मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है


बिना आचरण के धर्म व्यर्थ है 

प्राथमिक शाला के बच्चों को नैतिक ज्ञान के पीरियड में अध्यापक सुलेख लिखा रहे थे।
अलग -अलग बच्चों को अलग-अलग पंक्ति लिख कर दी गयी थी और सभी बच्चे उसी
पंक्ति को बार-बार लिख रहे थे।कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थी
माता -पिता की आज्ञा का पालन करो
झूठ कभी मत बोलो
अपने देश पर गर्व करो
अनुशासन में रहना सीखो
समय को व्यर्थ मत गवाओं
वृद्धों की सेवा करो
नारी को सम्मान दो
माता के चरणों में स्वर्ग होता है
सभी बच्चे सुन्दर अक्षरों में सुलेख लिख रहे थे।जिस जिस बच्चे का सुलेख पूरा हो
जाता था वह बच्चा अपनी नोटबुक मास्टरजी को दिखाने उनके पास आ जाता था।
मास्टरजी बच्चो के अक्षर देख कर दस में से दस,नौ,आठ अंक देते जा रहे थे।मैं इस
प्रक्रिया को देख रहा था।एक बच्चे को छोड़कर सभी बच्चे अध्यापकजी को अपनी
अपनी कॉपी दिखा चुके थे।जो बच्चा नहीं आया था उसको मास्टरजी ने अपने पास
बुलाया और डाँटते हुए पूछा -सब बच्चो ने सुलेख लिख लिया तुमने अभी तक क्यों
नहीं लिखा? क्या तुझे लिखना नहीं आता है ?

बच्चा बोला -मुझे लिखना तो आता है ....

मास्टरजी बोले -फिर लिखा क्यों नहीं ?

वह बच्चा कुछ बोला नहीं।मास्टरजी ने कहा -नहीं लिखता है तो मुर्गा बन जा।

बच्चा मुर्गा बन गया।बच्चे को दंड पाते देख मेने मास्टरजी से कहा -मास्टरजी
यह बच्चा कहता है कि उसे लिखना आता है फिर भी उसने नहीं लिखा और आपने जो
दंड इसे दिया उसने स्वीकार कर लिया इसके पीछे बच्चे का कोई भाव रहा होगा लेकिन
आपने इसे कुछ नहीं पूछा और दंड दे दिया आखिर एक बार उससे पूछ लेते कि उसने
क्यों नहीं लिखा।

मास्टरजी ने उस बच्चे को खड़े होने का आदेश दिया और पूछा -तुम्हे लिखना आता था
फिर भी क्यों नहीं लिखा ?

बच्चा बोला -स्कुल आने से पहले मेरे दादा ने मुझे अपनी लकड़ी और चश्मा देने को
कहा था लेकिन मेने उन्हें नहीं दिया और वहां से भाग गया।अभी आपने मुझे जो लिखने
के लिए दिया वह यह था कि "वृद्धों की सेवा करो "जब मैं लिखने को बैठा तो मुझे अपनी
करनी याद आई।मुझे लगा जिस बात को आज सवेरे ही मैं नहीं कर पाया क्या केवल
लिखने मात्र से मेरा अवगुण दूर हो जाएगा ,इसलिए मेने कुछ भी नहीं लिखा।

बच्चे की बात सुनकर मास्टरजी सन्न रह गए।मैं भी सोचने पर मजबूर हो गया।मुझे
लगा बच्चे ने कडवा सत्य कह दिया है।

  मुझे लगा आज मेरा देश इसलिए रुग्ण हो गया है कि सभी तथाकथित बुद्धिजीवी सिर्फ
प्रवचन देते हैं ,देश प्रेम के भाषण करते हैं,अच्छी बातें कहते हैं ,सुभाषित लिखते हैं मगर
उसका पालन नहीं करते हैं।बिना शुभ आचरण को धारण किये धर्म व्यर्थ का ढकोसला ही
तो है।किताबों में बंद पड़ी नैतिकता से कब कल्याण हुआ है।    

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