शनिवार, 27 अप्रैल 2013

दर्द

दर्द 

वतन को मिटा सके दुनियाँ वाले
दुनियाँ वालों में ये दमख़म कब था
इसकी हस्ती पर दाग लगाए उन्होनें 
जिनको जतन से यह वतन सौंपा था
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बगुले गिद्ध सियार भेड़ियों, तुम पर नाज करें कैसे
वतन को नाज है उन पर, जो मिट गये वतन के वास्ते

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वतन का भाल कट जाये, तुझे क्या फर्क पड़ता है
सडक पर शील लुट जाये, तुझे क्या फर्क पड़ता है
फर्क पड़ता है जब कोई उँगली उठती है तेरी तरफ
वरना मरे कोई जीये कोई तुझे क्या फर्क पड़ता है
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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है


बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है 

प्राथमिक शाला के बच्चों को नैतिक ज्ञान के पीरियड में अध्यापक सुलेख लिखा रहे थे।
अलग -अलग बच्चों को अलग-अलग पंक्ति लिख कर दी गयी थी और सभी बच्चे उसी
पंक्ति को बार-बार लिख रहे थे।कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थी
माता -पिता की आज्ञा का पालन करो
झूठ कभी मत बोलो
अपने देश पर गर्व करो
अनुशासन में रहना सीखो
समय को व्यर्थ मत गवाओं
वृद्धों की सेवा करो
नारी को सम्मान दो
माता के चरणों में स्वर्ग होता है
सभी बच्चे सुन्दर अक्षरों में सुलेख लिख रहे थे।जिस जिस बच्चे का सुलेख पूरा हो
जाता था वह बच्चा अपनी नोटबुक मास्टरजी को दिखाने उनके पास आ जाता था।
मास्टरजी बच्चो के अक्षर देख कर दस में से दस,नौ,आठ अंक देते जा रहे थे।मैं इस
प्रक्रिया को देख रहा था।एक बच्चे को छोड़कर सभी बच्चे अध्यापकजी को अपनी
अपनी कॉपी दिखा चुके थे।जो बच्चा नहीं आया था उसको मास्टरजी ने अपने पास
बुलाया और डाँटते हुए पूछा -सब बच्चो ने सुलेख लिख लिया तुमने अभी तक क्यों
नहीं लिखा? क्या तुझे लिखना नहीं आता है ?

बच्चा बोला -मुझे लिखना तो आता है ....

मास्टरजी बोले -फिर लिखा क्यों नहीं ?

वह बच्चा कुछ बोला नहीं।मास्टरजी ने कहा -नहीं लिखता है तो मुर्गा बन जा।

बच्चा मुर्गा बन गया।बच्चे को दंड पाते देख मेने मास्टरजी से कहा -मास्टरजी
यह बच्चा कहता है कि उसे लिखना आता है फिर भी उसने नहीं लिखा और आपने जो
दंड इसे दिया उसने स्वीकार कर लिया इसके पीछे बच्चे का कोई भाव रहा होगा लेकिन
आपने इसे कुछ नहीं पूछा और दंड दे दिया आखिर एक बार उससे पूछ लेते कि उसने
क्यों नहीं लिखा।

मास्टरजी ने उस बच्चे को खड़े होने का आदेश दिया और पूछा -तुम्हे लिखना आता था
फिर भी क्यों नहीं लिखा ?

बच्चा बोला -स्कुल आने से पहले मेरे दादा ने मुझे अपनी लकड़ी और चश्मा देने को
कहा था लेकिन मेने उन्हें नहीं दिया और वहां से भाग गया।अभी आपने मुझे जो लिखने
के लिए दिया वह यह था कि "वृद्धों की सेवा करो "जब मैं लिखने को बैठा तो मुझे अपनी
करनी याद आई।मुझे लगा जिस बात को आज सवेरे ही मैं नहीं कर पाया क्या केवल
लिखने मात्र से मेरा अवगुण दूर हो जाएगा ,इसलिए मेने कुछ भी नहीं लिखा।

बच्चे की बात सुनकर मास्टरजी सन्न रह गए।मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया।मुझे
लगा बच्चे ने कडवा सत्य कह दिया है।

  मुझे लगा आज मेरा देश इसलिए रुग्ण हो गया है कि सभी तथाकथित बुद्धिजीवी सिर्फ
प्रवचन देते हैं ,देश प्रेम के भाषण करते हैं,अच्छी बातें कहते हैं ,सुभाषित लिखते हैं मगर
उसका पालन नहीं करते हैं।बिना शुभ आचरण को धारण किये धर्म व्यर्थ का ढकोसला ही
तो है।किताबों में बंद पड़ी नैतिकता से कब कल्याण हुआ है।    

रविवार, 21 अप्रैल 2013

भ्रष्टाचार : अपराध की जड़

 भ्रष्टाचार : अपराध की जड़

किसी भी देश के सिस्टम में यदि भ्रष्टाचार घुस जाता है तो उस देश को चलाने वाला शासक
और प्रजा दोनों पर संकट आ जाता है।हमारे देश में भ्रष्टाचार के कारण ही अपराध रुक नहीं
पा रहे हैं।हर विभाग में कुछ भ्रष्ट लोग सिस्टम को तहस नहस कर रहे हैं।

        पुलिस जो शांति और व्यवस्था का काम देखती है वह भी अपराध को रोक नहीं पा रही
है क्योंकि जब भी किसी चौकी पर अफसर की नियुक्ति होती है उसके पहले उसे भी भ्रष्ट लोगों
को खुश करना पड़  जाता होगा और उसे जिसे खुश करना है वो कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता है।
यदि किसी ने किसी को किसी भी नियुक्ति के लिए कुछ भी आर्थिक या अन्य कोई फायदा दिया
है तो सबसे पहले वह जनता के काम को कर्तव्य समझ कर क्यों करेगा,वह व्यक्ति जिस पद पर
है उसी पद से खुद के द्वारा दिए गए पैसे वसूल करेगा और उस पद से अतिरिक्त लाभ भी लेगा।

    यह भ्रष्टाचार सिस्टम के उपरी भाग का है और यहीं से सिस्टम खराब होना शुरू हो जाता है
क्या किसी अव्यवस्था के प्रति हम आन्दोलन और नारे लगाकर व्यवस्था को पा सकते है ?
इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा।जब तक सिस्टम का उपरी हिस्सा सही नहीं होगा तब तक
अपराध रोकने में बड़ी बड़ी बाधाएं आती रहेगी।

  सिस्टम के उपरी हिस्से को स्वस्थ करने के लिए मुलभुत परिवर्तन करना पडेगा।चुनाव
प्रणाली को कम खर्चीली बनाना होगा।आज एक-एक निकायों के चुनाव में पैसे लाखो में खर्च
हो रहे हैं ताज्जुब यह है कि पैसा जो खर्च हो रहा है वह आम जनता को दिखाई देता है पर
सिस्टम को दिखाई नहीं देता है। हर राजनैतिक दल को पार्टी चलाने के लिए पैसे की आवश्यकता
होगी और उसकी पूर्ति या तो जनता करे या फिर उम्मीदवार खुद खर्च करे। यदि चुनावों के
खर्च में कमी आ जाए तो कुछ व्यवस्था सुधार की बात शुरू की जा सकती है।

  जो उम्मीदवार एक बार जीत के व्यवस्था का अंग बना गया है यदि उसने जीतने के लिए
बेफाम पैसा खर्च किया है तो वह उस खर्च किये पैसे की उगाही में लग जाता है और जनता का
काम करने की जगह पैसा बनाने में लग जाता है।अब वह बन्दा जिस भी विभाग का हेड बनेगा
वह अपने से नीचे के बड़े पदों पर या बड़े ठेकों पर पैसा बनाने लगेगा और यहीं से भ्रष्टाचार शुरु
हो जाता है।

  जब भी कोई छात्र बड़ी परीक्षा पास कर लेता है तब अगली कड़ी के रूप में उसे साक्षात्कार
देना होता है।साक्षात्कार के समय क्या होता होगा यदि साक्षात्कार लेने वाली व्यवस्था में भ्रष्ट
लोग शामिल हो गए हो।छात्र को नौकरी चाहिए और नौकरी के लिए योग्यता के अलावा रिश्वत
भी देनी पड़ जाती है यदि उसे किसी भ्रष्ट व्यवस्था को खुश करके नौकरी मिली है तो वह छात्र
काम करने से पहले दिए गए धन की उगाही में लग जाएगा,सेवा भावना खत्म हो जायेगी।

  अभिभावक अपनी  संतानों के सुन्दर भविष्य के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था बनाते हैं
बच्चे भी लग्न से पढ़ते हैं परीक्षा पास कर लेते हैं और चयन के समय अभिभावक भी गलत
तरीके से संतानों की नियुक्ति का झुगाड़ लगाते हैं।यदि यह तरीका रहेगा तो फल क्या होगा
इसे आसानी से समझा जा सकता है।

इस देश की समस्या केवल यह नहीं है कि केवल तंत्र में भ्रष्टाचार है बल्कि इस देश का नागरिक
भी भ्रष्ट बन कर आगे बढ़ रहा है।किसी भी नियुक्ति में लिखित परीक्षा में यदि उसका बच्चा पास
हो गया है और साक्षात्कार के लिए जाना है तो अभिभावक खुद भ्रष्ट तरीके से अपनी संतान की
नियुक्ति चाहने लग जाता है,उसे अपने बच्चे की योग्यता पर भरोसा कम और रिश्वत देकर काम
पूरा करने की पद्धति पर विश्वास ज्यादा होता है,और इस तरह से नौकरी मिल जाती है तो फिर
नतीजा ................

यदि सुशासन को पाना है तो हम भारतीयों  की पहली लड़ाई भ्रष्टाचार के विरोध में होनी चाहिए
अगर मूल बिमारी का ईलाज हम नहीं करेंगे तो सुन्दर व्यवस्था सपना ही बन जायेगी और
हम लोग नारे लगाकर और आन्दोलन करके फोटो खिचाते रहेंगे।अगर दिल में बदलाव की
भावना है तो डटकर संघर्ष करो भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ यही एक रास्ता है जो हमे मार्ग दिखा
सकता है।केवल अच्छी बाते किताबों में लिख देने से या प्रभावशाली भाषण देने दे देने से या
आफत आने पर केवल संवेदना जता देने से काम बनने  वाला नहीं है।

नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यकता है दृढ इच्छा शक्ति और दृढ संकल्प के साथ आगे
बढ़ने की।क्या हम सुन्दर भारत चाहते हैं .........?                            

स्थान परिवर्तन

स्थान  परिवर्तन 

कल शाम की बात है ,मैं अपने रिश्तेदार के ग्रह प्रवेश के अवसर पर उपस्थित था।गाँव से आये
भैया ने मुझसे कुशल क्षेम पूछी। मेने कहा -मैं यहाँ प्रसन्न हूँ।मेने उनके बारे में पूछा -

वो बोले - आप शहरी लोगों जैसी जिन्दगी हमारी नहीं है,बस ठीक ठाक चल रहा है।

मेने उनसे पूछा -आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ?

वो बोले -यह इसलिए कह रहा हूँ कि आप लोग गाँव छोड़ कर शहर मैं आ गए और हम वहीं
रह गये।आप ने तकलीफ झेलकर स्थान परिवर्तन कर लिया इसलिए उन्नति के अवसर भी
आप लोगों को हमारे बनस्पत ज्यादा मिले।

बात यहीं खत्म हो गयी और मैं भी स्व रूचि भोज लेकर घर आ गया।

सुबह जब मैं उठा तो घर की वाटिका में टहलने लगा।मेरा ध्यान अनायास एक गमले पर
चला गया जिस गमले में मेने 9 -10 महीने पहले कुछ बीज बिल्व के पेड़ के डाल दिए थे
उस गमले में उस समय पाँच पौधे लगे थे।उन पौधों में से मेने एक पौधा दुसरे गमले में लगा
दिया था और एक पौधा उस गमले में लगा दिया जिसमे पहले से गुलाब का पौधा लगा था।
मेने जिस गमले में अकेले बिल्व को लगाया था वह पौधा चार फुट लम्बा हो गया था और तना
भी काफी मोटा हो गया था।जिस गमले में गुलाब के साथ बिल्व के पौधे को लगाया था वह पौधा
ज्यादा नहीं पनप पाया केवल छह सात इंच का था और जिन पौधों का स्थान परिवर्तन नहीं
किया था उनमे से एक-एक करके दौ पौधे नष्ट हो गए और अंतिम पौधा नष्ट होने की कगार पर था।

              मुझे यह देख कर अचानक रात का वाकया याद आ गया कि गाँव से आये भैया ने बहुत
सटीक बात कही थी कि आप लोगों ने स्थान परिवर्तन कर लिया और उन्नती के अवसर पकड़ते
रहे।
        मेने उस बिल्व को देखा जो चार फुट लंबा था शायद मेरे से यह कह रहा था कि खुद को
उन्नती के पायदान पर देखना हो तो अकेले ही चल पड़ो और संघर्ष करो ,डटे रहो।

       गुलाब के साथ वाला पौधा यह कह रहा था कि अपने से बड़े पेड़ की छाया में मत पलो ,एक
बड़े पेड़ की छाया तले दूसरा बड़ा पेड़ विकसित नहीं हो सकता अगर खुद को बड़ा बनाना है तो
बड़े पेड़ की छाया से दूर जाकर संघर्ष करो।

      जिस गमले के बिल्व का स्थान परिवर्तन नहीं किया था वह मुझसे यह कह रहा था कि
यदि एक ही स्थान पर पड़े रहोगे और मजे की जिन्दगी जीना चाहोगे तो कुछ समय बाद पतन
की ओर चले जाओगे। लक्ष्य को हासिल करने के लिए गतिशील रहना होगा,अवसर की प्रतीक्षा
में समय खोना मुर्खता है।                        

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

शेर

         शेर


वो दिल बहलाने को फेंकते हैं समन्दर में कंकड़
नहीं सोचते हजारों लहरें यूँ ही खत्म हो जायेगी

उनके मुस्कराने का अंदाज कैसे बयाँ करे?
जानो इतना कि- कयामत इसी को कहते हैं

आज फिर से दिल में दर्द क्यों उठा है
क्या चाँद दूर बादलों में खिलखिलाया है ?


लोग समझते हैं निहायत बेकुसूर उनको
नहीं समझना चाहते कि- कुसूर किसका है ?


जब से देखे हैं उनके दिलकश अंदाज
अपने सीने से दिल को गायब पाते हैं




  

रविवार, 14 अप्रैल 2013

कामयाबी के चार कदम

कामयाबी के चार कदम 

Dream + Goal + Plan + Action = Success

बहुत ही सरल है कामयाब होना लेकिन फिर भी व्यक्ति असफल हो जाता है

Dream :- हम खुली आँखों से बड़े सपने देखना सीखे।अक्सर व्यक्ति बड़े सपने खुली आँखों
से देखते हुए डरता है जब भी सपना देखता है तो उसके मन में नकारात्मक भाव आ जाता
है कि "यह होने वाला नहीं है। " यह नकारात्मक भाव भविष्य की अपार सम्भावनाओं को
मिटा देता है।हम बड़े सपने देखना सीखें।जब सपना खुली आँखों से देख लेते हैं तो अपने से
एक सवाल करे- कब और कैसे ?बड़े सपने को निश्चित समय में बाँट दे और कैसे की तैयारी
शुरू कर दे।

Goal  :- जब हम खुद से "कैसे" होगा सपना पूरा का सवाल करते हैं तब अपने लक्ष्य को
स्पष्ट कर ले।क्या करना है,कैसे करना है,किससे मदद ली जा सकती है,किससे मार्ग दर्शन
लेना है,लक्ष्य के पथ पर किस गति से चलना है और मंजिल पर कब पहुंचना है ये सब स्पष्ट
हो जाने पर जिस विषय पर आप जाना चाहते हैं उस पर आपका ज्ञान कैसा है ?क्या आप में
यह क्षमता है कि आप उस विषय का गहन/बारीक विश्लेष्ण कर सकते हैं ?अगर आपका
उत्तर "हाँ" में है तो आप अगले कदम को बढ़ा दे और उत्तर स्पष्ट नहीं है तो उस विषय में पहले
पारंगत हो कर आगे बढ़े।

प्लान :- लक्ष्य को तय करने के बाद आप अपने विचारों से लक्ष्य के प्रति समर्पित हो जाए
और संदेह को त्याग दे।अपने लक्ष्य के प्रति नकारात्मक ना बने कमजोर विचारों को दूर
फेंक दे।योजना बनाते समय संभावित कठिनाईयों को चिन्हित करते चले ताकि उन के हल
ढूंढ़ सके।समय को खास महत्व दे क्योंकि आपका लक्ष्य उसी पर टिका है।योजना और
रणनीति बनाते समय हर बारीक बात का ध्यान रखें।आपका नक्शा तैयार हो जाने पर एक
बार पुन: अवलोकन करे यदि आपके सपने के अनुकूल है तो अपनी कलम के नीब को तौड़ दे
यानि करो या मरो

Action :- अब समय आ गया है अपने सपने की ओर बढ़ने का।अब केवल एक ही महापुरुष
की बात को याद रखना है -उठो,जागो और चल पड़ो ,तब तक मत रुको जब तक आप अपने
लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते। खुद पर विश्वास रखो और परमात्मा पर आस्था क्योंकि ये
दोनों ऊर्जा के अक्षय भण्डार हैं।

......अविलम्ब कदम बढ़ा दीजिये क्योंकि यह रास्ता सफलता की ओर ही जाता है।                      

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

दुःख का कारण

दुःख का कारण 

एक वन में काकराज बहुत सारे कोओं के साथ रहा करते थे।सभी कोओं का बसेरा एक
विशाल बरगद का पेड़ था।काकराज वृद्ध और विद्धवान थे ,सार कुटुंब संतोष और चैन के
साथ जी रहा था।

एक बार काकराज को काफी लम्बे समय के लिये सुदूर जाना था।यात्रा के पहले वे सभी
कोओं से मिले और मुस्कराहट और संतोष के साथ रहने की सलाह देकर यात्रा को चले
गये।जब काकराज सुदूर यात्रा से वापिस लौटे तो देखा कि उनका कुटुम्ब गहरा दुःख झेल
रहा है।काकराज सबसे मिले उन सबके चेहरे पर तनाव देख वो समझ गए कि कुछ बात
जरुर है।

अगले दिन काकराज ने देखा कि उनके बरगद पर गोरैया रहने आई हुयी है।काकराज
गोरैया से मिले और उससे पूछा- गोरैया बहन,यहाँ तुझे कोई कष्ट तो नहीं हैं न ?

गोरैया ने कहा-काकराज ,मुझे यहाँ रहकर अच्छा लग रहा है,मेरे बच्चों को भी किसी ने
हानि नहीं पहुंचाई है।सभी कौए प्रेम से बोलते हैं ,मैं यहाँ आराम से हूँ।

काकराज ने गोरैया को अभयदान दिया और वापिस अपने कुटुम्बी जनों के पास आ गये।
अपने कुटुम्बियों और मित्रो के दुःख को भांप कर उन्होंने एकांत में एक-एक कौए को
बुलाया और दुःख का कारण पूछा।

एक कौआ बोला -काकराज ,यहाँ अन्न का अभाव नहीं है,किसी का भय भी नहीं है लेकिन
जब से यह गोरैया यहाँ आई है तब से इसके रंग को देख कर मेरे मन में पीड़ा है कि इसका
रँग सुनहरा क्यों है।

दूसरा कौआ बोला -काकराज,मैं यहाँ पर प्रसन्नता पूर्वक हूँ लेकिन कभी -कभी सोचता हूँ
कि काश !मैं भी गोरैया की तरह सुरीली तान में बोल पाता।

तीसरा कौआ बोला -काकराज,इस विशाल बरगद पर कोई अभाव नहीं है ,मेरे दुःख का
कारण इस गोरैया के द्वारा बनाए गये सुन्दर घोंसले के कारण है।इस गोरैया ने अपने
रहने के लिए कितना सुन्दर नीड़ बुना है।
 
चोथा कौआ बोला- काकराज ,मेरी पीड़ा का कारण सिर्फ इतना है कि मुझे पेट भरने के लिए
काफी मेहनत करनी पड़ती है जबकि इस गोरैया का शरीर छोटा होने के कारण इसे अपना
पेट भरने के लिए मेहनत बहुत कम करनी पडती है।

काकराज ने सबसे दुःख का कारण जाना तो उन्हें लगा सारे कौए किसी आपदा के कारण
दुखी नहीं है इनके दुःख का कारण सिर्फ दुसरे से ईर्ष्या करना है।हम दूसरो के सुख को बड़ा
मानकर खुद के सुख को दुःख में बदल लेते हैं और खिन्न होकर अपना जीवन जीते हैं।
शायद यह एक बड़ा कारण हमारे रोते पीटते जीने का।हम अपने पास जो है उसका आन्नद
लेने के बजाय इसलिए दुखी रहते हैं कि दूसरा सुखी क्यों है।   
 
                    

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

नेता उपदेश .............

नेता उपदेश   .............

"मैं जानता हूँ कि समस्या क्या है क्योंकि मैं यह भी जानता हूँ कि समस्या किसकी
वजह से पैदा हुई ....
मैं समस्या को अच्छी तरह से रख सकता हूँ ताकि मेरे ज्ञानी होने का ढ़कोसला
पैदा हो सके ....
मैं समस्या के हल नहीं जानता हूँ और परीक्षा में हल नहीं जानने वाला असफल
होता है मगर मैं इसे अपनी सफलता मानता हूँ ...
उत्तर पुस्तिका में प्रश्न लिखकर मैं पूछता हूँ -अब तो पप्पू पास है ना,क्योंकि मेने
कुछ लिखा तो है .....
अब इतना कहकर मैं अपना भाषण समाप्त करता हूँ।"

भाषण समाप्त होते ही कबीले वाले खुश हो गये और कहा -वाह ! राजा बेटा होशियार
हो गया अगर समस्या का कारण और उपाय बता देता तो अपनी सैंकड़ो साल पुरानी
कब्र खुद जाती।

कुछ घाघ लोग ताली बजाने लगे,उनसे पूछा -यह हरकत क्यों ?वो बोले -ताली बजाने
की कीमत मिलती है कोई फोकट में नहीं बजा रहे हैं।
  

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

दे सेर को सवा सेर ........

दे सेर को सवा सेर ........

जब-
सत्याग्रह
अहिंसा 
सच्चाई
सुविचार
विनय
आग्रह
उपवास
उपाय 
सब व्यर्थ हो जाये 
और 
लक्ष्य दूर खिसकता जाए, 
तब-
अविलम्ब आजमाना,
आचार्य चाणक्य की टेर, 
दे सेर को सवा सेर-2 

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जब-
नेता शुकुनि सा लगे 
गुरु द्रोण सा लगे 
राजा धृतराष्ट्र सा लगे 
नाता कंस सा लगे
छल रावण सा लगे
मित्र जयचंद सा लगे
तब -
नीति से करना परहेज 
और 
आजमा ले चाणक्य की टेर  
दे सेर को सवा सेर-2      
       

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

सफलता के लिए रुकना भी जरुरी।

सफलता के लिए रुकना भी जरुरी।

ब्रेक ,रुकना और विश्राम का प्रयोग मंजिल तक का रास्ता तय करने के लिए जरुरी है।

जब पहाड़ियों पर चढ़ना होता है तब कुछ सीढियों के बाद एक लम्बी और चौड़ी सीढ़ी
बनायी जाती है ताकि हमें कुछ पल के लिये स्वत:ही चलना पड़े ना कि समान गति से
चढ़ना पड़े।लगातार चढ़ने से मंजिल या शिखर तक ज्यादा थकान के बाद चढ़ा जाएगा
जबकि चौड़ी सीढ़ी पर कुछ पल चलकर या विश्राम लेकर राही नई उर्जा के साथ आगे
का रास्ता तय कर लेता है।

हर वाहन में ब्रेक का होना जरुरी है क्योंकि ब्रेक गाडी को नियंत्रित ही नहीं करता है
बल्कि तेज गति से चलाने पर सहायक बनता है।बिना ब्रेक का वाहन गति भी नहीं
पकड पाता और जोखिम भी अनावश्यक रूप से ज्यादा झेलता है।

हर वाहन को कुछ सौ किलोमीटर के बाद रोकना आवश्यक हो जाता है ताकि वाहन
के ईंजन को गर्मी से बचाया जा सके और उसकी ताकत को बनाए रखा जा सके।

दिन के चोबीस घंटे में समय लगातार आगे बढ़ता दीखता है मगर समय को आगे बढ़ाने
में जितने भी ग्रह योगदान देते हैं वो विश्राम लेते रहते हैं और समय को गति देते रहते हैं।
सूर्य,चन्द्र,संधिकाल,ऋतुएँ सभी को देखने से आसानी से समझा जा सकता है कि विश्राम
से मंजिल तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।

जितने भी ग्रन्थ लिखे गए हैं तो उनको भी आगे बढ़ाने के लिए नए अध्याय से पहले
विश्राम दिया गया है कोई भी ग्रन्थ बिना अध्याय के आगे नहीं बढ़ता है।

हमारा मस्तिष्क भी लगातार काम करता है परन्तु किये गए काम को सुरक्षित करने के
लिये उसे भी कुछ समय का विश्राम चाहिए ताकि जो पढ़ा गया या काम किया गया है उसे
लम्बे समय के लिए याद रख सके।

जब भी हम बड़ा सपना देखते हैं तो उसको पूरा करने की योजना बनाते समय हमे रुकने
और विश्लेषण करते जाने को भी ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि बड़ा सपना (लक्ष्य)
केवल लगातार चलते रहने से पूरा नहीं होता है।जिस लक्ष्य को हमें पाना है उसे खण्डों
में चेप्टर में विभक्त कर देना चाहिए ताकि हम अलग-अलग खंडों पर रुक सके,विश्राम
पा सके और पिछले किये गए काम का विश्लेष्ण कर सके।

हम जब भी कोई योजना तय करते हैं तब भविष्य में आने वाली विपरीत परिस्थियों
का सम्पूर्ण आँकलन नहीं कर पाते हैं क्योंकि भविष्य के गर्भ में अनिश्चितता छिपी
रहती है लेकिन उस योजना को बनाते समय कुछ समय रुकने के लिए भी निश्चित
कर देंगे तो हम आकस्मिक विपरीत परिस्थिति को आसानी से दूर कर सकते हैं और
लक्ष्य तक समय पर पहुँच सकते हैं।