बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

परीक्षा के एक दिन पहले क्या करे ?

परीक्षा के एक दिन पहले क्या करे ?

परीक्षा के पहले का दिन काफी महत्वपूर्ण होता है।हम क्या पढ़े या क्या छोड़े में उलझे
रहते हैं या फिर जिसे नहीं पढ़ पाए उसकी चिंता करते हैं।यह तरीका नुकसानदायक
है जो कम नम्बर के लिए जबाबदार है। परिक्षा के पहले दिन क्या करे-

अपनी सोच को अपने प्रति सकारात्मक बनाये।

अपने आत्म विश्वास को मजबूत बनाये।

जो नहीं पढ़ पाए उसकी चिंता बिलकुल ना करें और जो तैयारी आपने की है उसे ही
महत्वपूर्ण मानकर मन ही मन नोट्स को पढ़े।

अपने दोस्तों से यह चर्चा नहीं करे कि वो क्या पढ़ रहे हैं।

अपने दैनिक कार्यक्रम को व्यवस्थित रखे।

अपने खानपान में वो चीजें शामिल नहीं करे जिसे पचाने में ग्रन्थियों को ज्यादा समय
लगता हो

अपने परिवार के साथ ज्यादा समय बिताएं,उनसे चुहलबाजी करे।अपने मूड (मन )को
तरोताजा रखें।

परीक्षा के समय नींद कम से कम सात घंटे लेवे ,रात को ज्यादा देर ना पढ़े।

सोते समय अपने अवचेतन मन को सकारात्मक सन्देश देकर सोये।

परीक्षा के दिन सवेरे जल्दी उठें और दैनिक दिनचर्या से निवृत होकर भगवान् के पास
बैठकर सकारात्मक प्रार्थना करे और मन को ऊर्जा से भरपूर बनाये।

परीक्षा के दो घंटे पहले किताब छोड़ देवे और चिंता खत्म कर दे।

परीक्षा भवन में बीस मिनिट पहले पहुंचे और उस माहोल से एकाकार हो जाए।

मन को शांत करे और पेपर को समझते हुये पढ़े बिलकुल जल्दबाजी ना करे।

अपने हल लिखे और उत्तर की समाप्ति के तुरंत बाद एक मिनिट तक पुन:जाँचे।

परीक्षा के पश्चात अपने मित्रो से प्रश्नपत्र के बारे में बिलकुल चर्चा ना करे,हाँ आगे
के पेपर पर थोड़ी बातचीत कर सकते हैं।

      

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

यह देश चलता कैसे है

यह देश चलता कैसे है


सीधे-सुलझे रिश्ते भी,वो उलझाते कुछ ऐसे हैं 
नहीं जानता राम-रहीम,यह देश चलता कैसे है 

समस्या से समस्या का,वो गुणाकार ही करते हैं 
इसकी टोपी उसके सिर पर,खेल खेलते रहते हैं
चोर-चोर मोसेरे भाई, ये चेहरे मिलते जुलते हैं
नहीं जानता राम-रहीम,यह देश चलता कैसे है

भूखे बेबस लोगों को भी,वो पल में धनी बनाते हैं
चुपके-चुपके प्रेम जताते ,सभा भवन में लड़ते हैं
भारत का नक्शा कागज पर लगता सुंदर ऐसे है
नहीं जानता राम-रहीम, यह देश चलता कैसे है

क्लर्क किरोड़ीमल,अफसर लक्ष्मी पुत्र से लगते हैं
नेता हैं कुबेर मित्र, लोग निर्धन बेहाल बिलखते हैं
काले धन की भरी तिजौरी,स्विस  बेंक  में  पैसे हैं
नहीं जानता राम रहीम, यह  देश चलता  कैसे है

दशहत में जीती है जनता,वो जेड सुरक्षा रखते हैं
होते रहते बम्ब धमाके वो पैसे मुर्दों पर बरसाते हैं
संवेदन बातों की मरहम,फिर सबकुछ जैसे वैसे हैं
नहीं जानता राम-रहीम, यह  देश चलता कैसे है 
    

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

इसे विडम्बना कहें या दुर्भाग्य

इसे विडम्बना कहें या दुर्भाग्य 

इटली की अदालत ने कुछ दिनों पहले वहाँ के वैज्ञानिकों को दोषी इसलिए ठहराया कि
वे भूकंप की सही जानकारी सही समय पर देने में असमर्थ रहे थे।यह एक महत्वपूर्ण
बात थी लेकिन हमने इससे क्या सीखा ?

           आतंक तो अमेरिका को भी झेलना पड़ा था लेकिन उस हादसे के बाद उन्होंने
मुख्य आतंकी को कैसे समाप्त किया इसे दुनिया ने देखा मगर हमने क्या सीखा ?

          हम उस देश में रहते हैं जहाँ के नेता आतंक को किस तरह से समाप्त करेंगे
इस पर जोश नहीं दिखाते हैं उनका जोश आतंक के रँग पर दिखता है,आतंक वाद पर
भी वोट की तिगड़म में ऊर्जा नष्ट करते हैं हमारे नेता!! बहुत दुखद ..!!

         इस देश में बम्ब विस्फोट होते हैं लेकिन हम कुछ नहीं कर पाते ,VIP सुरक्षा पर
पूरा ध्यान है चाहे आम भारतीय के लिए सुरक्षा व्यवस्था का ढाँचा खंडहर हो गया हो।

        आज तक आतंकवाद से लड़ने में नाकामयाब रहे व्यवस्थापकों पर,ऑफिसरो पर
कोई दण्ड नहीं हुआ,ना ही उन्हें इस तरह की घटना को रोक पाने के लिए विफल रहने
पर इटली की तरह जबाबदेह ठहराया गया,घटना के घटित हो जाने के बाद भाग दौड़
होती है दोष का ठीकरा किसी न किसी पर फोड़ दिया जाता है और जिन निर्दोष नागरिकों
का लहू सड़कों पर बहा उन्हें कुछ रुपयों से तौल दिया जाता है और देश के सामने कसमे
खायी जाती है वादे किये जाते हैं और फिर ढाक के तीन पात।देश में आतंक मचाने वालों
को "श्री" "साहब" का अलंकार देकर वोट की राजनीती में कूद पड़ते हैं,यह है हमारी राष्ट्र
भक्ति की वर्तमान मिसाल ...!!

        इस देश के राजनेता आतंक को रँग से जोड़कर क्यों देखते हैं ?क्या सन्देश देना
चाहते हैं भारतीयों को ..? आतंक ना तो भगवा होता है और ना ही हरा ना सफेद ,हाँ
आतंक का परिणाम जरुर सुर्ख लाल होता है जो बेगुनाह निर्दोष भारतीयों के खून जैसा
सडको पर बिखरा दीखता है।

          आतंक वाद के शिकार भारतीयों के बिखरे खून को देखने के बाद क्या कोई बता
पायेगा कि यह हिन्दू का खून का रंग है ,यह मुस्लिम या ईसाई के खून का .......

       इस देश ने राजनैतिक कारणों से कई बार जनता द्वारा चुनी हुई  राज्य सरकारे गिरती
देखी है,अधिकारों का इस्तेमाल देखा है मगर एक भी बार आतंकवाद से लड़ने में विफल
रहने के कारण राज्य सरकारे गिरती हुयी नहीं देखी है एक भी बार नैतिक जबाबदारी इस
विषय पर स्वीकार करते हुये किसी नेता का पद त्याग देखा है ........

          इस देश के निर्दोष नागरिकों ने आतंकवाद के कारण करुण मौतें और क्रन्दन देखा है
आतंक से निपटने की खोखली कसमे देखी है,मुआवज़ा बंटते देखा है,एक दुसरे पर दोषारोपण
देखा है मगर आज तक दृढ़ संकल्प नहीं देखा।इसे विडम्बना कहें या दुर्भाग्य .....                   

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

दिलचस्प मगर सच के करीब 

 ....आदमी की फितरत होती है कि वह दुसरे की बुराई जानने को उत्सुक रहता है
मगर खुद की बुराई सहन नहीं कर पाता।
....अच्छे कपडे और आला श्रृंगार के साथ सभाओं में चुप रहकर आदमी विद्वान सिद्ध
हो जाता है।
.... व्यक्ति गंदा बनना चाहता है मगर समय अभाव,स्थान या फिर समाज के भय से
गन्दा बन नहीं पाता।
....आदमी ख़ुशी के मौके पर भी मुस्कराता है और मज़बूरी या असफलता को छिपाने
के लिये भी।
....एक स्त्री दूसरी स्त्री की सुन्दरता को देख कर मन ही मन कुढती है मगर उसके पास
जाकर यह जरुर कह देती है कि- सच में,बहुत सुंदर लग रही हो।
....आदमी जानता है कि उसे जो भी सुख मिला है वह भगवान् की कृपा है परन्तु और
अधिक सुख पाने के लिए वह भगवान् को भी लालच देने की भरपूर कोशिश करता है।
....जब भी कोई किसी की प्रशंसा करता है उस समय प्रशंसा पाने वाले को वह सबसे
प्यारा लगता है।
....जब भी व्यक्ति झूठ बात को सच के साथ मिक्स करता है तब उसके हाथ मुंह की
तरफ उठते है ,नजरे दिशा बदल लेती है या आँखे बंद हो जाती है।
...जब कोई अपने को संतुष्ट बताने की कोशिश बार-बार करता है तो उसका मन
सामने वाले की प्रगति के कारण जल रहा होता है।
....जब आदमी किसी पार्टी में जाता है तो लिमिट से ज्यादा खाता है और दुसरे पर
फब्ती कसता है देखो वह पेटू है ,डटकर खा रहा है।
.... सफल होने पर खुद को आगे करता है और असफल होने पर परिस्थिति को।    
      

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

आँखें .............

आँखें .............

डूबने के लिए समन्दर की है कहाँ जरुरत
इन आँखों में बस एक गोता ...लगा कर बताओ

शाम ढलते ही भागते क्यों मयखाने की तरफ
इन नशीली आँखों का ... एक जाम पी कर बताओ

यूँ चोराहे पर खड़े होकर ढूंढने की कहाँ जरुरत
इन निगाहों से निगाहें ...एक पल मिला कर बताओ

खूब गाते हो तन्हाइयों में रूमानियत के गीत
इन नयनों से कोई ... एक गजल चुरा कर बताओ

बड़ी दिलेरी से उतरते हो तूफान भरे समंदर में
इन आँखों के किनारों से ...मोती उठा कर दिखाओ



गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

तितली

तितली 

उड़ने दो तितलियों को मुक्त गगन में
इनके बिना यह गगन बेरंग लगता है

रहने दो तितलियों को हर उपवन में
इनके बिना उपवन बदरंग लगता है

मंडराने दो तितलियों को गमलों में
इनके बिना गमले रंगहीन लगते है

गाने दो तितलियों को प्रीत के गीत
इनके बिना सब सुर बेजान लगते हैं

फैलने दो पंख तितलियों के गली में
इनके बिना गली सुनसान लगती है

फलने दो तितलियों को हर कोख में
इनके बिना सोगात अधूरी रहती है

बेरहम बनकर इनके पंख मत कुचलो
इन्ही से हर रिश्तें की शरुआत होती है
                                                                                               
इंसान हो तो इंसानियत की राह चलो
इनके अपमान से धरा बदनाम होती है
                                                                                              (छबि -गूगल से साभार )

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

कब तू पास बुलाती है .....

कब तू पास बुलाती है .....

मेरे दिल की चाहत,  तेरा इकरार चाहती है।
उल्फत के अल्फाज,तुझ से सुनना चाहती है।

ये होंठों की मुस्कान,प्यार को पंख लगाती है।
पल पल बढती प्यास,रात की नींद चुराती है।

ये दौ कजरारी आँख,इश्क का दीप सजाती हैं।
चुपचाप मेरे दिल को, तेरा पैगाम सुनाती है।


ये पायल की झंकार,प्यार का गीत सुनाती है।
रुन झुन की आवाज,मेरे ही नाम की आती है।


ये साँसों की सरगम, नेह का राग सुनाती है।
मैं करता हूँ इन्तजार,कब तू पास बुलाती है।











                                                                                                         (छवि गूगल से साभार )


बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

उल्टा घड़ा

  उल्टा घड़ा  

एक संत प्रवचन दे रहे थे -

"यदि हम अपनी जाती के आधार पर जीना चाहते हैं तो मानव बने, हम मजहब के आधार
पर जीना चाहते हैं तो इंसान बने,हम राजनीती के आधार पर जीना चाहते हैं तो राम बने,
हम भाषा के आधार पर जीना चाहते हैं तो हिंदी बने, हम रंग के आधार पर जीना चाहते
हैं तो काला बने,यदि हम प्रेम के आधार पर जीना चाहते हैं तो स्नेही बने ....

उनके इस प्रवचन को सुन लोग बीच में ही उठ कर जाने लगे,बहुत कम लोग पंडाल में
बच गए।संत ने उनसे पूछा -काफी लोग मेरे प्रवचन को सुनकर चुपचाप चले गये मगर
आप लोग यहाँ क्यों बैठे रह गए ?

श्रोता में से एक ने जबाब दिया-"जो उठकर चले गए उनमे से कुछ देश को चलाने का दंभ
भरते हैं,कुछ समाज का निर्देशन कर रहे हैं,कुछ धर्म के मर्मग्य हैं जो अपनी सुविधा के
अनुसार धर्म की व्याख्या करते हैं,कुछ उनका अन्धानुकरण करने वाले खुद का मतलब
साधने वाले लोग हैं।

संत ने पूछा -...फिर आप यहाँ बैठे बचे हुये लोग कौन हैं।

श्रोता बोला -हम उलटे घड़े हैं जो कभी भरे नहीं जा सकतेहैं,हम सुनते हैं,समझते हैं परन्तु
अमल नहीं करते हैं।         

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

बदलती संस्कृति


बदलती संस्कृति 

मेरे देश का परिवेश बदल रहा है ,भाषा बदल रही है ,संस्कृति बदल रही है ,आधुनिकता के
तूफान में जो अच्छा था वह भी ढह ढहा कर गिर रहा है -कुछ पंक्तियों का आनन्द लीजिये,
व्यंग प्रस्तुत है -

एक ससुर ने
पढ़ी लिखी बहु से कहा-
बहु ,
मेरा पोते को कुछ संस्कार सीखा।
उसके बाल मन को,
कुछ प्रभु की ओर झुका,
उसे कुछ श्लोक,प्रार्थना सीखा।
बहु बोली -
आपकी आज्ञा का होगा पालन,
बताईये कौनसे श्लोक का है चलन।
ससुर बोला -
मेरे पोते को सबसे पहले
"त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव "सीखा
कुछ दिन बाद पोते ने
यह प्रार्थना अपने दादा को
कुछ  इस तरह सुनायी-
यू आर माई मॉम
यू आर माई डेड
यू आर माई ब्रो
यू आर माई फ्रेंड
यू आर माई टीचर
यू आर माई मेम
यू आर माई ऑल
यू आर माई ऑल  

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा

हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा 

हिंदुत्व कभी कट्टरपंथी और क्रूर नहीं रहा है और इसका साक्षी हजारों साल पुराना इतिहास
है और वर्तमान समय भी।

यदि हिंदुत्व क्रूर या कट्टर होता तो विभिन्नं संस्कृतियाँ यहाँ ना तो पनप सकती थी और
ना पोषित हो सकती थी।हमारे वेद, जो प्राचीन ग्रन्थ हैं उनसे विश्व बंधुत्व का सन्देश निकला।
यह वेदों की सोच है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।

        हिंदुत्व ने आज तक किसी देश को क्षति नहीं पहुंचाई ,विश्व के किसी भी देश को ना लूटा
और ना ही आक्रमण किया।रामायण काल में श्री राम ने लोक व्यवस्था को मजबूती दी,
आततायी चाहे भारत का रहा हो या भारत के बाहर का उसे खत्म किया।श्री राम ने बाली के
अधार्मिक शासन को खत्म किया और सुशासन की स्थापना के लिए उन्ही लोगो को शासन
की बागडोर सौंप दी जो उसके उत्तराधिकारी थे,उन्होंने उस शासन को अपने अधीन नहीं किया।
रावण के आतंक को खत्म किया ,वहां सुशासन की स्थापना की मगर उस देश को स्वतंत्र
रखा। क्या श्री राम जीते हुए देश पर अपना शासन नहीं रख सकते थे ? हिंदुत्व की सोच क्रूरता
की नहीं थी ,राम ने उस समय ना तो लंका को लूटा ना ही अपना प्रभुत्व जमाया।क्या इसे
इतिहास विश्व बंधुत्व के सन्देश से परे देखता है ?

     स्वामी विवेकानंद ने कहा था -"गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" क्यों कहा होगा उस वेद वेदान्त के
मर्मज्ञ ने ऐसा ?क्यों शिकागो सम्मलेन में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ आँका गया ?क्या कट्टरवाद के
कारण ?  नहीं ,हिंदुत्व के मानव धर्म के कारण ऐसा संभव हुआ था।

  महात्मा गांधी ने कहा -मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। क्या गांधी को फासिस्ट मान लिया
जाए ,शायद नहीं ,क्योंकि गांधी के हिंदुत्व में भाईचारा झलकता था।

  आरएसएस या विहिप जब यह उदघोष करती है कि हमें हिन्दुत्व पर गर्व है तो आज उन्हें
तथाकथित सभ्य लोग कट्टरपंथी कह देते हैं,क्यों ?क्या अपने धर्म पर गर्व करना कट्टरपंथ
या अन्य धर्मों पर क्रूरता करना है ?यह हिंदुत्व ही है जो इतना विशाल ह्रदय लेकर चलता है,
जिस तरह विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ समुद्र में आकर समा जाती है और एक रस
हो जाती है उसी तरह हिंदुत्व के कारण भारत में सभी धर्म पोषित हो रहे हैं।

  हिंदुत्व को देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा कट्टरपंथी मान्यता वाला शब्द माना गया
तो उसके पीछे दुसरे धर्मों के लोगों से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं,क्योंकि हमारे में निम्न कोटि
की सोच के लोग पनप गए हैं जो अपना घर जला कर खुद तमाशा दिखा रहे हैं।सत्ता का नशा
भी निम्न कोटि की सोच के लोगों को लग गया है ,दूसरों के सामने खुद को गाली और खुद को
तमाचा मार के भी लोग सत्ता पाना चाहते हैं ,और इसी दिवालियापन के कारण विश्व भ्रम में
पड़ गया है। आज एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को सार्वजनिक रूप से साम्प्रदायिक कह देता है और
उसका समर्थन भी सत्ता लोभी दूसरा हिन्दू कर देता है।आज सत्ता को टिकाये रखने के लिए या
फिर से सत्ता पाने के लिए एक हिन्दू  दुसरे हिन्दू को ही आतंकी बता देता है,तथाकथित सभ्य
हिन्दू भगवा में आतंक देखने की बात फैलाते हैं जब की वो जानते हैं कि वो सच नहीं झूठ कह
रहे हैं,फिर भी इसलिए कह रहे हैं ताकि सत्ता का सुख भोग सकें।सिर्फ सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व
को संकीर्ण बताने वाले लोग ना तो खुद का भला कर पायेंगे और ना ही सभी धर्मों का।

      एक हिन्दू खुद को सभी धर्मों को समान भाव से देखने वाला मानता है और दुसरे हिन्दू
को देख कर यह कहता है कि यह फासिस्ट है तो दुनियाँ किसे सही और किसे गलत मानेगी ?
क्या दुसरे मजहब के लोग फिर ये धारणा नहीं बना लेंगे कि हिंदुत्व कट्टरवाद का पोषक है।

     राजनीती के कुछ सिद्धांत होते हैं मगर  मजहबों में वैमनस्य फैलाना और सत्ता की
रोटी सेकना अधम नीति है।सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए।किसी
धर्मावलम्बी को अपने धर्म पर गर्व तभी होता है जब उस धर्म में गर्व करने योग्य महान गुण
हो।

   हमें अपने "हिंदुत्व पर गर्व है क्योंकि हमारा हिंदुत्व विश्व बंधुत्व की प्रेरणा देता है।"