रविवार, 21 अप्रैल 2013

भ्रष्टाचार : अपराध की जड़

 भ्रष्टाचार : अपराध की जड़

किसी भी देश के सिस्टम में यदि भ्रष्टाचार घुस जाता है तो उस देश को चलाने वाला शासक
और प्रजा दोनों पर संकट आ जाता है।हमारे देश में भ्रष्टाचार के कारण ही अपराध रुक नहीं
पा रहे हैं।हर विभाग में कुछ भ्रष्ट लोग सिस्टम को तहस नहस कर रहे हैं।

        पुलिस जो शांति और व्यवस्था का काम देखती है वह भी अपराध को रोक नहीं पा रही
है क्योंकि जब भी किसी चौकी पर अफसर की नियुक्ति होती है उसके पहले उसे भी भ्रष्ट लोगों
को खुश करना पड़  जाता होगा और उसे जिसे खुश करना है वो कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता है।
यदि किसी ने किसी को किसी भी नियुक्ति के लिए कुछ भी आर्थिक या अन्य कोई फायदा दिया
है तो सबसे पहले वह जनता के काम को कर्तव्य समझ कर क्यों करेगा,वह व्यक्ति जिस पद पर
है उसी पद से खुद के द्वारा दिए गए पैसे वसूल करेगा और उस पद से अतिरिक्त लाभ भी लेगा।

    यह भ्रष्टाचार सिस्टम के उपरी भाग का है और यहीं से सिस्टम खराब होना शुरू हो जाता है
क्या किसी अव्यवस्था के प्रति हम आन्दोलन और नारे लगाकर व्यवस्था को पा सकते है ?
इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा।जब तक सिस्टम का उपरी हिस्सा सही नहीं होगा तब तक
अपराध रोकने में बड़ी बड़ी बाधाएं आती रहेगी।

  सिस्टम के उपरी हिस्से को स्वस्थ करने के लिए मुलभुत परिवर्तन करना पडेगा।चुनाव
प्रणाली को कम खर्चीली बनाना होगा।आज एक-एक निकायों के चुनाव में पैसे लाखो में खर्च
हो रहे हैं ताज्जुब यह है कि पैसा जो खर्च हो रहा है वह आम जनता को दिखाई देता है पर
सिस्टम को दिखाई नहीं देता है। हर राजनैतिक दल को पार्टी चलाने के लिए पैसे की आवश्यकता
होगी और उसकी पूर्ति या तो जनता करे या फिर उम्मीदवार खुद खर्च करे। यदि चुनावों के
खर्च में कमी आ जाए तो कुछ व्यवस्था सुधार की बात शुरू की जा सकती है।

  जो उम्मीदवार एक बार जीत के व्यवस्था का अंग बना गया है यदि उसने जीतने के लिए
बेफाम पैसा खर्च किया है तो वह उस खर्च किये पैसे की उगाही में लग जाता है और जनता का
काम करने की जगह पैसा बनाने में लग जाता है।अब वह बन्दा जिस भी विभाग का हेड बनेगा
वह अपने से नीचे के बड़े पदों पर या बड़े ठेकों पर पैसा बनाने लगेगा और यहीं से भ्रष्टाचार शुरु
हो जाता है।

  जब भी कोई छात्र बड़ी परीक्षा पास कर लेता है तब अगली कड़ी के रूप में उसे साक्षात्कार
देना होता है।साक्षात्कार के समय क्या होता होगा यदि साक्षात्कार लेने वाली व्यवस्था में भ्रष्ट
लोग शामिल हो गए हो।छात्र को नौकरी चाहिए और नौकरी के लिए योग्यता के अलावा रिश्वत
भी देनी पड़ जाती है यदि उसे किसी भ्रष्ट व्यवस्था को खुश करके नौकरी मिली है तो वह छात्र
काम करने से पहले दिए गए धन की उगाही में लग जाएगा,सेवा भावना खत्म हो जायेगी।

  अभिभावक अपनी  संतानों के सुन्दर भविष्य के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था बनाते हैं
बच्चे भी लग्न से पढ़ते हैं परीक्षा पास कर लेते हैं और चयन के समय अभिभावक भी गलत
तरीके से संतानों की नियुक्ति का झुगाड़ लगाते हैं।यदि यह तरीका रहेगा तो फल क्या होगा
इसे आसानी से समझा जा सकता है।

इस देश की समस्या केवल यह नहीं है कि केवल तंत्र में भ्रष्टाचार है बल्कि इस देश का नागरिक
भी भ्रष्ट बन कर आगे बढ़ रहा है।किसी भी नियुक्ति में लिखित परीक्षा में यदि उसका बच्चा पास
हो गया है और साक्षात्कार के लिए जाना है तो अभिभावक खुद भ्रष्ट तरीके से अपनी संतान की
नियुक्ति चाहने लग जाता है,उसे अपने बच्चे की योग्यता पर भरोसा कम और रिश्वत देकर काम
पूरा करने की पद्धति पर विश्वास ज्यादा होता है,और इस तरह से नौकरी मिल जाती है तो फिर
नतीजा ................

यदि सुशासन को पाना है तो हम भारतीयों  की पहली लड़ाई भ्रष्टाचार के विरोध में होनी चाहिए
अगर मूल बिमारी का ईलाज हम नहीं करेंगे तो सुन्दर व्यवस्था सपना ही बन जायेगी और
हम लोग नारे लगाकर और आन्दोलन करके फोटो खिचाते रहेंगे।अगर दिल में बदलाव की
भावना है तो डटकर संघर्ष करो भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ यही एक रास्ता है जो हमे मार्ग दिखा
सकता है।केवल अच्छी बाते किताबों में लिख देने से या प्रभावशाली भाषण देने दे देने से या
आफत आने पर केवल संवेदना जता देने से काम बनने  वाला नहीं है।

नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यकता है दृढ इच्छा शक्ति और दृढ संकल्प के साथ आगे
बढ़ने की।क्या हम सुन्दर भारत चाहते हैं .........?                            

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