शनिवार, 27 अप्रैल 2013

दर्द

दर्द 

वतन को मिटा सके दुनियाँ वाले
दुनियाँ वालों में ये दमख़म कब था
इसकी हस्ती पर दाग लगाए उन्होनें 
जिनको जतन से यह वतन सौंपा था
.....................................................................

बगुले गिद्ध सियार भेड़ियों, तुम पर नाज करें कैसे
वतन को नाज है उन पर, जो मिट गये वतन के वास्ते

..............................................................................

वतन का भाल कट जाये, तुझे क्या फर्क पड़ता है
सडक पर शील लुट जाये, तुझे क्या फर्क पड़ता है
फर्क पड़ता है जब कोई उँगली उठती है तेरी तरफ
वरना मरे कोई जीये कोई तुझे क्या फर्क पड़ता है
...........................................................................................










कोई टिप्पणी नहीं: