मंगलवार, 29 जनवरी 2013

न्याय

न्याय 

एक देवदूत ने कहा -मैं संसार में जा कर न्याय करना चाहूंगा।भगवान् ने उसे पृथ्वी
पर भेज दिया।वह पृथ्वी पर पहुंचा और मानव से बोला -मैं तटस्थ भाव से न्याय
करने को आया हूँ इसलिए मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दो।
  
देवदूत की आँखों पर पट्टी डाली गयी ताकि वह तटस्थ भाव से न्याय कर सके मगर
जैसे ही आँखों पर पट्टी डाली कि वह तटस्थ भाव भूल कर अँधा हो गया।

देवदूत की आँखों पर पट्टी बांधते समय एक और भूल हो गयी सिर्फ आँखे बाँधने को
कहा था मगर आँखों के साथ मानव ने उसके  कान भी बाँध दिये इसलिए वह बहरा भी
हो गया।

देवदूत अब ना देख सकता था और ना सुन सकता था इसलिए वह संवेदना शून्य हो
गया और शब्दों के बंधन में बंध गया।

देवदूत न देख सका,ना सुन सका ,ना सोच सका तो वह चिल्लाया -मैं फैसले कैसे लूंगा ?

मानव ने कहा-चिंता ना करो तुझे वह तर्क और सबूतों की बैसाखी दे देते हैं वो जिधर
घुमे उस पक्ष के फैसले सुना दिया करो अब वह तर्क और सबूतों के पराधीन हो गया।

देवदूत चिल्लाया -यह गलत हो रहा है मानव,मैं देखे बिना न्याय नहीं कर सकता,ये
आँखों की पट्टी हटा दो।

मानव बोला -पट्टी हटाने की जरूरत नहीं है तुझे देखने के लिए गवाह की आँखे दे देते
हैं उनसे देख कर फैसले करना।  

तब से देवदूत गवाह की आँखों से देखने लगा वह न तो जुर्म की गहराई में उतर सकता है
और ना खुद सोच सकता है वह तो कुछ शब्दों में फँस कर तड़फ रहा है।     




सोमवार, 28 जनवरी 2013

अवसर बनाये जाते हैं

अवसर बनाये जाते हैं

अवसर की प्रतीक्षा नहीं की जाती है क्योंकि अवसर अनुकूल या प्रतिकूल हर परिस्थिति में
छिपा हुआ रहता है ,आवश्यकता है परिस्थिति को दृढ़ता के साथ अपने सपने के अनुसार
बदल देने की।

किस्मत अवसर को पहचान कर पकड पाने वाले दिलेर लोगों की सफलता को कहते हैं,इसके
अलावा किस्मत हाथ पर हाथ धरे बैठे लोगों की असफलता को भी कहा जाता है।

हमारी संस्कृति हमें अवसर गढ़ना सिखाती है।रामायण काल में श्री राम का वनवास एक घटना
थी,जिसे दुखद कहा जा सकता है परन्तु श्री राम द्वारा उस परिस्थिति को दृढ़ता से राष्ट्र के हित
में मोड़ देना इतिहास का सुखद अवसर बन गया क्योंकि श्री राम ने वनवास काल के दरमियान
अयोध्या से सुदूर फैल रहे आतंक को समूल नष्ट कर दिया और शांति स्थापित कर दी थी।

कृष्ण का जन्म बहुत विपरीत परिस्थियों में हुआ।माँ -बाप कैद थे और खुद की जान जन्म के
साथ ही जोखिम में थी मगर उन्होंने उन विपरीत परिस्थियों में भरपूर संघर्ष किया और आतंक
का खात्मा किया और शांति की स्थापना की।

हमारे वेद कहते हैं कि देव भी कितना भी प्रतिकूल हो मगर आखिर में वह भी पुरुषार्थी के साथ
आ खड़ा होता है

हमारे शास्त्र कहते हैं तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथों में है,अपना हाथ जगन्नाथ।पुरुषार्थी व्यक्ति
अपनी हाथों की लकीरे खुद तय करता है और निट्ठलो की लकीरे समय तय कर देता है।

चाणक्य ने नन्द के आतंक को ख़त्म करने का दृढ संकल्प लिया और चल पड़े अवसर को
खोजने,जो व्यक्ति अवसर आने की प्रतीक्षा में बैठा रहता है वह अवसर को पहचान नहीं पाता
है मगर जो अवसर को खोजने निकल पड़ता है उसको अवसर का साक्षात्कार हो जाता है,जैसे
चाणक्य को अवसर चन्द्रगुप्त के रूप में मिला था।वेद का सन्देश है -"चरेवेति,चरेवेति "

अवसर कहाँ पाया जाता है?

अवसर का निवास प्रतिकूल परिस्थितियों में छिपा है,विपरीत दिशा से बहती हवा में छिपा
है ,बारिस को तरसती फटी जमीन पर पड़ा है,भयंकर संघर्ष में छिपा है उसे पकड़ने के लिये
राणा प्रताप ने घास की रोटी में ढूंढा,पृथ्वीराज ने शब्दबाण में ढूंढा,शिवाजी ने साहस में ढूंढा,
सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फोज में ढूंढा,गांधी ने अहिंसा में ढूंढा,शास्त्री जी ने "जय जवान-
जय किसान में ढूंढा,कलाम ने विज्ञान में ढूंढा,सचिन ने बल्ले में ढूंढा,साइना ने बेडमिन्टन
में ढूंढा और पाया भी। आवश्यकता है कदम बढ़ाने की ,कहा है-दाना खाक में मिलकर गुलो-
गुलजार होता है।

अवसर कैसे मिलता है?

अवसर का रास्ता असफलताओं के दलदल से होकर गुजरता है,संघर्षों की भीषणता से
निकलता है। पानी में भयंकर जोखिम है मगर तैरना सीखना है तो उसमे उतरना ही पड़ता
है केवल किताबी ज्ञान से तैरना नहीं आ जाता।हमारा समय खराब चल रहा है यह सोच
कर जो अच्छे समय के इन्तजार तक बैठे रहने का निर्णय कर चुके हैं उनके लिए कोई
अवसर दस्तक देने नहीं आता है।जो विषम परिस्थियों में कदम दर कदम बढ़ाते जाते हैं
उनकी पकड़ में अवसर आ ही जाता है।

क्या अवसर दर्शन देता है ?

हाँ, अवसर को देखने के लिए किसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं करनी पडती है,हम हर दिन
अवसर को अपने से निकट गुजरते हुए देख सकते हैं।परीक्षा में प्रथम आने वाले विधार्थी में,
खेल में प्रथम आने वाले खिलाड़ी में,भयंकर मंदी में मुनाफा कमाने वाली कम्पनी के
संचालक में,युद्ध में विजयी होने वाले सैनिक में,निर्धनता को पछाड़ कर धनी बने लोगों में
मिलता ही है,जरूरत है खुली आँखों से देखने की।

अवसर को कैसे पकड़े ?

अवसर को पकड़ने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं दृढ़ संकल्प करे,सिर्फ लक्ष्य नहीं पक्का ध्येय
बनाये,कुछ कदम नहीं लगातार चले,डर भय घबराहट को छोड़े और निडर बने,खुली आँखों
से सपने देंखे और उन्हें साकार करने के लिए अध्यव्यवसाय करे ,निरन्तरता बनाये रखे,
खुद में विश्वास रखे,कर्म पर ध्यान दे फल की चिन्ता ना रखे।  
                       

शनिवार, 26 जनवरी 2013

जर्जर मकान

जर्जर मकान 

एक पोत्र अपने दादा के हाथ के बनाये मकान को जमीनदोस्त करवा रहा था।मेने उससे
पूछा -" आप अपने दादा के हाथ का मकान क्यों तुडवा रहे हैं ?"

वो बोला - मकान जर्जर हो रहा था .......

मेने बीच में टोकते हुए कहा-लेकिन ये आपके दादा के हाथ की अंतिम निशानी है ,इसे
जमीनदोस्त करने से उनकी आत्मा को कष्ट होगा ?

वो बोला -मेरे दादा की आत्मा को कष्ट नही ,सुकून मिलेगा क्योंकि इस पुनर्निर्माण से
आने वाली पीढियाँ उन्हें याद रख पायेगी कि हमारे दादा के दादा ने इस जमीन पर घर
बनाया था।

मैं बोला-आपके विचार से पुनर्निर्माण एक आवश्यक प्रक्रिया है।

वो बोला- हाँ ,मगर आप यह प्रश्न क्यों कर रहे हैं ?

मैं बोला- मैं इसलिए कह रह हूँ कि जो बात तुम समझ पाये ,अनपढ़ आम आदमी भी
समझ पाता है लेकिन हमारे नेता नहीं समझ पाते .......!

वो बोला- मतलब .......

मेने कहा- हमारा गणतंत्र  पुनर्निर्माण चाह्ता है मगर इसे मजबूती देने के लिए कोई
तैयार नहीं है।हम वर्षों से कमियों को देख रहे हैं,समझ रहे हैं मगर पुनरोत्थान नहीं
कर पाये हैं।न्याय ठहरा सा लगता है,काम पेपर पर दीखता है,किसान मूर्छित सा लगता
है,औरत पीड़ा झेलती दिखती है,आतंकवादी सम्मानित होते हैं ,देश प्रेमी तड़फते दीखते
हैं,चरित्रहीन संसद में शोभा पा रहे हैं,देश की सम्पदा को समर्थ लूट रहे हैं,गरीब पिसता
जा रहा है,धूर्त अट्टहास लगा रहे हैं,गांधी दीवाल पर टंगे हैं गांधीवाद फट गया है,अधिकार
की माँग से कोड़े पड़ते हैं,नेता आंकड़ो का मायाजाल फैला रहे हैं,कोई पानी को तरस रहा
है,कोई बिजली के लिये चिल्लाता है,कोई शिक्षा को तड़फता है,कोई रोजगार की कतार में
खड़ा है,कहीं अन्न सड़ता है ,कोई भूखा सोता है,सरकार कर लाद रही है,कोई राजस्व में
चुना लगा रहा है ,कोई .............

वो बोला- आपका पुराण खत्म नहीं होगा इसमें नये अध्याय तब तक जुड़ते रहेंगे जब
तक हम जागरूक होने का दिखावा करते रहेंगे।पुनर्निर्माण के लिये जरुरी है कि जर्जर
को जमीनदोस्त किया जाए तभी नवनिर्माण संभव है।

उसकी बात सुनकर मैं आकाश की ओर ताकता रहा ,शून्य को घूरता रहा ,वर्षों से जटिल
रहे प्रश्न को ताकता रहा ...........कोई तो लाल कभी तो आयेगा और नव सर्जन करेगा !           

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

रँग

रँग 

आह ! रँग -
तुझे भी नहीं बख्शा
इन शैतानों ने,
आखिर डस ही लिया,
तेरे आस्तीन के सांपों ने!!

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अरे,रँग !
देखा लिया कुसंगत का असर?
कभी,
तू त्याग और प्रेम का प्रतीक था,
क्योंकि
तब  तू महात्मा के संग था।
अब  
तेरी इतनी दुर्दशा और दुर्गति,
कारण
तू  विकृत शैतानों के संग है।

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रँग -
तू है मानवता का प्रतीक
त्याग और प्यार का गीत
ख़ुशी और अमन का संगीत 
मगर
सत्ता के भूखे गिद्धों ने
तुझे भी नोच खाया है
इसलिए -
अब बन गया मजहब का प्रतीक!
तुष्टिकरण का प्रतीक!!
आतंक का प्रतीक!!!








   

बुधवार, 16 जनवरी 2013

आपको क्या कहें ..........

बुजदिल अँदाज 
बेशर्म आँखें
ढीढ मुस्कान
आपको क्या कहे ..........?

बहरे  कान
गूंगा ज्ञान
ह्रदय पाषाण
आपको क्या कहे ...........?

बर्फ सा खून
लुटा हुआ पौरुष
गेंडे सी खाल
आपको क्या कहे .............?

नीतिहीन बयान
श्मशानी बखान
नपुंसक जबान
आपको क्या कहे .............?





 





सोमवार, 14 जनवरी 2013

दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!

दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!

 एक दिन बाद ही दिवाली है ,आज वृद्धाश्रम में बूढ़े चेहरों पर ख़ुशी है,अपने घर को देखने
की उत्कंठा है। कुछ वृद्ध माताओं ने अपनी गठरियाँ भी तैयार कर ली है।साल भर में जिस
भी दान दाता ने उपयोगी चीज दान की थी उसको उन्होंने साल भर तक सहेज के रखा था,
आज वे सब सामान गठरियों में बाँध लिए हैं।कुछ अच्छी साड़ियाँ बहु के काम आ सकती
है कुछ गृह उपयोगी सामान घर में काम आयेंगे,अपने घर को देखने की तमन्ना ......कितने
ख़्वाब पले हैं बूढ़े मन में ................

            जिस घर को अपनी मेहनत से बसाया था,खुद अभावों में जी कर बच्चो को पाला
पोसा,योग्य बनाया ताकि बच्चे अभावों में नहीं जीये।उनकी मेहनत रंग लायी और पुत्र
योग्य बन गए,सरकारी नौकरी लग गयी।माँ -बाप खुश हो गए की अब उनके संघर्ष के
दिन खत्म हो चुके हैं ,पुत्र काम पर लग गया है ,शीघ्र शादी तय कर देंगे ,घर में काम
करने के लिए बहु आ जायेगी ,बेटे का घर बस जाएगा और उनका बुढापा सँवर जाएगा।

        बेटे के लिए रिश्ता भी अच्छा आया ,लडकी पढ़ी-लिखी थी और स्कुल में अध्यापिका
थी।बेटे की स्वीकृति के बाद शादी तय कर दी।शादी के एक सप्ताह के बाद ही समय ने
करवट बदलनी शुरू कर दी।बहु सुबह स्कुल चली जाती और बेटा दफ्तर ,उनके लिए
खाने पीने की जबाबदारी बुढ़ी माँ पर।दिन गुजरते गये और एक दिन बुढा चल बसा,अब
बुढिया अकेली रह गयी।काम भी घर का ठीक से कर नही पा रही थी।बेटे और बहु की
दिनचर्या माँ की खराब सेहत के कारण बिगड़ने लगी। बहु और बेटे ने उपाय निकाला
और माँ  से कहा- माँ ,आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है और हम दोनों आपको समय
भी नहीं दे पा रहे हैं।

 माँ ने कहा -आप लोगो ने सही कहा है।मेरा ख्याल है बेटे ,कि अब बहु को नौकरी छोड़
घर सम्भाल लेना चाहिए ताकि मेरी सेवा भी कर लेगी और घर भी संभाल लेगी।

बेटे ने कहा- माँ ,ऐसा संभव नहीं है,इसकी कमाई से घर चल जाता है और मेरी कमाई से
बचत हो जाती है।इसके घर बैठ जाने से मेरी बचत खर्च हो जायेगी इसलिए हमने सोचा
है कि आपके रहने का प्रबन्ध शहर के वृद्धाश्रम में कर देवे,वहां खाने-पीने का मामूली
चार्ज है जो हम भर देंगे।आप वहां आराम से रहेंगी।

   माँ ने अनमने मन से घर छोड़ा और नए घर में पहुँच गई।अब बेटा साल में एक बार
दिवाली के एक दिन पहले आता है और दिवाली के दुसरे दिन माँ को फिर से वृद्धाश्रम
छोड़ देता है।काफी सालों से ऐसा चल रहा है।

        माँ साल में एक दिन अपना घर देख कर खुश हो जाती है और जब बेटा उसे दिवाली
के दुसरे दिन वापिस छोड़ने आता है तो अश्रु भरे नेत्र से इतना जरुर पूछ लेती है -अगली
बार भी दिवाली पर मुझे एक दिन के लिए लेने आओगे ना पुत्र !

          घटना पूर्ण रूप से सत्य है,नाम और स्थान की जानकारी की जरूरत नही लग
रही थी ,मगर एक प्रश्न मन में उठता रहता है-क्या वर्तमान युग में पुत्र  के कर्तव्य इतने
असंवेदनशील ही बन जायेंगे,आखिर ये आपाधापी हमें कहाँ ले जायेगी ......!!!                                 

अहसास होना चाहिये .....................

अहसास होना चाहिये .....................


गणतंत्र के बदलाव का अहसास होना चाहिये
कागज की इन कश्तियों को अब बदलना चाहिये

देखना है, देखेंगे, कब तक फुसलाते जाओगे ?
पक चुके हैं कान सब के अब काम होना चाहिये

कुटनीति संवाद के मोहरे हार खा कर पीट गये
हर ईंट का जबाब अब चट्टान होना चाहिये 

निंदा या आलोचना का पापी पर है असर कहाँ
लातों के भूतों पर अब लातें बरसानी चाहिये 

क्षमा किया उपद्रव झेले आखिर हमने पाया क्या?
जैसे को तैसे की भाषा अब सिखलानी चाहिये  

   

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

सिंहासन खाली चाहिये ...........

सिंहासन खाली चाहिये ...........

देश के गणतंत्र का  नव निर्माण चाहिये
अंधे-खोड़े तंत्र से,अब छुटकारा चाहिये

न्याय की उम्मीद में दीप बुझने को चला
हर बार की तरह,अब तारीख नहीं चाहिये

अपराधी तो अपराधी है,छोटा हो या बड़ा
विषेले नागों का फण,अब कुचला जाना चाहिये 

गीदड़ों की फौज से भय,भेड़ियों को है कहाँ     
जंगल के जर्रे-जर्रे से,अब दहाड़ शेर की चाहिये 

शिखंडीयों की ओट से,तीर चलाओगे कब तक ?
दुराचार से भिड़ने को,अब चौड़ी छाती चाहिये

कोरी बातों के पुलिंदे, कब तक यूँ बहलाओगे ?
लक्ष्यभेद से चुक गये तो,सिंहासन खाली चाहिये 
     

शनिवार, 5 जनवरी 2013

तुम किस पंक्ति में हो ?

तुम किस पंक्ति में हो ?

एक आदमी नगर के विद्वान के पास बैठा युग के पतन पर गहरी चिंता कर रहा था।उसने
विद्वान् से कहा- देखो,हमारे परम्परागत मूल्यों का ह्रास हो रहा है।

विद्वान ने कहा- सही बात है।

उस आदमी ने कहा- ज्यादातर लोग उदात्त भावना खोते जा रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-लोग भ्रष्ट और अनैतिक होते जा रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-हमारा कानून गतिहीन या पंगु हो गया है।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-हमारे नेता भी आदर्शों का अनुकरण नहीं कर रहे हैं और सत्ता लोभी
                              हो गए हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा- गुरु और शिक्षक भी लोभी और असंस्कारी हो गए हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-नारी भी पाश्चात्य रंग में रंग के लज्जा के भूषण को छोड़ रही है।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-व्यापारी मुनाफाखोर और मिलावटी सामान बेच रहे हैं।

विद्वान ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-प्रशासनिक अधिकारी कामचोर और रिश्वत लेने वाले हो गए हैं।

उस आदमी ने कहा-सही बात है।

उस आदमी ने कहा-आप मान रहे हैं कि ये सब सही है परन्तु इन बुराइयों से समाज को
                             मुक्त कैसे करे ?क्या आपके पास कोई समाधान ने है।

विद्वान ने कहा- हाँ ,मेरे पास उपयुक्त समाधान है ।

वह व्यक्ति खुश होकर बोला -हमे वह उपाय शीघ्र बताएं ताकि हम समाज को बदल सके?

विद्वान बोला - उपाय बताने  से पहले मैं एक बात तुमसे जानना चाहता हूँ ?

वह व्यक्ति बोला -पूछिये ?

विद्वान बोला -इन सब में आप खुद को किस पंक्ति में पाते हैं?

वह व्यक्ति विद्वान के प्रश्न को सुनकर कुछ देर चुपचाप बैठा रहा और फिर सर झुका कर
चलता बना।      

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

निर्लज्जता पर चर्चा ना करे ................

निर्लज्जता पर चर्चा ना करे ................

एक व्यक्ति डॉक्टर के पास गया ,डॉक्टर ने उसकी शारीरिक तकलीफ के बारे में पूछा।
रोगी ने सब बात डॉक्टर को बतायी और शीघ्र निरोगी होने का उपाय जानना चाहा।

डॉक्टर ने कहा -आपको अमुक दवाइयाँ समय-समय पर लेनी होगी और खाने -पीने
में परहेज रखना होगा यदि तुम ऐसा करोगे तो शीघ्र ठीक हो जाओगे।

 रोगी बोला -डॉक्टर सा'ब, मैं आपके पास घर से चल कर आया,आपके साथ बैठकर
रोग की सांगोपांग चर्चा की ,हर तथ्य को समझा ,जाना, क्या इतने से बात नहीं बनेगी ?

डॉक्टर बोला - सिर्फ बिमारी को समझ लेने और जान लेने से स्वस्थ होना असंभव है,
स्वास्थ्य को दुरस्त करना है तो दवा भी लेनी होगी और परहेज भी करना होगा।

रोगी बोला -डॉक्टर सा'ब, आपका परामर्श मेरे गले नहीं उतर रहा है,ये तो हजारो सालो
पुरानी पद्धति है रोगों को शमन करने की ,आज हम  इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं।आज
हमने बहुत प्रगति कर ली है अब बिमारी को ठीक करने के जीर्ण-शीर्ण विचार नहीं चाहिए।
मुझे सिर्फ लच्छेदार बातों से ठीक कर दीजिये।

डॉक्टर बोला-मेरे पास अभी तक ऐसी तकनीक नहीं आई है इसलिए मैं आपकी कोई
सहायता नहीं कर सकता हूँ।आप सिर्फ यमराज से अरदास कीजिये ....!!

   आज यही हाल हमारा है।हम समस्याओं का सिर्फ बातों से समाधान चाहते हैं या फिर
हम परहेज को भूलकर सिर्फ दवा पर स्वस्थ होना चाहते हैं।हो सकता है दवा के बल पर
हम एक -दो बार ठीक हो जाए लेकिन परहेज से बचेंगे तो फिर रोगी हो ही जायेंगे इसमें
शंका की बात नहीं है।

हम समस्या के निवारण की प्रखर लालसा रखते हैं,उससे निजात पाने के लिए हम उस
व्यक्ति तक पहुँचने का प्रयास भी करते हैं और समस्या के निवारण के लिए दवा भी ले
लेते हैं मगर हम परहेज का प्रयास नहीं करते ,नतीजा यह होता है कि समस्या कम ज्यादा
बनी ही रहती है,उसका शमन नहीं होता।

  बियर बार डांसर के अश्लील डांस, डांस-क्लब में फूहड़ता का भोंडा प्रदर्शन,कला के नाम
 पर सिनेमा में परोसी जा रही कामुकता,गीत के नाम पर कामुक स्वर लहरियां,हास्य के
नाम पर द्वि अर्थी संवाद ,नारी देह का सार्वजनिक स्थलों पर फूहड़ प्रदर्शन,खेलो में चीयर
गर्ल, इन सबको छोड़े बिना हमे समस्यां से निजात चाहिए ,कैसे होगा ...?                 

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

मानव इन्द्रियाँ : निग्रह या दमन

मानव इन्द्रियाँ : निग्रह या दमन

हमें ज्ञान कराने वाली पाँच इन्द्रियाँ है-चक्षु (देखना),श्रोत्र (सुनना),घ्राण (सूंघना),
रसन (स्वाद),स्पर्शन(स्पर्श का अनुभव करना)इन पाँचो शक्तियों के अलग-अलग
अधिष्ठान अंग होते हैं -आँख,कान,नाक,जीभ,त्वचा।ये ज्ञानेन्द्रियाँ सूक्ष्म होने से
दिखाई नहीं देती है हम इनके अंग को देख सकते हैं।इन इन्द्रियों का सम्बन्ध
पञ्च महाभूतों से होता है-आकाश,वायु,अग्नि,जल और पृथ्वी।
इसी तरह पाँच कर्मेन्द्रियाँ होती है -हाथ,पेर,वाणी,लिंग और गुदा।

 प्रश्न यह उठता है कि हमें इन इन्द्रियों के साथ कैसे जीना चाहिए क्योंकि इन
इन्द्रियों के कारण ही धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ बने हैं।इन चारों
पुरुषार्थों के बिना संसार का सृजन नही हो सकता है।

क्या हम इन्द्रियों का दमन करके व्यवस्थित रूप से जी पायेंगे? भारतीय दर्शन
ने इन्द्रियों का दमन करने का नहीं बल्कि इनका निग्रह (control)करने का
निर्देश दिया है।क्योंकि दमन करने से घुटन एवं कुण्ठा पैदा होती है और जिस
कामना का दमन किया जाता है वह हमसे ही शक्ति प्राप्त करके और बलवती
होती जाती है।हम उससे मुक्त नहीं हो पाते बल्कि उसमें और उलझ जाते हैं
और अपनी उर्जा ख़त्म करते रहते हैं।

धृति: क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह: के अनुसार इन्द्रियों का निग्रह
करना चाहिए ,दमन नहीं।न करने योग्य कर्म को करने से रोक कर ,करने
योग्य कर्म में ही इन्द्रियों को लगाना और कार्यरत रखना 'निग्रह' है।इसी
को आत्म नियन्त्रण या निज अनुशासन का पालन करना कहते हैं।इन्द्रियों
का निग्रह करने में विवेक और धैर्य सर्वाधिक सहायक रहते हैं।मन को वश
में रखना ही इन्द्रिय निग्रह करना है।

यहाँ यह शंका प्रस्तुत की जा सकती है की मन को वश में रखना बहुत कठिन
होता है।किसी सुंदर वस्तु को देखकर आकर्षित हो जाना स्वाभाविक है।किसी
सुंदर स्त्री को देखने या उसके सम्पर्क में रहने और घनिष्ठता होने की स्थिति में
काम वासना सम्बन्धी विचार मन में आ ही जाते हैं।अब इस कामना का दमन
कैसे करे ?

इसका समाधान यह है कि दमन करने की जरूरत नहीं सिर्फ विवेक से काम
लेकर निग्रह करने की जरूरत है जैसे अपनी सुंदर युवा बहन और बेटी को
देखने और सम्पर्क में रहने पर भी मन में कामुक विचार नहीं आता क्योंकि
विवेक ऐसा विचार नहीं करने देता।मन तभी वश में रहकर उचित विचार
करता है जब विवेक से काम लिया जाए क्योंकि विवेक ही मन को सही विचार
करने की प्रेरणा देने और सही आचरण करने के लिए विवश करने की क्षमता
रखता है।विवेक के साथ धैर्य का होना भी जरूरी होता है क्योंकि धैर्य विवेक
का बल होता है।

हमारा मन हमारे अवचेतन मन में दबे संस्कारों और अतृप्त इच्छाओं से
प्रभावित और संचालित रहता है अत:जो अच्छे संस्कार वाले होते हैं उन्हें
इन्द्रिय निग्रह करने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता बल्कि ऐसा स्वभावत:
स्वयमेव होता रहता है ब्रह्मचार्य इसी स्वभाव और आचार विचार को कहते हैं।

महाराज शिवाजी मुगलों से युद्ध कर रहे थे उस युद्ध में मुगल राजा हार गये
थे।शिवाजी की सेना ने मुगल राजा के महल से युवा सुन्दरी को बंधी बना
लिया और उसे शिवाजी को भेंट देने के लिए अपने साथ ले आये।शिवाजी ने
उस सुन्दरी को देख सैनिको से पूछा -ये कौन हैं ?
सैनिको ने जबाब दिया- मुग़ल राजा युद्ध में हार गया और जान बचा कर
भाग गया हम उसके महल से इसे आपके लिए बंदी बना लाये हैं।

शिवाजी ने कहा -आप लोगों ने यह गलत किया है।यह नारी तो मेरे लिए
माँ के समान है ,आप इसे आदर सहित वापिस पहुँचा देवे।

यह एक अनुपम उदाहरण है इन्द्रिय निग्रह का। हमे समाज को और
नारी को देखने का नजरिया भी बदलना होगा।केवल दण्ड व्यवस्था से पूरा
काम बनने वाला नहीं है। 

इस लेख में कुछ अंश निरोगधाम "स्वास्थ्य रक्षक "अंक से लिए हैं।                     
   

बुधवार, 2 जनवरी 2013

बुद्धिमान कौन ? क्या कहते हैं शास्त्र ..........

बुद्धिमान कौन ? क्या कहते हैं शास्त्र ...........

जिसे विद्याध्ययन,साहित्य,संगीत,कला,सांसारिक वैभव,सुखों के भोग,धन-संपदा,
सुन्दर वस्तुएं,सुन्दर स्त्री,और सुख-दु:ख का अनुभव -इन सब में रूचि न हो वह या
तो सिद्ध महापुरुष है या फिर मानव रूप में मूढ़ पशु है।सामान्य पुरुष इनसे अवश्य
आकर्षित होता है पर जो सामान्य रूचि लेता है वह बुद्धिमान है।

जो प्राप्त वस्तु से संतुष्ट रहता है और अप्राप्त के लिए दुखी नहीं रहता ,जिस हाल में हो
उसी में प्रसन्न रहता है और सब कुछ ईश्वर की इच्छा मान कर राजी रहता है वह
व्यक्ति दुख से बचा रहता है और जो व्यक्ति दुख से बचना जानता है वह बुद्धिमान है।

जो बात के मर्म को तुरन्त समझ लेता है,सुनने योग्य बातों को एकाग्रचित हो सुनता
हैऔर व्यर्थ की बातों में रूचि नहीं रखता,खूब सोच-विचार करके ही कोई काम शुरू
करता है और हाथ में लिए काम को अधूरा नहीं छोड़ता और बिना पूछे किसी को
सलाह नहीं देता,वही बुद्धिमान है।

जो नष्ट हुयी वस्तु के लिए शोक नहीं करता,जो विपत्ति पड़ने पर धैर्य और विवेक का
साथ नहीं छोड़ता,जो पराई वस्तु का लालच नहीं करता और सदा शुभ कर्म करके
अपने पुरुषार्थ से ही कोई वस्तु प्राप्त करता है और जो सफल होकर इतराता नहीं,वही
बुद्धिमान है।

जो यश और आदर सम्मान मिलने पर अभिमानी नहीं होता,आदर न मिलने पर
अप्रसन्न नहीं होता,जो अपनी विद्या का अहंकार नहीं करता और अपने धन का
दुरूपयोग नहीं करता,जो गहन गंभीर और उदार स्वभाव रखता है और किसी के प्रति
भी वैर भाव नहीं रखता ,वही  बुद्धिमान है।

जो अपने द्वारा किये गए उपकार और दूसरों के द्वारा अपने प्रति किये गए अपकार को
याद नहीं रखता , जो अपनी बुराईयों और दूसरों की भलाइयों को भूलता नहीं ,जिसके
साथ रहने से किसी का अहित नहीं होता बल्कि भला ही होता है और जो किसी भी
समस्या को ठीक ढंग से सुलझा लेता है,वही  बुद्धिमान है।