शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा

हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा 

हिंदुत्व कभी कट्टरपंथी और क्रूर नहीं रहा है और इसका साक्षी हजारों साल पुराना इतिहास
है और वर्तमान समय भी।

यदि हिंदुत्व क्रूर या कट्टर होता तो विभिन्नं संस्कृतियाँ यहाँ ना तो पनप सकती थी और
ना पोषित हो सकती थी।हमारे वेद, जो प्राचीन ग्रन्थ हैं उनसे विश्व बंधुत्व का सन्देश निकला।
यह वेदों की सोच है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।

        हिंदुत्व ने आज तक किसी देश को क्षति नहीं पहुंचाई ,विश्व के किसी भी देश को ना लूटा
और ना ही आक्रमण किया।रामायण काल में श्री राम ने लोक व्यवस्था को मजबूती दी,
आततायी चाहे भारत का रहा हो या भारत के बाहर का उसे खत्म किया।श्री राम ने बाली के
अधार्मिक शासन को खत्म किया और सुशासन की स्थापना के लिए उन्ही लोगो को शासन
की बागडोर सौंप दी जो उसके उत्तराधिकारी थे,उन्होंने उस शासन को अपने अधीन नहीं किया।
रावण के आतंक को खत्म किया ,वहां सुशासन की स्थापना की मगर उस देश को स्वतंत्र
रखा। क्या श्री राम जीते हुए देश पर अपना शासन नहीं रख सकते थे ? हिंदुत्व की सोच क्रूरता
की नहीं थी ,राम ने उस समय ना तो लंका को लूटा ना ही अपना प्रभुत्व जमाया।क्या इसे
इतिहास विश्व बंधुत्व के सन्देश से परे देखता है ?

     स्वामी विवेकानंद ने कहा था -"गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" क्यों कहा होगा उस वेद वेदान्त के
मर्मज्ञ ने ऐसा ?क्यों शिकागो सम्मलेन में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ आँका गया ?क्या कट्टरवाद के
कारण ?  नहीं ,हिंदुत्व के मानव धर्म के कारण ऐसा संभव हुआ था।

  महात्मा गांधी ने कहा -मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। क्या गांधी को फासिस्ट मान लिया
जाए ,शायद नहीं ,क्योंकि गांधी के हिंदुत्व में भाईचारा झलकता था।

  आरएसएस या विहिप जब यह उदघोष करती है कि हमें हिन्दुत्व पर गर्व है तो आज उन्हें
तथाकथित सभ्य लोग कट्टरपंथी कह देते हैं,क्यों ?क्या अपने धर्म पर गर्व करना कट्टरपंथ
या अन्य धर्मों पर क्रूरता करना है ?यह हिंदुत्व ही है जो इतना विशाल ह्रदय लेकर चलता है,
जिस तरह विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ समुद्र में आकर समा जाती है और एक रस
हो जाती है उसी तरह हिंदुत्व के कारण भारत में सभी धर्म पोषित हो रहे हैं।

  हिंदुत्व को देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा कट्टरपंथी मान्यता वाला शब्द माना गया
तो उसके पीछे दुसरे धर्मों के लोगों से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं,क्योंकि हमारे में निम्न कोटि
की सोच के लोग पनप गए हैं जो अपना घर जला कर खुद तमाशा दिखा रहे हैं।सत्ता का नशा
भी निम्न कोटि की सोच के लोगों को लग गया है ,दूसरों के सामने खुद को गाली और खुद को
तमाचा मार के भी लोग सत्ता पाना चाहते हैं ,और इसी दिवालियापन के कारण विश्व भ्रम में
पड़ गया है। आज एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को सार्वजनिक रूप से साम्प्रदायिक कह देता है और
उसका समर्थन भी सत्ता लोभी दूसरा हिन्दू कर देता है।आज सत्ता को टिकाये रखने के लिए या
फिर से सत्ता पाने के लिए एक हिन्दू  दुसरे हिन्दू को ही आतंकी बता देता है,तथाकथित सभ्य
हिन्दू भगवा में आतंक देखने की बात फैलाते हैं जब की वो जानते हैं कि वो सच नहीं झूठ कह
रहे हैं,फिर भी इसलिए कह रहे हैं ताकि सत्ता का सुख भोग सकें।सिर्फ सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व
को संकीर्ण बताने वाले लोग ना तो खुद का भला कर पायेंगे और ना ही सभी धर्मों का।

      एक हिन्दू खुद को सभी धर्मों को समान भाव से देखने वाला मानता है और दुसरे हिन्दू
को देख कर यह कहता है कि यह फासिस्ट है तो दुनियाँ किसे सही और किसे गलत मानेगी ?
क्या दुसरे मजहब के लोग फिर ये धारणा नहीं बना लेंगे कि हिंदुत्व कट्टरवाद का पोषक है।

     राजनीती के कुछ सिद्धांत होते हैं मगर  मजहबों में वैमनस्य फैलाना और सत्ता की
रोटी सेकना अधम नीति है।सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए।किसी
धर्मावलम्बी को अपने धर्म पर गर्व तभी होता है जब उस धर्म में गर्व करने योग्य महान गुण
हो।

   हमें अपने "हिंदुत्व पर गर्व है क्योंकि हमारा हिंदुत्व विश्व बंधुत्व की प्रेरणा देता है।"                        

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