सोमवार, 14 जनवरी 2013

दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!

दिवाली पर बेटा घर ले चलेगा ....!!

 एक दिन बाद ही दिवाली है ,आज वृद्धाश्रम में बूढ़े चेहरों पर ख़ुशी है,अपने घर को देखने
की उत्कंठा है। कुछ वृद्ध माताओं ने अपनी गठरियाँ भी तैयार कर ली है।साल भर में जिस
भी दान दाता ने उपयोगी चीज दान की थी उसको उन्होंने साल भर तक सहेज के रखा था,
आज वे सब सामान गठरियों में बाँध लिए हैं।कुछ अच्छी साड़ियाँ बहु के काम आ सकती
है कुछ गृह उपयोगी सामान घर में काम आयेंगे,अपने घर को देखने की तमन्ना ......कितने
ख़्वाब पले हैं बूढ़े मन में ................

            जिस घर को अपनी मेहनत से बसाया था,खुद अभावों में जी कर बच्चो को पाला
पोसा,योग्य बनाया ताकि बच्चे अभावों में नहीं जीये।उनकी मेहनत रंग लायी और पुत्र
योग्य बन गए,सरकारी नौकरी लग गयी।माँ -बाप खुश हो गए की अब उनके संघर्ष के
दिन खत्म हो चुके हैं ,पुत्र काम पर लग गया है ,शीघ्र शादी तय कर देंगे ,घर में काम
करने के लिए बहु आ जायेगी ,बेटे का घर बस जाएगा और उनका बुढापा सँवर जाएगा।

        बेटे के लिए रिश्ता भी अच्छा आया ,लडकी पढ़ी-लिखी थी और स्कुल में अध्यापिका
थी।बेटे की स्वीकृति के बाद शादी तय कर दी।शादी के एक सप्ताह के बाद ही समय ने
करवट बदलनी शुरू कर दी।बहु सुबह स्कुल चली जाती और बेटा दफ्तर ,उनके लिए
खाने पीने की जबाबदारी बुढ़ी माँ पर।दिन गुजरते गये और एक दिन बुढा चल बसा,अब
बुढिया अकेली रह गयी।काम भी घर का ठीक से कर नही पा रही थी।बेटे और बहु की
दिनचर्या माँ की खराब सेहत के कारण बिगड़ने लगी। बहु और बेटे ने उपाय निकाला
और माँ  से कहा- माँ ,आपकी तबियत ठीक नहीं रहती है और हम दोनों आपको समय
भी नहीं दे पा रहे हैं।

 माँ ने कहा -आप लोगो ने सही कहा है।मेरा ख्याल है बेटे ,कि अब बहु को नौकरी छोड़
घर सम्भाल लेना चाहिए ताकि मेरी सेवा भी कर लेगी और घर भी संभाल लेगी।

बेटे ने कहा- माँ ,ऐसा संभव नहीं है,इसकी कमाई से घर चल जाता है और मेरी कमाई से
बचत हो जाती है।इसके घर बैठ जाने से मेरी बचत खर्च हो जायेगी इसलिए हमने सोचा
है कि आपके रहने का प्रबन्ध शहर के वृद्धाश्रम में कर देवे,वहां खाने-पीने का मामूली
चार्ज है जो हम भर देंगे।आप वहां आराम से रहेंगी।

   माँ ने अनमने मन से घर छोड़ा और नए घर में पहुँच गई।अब बेटा साल में एक बार
दिवाली के एक दिन पहले आता है और दिवाली के दुसरे दिन माँ को फिर से वृद्धाश्रम
छोड़ देता है।काफी सालों से ऐसा चल रहा है।

        माँ साल में एक दिन अपना घर देख कर खुश हो जाती है और जब बेटा उसे दिवाली
के दुसरे दिन वापिस छोड़ने आता है तो अश्रु भरे नेत्र से इतना जरुर पूछ लेती है -अगली
बार भी दिवाली पर मुझे एक दिन के लिए लेने आओगे ना पुत्र !

          घटना पूर्ण रूप से सत्य है,नाम और स्थान की जानकारी की जरूरत नही लग
रही थी ,मगर एक प्रश्न मन में उठता रहता है-क्या वर्तमान युग में पुत्र  के कर्तव्य इतने
असंवेदनशील ही बन जायेंगे,आखिर ये आपाधापी हमें कहाँ ले जायेगी ......!!!                                 

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