लक्ष्य बना लेता है तो वह ग्रेट संत
है
कुछ पाने की कामना से रहित जीवन को कैसे जीया जाये इसके लिए हर धर्म और
दर्शन ने मंथन किया है और उस जीवन को जिसमें इच्छा ,कामना ,लालसा ,भोग
आदि पर विजय पायी जा सकती है उसे संन्यास कहा है जिसका वस्त्रों या वेशभूषा
से कुछ भी संबंध नहीं है। सन्यास में विश्व कल्याण कि भावना को प्रमुखता दी
गई है ,जब कोई वैज्ञानिक मानव हित कि कोई खोज करता है तो वह सन्यास धर्म
का पालन करता है और कोई  वैज्ञानिक विध्वंस कि खोज करता है तो वह अधर्म को
पोषित करने वाला बन जाता है  .
कैसे जाने कि अमुक छद्म बाबा या ढोंगी है - नीति कहती है कि जब तक हम किसी
अपरिचित के बारे में गहन जानकारी प्राप्त नहीं कर लेते तब तक उस पर विश्वास
न करे। मंगल वेश में अमंगल कारी तत्व भी छुपे हो सकते हैं , श्री सीताजी की
बुद्धि भी यह समझ ना पायी थी जिसके कारण उन्हें दुःख सहने पड़े थे ,यह उदाहरण था
मंगल वेश का। छद्म बाबा स्वभाव के मीठे और ह्रदय से काले ,देने की जगह लेने का
भाव प्रबल होता है ,सम्पति और धन को एकत्रित करने में दिन रात जुटे रहते हैं।
जब भी हम अपने स्वार्थ से किसी से जुड़ते हैं तो स्वाभाविक है सामने वाला भी अपना
स्वार्थ रख देता है ,यह एक व्यापार है जो लाभ हानि की  गणित से चलता है और
दुनियादारी कहलाता है ,इससे हटकर बिलकुल उलट बात है हम किसी परमार्थ के
लिए किसी परमार्थी से कुछ चाहते हैं ,यहाँ भी चाह है पर स्वार्थ से परे लोक कल्याण
के लिए। अगर यहाँ भी एक पक्ष स्वार्थी है तो उसे छद्म या ढोंग ही जाने।
संत से क्या माँगे -अगर हम सत्य तत्व के अलावा अपने स्वार्थ की पूर्ति किसी संत
से चाहते हैं और वो उसे पूरा करने का आश्वासन देता है तो समझो धोखा है। क्योंकि
इस संसार में स्वार्थ की  पूर्ति के लिए तो कुछ मूल्य निश्चित रहता है चाहे वह धन हो
या तन। संत पैसा नहीं दे सकता ,संत तक़दीर नहीं बदल सकता ,संत कामनाओं की
पूर्ति का स्त्रोत नहीं है। संत ज्ञान देता है। सत्य कहता है। संत मार्ग का निर्देश मात्र
करता है चलना तो खुद को ही पड़ता है
सन्त को केवल जीवन निर्वाह के लिए भोजन और शरीर ढकने को वस्त्र चाहिए
इसके अलावा उन्हें सच्चे अनुयायी चाहिए जो सत्य को मथते रहे ,अंधानुकरण ना
करे। हम मठाधीश पा सकते हैं मगर सरलता से संत नहीं पा सकते क्योंकि सन्त
कि खोज में भटकना पड़ता है और वह भी परमार्थ का उद्देश्य लेकर।        

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

धार्मिक चित्र और चिन्ह का ना हो अपमान

धार्मिक चित्र और चिन्ह का ना हो अपमान 

कुछ दिन पहले मैं बाजार में कुछ खरीदी के लिए गया था। दुकानदार अच्छी ग्राहकी के
कारण व्यस्त था। मेरे आगे जो ग्राहक खड़ा था उसका बिल दुकानदार बना रहा था।

ग्राहक ने दुकानदार से कहा -भैया ,मेरे दोनों बिल एक साथ पिन कर देना। दुकानदार
ने स्टेप्लर पिन लगा दी और फिर तसल्ली से भुगतान के पैसे गिनने लगा। मेने
देखा कि जिन दोनों बिलों को स्टेप्लर किया था उसी जगह श्री गणेश का फ़ोटो छपा था
और वह स्टेप्लर उन दोनों बिलों पर छपी फोटुओं पर लगी थी। इस बात का भान ना
तो दुकानदार को था और ना ही उस ग्राहक को।

मेने उस दुकानदार से पूछा -भैया ,आप भगवान् गणेश और लक्ष्मी में श्रद्धा रखते हैं ?

दुकानदार बोला -श्रीमान ,यह भी भला पूछने की बात है ,गणेश और लक्ष्मी कि अर्चना
पूजा तो हर दिन करते हैं ,देखो दुकान में पूजा स्थल भी है।

मेने पूछा -क्या आप पूजा करके फिर भगवान को सुई भी चुभोते हैं ?

दुकानदार को गुस्सा आ गया और गुस्से से बोला -आप कैसे व्यक्ति हैं जो बेहूदा प्रश्न
कर रहे हैं ,मुझे भगवान् में श्रद्धा है मैं उनका अपमान इन हाथो से करने कि सोच भी
नहीं सकता।

मेने कहा -भैया ,आपने अभी जो बिल स्टेप्लर किये हैं उनको देखिये ,आपने गणेश के
फ़ोटो पर पिन चुभो दी है।

दुकानदार ने स्टेप्लर किये बिल को देखा और बोला -सॉरी ,मगर यह अनजाने में हुयी
भूल है  …।

मेने कहा -यह मैं भी जानता हूँ। क्या आपका बिल इस धार्मिक फ़ोटो या चिन्ह का
उपयोग किये बिना भी छप सकता है ?

दुकानदार ने कहा -हाँ ,और आगे से मैं कभी इस तरह के धार्मिक फ़ोटो और चिन्ह का
उपयोग व्यावसायिक किताबों पर नहीं करूंगा।

मेने दुकानदार से कहा -भैया ,हम लोग श्रद्धा से व्यावसायिक बुक पर ये सब छपवाते हैं
परन्तु फिर इन पवित्र चिन्ह और फ़ोटो का अनजाने में अपमान करते रहते हैं। जिस
तरह से आपने भविष्य में धार्मिक फ़ोटो और चिन्ह का उपयोग बिल पर नहीं करने का
संकल्प लिया है वैसे ही सब जागरूक होकर इस छोटी बात पर ध्यान दे।

अपने व्यावसायिक लाभ के लिए जिन धार्मिक चिन्हो और फ़ोटो का उपयोग हम करते हैं 
उन पवित्र प्रतीकों कि पवित्रता कि रक्षा करना भी हमारा ही कर्तव्य है   

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

मोदी से भय क्यों है अन्य दलों को ?

मोदी से भय क्यों है अन्य दलों को ?

राष्ट्रिय राजनीति में नरेन्द्र मोदी जैसे ही आये बूढ़े और नये सभी राजनैतिक पार्टियों 
में सुनापन आ गया ,कुछ हक्के बक्के हैं तो कुछ बेहोश ,चारों तरफ सभी दलों में 
हाहाकार मचा है -रोको ,रोको  … मगर सबके उपाय अभी तक निरर्थक साबित हो 
रहे हैं ,क्या कारण है मोदी से भय खाने का --
1 .छद्म धर्म निरपेक्षता के खोल के लितरे हो जाना -ज्यादातर पार्टियाँ खुद को छद्म 
धर्मनिरपेक्षता की केंचुली में छुपाये रखना पसंद करती है जबकि यथार्थ के धरातल 
पर उन्होंने उनको अभी तक मुख्य प्रवाह से जोड़ा तक नहीं है। 66 वर्ष से तथाकथित 
धर्म निरपेक्ष सरकारे राज करती रही है मगर उनको साथ नहीं सिर्फ अँगूठा दिखाया 
है और मोदी इसी तथ्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि वो शठ को शठ और सज्ज्न 
को सज्ज्न कह देते हैं 
2. उदारीकरण का असफल हो जाना -देश को जबसे उदारीकरण के दौर में लाया गया 
तब से देश पिछड़ रहा है ,वर्तमान भी भूतकाल से कुछ सीख नहीं पा रहा है जिसका 
कुफल यह हुआ कि आम आदमी कि रीढ़ ही टूट गयी है और हम 26/-कमाने वाले को 
अमीर की श्रेणी में रख विश्व को और खुद को गुमराह कर रहे हैं। आज हम स्वदेशी का 
जनाजा निकाल कर FDI को प्रोत्साहन दे रहे हैं ,हमारा आलू हमसे १०/- में खरीद कर 
४००/-में चिप्स हमे ही खिला रहा है। हमारे ही पानी का दुरूपयोग कर हमे ही १५/- की 
पेप्सी कोक पिला रहा है  और मोदी गुजरात में देश के उद्योगपतियों कि पीठ थप थपा 
रहा है 
3. महँगाई कि सुनामी - इस उदारीकरण के कुचक्र से महँगाई कि देश में सुनामी आ गई 
है ,२६/-वाला अमीर भूख से बिलबिला रहा है ,मध्यम वर्ग के आँसू यह सरकार पोँछ 
नहीं पायी है ,आये दिन वादे और आश्वासन। … मोदी २६/- वाली अमीरी को बचपन में 
भोग चुके हैं और इसीलिए वो नागरिकों से सवाल करते हैं कि क्या क्या मिलता है २६/-में 
और जनता इनको आजमाने कि कोशिश में लगी है 
4. भ्रष्टाचार - विदेशों में भारतीय प्रधानमंत्री को इसलिए भी जाना जाता है कि वे अच्छे 
अर्थशास्त्री हैं मगर भ्रष्ट टोले के मुखिया है। इस सरकार के काल में बहुत ही कलंकित 
भ्रष्टाचार के कारनामे हुये हैं मगर किसी से आज तक देश का लूटा हुआ धन वापिस 
नहीं ले पाये और मोदी खुद बेदाग़ शासन दे रहे हैं और पुरे देश को देने का वादा भी कर 
रहे हैं 
5. रोजगार के अवसरों का अभाव -देश का युवा पढ़ने के बाद भी रोजगार का रास्ता 
नहीं ढूंढ पा रहा है ,बेरोजगार डिग्रीधारी हताश और निराश है ,उसके दोनों हाथ काम 
चाहते हैं मगर काम नहीं है और मोदी के शासन में बेरोजगार अन्य प्रदेशो की तुलना 
में बहुत कम है और मोदी जब युवाओ से भारत के भविष्य को जोड़ते हैं तो युवा 
खिल उठता है 
6. गिरती विकास दर - अर्थव्यवस्था का पहिया चरमरा रहा है ,सरकार अपना दामन 
साफ बताने के लिए पुरे विश्व को दोषी ठहरा देती है ,सबका बुरा हाल है तो हमारा तो 
होना ही है ,गाँव के सब बच्चे फेल हो गए तो मास्टरजी का बच्चा कैसे पास होगा ?
मोदी अपने राज्य को पुरे विश्व के गिरने पर भी सम्भाले हुए दौड़ रहे हैं। समूचा विश्व 
उन्हें देख रहा है और वो करिश्मा दिखा भी रहे हैं 
7. नए सूत्र नए सपने -सरकार एक तरफ कहती है कि गरीब जनता को दी जा रही 
सब्सिडी हटानी पड़ेगी और दूसरी ओर २/- किलो अनाज देने कि बात करती है। अजीब 
विरोधाभास   … चुनाव के साल में रेवड़ियाँ बाँटने का समय बीत गया है। देश आगे 
बढ़ने कि बात सुनना चाहता है और ये वही घिसे पिटे सूत्र आजमा रहे हैं और मोदी 
कहते हैं -नेशन पहले ,सबका साथ -सबका विकास   

ये कुछ मुख्य कारण हैं जिनके कारण पुराने और नए दल बोखला गए हैं और मोदी 
के भय से बीमार हैं   

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

पुराने कपड़े और संतुष्टी

पुराने कपड़े और संतुष्टी 

कुछ साल पहले का वाकया है और हर कस्बे ,शहर और महानगर में घटित होता
रहता है। वाकया यह था कि सडक के किनारे स्टील और प्लास्टिक के बर्तन लिए
दो -तीन औरते बैठी थी और कभी कभी आवाज भी लगा देती थी -पुराने कपड़े दे
दो ,बर्तन ले लो।

  गली की कुछ औरते पुराने कपडे लेकर गयी और मोल भाव करके पुराने कपड़े
देकर बर्तन ले आयी ,नए बर्तन लाने वाली औरतों में मेरी पत्नी भी शामिल थी
जब रात को मैं दुकान से लौट कर घर आया तो उन्होंने वे बर्तन मुझे दिखाए जो
पुराने कपड़ों के बदले लिए थे और बर्तनों को चाव से देख भी रही थी और सामने
वाले भाभी की प्रशंसा भी कर रही थी जो भाव ताव करके कम कपड़ो में ज्यादा
बर्तन दिलवा दी थी।

मेने पत्नी से पूछा -ये बर्तन कितने कपडे देकर लिए हैं और बाजार से खरीदती
तो कितने में आ जाते ?

उन्होंने बताया -मेरी पुरानी सात साड़ियाँ और आपके और बच्चो के मिलाकर
दस जोड़ी कपडे थे और बाजार से खरीदने पर चार सौ रूपये तो लग ही जाते।

मेने उनको समझाते हुए कहा -वैसे आपने जो किया वह अनुचित नहीं है लेकिन
क्या कपड़ों के बदले सामान लेने से आपको संतुष्टि मिली ?

वो बोली - ना ,मगर पुराने कपड़ो में जो मिला वह ठीक ही है।

मेने कहा -आप इससे ज्यादा पा सकती हैं और मन में संतुष्टि भी मिल जायेगी।

वो बोली -कैसे ?

मेने कहा -आज से निश्चय करलो कि आप कोई भी पुराना कपडा देकर सामान
नहीं खरीदेंगी और जो कपडे अच्छे हालत में हैं उन्हें आप गरीबों में वितरित कर
दोगी। आपकी पहनी हुई साडी से किसी गरीब की लाज ढकी जा सके ,आपके
बच्चों के कपडे किसी गरीब बच्चे का तन ढक सके यह काम संतुष्टि देगा।

उसके बाद उन्होंने अपनी साड़ियाँ जो पुरानी हो जाती है उन्हें समय से कुछ पहले
उपयोग में लाना बंद कर देती है और अपने ही घर में काम करने वाली कामवाली
बाइयों को पहनने के लिए दे देती है।

हममे से बहुत से ऐसे भारतीय हैं जो नये वस्त्रों का दान करने की सामर्थ्य नहीं
रखते हैं मगर पुराने कपड़ो को बेच कर उसके बदले में वस्तु लेने के लालच से
बच सकते हैं, हम गरीब देश के वाशिंदे हैं और आज भी हर राज्य के पिछड़े और
वनवासी इलाको में वस्तुओ का घोर अभाव है ,हम सामर्थ्य के अंदर कुछ अच्छा
कर सकते हैं जिसे पाकर किसी अभावग्रस्त के चेहरे पर मुस्कान आ सकती है।

कृपया पुराने कपड़े जो पहनने योग्य हो तो उन्हें किसी अभावग्रस्त जरूरतमंद को 
दे दे ,आपका यह काम निश्चित रूप से आपको मानसिक संतुष्टि देगा।    

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

सोच का फर्क

सोच का फर्क 

सब्जी मंडी नहीं कह सकते उस जगह को क्योंकि वह एक चौड़ा रास्ता है उसके आस
पास रहीश और अमीर लोगों की कॉलोनियां हैं। उस चौड़े रास्ते पर कुछ ठेले वाले
सब्जियां बेच कर अपना परिवार चलाते हैं।
एक युवती सब्जी वाले से पूछती है - भईया ,भिन्डी क्या भाव है ?
सब्जी वाले ने कहा -बहनजी ,पचास रूपये किलो।
युवती -क्या कहा !पचास रूपये !! अरे बड़ी मंडी में चालीस में मिलती है  …
सब्जीवाला -बहनजी वहां से लाकर थोड़ी थोड़ी मात्रा में यहाँ बेचना है  में मुश्किल से
दस किलो बेच पाता हूँ ,मुझे तो उसी दस किलो की बिक्री से घर चलाना है
युवती -तो क्या करे हम ,हम भी मेहनत से कमाते हैं ,देख पेंतालिस में देता है तो
एक किलो दे दे ?
सब्जीवाला उसे एक किलो भिन्डी पेंतालिस के भाव से दे देता है और अनमने भाव से
बाकी के पैसे लौटा देता है
वह युवती घर लौटती है और अपने पति से बताती है कि किस तरह वह भाव ताल
करके सस्ती सब्जी लाती है। पति उसको गर्व से निहारता है और मॉल में खरीद दारी
के लिए ले जाता है। वह युवती पर्स पसंद करती है और उसे पेक करने का ऑर्डर दे
देती है यह देख उसका पति बोलता है -रुक ,जरा भाव ताल तय कर लेते है ,तुमने तो
उससे भाव भी नहीं पूछा और सामान पैक करने का भी कह चुकी हो  ….
युवती बोली -आपकी सोच कितनी छोटी है ,ये लोग अपने को फटीचर नहीं समझेंगे ?
युवक बोला -अरे चीज खरीद रहे हैं ,भाव पूछने में क्या जाता है ,वाजिब होगा तो
लेंगे नहीं तो दुसरे से खरीद लेंगे
युवती ने कहा - देख नहीं रहे हो ,यहाँ सभी अपने से ज्यादा पैसे वाले लोग खरीदी
कर रहे हैं और चुपचाप बिल चूका रहे हैं ,आप मेरी इज्जत का कचरा करायेंगे मोल
भाव करके ,ज्यादा से ज्यादा सौ -दो सौ का फ़र्क होगा
 मॉल से पर्स खरीद कर वो दरबान को दस रुपया टीप देकर बाहर निकल आते हैं
ये घटनाएँ छोटी हो सकती हैं मगर बहुत गहरा प्रभाव देश पर छोडती है। एक गरीब
मेहनत करके परिवार का पेट इमानदारी से पालना चाहता है तो हम उससे मोल
भाव करते हैं और वो बेचारा पेट की भूख की मज़बूरी को देख सस्ता देता है और एक
तरफ धन्ना सेठों की दुकानों पर मुहँ मांगे दाम भी देते हैं। कभी हमे पाँच रूपये बचाना
होशियारी लगता है तो कहीं सौ -दो सौ लुटाना वाजिब लगता है।

फैसला कीजिये खुद कि क्या आप सही कर रहे हैं ,आने वाले पर्व त्योहारों पर गरीब
लोगों से सडक पर छोटी छोटी वस्तुओं पर भाव ताव करके पैसे मत बचाईये ,जैसे
आप त्यौहार हर्ष से मनाना चाहते हैं वैसे इन मेहनत कश लोगों को भी त्यौहार के
दिन उनका माँगा मुल्य देकर उनके घर भी कुछ पल रौशनी के आ जाए ,ऐसा काम
कर दीजिये ,  आपके घर जलने वाले दीपक से कोई झोपडी में ख़ुशी आ जाए तो
आप इसमें सह भागी बनिये।

ठीक लगे यह विचार तो आगे अपने दोस्तों में शेयर कीजिये। 

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

हम …………

हम  …………

1. पाप करने का मौका मिल जाए तो छोड़ते नहीं और मौका नहीं मिला तो ताक
में बैठे रहते हैं और मौका मिलते ही पाप कर बैठते हैं बदकिस्मती से पाप करने
का मौका नहीं बना पाये तो सज्जन का तुकमा अपने पर फिट कर लेते हैं

2. स्वच्छता और सफाई को पसंद करते हैं मगर अपने घर तक ,अपने घर का
कचरा बड़े मजे से सोसायटी या सड़क पर उछाल देते हैं और सारा दोष नगर
पालिका पर डाल देते हैं कि कर्मचारी पगार लेते हैं पर काम नहीं करते हैं

3 . मानते हैं की रिश्वत तब बुरी है जब दूसरा लेता और देता है मगर देने और
लेने वाले में एक जगह हम खुद होते हैं तो वह व्यवहार की परिभाषा में ही आता
है
4 . जन सेवक तब ही बुरा होता है जब वह सत्य पर अड़ जाता है और बुरी चीज
एक जगह ज्यादा समय तक नहीं टिक पाए इसलिए हम तबादला शस्त्र का
उपयोग करवाते हैं

5 . पराई वस्तु को महान समझते हैं चाहे वह पहनावा हो,भाषा हो,या स्त्री
अपना पहनावा जाहिल लगता है ,अपनी भाषा अशिष्ट और स्त्री गँवार जो
इनसे हट कर खुद को देखता है वह या तो मंदबुद्धि है या फिर ढोंगी या कोई
काल विशेष का जीव
6 . फटे में टांग अडाने वाला सफल राजनीतिज्ञ बनता है और नए वस्त्र की
सिलाई कहाँ से उधेडी जा सकती है और उसमे किस तरह से टांग अड़ाई जायेगी
पर माथा लडाने वाला महान रणनीतिकार बनता है
7 एक निर्धन जब भीख मांगता है तो उसे भिखारी कह दुत्कारते हैं लेकिन
सरकार जब सब्सिडी बाँटती है तब हम वारिस बन जाते हैं और हक़ से मांगते हैं  

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

प्याज और सिंहासन

 प्याज और सिंहासन 

प्याज एक सब्जी भर नही है क्योंकि किसी भी सब्जी में आज तक वह दम देखने को
नहीं मिला जो प्याज में है। सत्ता के सिंहासन से जमीन पर पटकने का काम सिर्फ
प्याज ही करता है।
             जिन राज्यों में चुनाव माथे पर है उन सत्ताधिशो को नींद नहीं आ रही है
कारण यह नहीं कि विरोधी हावी है बल्कि प्याज गरीबी रेखा से ऊपर उठ गया है और
मीडियम वर्ग के ठीक ऊपर से निकल कर रहीश लोगों की थाली में जा गिरा है।
          वैसे आज तक बहुत घोटाले हुये मगर आम आदमी सब घोटाले पचा जाता
है इसे हम लोगों के बढिया हाजमे के उदाहरण के तोर पर देखा जा सकता है मगर
प्याज का घोटाला  …. सब की जबान से चक चक शुरू हो जाती है!
         एक भाई वातानुकूलित दूकान में सब्जी खरीदने गये  काफी सब्जियां देखी
और कुछ सौ दो सौ ग्राम खरीदी भी थोड़ी देर में पहुँच गए प्याज के काउंटर के
पास ,गहरा साँस लिया और प्याज को नाजुकता से छुआ ,पुरे शरीर में करंट दौड़
गया। प्याज का गुलाबी चेहरा दमक रहा था और मादक खुशबु से भरा था। भाई
प्याज को एकटक निहारने का आनन्द लेते रहे और फिर मिलने का वादा कर
पेमेन्ट काउन्टर की और बढ़े। जब बिल मिला जो प्याज का दस रूपये भी लिखा
था। उसने दूकान वाले से कहा -मेने प्याज ख़रीदा नहीं तो दस रूपये क्यों लिखे हैं ?
दुकानदार बोला -प्याज के काउंटर के पास से गुजरने के पाँच रूपये और हाथ से
उठाकर या कुछ देर रुक कर खुशबु लेने के पांच ,श्रीमान आपने ये दोनों काम किये
इसलिए दस का चार्ज लगा।
         प्याज के दाम बढ़ने से बहुत सारे सरकारी महकमे और छोटे बड़े व्यापारी
संतुलित बल्ड प्रेशर से जीते हैं। जब ये दोनों पॉइंट जुड़ जाते हैं तो इन दोनों के
घर सिक्के खनकते हैं ,रोता है बेचारा पैदा करने वाला या फिर प्याज की बलि देने
वाली।
       प्याज के दाम बढ़ते ही विरोधी दल इस तेज गेंद को हवा में तैर कर पकड़ने
की फिराक में रहते हैं। प्याज के नाम पर आंसू टपकाते हैं ताकि जनता की संवेदना
टपके और फिर चालु खटखटिया सरकार टपके। जो काम विरोधी दल के बड़े बड़े
मुद्दे नहीं कर सकते वो अकेले प्याज देवता कर देते हैं।
    देश की हर रूलिंग पार्टी जगती और सोती रहती है। जागने और सोने को रेशियो
कुछ भी हो यह मुख्य नहीं है मुख्य बात है उसके पास पक्के आंकड़े प्याज की
पैदावार के सम्बन्ध में होने चाहिए बाकी सब आंकड़े मौसम विभाग वाले हो तो
चलेगा क्योंकि प्याज के अलावा सब जगह सुंदर भड़कीले बहाने मिल जाते हैं मगर
प्याज के मुद्दे पर असल ही चाहिये यदि प्याज पर लीपापोती कर दी तो पक्का मानो
कि उस सरकार की पुताई होनी ही है
       यदि प्याज गरीबी की रेखा के नीचे भी भरपूर मिले तो समझिये आप फिर
सरकार बनाने वाले हैं और प्याज गायब तो वे सरकारे भी गायब  …………….

चलते चलते ---

       हम देश के सभी गरीबों को भरपेट भोजन देंगे क्योंकि हमारे पास खाद्य सुरक्षा
है मगर हमसे प्याज गारंटी ना मांगे क्योंकि इसका मिलना या ना मिलना भाग्य के
हाथ में है !!        

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

चल सपना देख !!

चल सपना देख !!

सपना भी अजीब दुनियाँ रच देता है ,तरह-तरह के सपने ,सबके सपनों का रंग रूप भी
भिन्न -भिन्न। छोटे सरकार से बड़े सरकार सबको सपना देखना और दिखाना भाता है

   हमारे देश ने सालो पहले अपने प्रधानमंत्री की नजरों से एक सपना देखा -गरीबी
हटाओ। बड़ा रंगीन और मनभावन सपना था पुरे देशवासियों को भाया ,खेत ,ठाणी
गाँव ,क़स्बा ,शहर ,महानगर सब जगह हसीन सपने की चर्चा थी ,सबने सोचा -अब
बुरे दिन लद गए मगर हाय रे सपना ,ऐसा टुटा कि करोडो भारतीय टूट गये परन्तु
जिसने दिखाया उसका सिंहासन बना गया। ………।

 फिर आया शिक्षा का सपना ,सब पढने लगे ,रात और दिन ,बच्चे युवा और बूढ़े सब के
बस पढने लगे ,कोई नाम लिखना सीख गया ,कोई गिनती लिखना और कोई अक्षर
पढना सीख गया ,युवा और बच्चे किताबे गोकते गए ,कागज पर योग्यता कार्ड पाते
गये ,लेकिन हाय रे सपना , पढ़े लिखे निकम्मे और बेकार हो मख्खियाँ मारते रहे मगर
उनको सिंहासन मिलता रहा। …………

फिर आया भावनाओं का सपना  …. उनकी बदनसीब मौत एक जवान युवा सपने में
बदल गई। देश को लगा अब क्रांति की शरुआत होगी मगर हम देखंगे ,हम देख रहे हैं
हमे देखना है में सपना उलझ गया। ……………………।

फिर आया जातिवाद का सपना ,परमात्मा को घर देने का सपना। सबके सब लग पड़े
परमात्मा को घर देने के नाम पर।  दिखाया गया सपना चमत्कार से भरा था और
चमत्कार हुआ भी ,जिसको घर देने का वादा किया वह तो बेघर ही रह गया और घर
किसी और को मिल गया  ……। 

फिर आया आर्थिक उदारीकरण का सपना ,ले उधार ,ले उधार। बेच बाप दादा का माल
और पेल उदारीकरण। भाई ने कौडियाँ के दाम हीरे बेच दिए और जो दाम मिले उससे
जलसे करने लगे। देश डूब गया मगर उनका सपना तैर गया  …………

फिर लाये रोजगार गारन्टी का सपना ,खोद चोकड़ी और ले जा रोकड़ ,लिखा दे फर्जी
नाम और करले रोकड़ी ,गाँव के गाँव लग गए खोदने और रोकड़ पाने के चक्कर में
सपना फिस्स हो गया ,खुद के हाथ लुल्ले हो गए ,दूसरो की पीठ पर चढ़कर फिर आ
गए नया सपना लेकर   ……।

 चालू गाडी में सपना आया -लूट ले और झोली भर ले। जिसको जहाँ जो हाथ लगा
अपने खिस्से के हवाले किया ,अरबों लोगों के सपने टूट गए तो हजारों ने  सच भी
करा लिए गए

अब फिर सपना दिखाना था सो ले आये -खा खा कर तोंद भरने का सपना ,सबके
पेट भरेंगे ,सबकी तोंद निकल आयेगी ,बस इस बार कृपा कर दो नाथ  …. अगर
नाथ ने कृपा कर दी तो फिर राजा का सोना  …. कसम से पीगल कर फिर हजारो
हाथों में चला जाएगा और अरबों लोग कंगले हो जायेंगे और अमीरी के सपने देख
खुश होते रहेंगे  ……………    
   

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

विजयी भव :

विजयी भव :

सफलता के दस सूत्र

1. कर्तव्य का बोध - काम करने से पहले हम यह जरुर जान ले कि हमे क्या करना
चाहिए और क्यों करना चाहिए। अगर हम जो भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं क्या वह
अपना खुद का है या किसी ने थोप दिया है और हम बिना मन से उसे कर रहे हैं।
हमारा लक्ष्य निर्धारित होने के बाद हमें अपने कर्तव्य का बोध अनिवार्य रूप से होना
चाहिए यानि जबाबदारी। परिणाम के बारे में पहले से सोच कर हम जबाबदारी से
नही बचे क्योंकि परिणाम कार्य कुशलता और भाग्य यानि समय की अनुकूलता
दोनों पर निर्भर रहता है ,हमारे हाथ में कार्य कुशलता और जबाबदारी पूर्वक कार्य
को पूरा करने की निष्ठा होनी चाहिए

2. लाभ और हानि - हर कार्य के पूरा होने के बाद लाभ या हानि हमे परिणाम के रूप
में प्राप्त होते हैं इसलिए कार्य के फल और कुफल पर विस्तृत विचार करना चाहिए
कार्य के अच्छे और बुरे सभी पहलुओं पर विश्लेष्ण करने से हम संभावित आपदाओं
को रेखांकित कर सकते हैं और यु टर्न या प्रतीक्षा करने के टूल का उपयोग कर सकते
हैं

3. कार्य नीति -लक्ष्य का निर्धारण और लाभ हानि पर चिंतन के पश्चात् कार्य को
कैसे पूरा किया जाना है ,के बारे में रुपरेखा और सिद्धांत निश्चित कर लेना जरुरी है
यदि पालिसी नही होगी तो आपात प्रबन्धन में रूकावट आ जाती है

4. उपाय - काम उपाय पूर्वक करने से कठिन नहीं रहता है ,सामान्य परिस्थिति में
कार्य नीति के अनुसार चलते रहेंगे मगर आपात स्थिति आने पर उस काम की गति
में रूकावट नहीं हो इस बिंदु पर आकस्मिक उपाय पहले से ही तैयार रहना चाहिए।
ध्यान रहे हमारा लक्ष्य महत्वपूर्ण है कार्य योजना जो पहले से तय कर रखी है उसके
असफल होने पर दूसरी और तीसरी योजना हाथ में होनी ही चाहिए।

5. दीर्घसूत्रता - हर काम को निश्चित समय में पूरा करना सफलता के लिए जरूरी है
अगर अनावश्यक रूप से ज्यादा समय काम को पूरा होने में लगता है तो उस काम
के फल को काल चाट जाता है। टाल मटोल योजना के रूप को बीमार कर देता है।

6. उपलब्ध साधनों का सदुपयोग - काम को पूरा करने के लिए हमारे पास जितने भी
साधन उपलब्ध हैं उनका किस प्रकार उपयोग करना है कि लक्ष्य की राह आसान हो
जाए ,याद रखे छोटे छोटे साधनों के उपयोग से बड़ी विजय मिल जाती है ,घास के
तिनके मतवाले हाथी को बाँध देते हैं और गुरिल्ला पद्धति से भी युद्ध जीते जाते हैं।

7. आत्म शक्ति - हमारा आत्म बल जितना मजबूत होगा हमारी बाधाएं उतनी छोटी
होती जायेगी। चेहरे पर मुस्कान ,होंटों पर गीत और ह्रदय में सकारात्मक भाव ये
तीनो चीजे हमारी आत्म शक्ति को दुगुना कर देती है और हमारे संकल्प को जीवटता
प्रदान करती है।

8. धन -हमारे पास कितना धन उपलब्ध है और कितना धन कैसे आवश्यकता पड़ने
पर उपलब्ध होगा इस बिंदु पर तठस्थ आंकलन होना चाहिए ताकि धनाभाव से
योजना पर कुप्रभाव ना पड़े।

9. टीम -काम को अकेले हाथों से पूरा नहीं किया जा सकता है। हम जो भी सहायक
अपने पास रखते हैं उसमे टीम भावना होनी चाहिए। सफलता का श्रेय सहायको को
देते जाए और असफलता को बोझ खुद के कंधे पर डालते जाए यानि टीम आपात
समय में हतोत्साहित ना हो इसका ध्यान नेता को रखना होगा।

10. आस्तिक भाव -अगर उपरोक्त नौ बाते हमारे पास है तो हमें आस्थावान बनना
है। आस्था कार्यसिद्धि के लिए खुद पर ,खुद की टीम पर और शक्तिशाली परमात्मा
पर।  

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है

क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है


न्याय की पोथी के वो पन्ने सुलगा रहे थे 
पूछा क्यों ?तो बोले चुनाव जो आ रहे हैं 

इत्मीनान से कर रहे थे वो कश्ती में सुराख
नाव जब डूबी तो दोष जमाने पर मढ़ दिया 

सफेद बगुला तो नव निर्माण की बात करता है
मगर समन्दर की मछलियाँ क्यों रोने लगी है 

बड़ी जालिम है निरपेक्षता धर्म के नाम पर 
मरहम की बात करके वो चीरा लगा देते हैं 

कंठी,माला,टोपी सडको पर क्यों अटी पड़ी है 
लगता है- जरुर कोई नेता इधर से गुजरा है 

आज उसकी झोपडी में चूल्हा जला कैसे 
क्या फिर कोई धूर्त सन्यासी बन आया है 

वो दुश्मन से गले मिलकर अमन का ख़्वाब देखते हैं 
हकीकत सिर्फ यही थी कोई जवान शहीद हुआ है  

क्यों उदास है आज ये गुलजार गुलिस्ता 
क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है
   

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

नजरिया

नजरिया 

पौधे पर लगा गुलाब  पास खड़ी कांटे की झाड़ी पर लगे कांटो को देख खुद पर गर्व
महसूस कर रहा था . गुलाब अपने सौन्दर्य ,कोमलता ,महक ,रंग ,रूप,कुशल माली
के हाथों लालन पालन देख अहंकार से भर गया . उसे दुनिया में खुद की सार्थकता
नजर आने लगी . गुलाब ने मन ही मन सोचा - मेरे कारण ही यह उपवन शोभित है ,
तितलियाँ और भवरे मेरे कारण ही उपवन की सुन्दरता बढाते और नाचते गाते हैं .
मेरे कारण ही देव प्रतिमा सुसज्जित लगती है .जब मैं सुन्दरी के बालो में होता हूँ
तो उसका रूप खिल उठता है .यह सब सोच वह प्रफुल्लित हो गया और कांटे की झाड़ी
का उपहास करते हुए बोला- अरे शूल !तुम कांटो का बोझ ढ़ो कर निरर्थक जिन्दगी 
क्यों जी रहे हो ?न तुम सुन्दर हो ,ना सौरभ है ,ना ही तुम कोमल हो ?

कंटीली झाड़ी ने कहा - गुलाब , तुम सिर्फ खुद को देख कर ही ऐसा कह रहे हो मगर
यह भूल रहे हो कि तुम और मैं इस एक ही प्रकृति कि संतान हैं ,तुम्हे यह लग रहा है
कि तेरे अलावा बाकी सब कि जिन्दगी निरर्थक है मगर मुझे लगता है कि हम सभी
सार्थक जिन्दगी जी रहे हैं .

गुलाब हंसा और बोला -बताओ तेरे में क्या सार्थकता है ?

कांटे कि झाड़ी बोली -मेरे कारण कई छोटे छोटे पौधों का जीवन पशुओं से बच जाता है
मुझे देख वे दूर चले जाते हैं ,मेरे कारण तेरी रक्षा भी होती हैं तुम्हे अवांछित हाथों में
जाने से बचाता हूँ ,मेरे से ही सभी किसानों के खेत सुरक्षित हैं और किसान चिंता
रहित हो रात को सुकून से घर लौटते हैं .मेरे सूख जाने पर मैं अपने इन्ही कांटो से
भयंकर सर्द रातों में हर पथिक को गर्मी देता हूँ .यह तो आदमी कि फितरत है कि वो 
खुद को महान और दूसरों को तुच्छ समझता है   

शनिवार, 28 सितंबर 2013

आप का क्या कहना है -

आप का क्या कहना है -

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 'दांग़ी सांसदों और विधायकों' पर लाए गए यूपीए 
सरकार के अध्यादेश को 'बकवास' करार देते हुए कहा है कि इसे फ़ाडकर फेंक देना
चाहिए.

१. कांग्रेस की धूमिल हो रही छवि को बचाने का प्रयास 

२.शीघ्र चुनाव की आहट

३.मोदी की साफ छवि का भय 

४.खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की लालसा 

५.प्रधानमन्त्री को चोर दागी लोगो का पक्ष लेते दिखाना

६.UPA के गठबंधन में फेरफार 

७.अपने मतलब के लिए उपयोग करो और फेंको की नीति   

बुरे फंसे नानसेंस

बुरे फंसे नानसेंस 

चने के झाड़ पर पंच चढ़ गए तो गुज्जु ने हाथ खिंच लिए और हाथ खींचते ही पंच
फस गए कि अब इस हड्डी को कैसे उगले.उस दिन तो गुज्जु बड़ा भाईपना दिखा
रहा था -जोर जोर से चिल्ला रहा था -  चोर-चोर मोसेरे भाई !माँ ने कहा था कि ये
गुज्जु  बड़ा तीसमारखा है मगर हम ही नहीं माने ,माँ तो पटखनी खा चुकी थी
इसलिए डांट रही थी . सब पंचों ने विलाप किया -बबलू ,कुछ सोचो ,वो तो अनर्थ
करके भाग लिया और पिंडा अपने बांध गया .

बबलू बोला- तुम लोग तो खाए खेले हो ,ये फैसला तो सबके हक़ मैं था ,मेरे जीजू के
हक़ में था ,ये वाले अंकलजी ,छुक छुक वाले अंकलजी ,सिगड़ी वाले अंकलजी ,
फोन वाले अंकलजी ,भेंस वाले और बंगले वाले अंकलजी सबके हक़ में था ,नाश
हो उस गुज्जु अंकल का जो हाँ -हाँ में सर हिलाता रहा और अब साफ ना कर बैठा ,
अब मैं तो नया रंगरूट ,मैं क्या जानू कि चक्रव्यूह कैसे तोडा जाता है ,मैं तो इस
खटपट से दूर मामा के घर जाउंगा .

बबलू की बात सुन सब के मुंह उतर गए ,सब गले में अटकी हड्डी को लेकर परेशान
थे ,आखिर में तकले अंकल ने कहा - लुन्गीवाले,सब लपेटे में आ गए हैं ,गले में अटकी
ये हड्डी से गला लहुलुहान हो गया ,करमजले तूने ही तो कहा तो सब सेट हो गया ?

लुन्गीवाला बोला -सब सेट था ,मगर ये गुज्जु !हाँ कह रहा था की ना कह रहा था
ये समझने में मार खा गया और ऊपर से दादा भी दांत किटकिटा रहे हैं और सुपर
सर तो दूसरा धमाका नापसंद बम्ब से भी कर चुके हैं .

खुरखुरे बोला -एक उपाय है ,अम्मी के पास चलते हैं ,विलायती बादाम की खोपड़ी
में जरुर कुछ छटकने का उपाय होगा .

सब के सब अम्मी के घर की ओर भागे .सबको भागते देख अम्मी समझ गयी की
जरुर कुछ कलई खुलने वाली आफत आन पड़ी है .

अम्मी बोली -क्यों सिटपिटाये हो कर्मजलों?

दुग्गी बोला -गेम पेक होना है ,वो तो साहूकार बन गाँव भर में डुगडुग्गी पिट रहा है
और कह रहा है -मैं साहूकार ,अब अम्मी क्या करे ,हाय रे हड्डी ....

अम्मी बोली -फिक्र ना करो ,बड़ा चमचा तो अब काम आने वाला नहीं है इसलिए
उसे तोड़ दो !

सब एक साथ बोले -हैं ...!!! .फिर समझ गए तो तालियाँ बजा उठे और लगे बड़े
चमच्चे को घिसने .

बबलू भी जोश में आ गया और बोला -देखो,मैं इस चमचे के दो टुकड़े करता हूँ ,
तुम सब जयजयकार करना .

बबलू ने गाँव की टंकी पर चढ़ कर ऐलान किया -बेवकूफ,अब नयी पिक्चर का
हीरो अपुन खुद बनेगा  और बड़े चमच को घिस दूंगा

बाकी के कुछ चमचों ने तालियाँ बजाई ,समर्थन किया ,तुरंत थूंका तुरंत चाटा
और बड़ा चमचा दूर पड़ा कराहा-अपुन ने कुछ नहीं किया ,अपुन ने सबको खिलाया ,
अपुन का पेट भूखा है     

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

हम सुरती लाला

हम सुरती लाला 

सूरत के बासिन्दे अपनी जिन्दादिल्ली के लिए मशहूर हैं यहाँ के लोगों के लिए समस्या
या विपति  भी उत्सव से कम नहीं है . बाढ़ ,भूकंप ,महामारी कोई भी आपत्ति क्यों न हो ,
यहाँ के लोग समस्या से दो दो हाथ भी मुस्कराते हुए करते हैं ,आप जो तस्वीर देख रहे हैं
यह ताप्ति नदी के प्रचंड रोद्र रूप की है ,डेम से छोड़ा जा रहा अतिरिक्त जल से तापी रोद्र 
होकर बह रही है और इस कारण शहर के निचले हिस्सों में पानी आ गया है ,मगर 
सुरती बेफिक्र होकर इस समस्या को भी उत्सव की नजर से देखने उमड़ रहे हैं ,समस्या
को नजदीक से देखना उसे समझना उस पर विश्लेष्ण करना और फिर मिलझुल कर समस्या
से दो दो हाथ कर उसे पराजित कर देना यह सुरतीयो की खास विशेषता है  




यहाँ का बचपन निडर है ,ताप्ति रोद्र रूप में बह रही है
पर बच्चे इसे समझने की चेष्टा कर रहे हैं ,जिस धरती के बच्चे निडर हो
उस के बासिन्दे निश्चित ही कर्म शाली ही रहेंगे तभी तो व्यापार और उद्योग यहाँ फलते फूलते हैं


The southwest Monsoon has been vigorous over Gujarat state. (Photo courtesy: Hanif Malek)


इस पुल को ध्यान से देखिये यहाँ कारें चल नहीं रही है ,पार्किंग की है ताकि संभावित
बाढ़ से नुकसान ना हो ,यह विनोदप्रिय शेली यहाँ के लोगों को समस्या नहीं लगती है
एक को देख कर दूसरा भी अपनी कार को बाढ़ से बचाने पुल को पार्किंग करता जा रहा है
यहाँ के लोग मस्त रहते हैं ,हँसते खिलखिलाते हैं ,काम करते हैं परिश्रमी हैं ,जिन्ददिल्ली
के कारण ही इन्हें सुरती लाला कहा जाता है

यहाँ का यौवन सडको पर अटखेलियाँ करता है ,रोमांस करता है पर हमें परवाह नहीं हैं
क्योंकि सडक किनारे बैठ कर बतियाना  युवा दिलों को खूब भाता है .

हम बारिस देखने भी जाते हैं प्लेग से भी नहीं घबराते हैं कर्फ्यू को देखने का आनंद सडको
 पर जाकर ले आते हैं ,बाढ़ भूकंप या अन्य  आपदा सुरतियों के हौसले आज तक नहीं तोड़ पायी है


रविवार, 22 सितंबर 2013

सूत्र -जाकी रही भावना जैसी ( रामचरित मानस से )

सूत्र -जाकी रही भावना जैसी ( रामचरित मानस से )

सूत्र यानि वह पद्धति जिसको हर काल में लागू करने पर समान परिणाम प्राप्त होता
है उस पर काल ,परिस्थिति,स्थान का प्रभाव नहीं पड़ता है। तुलसी कृत मानस सफल
जीवन पद्धति के सूत्रों से भरी पड़ी है। उसी से एक सूत्र उठा रहे हैं "जाकी रही भावना
जैसी"

भावना यानि मन में उठने वाले विचार। हर विचार दो प्रकार का होता है  एक सकारात्मक
और दूसरा नकारात्मक। दोनों ही भाव परस्पर विरोधी परिणाम देने वाले हैं ,वस्तु
तठस्थ होती है परन्तु भावना अलग-अलग होती है। उस वस्तु के प्रति हमारे जैसे भाव
होते हैं उसी रूप में वह प्राप्त हो जाती है।

हमारा क्रिकेट खिलाड़ी युवराज एक गंभीर बिमारी से पीड़ित हो गया और बिमारी को
पराजित कर पूर्ण रूप से स्वस्थ भी हो गया। बीमार होने से स्वस्थ होने तक उस खिलाड़ी
के भाव उस बिमारी के प्रति क्या रहे होंगे ?क्या वह बिमारी से भयभीत होकर निराश
हो गया या बिमारी को समूल नष्ट करने के भाव से विजयी हो गया ,वह खिलाड़ी बिमारी
को हरा चूका था  …. यह चमत्कार हुआ कैसे ?उत्तर है उसकी विजयी होने की भावना से।

मनुष्य जब भी जीवन क्षेत्र में उतरता है तो उसे क्या धन सम्पति लेकर उतरना चाहिए ?
यदि आपको उत्तर हाँ में है तो इस लेख को आगे पढना बंद कर दीजिये क्योंकि यह
आपके लिए नहीं लिखा जा रहा है यह उनके लिए लिखा जा रहा है जो हाथ से खाली
और भावना से सम्पन्न हैं।

हम जब जीवन के क्षेत्र में उतरते हैं तो हमारे पास वस्तु को सही रूप में देखने और
समझने की क्षमता होनी चाहिए। वस्तु को देखने का भाव और नजरिया सकारात्मक
ही होना चाहिए। यदि हम अपने लक्ष्य के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों
चिंतन एक साथ रखेंगे तो हम अपने लक्ष्य को कभी भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे चाहे
दैव कितना ही अनुकूल क्यों ना हो। अगर हम अपने लक्ष्य को ठीक वैसा ही देख रहे
हैं जैसा हमने सोचा है तो विजय के हम निकट आ जाते हैं उसके बाद ठीक वैसा ही
होने लगता है जैसा होना चाहिए।

हमारे देश के एक मुख्य मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण लीजिये उनके ऊपर विरोधी
नेताओं ने एक दंगे को भड़काने का आरोप लगाया लेकिन उन्होंने उस आरोप को
सकारात्मक भाव से देखा और तुरंत चुनाव घोषित करवा दिए और उसमे विजयी
हुये ,अगर उन्होंने उस चुनौती को नकारात्मक भाव से लिया होता तो विजय रथ रुक
भी सकता था।

हमारे देश के प्रधान मंत्री ने कहा था कि मेरे पास जादू की कोई छड़ी नहीं है जिससे
तुरंत समस्याओं का हल आ जाए ,यह कथन नकारात्मक भाव से भरा था और
नतीजा यह है कि देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है ,यहाँ मेरा आशय किसी की प्रसंशा
या आलोचना करना नहीं है मेरा तात्पर्य है वस्तु को देखने के भाव से जुड़ा है।

कुछ दिन पहले देश के युवा नेता ने कहा था कि "तीन चार रोटी खायेंगे -सौ दिन काम
करेंगे -दवाई लेंगे  …। "यह कथन नकारात्मक और संकुचित दृष्टिकोण रखता है
इसको सुनकर देशवासी उत्साह से लबरेज नहीं हुआ ,क्यों  ……।

एक कथन अमेरिका के टावर हमले के समय राष्ट्रपति ओबामा का आया -"जिसने
भी यह अपराध किया है वह क्षमा का पात्र नहीं है उसे दण्डित करके ही रहेंगे "यह वाक्य
अमेरिकन प्रजा में आशा का संचार कर गया और उस विकट घड़ी में ओबामा को
पुरे राष्ट्र का समर्थन मिला।

हम अपने लक्ष्य के प्रति कैसा नजरिया रखते हैं यही महत्वपूर्ण है। यदि हम दृढ
निष्ठा,दृढ संकल्प के साथ आगे बढ़ते हैं तो उस लक्ष्य को पूरा करने का उत्तरदायित्व
प्रकृति स्वत:उठा लेती है। हमे अपने लक्ष्य को पूरा करने वाले लोग साधन मिलते
जाते हैं ,अगर ऐसा नहीं होता है तो निश्चित मानिए लक्ष्य पवित्र नहीं है ,कल्याणकारी
नहीं है। 

हमें शुभ नजरिया रखना है ,आशावादी विचारों से मन को भरे रखना है ,विजय का
विश्वास चेहरे से छलकना चाहिए हमारा संकल्प अटूट और अटूट उत्साह मन में
रखना है उसके बाद खुद को परमात्मा का अंश मानकर विराट भाव से कर्तव्य पथ
पर बढ़ जाना चाहिए  …। परिणाम अनुकूल ही रहेगा इस पर कोई शंका करने की
आवश्यकता नहीं है।
पत्थर में भी विराट परमात्मा को देखने का नजरिया रखिये। समस्या को झुका दीजिये ,
निराशा के भाव को दूर फ़ेंक दीजिये क्योंकि आप उस ईश्वर के अंश है जो सर्वसमर्थ है।
ये सब पदार्थ ईश्वर ने अपनी सन्तान के लिए आपके लिए ही तो बनाये हैं ,बस क़दम
बढ़ा दीजिये  ………………।       

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

बड़ी मज़बूरी है

बड़ी मज़बूरी है 

कैसे साधे इस पे निशाना, बड़ी मज़बूरी है 
मौन कुर्सी की टाँगे, इसने ही टिका रखी है 
सबूत हटाये इन्ही हाथों से, बड़ी मज़बूरी है
उसके हाथों ने चाबी ,कुर्सी की थाम रखी है 

गुम करनी थी ये फाइल, बड़ी मज़बूरी है 
कुछ स्याह तस्वीरे उसमे भी लगा रखी है 
थी टावर में कुछ गड़बड़, बड़ी मज़बूरी है 
कई काली चोंचों ने, गर्दन जो दबा रखी है 

सर्किट से पकड़ना आग, बड़ी मज़बूरी है 
जलते कुछ कागज ने, साख बचा रखी है 
लछमी का गिरते जाना, बड़ी मज़बूरी है 
जानो हूँ खिलौना,चाबी कहीं ओर रखी है 

मजदुर के घर भी रोटी, बड़ी मज़बूरी है
बस वोटों तक प्यारे, कंठी पहन रखी है 
तेरी बासी बस्ती में हम, बड़ी मज़बूरी है
हैं पक्के सियार ,गाय की खाल रखी है  

 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

जननायक की जय हो

जननायक की जय हो

फूट गए जन-जन के किस्मत 
जब खलनायक ही अधिनायक 
क़ोम -क़ोम में लहू बहाकर 
कहलाते खुद को जननायक 

शाख -शाख पर उल्लू  बैठे 
साध रहे सब अपना मतलब 
जिस माता की कोख से जन्मे 
उसे उझाड़े क्रूर खल नालायक  

भारत माँ का भाग्य विधाता 
किसकी करनी किसको भरनी 
बस लाश गिरे, हो हिंसक बस्ती 
है कुटिल इरादा कुरसी मिलनी 

उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम
धुं -धुं कर हर दिशा जले 
मारो काटो अमन चैन को 
नफरत का नंगा नाच चले

चाहे पराजीत हो प्रजातंत्र
चाहे जनतंत्र की कुर्बानी हो 
कीमत कितनी भी लग जाए 
गूँजे अधिनायक की जय हो 

रो-रो कर जन-जन पुकारे- 
जय हो,जननायक की जय हो

  
   



बुधवार, 18 सितंबर 2013

इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरी माँ के आँचल में पनाह पाता हर धर्म
मेरी माँ कि छाती से पोषित सब संस्कृति
मेरी माँ की गोदी में प्रफुल्लित है हर कोम
इसीलिये गर्व है -मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे वेद की ऋचाएँ मुझे सम दृष्टा बनाती है
मेरे उपनिषदो से धारा स्नेह की बरसती है
मेरे पुराणों की गाथा सत्य की लौ जलाती है
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे राम सिखाते हैं जीना आदर्श जिन्दगी
मेरे श्याम गाते हैं निष्काम कर्म है बन्दगी 
मेरे शंकर पीते रहे गरल बचाने को सृष्टि
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे दिल में है रसखान मेरे मन में कबीरा है
मेरे दर्शन में महावीर भुजा में गुरु गोविन्दा है
मेरी धडकन में बसी टेरेसा मेरे कर्म में बुद्धा है 
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।


रविवार, 15 सितंबर 2013

हें -हें …हिंदी बोलता तू !!

हें -हें  …हिंदी बोलता तू !!

हिंदी दिवस है और हिंदी बोलना है ,यह देश चलाने वाले कर्णधारों को एक मिठ्ठी सजा
है वरना धकाधक इंग्लिश झाड़ना इनकी आदत है।

हिंदी अभी राष्ट्र भाषा की गरिमा और ताज से दूर है क्योंकि हमारे संविधान ने यह
ताज हिन्दी को नहीं बख्शा है।

हम अंग्रेजी के दीवाने हैं ,जो व्यक्ति फिरंगी भाषा में ऊल जलुल कुछ भी बक देता है
तो हम उसको ऊँचे दर्जे का साहब समझने लग जाते हैं। हम अपनी रगो में हिंदी को
बहने ही नहीं देना चाहते हैं क्योंकि हमें घर का जोगी जोगना और बाहर गाँव का
सिद्ध लगता है।

हिंदी बोलने वाले को आज अच्छी नौकरी और छोकरी नसीब नहीं होती है और ये
दोनों जीवन जीने के लिए जरुरी है। जब भी कोई पढ़ा -लिखा नौजवान किसी
महत्वपूर्ण सभा में राज भाषा में बोलने लग जाए तो कोई ना कोई फुलझड़ी बोल
पड़ती है - हें -हें  …हिंदी बोलता तू !!

हमारा भविष्य जब अंग्रेजी में बोलता है तो हम गर्व महसूस करते हैं और सोचते
हैं कि हमारे बुढ़ापे में सुखद समय आने वाला है ,इस मृग तृष्णा से हम बच नहीं
पाते हैं और खुद अपनी खुशियाँ कम करके देश के भविष्य को फिरंगी भाषा के
हवाले कर प्रगती के शिखर को तय करना चाहते हैं। हम बैसाखियों के सहारे चोटी
पर पहुंचना चाहते हैं इसलिए हम अढाई दिन में एक कोस चलते हैं।

हमारे नेता ,वाह! क्या कहना -जब देश का बजट भाषण संसद में पढ़ते हैं तो बड़े
गर्व से इंग्लिश जबान में बोलते हैं ,बेचारा देश उनके चेहरे को देख अपने भाग्य
को फोड़ता है ,हमारे प्रधान संसद में बड़ी सहजता से हिंदी को दरकिनार कर देते
हैं और फिरंगी भाषा में भारत निर्माण की बातें करते हैं। लोकसभा और राज्यसभा
में हिन्दी अपनी माथे की बिन्दी भी सुहागिन आधुनिका के ललाट की बिंदी की तरह
खोती जा रही है।

मुन्शी प्रेमचंद को कौन भारत रत्न देगा और क्यों देगा ? उन्होंने जो कुछ किया देशी
भाषा में किया और देशी का मोल गुलाम आत्माएँ कैसे समझे ?

हम विकास की बातें इंग्लिश में करते हैं और तुर्रा यह ठोकते हैं कि हिंदी अंतर्राष्ट्रीय
भाषा नहीं है इसलिए मज़बूरी में बोलना पड़ता है  … वाह रे कपूत !किसे उल्लू बना
रहा है ,इस देश के अगले कदम पर चीन है और वह अपनी भाषा के साथ विकास का
पर्याय बन रहा है,क्या चीन की भाषा विश्व के पल्ले पड़ती भी है ?

फिरंगी भाषा का बेजा फायदा नेता लोग उठा लेते हैं। वो जिनके सामने भाषण करते
हैं ,उनकी बर्बादी पर अंग्रेजी में बोलते हैं और उनसे तालियाँ भी बटोर लेते हैं!

बड़ी मुश्किल से बड़े लोग हिंदी दिवस पर इस तरह बोलते हैं -

"आज हिंदी दीन है,हमे एक भी वर्ड आज अंग्रेजी में नहीं बोलना है ,आज मेरा लेक्चर
हिन्दी के वास्ते हैं ,मैं इस टाइम आपसे वादा करता हूँ कि इण्डिया में हिंदी को डवलप
करने का हार्टली प्रयास करूंगा। बाई  ……  

रविवार, 8 सितंबर 2013

हिंदु सन्त समाज को बदनाम करने में व्यस्त मिडिया

हिंदु सन्त समाज  को बदनाम करने में व्यस्त मिडिया 

टेलीविजन के समाचार चैनल वर्तमान में क्या दिखा रहे हैं ? जो अपने आप को
लोकतंत्र का एक स्तम्भ समझते हैं वे एक व्यक्ति के दुर्गुणों को चटखारे लेकर
प्रस्तुत कर रहे हैं। हिन्दुस्थान में लाखों हिन्दू संत और सन्यासी हैं जो पूज्य ,
दिव्य और विद्धवान हैं,मेने कभी टेली मिडिया को उनके सुविचारों और कार्य
कलापों का गुणगान करते हुए कभी नहीं देखा। मेने कभी टेली मिडिया पर उनके
द्वारा किये जा रहे लोक कल्याण कार्यों पर विभिन्न तथाकथित विद्धवानो को
उनके गुणगान करते नहीं देखा। इसके पीछे क्या कारण हैं  ……

      हम देख रहे हैं कि लाखों सन्त समाज में से एक संत के घिनोने काम को किस
तरह मिडिया दिन रात बता रहा है जैसे देश की सबसे बड़ी समस्या वो अकेला ही है।
इस देश के संसद के मन्दिर में हल्के दर्जे के कुछ सांसद बैठे हैं उनके आचरण को
लेकर यह मिडिया इतना क्यों नहीं चिल्लाता है क्या उनका देश लूटने का आचरण
किसी व्यभिचार से कमतर है ?मगर मिडिया का मकसद कुछ  …. ।

    अन्य धर्मो के कुकर्मो पर पर्दा डालने वाला मिडिया करोड़ो हिन्दुओं की भावनाओं
का अपमान क्यों कर रहा है ,जबकि वह जानता है कि अपराधी को दंडित करने के
लिए एक स्तम्भ अपना काम कर रहा है,क्या मिडिया खुद को न्याय का देवता
समझता है या फिर किसी की घिनोनी हरकत से खुद की कमाई  …। ।

      गँगा नदी को प्रदुषण मुक्त करने की मुहीम में प्राण गवाने वाले हिन्दू संत पर
ये मिडिया चुप क्यों था ,जिस तरह आशाराम के कुकर्म को और उसकी गिरफ्तारी
को भरपूर उत्साह के साथ बताया था मगर प्रदुषण मुक्त गँगा के लिए प्राण
 न्योछावर करने वाले संत से यह मिडिया दूर क्यों भाग रहा था ? क्यों  … ?

    ये कुत्सित मानसिकता वाले समाचार वाचक एक आशाराम के कारण समस्त
संत समाज को बदनाम करने पर क्यों तुले हैं ,शायद इसका एक उत्तर यह भी हो
सकता है कि हिन्दू संत क्षमा और करुणा को धारण किये रहते हैं और सद्भावना के
मूल सिद्धांत पर जीवन जीते हैं। क्या किसी कट्टरपंथी या ईसाई पादरियों के कुकर्मो
पर ये अपना मुँह खोलने का साहस भी करते हैं ? शायद नहीं ,क्योंकि वो उसका
अंजाम समझते हैं या फिर जानबूझ कर चुप्पी साध लेते हैं । 

   पाप का उदय कभी भी किसी में भी हो सकता है ,क्या मिडिया अपने को चरित्रवान
समझता है ?क्या मिडिया अपने कर्तव्य का निष्काम पालन करता है ? मिडिया में
ज्यातर महानुभाव अच्छे हैं मगर सब के सब तो अच्छे नहीं हैं ना। जब मिडिया में
अच्छे और कुत्सित दोनों प्रकार के लोग बैठे हैं तो विशाल हिन्दू संत समाज में
कुछेक पाखंडी भी बैठे होंगे इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है। कुछ गलत लोगों
के कारण पुरे संत समाज को विश्व फलक पर संदेह के घेरे में खड़ा करके यह ओछा
मिडिया क्या सिद्ध करना चाहता है ?

   यह देश तुलसी का है ,रहीम का है ,मीरां का है ,रसखान का है,कबीर का है,नानक का
है ,ख्वाजा का है ,विवेका नन्द का है। हमें अपने इन विद्धवान संतों पर गर्व है। मिडिया
अपने कर्तव्यों का ठीक निर्वाह करे ताकि जनता में उसकी विश्वसनीयता बनी रहे 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

सफल जीवन और आचार्य तुलसी

सफल जीवन और आचार्य तुलसी 

चट्टान -किसी के पथ की बाधा बन सकती है और किसी के लिए सीढ़ी का एक चरण
यह हम पर निर्भर करता है कि हम मार्ग में आई चट्टान को किस नजरिये से लेते हैं।

समस्याओं के समाधान के लिए हमे स्वयं ईश्वर बनना पडेगा यानि हम ये सोच
कर समय व्यतीत कर दे कि हमारी समस्या कोई और सुलझायेगा तो यह बड़ी भूल
होगी

सफलता का अमोघ अस्त्र है -श्रम और साधना ,हमे मेहनती बनना पडेगा और विषय
का पूरा ज्ञान प्राप्त करना होगा।

चिंता नहीं ,चिंतन करो। व्यथा नहीं,व्यवस्था करो। प्रशस्ति नही,प्रस्तुति करो।

हम समस्या का समाधान नहीं कर सके कोई बात नहीं ,स्वयं समस्या ना बन जाए
इसका ध्यान रखना होगा ,अच्छे काम में हमे नहीं पूछा गया इसलिए कोई ना कोई
अडंगा डालना अनुचित है।

अशांति का मूल कारण आवश्यकताओं की वृद्धि है।

खुली आँख से देखे ,ठंडे दिमाग से सोचे ,पूर्ण निष्ठां से कार्य क्षेत्र में उतरे। ये करने से
कभी असफलता नहीं मिलेगी।

व्यक्ति की मन्जिल कितनी ही दूर क्यों नहीं हो ,उसे चलना तो एक-एक कदम ही
है। वर्तमान का यह कदम सही दिशा में है और पूरी मजबूती से टिका है तो अगला
कदम रखने के लिए ठोस धरातल स्वयं उपलब्ध हो जाएगा।

विस्फोट ध्वंस के लिए भी होता है और सृजन के लिये भी।

परिस्थितियाँ सबके सामने होती है ,पुरुषार्थी व्यक्ति उन्हें पारकर आगे बढ़ जाता है
और निष्क्रिय व्यक्ति उसके सामने घुटने टेक देता है।

थोडा सा ज्ञान प्राप्त करते ही व्यक्ति में अहंकार जग उठता है ,अभिमान का नशा
छा जाता है ,विनम्रता भूल जाता है ,यह क्या है ? ज्ञान या अज्ञान  … ?

आत्मविश्वास के अभाव में विकास का स्वप्न कभी साकार नही होता है।

तुम भाग्य की ओर मत झांको ,तुम झांको उस पुरुषार्थ की ओर जो तुम्हारे भाग्य
की रचना करता है।

इस संसार की सबसे बड़ी कला है दुसरो के ह्रदय को स्पर्श करना।

जो व्यक्ति अपने अतीत के पन्ने को नहीं पढता ,कार्य कारण के परिणाम पर
दृष्टि नही डालता ,जाग्रति और अभ्युदय ,भूल और सुधार के पन्ने नहीं उलटता ,
वह सफल व्यक्ति नही बन सकता।

विकास का अर्थ है जो सोये हुए हैं उन्हें जगाओ और जो जागे हुए हैं उन्हें प्रगति
की ओर ले जाओ।

धर्म की भूमिका यह होनी चाहिए कि अपनी बुराई को व्यक्ति स्वयं में समेटे
और अपनी अच्छाई को समाज में फैलाए। 












Sun Le Bapu Yeh Paigam

Sun Le Bapu Yeh Paigam Lyrics from Baalak

Sun le bapu yeh paigam, meree chitthi tere nam
Chitthi me sabse pehle, likhata tujhko ram ram
Likhata tujhko ram ram, sun le bapu yeh paigam.......

Kala dhan kala vyapar, rishwat kaa hai garam bajar
Satya ahinsa kare pukar tut gaya charkhe kaa tar
Tere anashan satyagrah ke badal gaye asali bartav
Ek nai vidya upaji jisko kehte hain gherav
Teree kathin tapasya kaa yeh kaisa nikla anjam

Prant prant se takarata hai maya par bhasha ki lat
Mai panjabi too bangali kaun kare bharat ki bat
Teree hindi ke panv me angreji naa dali dor
Teree lakdi thago ne thag li, teree bakari le gaye chor
Sabaramati sisakati teree tadap raha hai sevagram

Ram raj ki teree kalpana udi hawa me ban ke kapur
Bachcho ne padhana choda tod phod me hain magarur
Neta ho gaye dal badlu desh ki pagadi rahe uchhal
Tere put bigad gaye bapu daru bandi huyi halal
Tere rajghat par phir bhi phul chadhate subah sham

बुधवार, 28 अगस्त 2013

गलत उपाय से राष्ट्र का बदहाल

गलत उपाय से राष्ट्र का बदहाल 

आचार्य चाणक्य ने सूत्र दिया था कि-" जैसे भूख मिटाने के लिए बालुका रेत को
उबालना निरर्थक होता है उसी प्रकार गलत उपायों से राष्ट्र की उन्नती का
सपना सच नहीं होता है।"

"राजा का कर्तव्य है कि वह राजलक्ष्मी की सुरक्षा चोरो और राजसेवकों से करता
रहे।"

अगर देश की सरकार ने इन सूत्रों का पालन किया होता तो आज हमारे राष्ट्र की
यह आर्थिक दुर्दशा नहीं हुई होती ,मगर राष्ट्र की जगह राजा अपने समूह का हित
साधने लग जाए तो स्थिति विकट होनी ही थी और हुई भी। …

पिछले सालों में अर्थशास्त्री गलत नीतियाँ लाते ही गए ,उधारवाद की कुनीति से
सब बंटाधार हो गया ,हम उधार के पैसों से अपने को चमकता हुआ दिखलाना
चाहते थे ,चाणक्य ने ऋण,शत्रु और रोग को पूर्णतया खत्म करने की नीति बताई
और हमने ऋण लेकर उसको चोरों के, लुटेरों के हवाले कर दिया ,नतीजा देश का
धन विदेशी बैंको में काला होकर सड़ रहा है और हम बेबस हैं।

हमने अपने ही सरकारी उद्योगों को ठन्डे कलेजे से नीजी हाथों में बेचा और अपनी
पीठ ठोकते रहे ,अब जब सब कुछ कोडियों के मोल बिक गया तो असल तस्वीर
नंगी हो गयी और हम फकीर नजर आने लगे ,जिन महापुरुषों ने जो सम्पति बनायी
उसे बेचकर हम राष्ट्र निर्माण का सपना देखने लगे ! अजीब मुर्खता थी यह  …

हमने गुलाम रहकर उसके दुष्परिणाम भोग कर भी कुछ नहीं सिखा ,जिस ईस्ट इण्डिया
कम्पनी के कारण हम गुलाम हुए ,हमने उसके पुरे कबिले को न्योता दे दिया कि
वह भारत में आयें वे निवेशक के रूप में आये भी और भारतीय कम्पनियों के शेयरों
को सस्ते में खरीद कर रख लिया ,हमने उस समय कहा की देखो ,देश की तिजोरी
डॉलर से छलका दी है … हम अपनी मुर्खता का ढोल पीट कर गुणगान करते रहे
और देशवासियों को बरगलाते रहे। कुछ साल बाद वे विदेशी निवेशक कम दाम में
ख़रीदे शेयर ऊँचे दाम में हमको ही बेचकर उड़ने लगे और हम वापिस वहीँ आ गये 
जहाँ थे और जेब कब खाली हो गई ,पता ही नहीं चला।

हमने रिटेल में भी विदेशी लुटेरों को निवेशक बनाकर न्योता दिया ,वो अभी नहीं आ रहे
हैं क्योंकि वो जानते हैं कंगाल से दोस्ती करने पर बुरा हश्र होता है मगर वो उस
समय जरुर आयेंगे जब हम भारतीय पसीना बहा कर सम्पन्न हो जायेंगे और वो हमें
पुन: लूट कर चल पड़ेंगे।

हमने मुक्त व्यापार की नीति को अपनाया जबकि हमने अपनी ताकत और कमजोरियों
को नहीं जाँचा और नतीजा ये हुआ कि हम जिनको निर्यात करना चाहते थे वे देश
हमें निर्यात करके चले गए ,नतीजा देश का कुटीर ,लघु,मध्यम उद्योग लकवाग्रस्त
हो गया, सब कुछ ढेर  … और हम कहते हैं कि इसे ही प्रतिस्पर्धा कहते हैं ।

हमने वितरण क्षेत्र में लीकेज वाली नीतियाँ बनायी ,जानबूझ कर।  तब के प्रधान
कहते थे दिल्ली से चला रुपया गरीब के पास दो आन्ने बन कर पहुँचता है ,जब यह
सब जानते थे तो क्यों लीकेज बंद नहीं किये गए ,शायद गरीबों के नाम को आगे
रख कर कुछ स्वार्थी तत्वों के पेट भरने का मकसद रहा होगा ,और उन नीतियों का
परिणाम यह रहा कि गरीब और गरीब हो गया और धन को जोंक और साँपों ने डस
लिया।

सरकार भूखी, लाचार, निराश, महंगाई से त्रस्त जनता के सामने भारत निर्माण के
सपने परोस रही है। जनता यह समझ ही नहीं पा रही है कि निर्माण किसका हो रहा
है ,उसकी थाली में रोटी की संख्या हर दिन कम होती जा रही है  …। 

सरकार अपनी गलत नीतियों का दोष दुसरो पर थोपना चाहती है ताकि भेड़ें उसका
अनुकरण करती रहे और जो दोषी नहीं है उसे ही अपराधी मानती रहे  …. मगर
त्रस्त प्रजा का रोष कितना भयंकर होगा यह भविष्य में छिपा है …।  

ठोकम ठोक

ठोकम ठोक

 बच्चा :- पापा ,आप ने मेरे पाकेट में अठन्नी रखी या रुपया?
पापा - रुपया।
बच्चा -पापा, फिर ये अठन्नी कैसे बन गई ?
पापा -बेटे ,अर्थशास्त्र का सवाल हैं,दिल्ली से पूछ..

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नेता - गरीबी एक मानसिकता है
गरीब -…. तो बताओ अमीर कैसे बनूँ ?
नेता - आ जा राजनीति में !!

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VIP - मेंगो पीपल इन बनाना रिपब्लिक
जनता -भविष्य में जरुर पलीता लगाओगे ,क्यों सही है ना बाबा !

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नेता -देखो ,उसके बारे में कोई भी बोलेगा तो चौबीस घन्टे के बाद ही बोलेगा
चौबीस घंटे बाद बहुत सोच के प्रवक्ता बोला -  मेंढक !!

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जनता - साहब, रुपया गिर रहा है
अर्थशास्त्री -हाँ ,दिख रहा है
जनता -कुछ करो साहब ,रुपया गिर रहा है
अर्थशास्त्री - चिंता की बात नहीं है,मेरे पास दूरबीन है 
जनता -साहब ,रुपया गिरता ही जा रहा है
अर्थशास्त्री -तुझे गिरता दिखाई दे रहा है तो उठा कर जेब में डाल ,मुझे क्यों
                   उठाने को बोल रहा है ,क्या मुझे उचक्का समझ रखा है
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पत्नी -मुझे आज ही लॉन्ग ड्राइव पर ले चलो
पति -रात के ग्यारह बज रहे हैं प्रिये।
पत्नी -बारह बजते ही पेट्रोल महँगा हो जाएगा और आप ले जाओगे नहीं
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टीचर -सुरसा किसे कहते हैं?
छात्र -महँगाई को
टीचर -और कुम्भकर्ण ?
छात्र -सरकार को
टीचर -…… मारीच ?
छात्र -कुर्सी को
टीचर - और रावण
छात्र -टीचर ,ये शब्द स्त्रीलिंग है या पुर्लिंग
टीचर -मतलब
छात्र -यदि शब्द पुर्लिंग है तो रिमोट को और स्त्रीलिंग है तो रिमोट कन्ट्रोलर को
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शनिवार, 24 अगस्त 2013

हम रूपये को मजबूत सहारा दे सकते हैं

हम रूपये को मजबूत सहारा दे सकते हैं  

1. पेट्रोल ,डीजल का उपयोग सोच समझ कर करे क्योंकि इसका अनावश्यक खर्च
   हमें कंगाल बना रहा है।
2. भ्रष्ट नेताओं को हार का जबर्दस्त मजा चखाएं।चोर नेता जो जनता के कर के पैसे
   की लूट चलाते हैं ,उनके खिलाफ कठोर कानून लाओ।
3 . विदेशो में पड़ा काला धन वापिस लाने का जो दल लिखित में वादा करता है
     उसकी सरकार बनवाओ।
4 . विदेशी चीजों की खरीदी बंद करो स्वदेशी का सम्मान व उपयोग करो।
5. सरकार द्वारा बड़े उद्योगपतियों को दी जा रही सब्सिडी और अन्य रियायते
    बंद हो।
6. सरकार द्वारा समाज कल्याण या रोजगार के नाम पर चल रही अनुत्पादक
    लोक लुभावन योजनायें तत्काल बंद हो।
7. काम के घंटों में बढ़ोतरी हो और सरकारी छुट्टियों में कमी हो।
8. रक्षा उपकरणों में स्वदेशी उत्पाद को तीव्र गति से बढ़ाया जाए।
9.  उधार लेकर घी पीने की संस्कृति बंद करो और बचत करो।
10. लघु उद्योगों का संरक्षण हो और ग्रामीण क्षेत्रों में लघु इकाइयों को प्रोत्साहन
      दो।
11. उत्पाद की मजबूत गुणवत्ता हो।
12. परिश्रमी और पुरुषार्थी बनो ,शारीरिक मेहनत को हेय मत समझो।
13.हर प्रकार का सट्टा,जुआ बंद हो।
14. सरकारी खर्चो,भत्तों में भारी कमी हो। सरकारों द्वारा अपने काम के बखान
    के लिए किया जाना वाला खर्च और विज्ञापन बंद हो।
15. खेती को उद्योग का दर्जा दो।        

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

"मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है अपने हिन्दू धर्म पर गर्व है अपनी हिन्दू संस्कृति पर
गर्व है।"  यह बात लिखते हुए मुझे गर्व है क्योंकि यह बात विवेकानंद ने कही और इस
बात को महात्मा गाँधी ने दोहरा कर गर्व महसूस किया।

         हिन्दू संस्कृति को सांप्रदायिक ठहराने वाले दुर्बुद्धि नेताओ की जमात को नेतागिरी
भुलाने के लिए क्या हिन्दू वोट बैंक की वर्तमान समय में देश को आवश्यकता है ?क्या
तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की ईंट को जबाब देने के लिए हिन्दू वोट बैंक को संगठित
होकर चट्टान बनने की आवश्यकता आ चुकी है ? इन प्रश्नों को उठाने का समय अब पक
गया है।

         हमारे ही हिन्दुस्थान में कोई भी तथाकथित बुद्धिशाली, हिन्दुओं को, जब चाहे ,
जिस मंच से चाहे,उस मंच से साम्प्रदायिक शक्ति ठहराने की बात उछालता है ,क्यों ?
कारण कि हिन्दु वोट बैंक में तब्दील नहीं हुआ है ,वह कट्टरवादी और चरमपंथी नहीं है
और उसकी इसी सहनशीलता को स्वार्थी नेता भद्दी मजाक बनाते रहते हैं।

        इस देश के हिन्दुओ को ऊँच नीच ,अगड़ा पिछड़ा , सब कुछ छोड़ कर एक मकसद
के लिए संगठित होना होगा और वह मकसद है जो दुर्बुद्धि नेता चुनाव लड़ता है और
चुनाव जीतने की खातिर हिन्दुओं को सांप्रदायिक शक्ति कहता है उस नेता के और उसकी
पूरी पार्टी के खिलाफ अपने मत का उपयोग करना है ताकि उनकी हार हो और वो भविष्य
में कभी भी स्तरहीन राजनीति ना करे।

      हिन्दू कोई सम्प्रदाय नहीं है एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन है ,जीवन पद्धति है। क्यों इस
धरती पर आज विभिन्न धर्म पोषित हो रहे हैं ?हिन्दू धर्म एक सागर है जिसमे अनेको
धर्मो को साथ लेकर चलने की गंभीरता है। किसी भी प्रकार का तुष्टिकरण अंत में
देश के लिए समस्या ही पैदा करता है। हिन्दू तुष्टिकरण में विशवास नहीं करता है ,
वह तो सम दृष्टि में विश्वास करता है.हिन्दू तुष्टिकरण नहीं चाहता है हिन्दू समानता
का अधिकार चाहता है। हिन्दू तो विश्व बंधुत्व की मंगल कामना से अपने दिन की
शरुआत करता है, सब में एक ही ब्रह्मा को देखता है ,परहित ही धर्म मानता है ,उसे
चरम पंथी और कट्टरपंथी कहने का क्या भावार्थ समझा जाये।

        क्या कोई विद्वान यह सिद्ध कर सकता है कि हिन्दू - धर्म सांप्रदायिक है ?

केवल स्वार्थी मनुष्य ,गिरे हुए स्तर के पशु तुल्य मूढ़ पामर लोग अपने स्वार्थ के लिए
खुद को भी गाली देने से नहीं चूकते हैं,ऐसे लोग हर समाज के लिए बोझ है और उनकी
चुनावी हार ही अब जरूरी है ताकि स्वस्थ भारतीय समाज का निर्माण पोषण पा सके          

बुधवार, 21 अगस्त 2013

ये कैसा भारत निर्माण …?

ये कैसा भारत निर्माण  …?

देव भी पुरुषार्थ के पीछे चलता है ,ऐसा हिन्दू दर्शन और विद्धवानों का मानना है,मगर
वर्तमान भारत के हवा में उड़ने वाले अंधे नेता ऐसा नहीं मानते हैं। इसका कारण या
तो ये नेता समस्या को मूल रूप से समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समस्या को उलझाये
रख कर स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। देखिये कुछ बानगियाँ -

1 . पुरुषार्थी भारतीय की जगह 65 % भारतीयों को निकम्मा बनाने के लिए खाद्य
     सुरक्षा ,इसका कुफल ये होगा कि भारतीय मेहनत करके पेट भरने की जगह
     कोड़ी के भाव मिलने वाले अन्न से पेट भरेंगे और निठल्ले पड़े रहेंगे। वास्तव
     में समस्या बेरोजगारी की है ,करोड़ो युवा काम माँग रहे हैं ,सरकार उन्हें काम
     देने की जगह निठल्ला क्यों बना रही है जबकि इस देश में विश्व के अन्य देशों
    की तुलना में सबसे ज्यादा युवा बसते हैं।

2. समस्या है गुणवत्ता युक्त शिक्षा और उपाय निकाला है कि बच्चा अगर नहीं भी
    पढ़ रहा है यानि कम अंक अर्जित कर रहा है तो भी उसे अगली कक्षा में प्रवेश दे
    देना ,बच्चे को तरासना मकसद नहीं है ,बस शिक्षित भारत के आँकड़े जुटाने हैं।

3.  समस्या है गाँवों को स्वावलम्बी बनाने की मगर चला रहे हैं अकुशल मजदुर
     योजना और वह भी महात्मा के नाम पर , क्या महात्मा का यह सपना था कि
    उसके देश के गाँवों के लोग गढ्ढे खोदते रहे और कच्ची रेत की सडके बिछाते
    रहे.

4 . समस्या है नारी के गौरव को बढ़ाने की मगर उपाय खोजा है पारिवारिक रिश्तों
    में कलह पैदा करने का। बाप की सम्पति में पुत्रियों को बराबर का हक़ देकर
    भाई बहिन के पावन रिश्ते में आग लगाने की कोशिश और इसका नतीजा आने
   वाले समय में यह देखने को मिलेगा कि बहिने भाइयों की कलाई पर राखी की
   जगह पेतृक सम्पति में हक़ पाने के लिए हथकड़ी लगवायेगी और भाई उसे डोली
  में बैठने से पहले उसकी शादी के खर्च की तलपट तैयार करके उसे देगा।

5. समस्या है जनसँख्या दर को संतुलित करने की और उपाय निकाला है लीव इन
   रिलेशनशिप के रूप में यानि खूब व्यभिचार करो और असयंम रखो।

6. बात करते हैं सामाजिक सोहार्द की और नीति जिस पर अमल करते हैं वो है
   भेदभाव और तुष्टिकरण की।

7. समस्या है भ्रष्टाचार की जिसके लिए जरूरत थी शक्ति सम्पन्न लोकपाल
     की मगर उपाय खोज रहे हैं अशक्तपाल रिमोट से

8. समस्या है भुगतान संतुलन की और उपाय खोजा है F D I ,जो आर्थिक गुलामी
  की ओर ले जायेगा जबकि रास्ता था काले धन को विदेशो से वापिस लाने का।

9. समस्या है अकर्मण्यता और लालफीताशाही की और उपाय खोजा जा रहा है
    वाणी स्वतन्त्रता को कुचल कर रख देने का ताकि खूब मनमानी कर सके और
   विरोध करने वाले को कालापानी दिया जाये।

10. समस्या है सही नीति के निर्माण की और उसे अमल में लाने की मगर उपाय
     खोजा जा रहा है भव्य रंगीन विज्ञापन के जरिये खुशहाल भारत बनाने की          

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

धड़ाम से ………

धड़ाम से  ……… 

बात मौन के महत्व की है ,बड़ी ताकत है मौन में। जो काम चिल्लाने से पूरा नहीं होता
वह मौन से हो जाता है। सब कुछ इस तरह करो कि किसी के कानो कान खबर भी ना
हो ,कुछ सालों से मौन अपनी पराकाष्ठा पर है ,बिना कुछ चूं चपाटा किये रुपया धडाम
हो गया ,बस सब देखते रह गए मोहनी अदा से  …।

           कुछ सालों से अभी तक बेचारी ईमानदारी का जनाजा निकाला जा रहा है,किसी
ने यह पूछने की हिम्मत नहीं करी कि ये मरी कैसे ?ईमानदारी शिखर पर खड़ी थी और
मौन ने बड़ी मासूमियत से खाई की तरफ धकेल दिया ,ईमानदारी कुछ समझे उसके
पहले धड़ाम से खाई में जा गिरी  ……………. धड़ाम

         अर्थ का पहिया बड़े जोर से चक्कर खा रहा था ,यह चक्कर घूमता हुआ ऊपर जा
रहा था ,सब खुश थे कि ये चक्कर बड़ी तेजी से घूम रहा है लेकिन बड़ी शिफ्त से कब
रिवर्स लगा कि भागा धड़ाम से निचे की तरफ …….कोई रूकावट नहीं लगता है खाई
में जाकर विश्राम लेगा  …धड़ाम हो खुद ही ठहर जाएगा 

     पहली पार से उथल पुथल हुयी ,हमने उस ओर इशारा किया मगर वो बोले -बेटे ,
मौन  … थोड़े समय बाद एक आवाज आई - धड़ाम -धड़ाम  … और कुछ रण बाँकुरे
को सदा के लिए मौन कर गयी  …!!

    दामाद जी अपना कारोबार भी मौन हो चला रहे थे ,बड़ी अच्छी कट रही थी। रुपया
खुद ब खुद बढ़ रहा था ,सिलसिला आगे बढ़ रहा था क्योंकि कुछ चला था और मीलों
चलना था पर वाह रे किस्मत !ना जाने कैसे खे -खे करता मका आया और धड़ाम से
धक्का दिया ,इससे कुछ उल्टी बाहर आई मगर मौन हो कर वापिस निगल ली  …।

    वो बेतहाशा भागे जा रहे थे ,जब भी पीछे मुड़ कर देखते तो गरीबी पीछा करती
दिखती ,उनकी साँसे फुल रही थी मगर दौड़े जा रहे थे ,हमने उनको रोक कर पूछा -
यूँ भागने से क्या होगा ,इससे मुकाबला करो. वो बोले - रुकते ही यह पकड कर मुझे
धड़ाम से गिरा देगी इसलिए रुकना उपाय नहीं है मुझे किधर भी भागना है ,दोड़ना
है ताकि मेरा धड़ाम होना टल जाये !

       हम घर पर बैठे थे ,सोचा कुछ समाचार जान लूँ। टी वी ऑन किया कि समाचार
वाचक अजीब हरकतें करता हुआ बोला - हाय राम ,जोरदार मंदी की आंधी से पूरा
शेयर मार्केट धड़ाम से ओंधे मुंह गिर पड़ा। …….

        टी वी पर धड़ाम सुन हम घर के बाहर निकले शायद इस धड़ाम से पीछा छूटे
घर से कुछ दुरी पर एक अँधा माथे पर भारी बोझ रखे पृथ्वी की तरह गोल घेरे में
घूम रहा था। मेने उसके सर के बोझ को हटाना चाहा तो वो बोला -ये क्या कर रहा
है छोरा ,दीखता नहीं मैं निर्माण कर रहा हूँ ,सालो से दौड़ रहा हूँ और सालो तक
दौड़ने की अदम्य इच्छा रखता हूँ  … और तू इस बोझ को धड़ाम से मुझसे अलग
करना चाहता है ?

  मेने कहा -बूढ़े बाबा ,समय को पहचान ,अब तेरा सूरज अस्त हो रहा है क्योंकि
अब क्षितिज से शेर दहाड़ रहा है ,कट ले बाबा वरना शेर तेरा धडाम कर ही देगा !!