शनिवार, 26 जनवरी 2013

जर्जर मकान

जर्जर मकान 

एक पोत्र अपने दादा के हाथ के बनाये मकान को जमीनदोस्त करवा रहा था।मेने उससे
पूछा -" आप अपने दादा के हाथ का मकान क्यों तुडवा रहे हैं ?"

वो बोला - मकान जर्जर हो रहा था .......

मेने बीच में टोकते हुए कहा-लेकिन ये आपके दादा के हाथ की अंतिम निशानी है ,इसे
जमीनदोस्त करने से उनकी आत्मा को कष्ट होगा ?

वो बोला -मेरे दादा की आत्मा को कष्ट नही ,सुकून मिलेगा क्योंकि इस पुनर्निर्माण से
आने वाली पीढियाँ उन्हें याद रख पायेगी कि हमारे दादा के दादा ने इस जमीन पर घर
बनाया था।

मैं बोला-आपके विचार से पुनर्निर्माण एक आवश्यक प्रक्रिया है।

वो बोला- हाँ ,मगर आप यह प्रश्न क्यों कर रहे हैं ?

मैं बोला- मैं इसलिए कह रह हूँ कि जो बात तुम समझ पाये ,अनपढ़ आम आदमी भी
समझ पाता है लेकिन हमारे नेता नहीं समझ पाते .......!

वो बोला- मतलब .......

मेने कहा- हमारा गणतंत्र  पुनर्निर्माण चाह्ता है मगर इसे मजबूती देने के लिए कोई
तैयार नहीं है।हम वर्षों से कमियों को देख रहे हैं,समझ रहे हैं मगर पुनरोत्थान नहीं
कर पाये हैं।न्याय ठहरा सा लगता है,काम पेपर पर दीखता है,किसान मूर्छित सा लगता
है,औरत पीड़ा झेलती दिखती है,आतंकवादी सम्मानित होते हैं ,देश प्रेमी तड़फते दीखते
हैं,चरित्रहीन संसद में शोभा पा रहे हैं,देश की सम्पदा को समर्थ लूट रहे हैं,गरीब पिसता
जा रहा है,धूर्त अट्टहास लगा रहे हैं,गांधी दीवाल पर टंगे हैं गांधीवाद फट गया है,अधिकार
की माँग से कोड़े पड़ते हैं,नेता आंकड़ो का मायाजाल फैला रहे हैं,कोई पानी को तरस रहा
है,कोई बिजली के लिये चिल्लाता है,कोई शिक्षा को तड़फता है,कोई रोजगार की कतार में
खड़ा है,कहीं अन्न सड़ता है ,कोई भूखा सोता है,सरकार कर लाद रही है,कोई राजस्व में
चुना लगा रहा है ,कोई .............

वो बोला- आपका पुराण खत्म नहीं होगा इसमें नये अध्याय तब तक जुड़ते रहेंगे जब
तक हम जागरूक होने का दिखावा करते रहेंगे।पुनर्निर्माण के लिये जरुरी है कि जर्जर
को जमीनदोस्त किया जाए तभी नवनिर्माण संभव है।

उसकी बात सुनकर मैं आकाश की ओर ताकता रहा ,शून्य को घूरता रहा ,वर्षों से जटिल
रहे प्रश्न को ताकता रहा ...........कोई तो लाल कभी तो आयेगा और नव सर्जन करेगा !           

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