रविवार, 30 जून 2013

नेता वचन

नेता वचन 

चुन लिया हमको नेता तो हश्र उसका पाईये
बच गये कयामत से कैसे उत्तर देते जाईये 

बच गया हिमालय ! इसे करिश्मा ही मानिए  
हिमगिरी के वस्त्र हरण में कसर रही ये जानिए  

खुदा से भी बड़ा अब तो हमको हुजुर मानिए  
पर्यटन के भ्रष्ट पाश में सबको तडफता पाइये

नेताओं के कुकर्मों से शिवशंकर गच्चा खा गए!
भस्मासुर नहीं भस्म हुआ भोले जी भी मान गए
  
महा मौत के खप्पर से भी लोग जिन्दा बच गए?
इसे हमारी नीतियों का नाकारापन ही जानिए 

जो बच गये आबाद सलामत उन्हें आगे डुबो देंगे
नही होता है विश्वास तो इतिहास पलटते जाइए  

राहत-बचाव के नाम का इश्तहार चिपकायेंगे 
तेरे आँसुओं की बाढ़ में तुम सबको ही डुबोयेंगे   

     

शनिवार, 29 जून 2013

स्वार्थ बुद्धि -श्रीमद भगवत गीता

स्वार्थ बुद्धि -श्रीमद भगवत गीता 

यह सँसार दौ मुख्य कारणों के इर्द गिर्द चल रहा है पहला मोह और दूसरा स्वार्थ।पशु में इन
दोनों चीजो का अभाव होता है मगर मनुष्य में ये होती ही हैं ,इनके अभाव हो जाने से शायद
सृष्टि का विकास भी खत्म हो सकता है।प्रश्न यह उठता है कि फिर श्री कृष्ण ने मोह और
स्वार्थ दोनों से दूर रहने को ही सही क्यों माना और अपने उपदेश में दूर रहने को ही सही
क्यों बताया ?

इस प्रश्न से पहले हमें इन दोनों शब्दों के अर्थ समझ लेने चाहिए ताकि हम इस प्रश्न के हल
की ओर बढ़ सके।

मोह -किसी वस्तु ,पदार्थ या जीव में आसक्ति और मेरापन 

स्वार्थ -स्वयं की प्रसन्नता के लिए किये जाने वाले कामना युक्त कर्म ,ऐसे कर्मो के अन्दर 
          अन्य लोगों का अहित छुपा रहता है 

इन दोनों से बिलकुल अलग है प्रेम  और परमार्थ।प्रेम में मेरापन नहीं होता ह्मारापन होता
है और परमार्थ में शुभ कर्म ही निहित होते हैं।प्रेम में देने का भाव होता है प्रतिफल की इच्छा
नहीं होती।प्रेम में त्याग की भावना होती है प्रेमी से सुख पाने की लालसा नहीं होती।परमार्थ
में काम करने से पहले यह सोचना होता है की उस कर्म के करने से किसी का अहित तो नहीं
होगा।परमार्थ में कर्म के प्रभाव को पहले ध्यान में लिया जाता है और उसके बाद खुद के हित
को देखा जाता है।  

              अब हम मूल विषय पर आते हैं कि शुभ कर्म क्या है और स्वार्थ क्या है।शुभ कर्म
में अच्छे साहित्य का अध्ययन,शुभ कर्म से अर्जित सम्पति से दान,इंद्रियों में संयम यानि
तप,शरीर से लोकोपयोगी काम करना।स्वार्थ बुद्धि में भी कर्म करना पड़ता है परन्तु अन्य
के हित का ध्यान नहीं रखा जाता, शुभ -अशुभ सभी कर्मो से सम्पति का अर्जन करना और
स्वयं के सुख के लिए भी कंजूसी से खर्च करना दान तो बहुत दूर की बात है, इन्द्रियों का
दुरूपयोग करना हरेक इंद्री में असंयम,और शरीर से स्व हित के कर्म करना।

                 भगवान् गीता में मोह से परे हटकर विवेक का उपयोग करते हुए कर्म को पूरा
करने का उपदेश देते हैं।एक पिता को अपना पुत्र बहुत प्यार होता है,पुत्र पर स्नेह होने के
कारण पिता अपने पुत्र के ना करने योग्य काम पर टोकता नहीं है ,पुत्र को उचित दंड नहीं
देता है तो क्या वह अपने पुत्र का भला कर रहा होता है ?पुत्र चोरी करता है ,झूठ बोलता है
शराब पीता है ,जुआ खेलता है और पिता मोह के वशीभूत पुत्र के कुकर्मो पर आँख पर पट्टी
बाँध लेता है तो क्या वह अपने पुत्र का प्रेमी या हितेषी कहलाता है ?पैसे कमाने के लोभ में
संतान अपराध करता है,अराजकता के काम करता है,दुराचार करता है और माँ -बाप मोह
के कारण सब कुछ सह लेते हैं मगर क्या इसमें संतान का भला होता है ?अगर बाप जज हो
और बेटे ने किसी अबला के साथ दुराचार किया हो और उसका फैसला उसी बाप की कलम
से होना हो और वह बाप अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके पुत्र के पक्ष में फैसला दे देता
है तो क्या वह पुत्र का भला कर रहा होता है।मोह से विवेक मंद पड़ जाता है विवेक के नष्ट
होने से बुद्धि नष्ट हो जाती है और कुबुद्धि से लिया गया निर्णय पतन का हेतु बन जाता है।

           स्वार्थ का त्याग का मतलब यह नहीं कि हम जो भी अर्जित करे उसे दुसरो पर लुटा
दे या खुद कष्ट सह कर भी दूसरों का हित साधते रहे।श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध में खड़े हो
जाने की बात कही है यह नहीं कहा कि इस नर संहार से अच्छा है साधू बन जाना।हम जो
भी कर्म करे उनको करने से पहले इतना विचार जरुर कर लेना चाहिए कि मेरे द्वारा किये
जा रहे काम से किसी कमजोर का अहित तो नहीं होगा ना।मेरे काम से मुझे तो शुभ फल
प्राप्त हो मगर उसका प्रभाव दुसरो पर हितकारी रहे ,अन्यों को भी लाभ हो।भगवान् राम
यदि राज्य के लोभ में पड़कर पिता दशरथ को बंदी बना लेते और शासन खुद संभाल लेते
तो क्या वह आज हमारे पूजनीय होते ?जब भरत उनके पास जाकर राज्य संभालने की
जिद करते हैं और श्री राम उनकी बात को मानकर वनवास त्याग राज्य की धुरा खुद के
हाथ में ले लेते तो क्या आज हम उनको पूजते ?

               जब भी हम कर्म करते हैं तब दुसरो के सुख को भी ध्यान में रख लेते है तो वह
काम लक्ष्य तक पहुँच जाता है और उस काम को पूरा करने में सहयोग भी सभी से स्वत:
ही मिल जाता है।जिस कर्म को करने में दुसरो के हित का ध्यान रखा गया तो निश्चित
जानिये उस काम के परिणाम में उस काम को करने वाले का भला होता ही है क्योंकि सूत्र
यह कहता है कि अच्छे काम का परिणाम कभी भी खुद के लिए बुरा हो नहीं सकता।कर
भला तो हो भला                 









                         

शुक्रवार, 28 जून 2013

कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता

कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता 

श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण कहते हैं की कर्म की आसक्ति से,सफलता या असफलता के
भाव से परे हटकर कार्य किया जाए तो समता भाव आता है।किसी कार्य को करने से पहले
यदि हम उसे कर्तव्य निर्वाह मान कर शुरू करे और जब तक वह कार्य सम्पूर्ण नहीं हो जाता
तब तक सफलता या असफलता के भाव से दूर रहकर करे तो उसे कार्य कुशलता कहा जाता
है ,क्योंकि हमारा मस्तिष्क इस तरीके से काम करने पर बंधन में नहीं रहता है ,कोई बोझ
यदि मन पर नहीं है तो वह कार्य पूर्ण होने पर यज्ञ बन जाता है।यदि किसी परिणाम से बंध
कर हम काम शुरू करते हैं तब हमारी कार्य क्षमता कम हो जाती है ,खुद पर श्रद्धा कम हो जाती
है।परिणाम से बंध कर कार्य करने पर हम शंका में फँस जाते हैं और नकारात्मक चिंतन करते
हैं,इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम लक्ष्य रहित या लापरवाही से काम को अंजाम दे।हमारे
कर्तव्य की योजना स्पष्ट,समयबद्ध और सुनियोजित होनी चाहिएलेकिन उसका परिणाम
उस योजना के पूरा हो जाने के बाद ही देखना चाहिए।

                          दौ अलग -अलग व्यक्ति एक ही प्रकार के काम को शुरू करते हैं उसमे एक
व्यक्ति सफल हो जाता है और दूसरा असफल,ऐसा क्यों होता है ? इसका कारण उस विषय के
प्रति पूर्ण जानकारी का भिन्न होना भी हो सकता है या उस काम को करने के ढंग में अंतर हो
सकता है।उस काम को करते समय एक व्यक्ति उसके परिणाम को अपनी इच्छा के अनुकूल
आने की चिंता के साथ करता है और दूसरा उस काम को कुशलता से पूरा करने के नजरिये से
करता है।काम को कुशलता पूर्वक करने के नजरिये से करने वाला सफल ही होता है और इसी
को भगवान् कर्म यज्ञ कहते हैं।

                           कर्म या तो शुभ होते हैं या अशुभ। शुभ कर्म ही कर्म यज्ञ कहलाते हैं।अब
प्रश्न यह उठता है कि शुभ कर्म से तात्पर्य क्या,किसे शुभ कर्म माने और किसे अशुभ।देश की
रक्षा के लिये किया गया शत्रु वध शुभ कर्म होता है जबकि स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी की
हत्या करना अशुभ कर्म हो जाता है।शुभ कर्म का आशय यह है कि ऐसे काम जिसके करने से
किसी निर्दोष का अहित नहीं हो और परिणाम भी सुन्दर हो।एक चोर ने एक महिला का हाथ
काट कर उसके हाथ में पहनी सोने की चूड़ी लूट ली और दुसरे दृश्य में एक सर्जन डॉक्टर ने
किसी मरीज की जान को बचाने के लिए उसकी दोनों टाँगे काट दी,अब हम किस कर्म को शुभ
और किसे अशुभ कहेंगे ?

                         सभी कर्म यदि शुभ भाव से ,सच्ची निष्ठां से किये जाते हैं तो वह यज्ञ है और
यज्ञ ही पूजा है।श्री कृष्ण कहते हैं-फल की इच्छा,आसक्ति,कामनाऔर कर्तव्य के अभिमान से
रहित होकर कर्म करने के लिए कर्म करे।प्राय: मनुष्य कर्म करने से पहले यह सोचता है कि
मेरा भला हो  या मेरा भला हो चाहे दुसरे का अहित हो जाए  या मेरा भला ना हो तो दुसरे का भी
भला ना हो या मेरा भला हो तथा दुसरे का भी हित हो या चाहे मेरा अहित हो जाए मगर दुसरे
का भला हो।सबसे अंतिम सोच लोक कल्याण की भावना है जिसके उदाहरण बहुत कम वर्तमान
में मिलते हैं क्योंकि ये लोक शिक्षा के कर्म है मगर भगवान् कहते हैं की तुम इस भाव से कर्म
नहीं करोगे तो भी मैं तुम्हारे कर्म को यज्ञ मान लूँगा यदि तुम निर्लिप्त भाव से उन्हें करो।

                   वर्तमान समय हो या गुजरा हुआ समय हो एक सूत्र श्री कृष्ण ने सफल व्यक्ति
बनने के लिए प्राणी मात्र को दिया है वह यह है कि कर्तव्याभिमान से सदैव बचे।यह एक सूत्र
है ,सूत्र सार्वभोमिक सत्य होते हैं हर काल में लागू होते हैं और उनका प्रभाव पड़ता है।

                     व्यक्ति छोटा सा भी शुभ काम करता है तो उसके मन में खुद पर अभिमान
आता हैऔर वह हर किसी के सामने उस शुभ कर्म को रखना चाहता है।व्यक्ति जिसके
सामने अपने शुभ कर्म को रखता है तो उसके मन में इच्छा जाग्रत होती है कि सामने वाला
उसकी प्रशंसा कर दे।इसी इच्छा से अभिमान की उत्पत्ति होती है और अभिमान ही पतन
का कारण बनता है।व्यक्ति शुभ आचरण करके प्रशंसा की इच्छा करे इसे कुछ समय के
लिए ठीक मान ले मगर उस व्यक्ति का क्या होगा जिसने खुद ने शुभ काम किया ही नहीं
था लेकिन वह यह चाहे कि लोक में उसकी प्रशंसा हो जाए भले ही वह काम किसी और ने
किया हो।प्राकृतिक आपदाओं के समय राजनेता जनता के द्वारा प्राप्त कर की राशि में
से आपदाग्रस्त को देने का दिखावा इस तरह से करते हैं कि जैसे उन्होंने खुद ने अपनी
कमाई से दी हो।

                            उच्च पदों पर आसीन नेता जब भी जनता के कर से प्राप्त राशि को लोक
हित में खर्च करने की योजना बनाते है तब सबसे पहले खुद की फोटो अखबार में विज्ञापन
के साथ जरुर देते हैं जैसे वो जनता का धन जरूरतमंद को देकर कोई उपकार कर रहे हों।

                     कर्तव्य के अभिमान का रोग उस भारत में बुरी तरह से फैल गया है जिससे
बचने के लिए ही श्री कृष्ण ने उपदेश किया था।आज अधिकाँश लोग यह चाहते हैं की उसकी
जगत में प्रशंसा हो चाहे उसने कर्म कैसा भी क्यों ना किया हो।आम व्यक्ति भी भगवान् के
मन्दिर पर जाता है और खुद के कल्याण की प्रार्थना करता है फिर खुद की संतुष्टि के लिए
कुछ चढ़ावा भेंट करता है और उसके बदले में बड़ी सारी लिस्ट भगवान को सौंप देता है तथा
मंदिर से बाहर आकर जगत में ढिंढोरा पीटता है कि उसने आज शुभ काम किया है ,दान दिया
है।
                कर्तव्य अभिमान और अधिकारों का दुरूपयोग यह बहुत बड़ी बिमारी है जिससे
भारत ही नहीं पूरा विश्व ग्रसित है।इस खोटी प्रशंसा से उबरने की जरूरत है और उबरने
का उपाय भी गीता में निहित है कि कर्म के फल में आसक्ति ना हो ,कर्म में कामना ना
हो ,कर्म कर्तव्य बुद्धि से पूर्ण हो उसमे अभिमान की लालसा ना हो          
                              



गुरुवार, 27 जून 2013

सफलता के सूत्र -श्रीमद भगवत गीता से

सफलता के सूत्र -श्रीमद भगवत गीता से 

कर्म का आशय वह कार्य जिसके करने के निमित में प्रतिफल की लालसा हो और कर्मयोग
का मतलब समतापूर्वक समभाव रखते हुए कर्म का निर्वाह करना,यहाँ फल की लालसा नहीं
है जो भी परिणाम मिलेगा उसे स्वीकार कर लेना है।समता पूर्वक कर्तव्य का आचरण करना
ही कर्मयोग है

समतापूर्वक कर्म कैसे किया जाये ? यह प्रश्न स्वाभाविक है क्योंकि हर परिस्थिति में सम
रहना बहुत मुश्किल लगता है।हम जो भी कर्म करते हैं तब दौ चीजों से जुड़ कर करते हैं
राग और द्वेष,लाभ या हानि ,हार या जीत ,सफलता या असफलता।जब इन भावनाओं के
वशीभूत होकर हम काम करते हैं तो हम अपने अनुकूल या प्रतिकूल किसी एक बंधन में
बंध जाते हैं जो हमे सुख या दू:ख का अनुभव करवाता है।भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -
श्रेयान स्वधर्मो विगुण: परधर्मात स्वनुष्ठितात
स्वधर्म क्या है -अपना कर्तव्य खुद तय करके उस पर आचरण करना।कर्तव्य हर परिस्थिति,
समय,स्थान,व्यक्ति के अनुसार अलग -अलग होता है। किसी व्यक्ति के लिए कोई कर्म
आवश्यक होता है तो दुसरे के लिये वही काम अनावश्यक भी हो सकता है।एक डॉक्टर के
पास दौ रोगी एक साथ पहुंचे।डॉक्टर ने एक से कहा -तू दही का सेवन छोड़ दे और दुसरे से
कहा-तुझे दिन में दही जरुर सेवन करना है।दही एक ही है मगर एक को नुकसान  कर सकता
है और एक को फायदा।अर्जुन जब कर्तव्य को समझने में भ्रमित हो जाता है तो श्री कृष्ण
कहते हैं कि तेरे लिए युद्ध करना ही कर्तव्य है।युद्ध जैसा कर्म जिसमे नर संहार होना निश्चित
है जिसमे गुण नहीं है फिर भी वह समय ,परिस्थिति स्थान और व्यक्ति के कारण कर्तव्य
बन जाता है जबकि किसी वीतरागी व्यक्ति ने श्री कृष्ण से पूछा होता तो उत्तर यह हो सकता
था -अहिंसा परम धर्म है।
               स्वकर्म क्या हो?कैसा हो ?किस रीति से तय किया जाये?- स्वकर्म आत्मवलोकन
है खुद का मूल्यांकन करना।हम किसी पर कोई कार्य थोप दे उसे पूरा करने को स्वमूल्यांकन
नहीं कह सकते।हम किस विषय में निपुण हैं और किस में कमजोर यह सबसे अच्छे तरीके से
खुद ही जानते हैं इसलिए खुद के प्रति तठस्थ रहकर अपने गुण और विगुण को परखे ,अपनी
कमजोरियों को सही रूप से पहचाने और अपने गुणों को भी यथारूप में पहचाने।यदि यह काम
हम सफलता से कर सकते हैं तो हम आसानी से लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
          कोई छात्र गणित में निपुण हो और उसके अभिभावक कहे कि वह इतिहास के विषय
का चयन करके उसे ही पढ़े तो क्या वह छात्र अपनी सम्पूर्ण योग्यता का प्रदर्शन कर पायेगा ?
किसी व्यक्ति की रूचि कार बनाने में हो और उसे कहा जाये कि आपको खेती करनी है तो
क्या परिणाम आयेगा ?किसी पडोसी के जेवरात की दूकान अच्छी चलती हो और खुद के धंधे
में मंदी चल रही हो तो क्या तुरंत अपने धंधे का त्याग कर जेवर बेचने की दूकान शुरू कर देना
बुद्धिमत्ता है ?
  श्री कृष्ण कहते हैं कि दुसरे का कर्म कितना ही लुभाने वाला क्यों ना हो पर अपनी समझ से
परे हो तो तुच्छ है ना करने के योग्य है क्योंकि उस कर्म को हम लोभ के वशीभूत होकर कर
रहे हैं ,हम जिस विषय में पारंगत ना हो तो सिर्फ देखादेखी करने से फायदे की जगह नुकसान
ही करेंगे।हम क्या कर सकते है और कितना कर सकते हैं हमारे लिये इसी बात का महत्व है।
लोग क्या कर रहे हैं इस बात का महत्व अपने खुद के लिए नहीं होता है।जैसे पतिव्रता के लिये
उसका पति ही सेव्य है चाहे वह अवगुण भी रखता हो ,यदि दुसरे का पति गुणवान हो तो क्या
वह सेवनीय है? पर पति पतिव्रता के लिए कदापि सेवनीय नहीं होता है।
श्री कृष्ण कहते हैं कि स्वकर्म का आचरण करो चाहे उसमे कितनी ही बाधाएं क्यों ना हो।जो
कार्य खुद को रुचिकर लगे जिस काम को करने की हम योग्यता रखते हैं उस काम को ही
करने की योजना बनाओ और उस पर अमल करो।हर काम में विघ्न बाधाएँ होती ही है।वास्तव
में बाधाएं तो यह परीक्षा करने के लिए आती है कि हमने जो संकल्प किया है उसके प्रति कितने
निष्ठावान हैं।काम को करने पर हमारे आत्म विशवास की परीक्षा करने के लिए विधि बाधाओं
को भेजती है यदि हम उस काम को समस्याओं के कारण बीच में ही अधूरा छोड़ देंगे तो हारेंगे
भी और लोक में हँसी भी होगी।बाधों के आने पर भी यदि हम लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे तो
बाधाएँ स्वत ही दूर हो जायेगी यदि किसी कारण से दूर ना भी हुयी और हम लक्ष्य से दूर रह भी गए
तो भी मन में पछतावा नहीं होगा,कष्ट नहीं होगा।क्योंकि हमने जो काम किया उसको जी जान
से पूरा किया ,पुरे मन से किया।                                        

सोमवार, 24 जून 2013

सलाम है सेना को यारा .........

सलाम है सेना को यारा .........


एक ओर नेताओं की टोली, एक ओर सैनिक है यारा
किसको करना है सेल्यूट ,मन को कौन लगे प्यारा

एक ओर झंडे सब दल के, एक ओर तिरंगा न्यारा
किसको करना है प्रणाम, मन को कौन लगे प्यारा

इधर नेता का जयघोष,उधर सेना का जय हिन्द
किस पर रखना है विश्वास, कौन है जनता को प्यारा

इधर नेता की आँख में आँसू, उधर शहीद दारा की धारा  
किसे देख छलकेगी आँखें ,तू ही तुझको तोल ले प्यारा

एक ओर हवाई दौरे हैं,एक ओर डटा है सैनिक यारा
किसे कहें पुरुषार्थ? बता दे कौन तेरी आँखों का तारा

इधर जहर उगलती बातें,उधर जान बचाने की जहमत
किस ओर चले दुआ मन की,तू ही तो बतला दे यारा

इधर बेजानो पर रण नीति,उधर जान बचाना ही नारा
महाकाल खड़ा उस ओर,जहाँ सेना ने है काल को मारा     

गुरुवार, 20 जून 2013

निर्णय क्षमता

निर्णय क्षमता 

शास्त्र कहते हैं कि संशय में फंसे रहने वाले मनुष्य विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।हमें हाँ और
ना के बीच में फंसे नहीं रहना चाहिए।हम प्रतिदिन कुछ ना कुछ निर्णय अवश्य करते हैं ,क्या
हमारे द्वारा किये गए सभी फैसले सही होते हैं ?....अगर सही होते तो इस विषय पर लिखने
की आवश्यकता भी नहीं थी।

               निर्णय कैसे ले -- निर्णय लेना जीवन को गतिशील रखने के लिए आवश्यक है ,सभी
व्यक्ति निर्णय लेते हैं उसमे से ज्यादातर व्यक्ति अटूट निर्णय के स्तर को नहीं छू पाते ?ऐसा
इसलिए होता है कि उनके द्वारा लिया गया निर्णय तठस्थ होकर नहीं लिया जाता है।हम
निर्णय लेने से पहले सब कुछ अपने अनुकूल सोच कर फैसले पर पहुँच जाते हैं तब इसके
विपरीत परिणाम भोगने पड़ते हैं।

                  निर्णय लेने से पहले सवाल या समस्या के मूलरूप को जानने की कोशिश करे।
जब तक हम स्थिति को मूल रूप से सांगोपांग रूप से समझ नहीं लेते तब तक हमे अपना
समय चिंतन और मनन करने में बिताना चाहिए।जब भी कोई विषय हमारे समक्ष आता
है तब उसे समझे तथा समस्या को खुद से दूर रखकर देखे यदि हम अपनी समस्या में लिप्त
नहीं हिकार तटस्थ भाव से देखेंगे तो हम बात के मर्म को सही मायने में समझ पायेंगे।

                 निर्णय और उतावलापन ,यदि एक साथ किसी भी व्यक्ति में होता है तो वह सही
निर्णय ले ही नहीं पाता क्योंकि उतावलापन उस विषय पर पूरा चिंतन किये बिना ही फैसले
पर पहुंचा देता है। उतावला और जल्दबाज ना तो खुद सही निर्णय कर पाता है और ना ही
किसी को उचित सलाह देने की स्थिति में होता है।जब भी निर्णय करना हो तो उस विषय
के हानि लाभ और दीर्घकाल में पड़ सकने वाले प्रभाव पर शांत चित्त से सोचे।

                 क्रोध की अवस्था में कोई भी निर्णय ना करे क्योंकि क्रोध अविवेक से उत्पन्न
होता है और विवेकशुन्यता की अवस्था में सही निर्णय हो नहीं सकता है।यदि हम गुस्से में
है और निर्णय करना जरुरी भी है तब उस निर्णय को कुछ समय के लिए टालने की नीति
अपनाये,बहुत बार विषम परिस्थितियों में निर्णय ना करना भी एक निर्णय ही होता है।

               चिंता की अवस्था में दिमाग की क्षमता कम हो जाती है यदि हम चिंता में है और
उस समय निर्णय कर लेते हैं तो गलत परिणाम मिल जाते हैं।

             अकेले विचार करके निर्णय पर नहीं पहुंचे क्योंकि हम समस्या का आंकलन पूरी
तरह से करने में चुक गए तो काम बिगड़ भी जाता है और जग हँसाई भी होती है,परन्तु
इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने मन्त्र (योजना )को चोपट कर दे।हमे अपने विश्वनीय
मित्र के साथ बैठ कर मनन करना चाहिए।विश्वनीय का अर्थ जिस पर आप विश्वास करते
हैं ,जो आपकी योजना को खुद तक सिमित रख सकता हो ,जो उस विषय में योग्य हो ,जो
उस योजना की लाभ हानि से जुड़ा  हुआ ना हो।

            निर्णय से अटूट निर्णय की ओर - जब हम उपरोक्त बातों को ध्यान में रख कर
निर्णय लेते हैं तब भी फैसले को अधुरा ही माने क्योंकि अभी तक के मंथन से हमे जो कुछ
हासिल हुआ है वह निर्णय लेने के लिए काफी नहीं है।हमें उस निर्णय पर पुनर्विचार करना
चाहिए।उस निर्णय के हर अंश पर गौर करे ,निर्णय का सूक्ष्मतम अवलोकन करे।उसके हानि
लाभ और प्रभाव को फिर से जांच ले ,मन में यदि लेश मात्र शंका बची हो तो उसका निवारण
करे। निर्णय ही हमे अपने लक्ष्य तक पहुंचाता है इसलिए अटूट निर्णय करना आवश्यक
होता है। अटूट निर्णय का मतलब विकल्प रहित होना है मगर उपाय रहित होना नहीं है।
जब भी हम निर्णय करते हैं उसका अर्थ लक्ष्य को पाना ही होता है मगर हमारे द्वारा लिए
गए निर्णय के कारण लक्ष्य दूर नजर आता हो तो पहले से सोचे गए उपाय का भी उपयोग
कर ले क्योंकि हम सफल होने के लिए ही निर्णय करते हैं।

        पुरे मनोयोग से अमल करे - यदि हम इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं तो हमारा अगला
और महत्वपूर्ण कार्य है निर्णय पर पुरे मन से काम करना।हम यदि पुरे मन से ,अटूट उत्साह
से, निर्णय पर सच्ची श्रद्धा रख कर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ जाते हैं तो मंजिल भी पास आ
जाती है                         

मंगलवार, 18 जून 2013

क्या माहेश्वरी समाज अपने अन्दर झाँकने की कोशिश करेगा ?

क्या माहेश्वरी समाज अपने अन्दर झाँकने की कोशिश करेगा ?

महेश नवमी के पावन अवसर पर क्या माहेश्वरी समाज खुद के अंदर झाँकने की  कोशिश करेगा-

1. सामाजिक पदों पर सत्ता की भूख - सामाजिक संगठनों पर पद प्राप्ति की लालसा समाज को
          गतिशील रख पाएगी या विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी खुद के अहं को ही पोषते रहेंगे ?

2. समाज पर धनी लोग ही हावी -भारत भर के विभिन्न राज्यों में रहने वाले माहेश्वरी समुदाय
         पर क्या धनी लोग ही हावी रहेंगे या सबको साथ में लेकर बन्धुत्व भाव से भी चल पायेंगे ?

3. वोट का अधिकार -भारत भर में बहुत जगह पर समाज का सामान्य सदस्य बनने के लिए भी
    बहुत ऊँचा शुल्क रखा जाता है इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि बहु संख्यक गरीब या मध्यम
    वर्ग का बन्धु योग्य मगर आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण समाज की सेवा करने या
    समाज हित में अपने विचार रखने से वंचित रह जाता है,क्या यह व्यवस्था उचित है ?

4. व्यक्ति एक और मताधिकार एक से ज्यादा - समाज में बहुत सी सामजिक संस्थाओं में यह
     दूषण घुस गया है कि जो सामाजिक संस्था को ज्यादा आर्थिक सहयोग करेगा वह व्यक्ति
    एक से ज्यादा मत देने का अधिकारी बन जाता है क्या यह भारतीय संविधान के अनुकूल है ?

5.कहीं पर नियम कहीं पर मनमानापन -भारत के हर राज्य में बस रहे माहेश्वरी कहीं पर कुछ
    मर्यादा तय कर देते हैं और उस का पालन भी उस स्थान पर रह कर करते हैं मगर उसी स्थान
   का व्यक्ति दूसरी जगह जाकर उस सामजिक नियम को तार-तार कर देता है ,क्या समस्त
    भारत में समान सामाजिक नियम कभी बनाये जायेंगे ....?

6. दिखावा और प्रदर्शन-माहेश्वरी समाज का धनी तबका बेसुमार दिखावा और प्रदर्शन सामाजिक
    कार्यक्रमों में कर रहा है उसका दुष्प्रभाव निचे के वर्ग पर हो रहा है ,यह वर्ग झूठी रीति को
    निभाने के चक्कर में पीस रहा है ,क्या सामजिक कायदे और व्यवस्था सब जगह एक सी हो
   इस पर कोई कार्य हुआ है ?

7. पुत्र और पुत्री में समभाव -अपने को उन्नतिशील समझने वाला समाज पुत्र और पुत्री के लालन
    पालन से लेकर सम्पति के अधिकार तक अलग-अलग मत क्यों रखता है।पुत्री को पराया धन
    मानकर ही उसका पोषण क्यों ?उसे पुत्र के समकक्ष अधिकार क्यों नहीं (स्वेच्छा से) मिलते हैं ?

8. कन्या भ्रूण हत्या - यह भयंकर बिमारी इस समाज में भी घुस चुकी है और इस कारण से
    सामजिक संतुलन बिगड़ रहा है ,क्या माहेश्वरी समाज कन्या भ्रूण हत्या करने वाले पापी
    को समाज से बहिष्कृत कर नए समाज की रचना करेगा ?

9. तलाक की समस्या -नए भारत की यह समस्या इस समाज को भी रुग्ण कर रही है,क्या इस
    विकत परिस्थिति से निपटने के लिए हमारे पास कोई विचारधारा है ?

10.बहु और बेटी में भेद - हम अपनी बेटी को छुट दे देते हैं कि वह अपनी इच्छा मुताबिक़ काम
    कर सकती है मगर बहु को वो सब अधिकार सहजता से नहीं दे पाते ,दोनों के लिए अलग-
    अलग नजरिया क्यों ?

11. राष्ट्रिय स्तर पर पहचान का अभाव-हमारा समाज अन्य समाज की तरह खुद की पहचान
     राष्ट्रिय स्तर पर क्यों नहीं बना पा रहा है                    













सोमवार, 17 जून 2013

कब तक धर्म के नाम पर राजनीति का बोझ उठाएंगें भारतीय ....?

कब तक धर्म के नाम पर राजनीति का बोझ उठाएंगें भारतीय ....?

यह देश सभी धर्मावलम्बियों को साथ लेकर चलता आया है और यही कारण है कि हम अपनी
संस्कृति पर गर्व करते आये हैं।जिस तरह अनेकों नदियाँ अलग-अलग भू भाग से बह कर सागर
में आकर एक  हो जाती है उसी तरह संसार के अनेक धर्म भारत की भूमि पर आकर विश्व बंधुत्व
के सागर में एक होते आये हैं और होते रहेंगे ,क्योंकि हिंदुत्व प्राणी मात्र में समभाव समदृष्टि के
सिद्धांत पर ही बना है।
इस देश का दोहन अंग्रेजों ने किया और अपने स्वार्थ के लिए दौ धर्मो के बीच खाई भी बनाई ,
उन्होंने जो भी किया उसे उनके देश के हित के अनुकूल किया होगा लेकिन 1947 के बाद अब तक
हमारे ही नेताओं ने क्या किया ?

इस देश की सभी राजनैतिक पार्टियाँ भी भारतीयों के साथ वही खेल चला रही है जो आजादी के
पहले अंग्रेजों का था।सभी पार्टियाँ अल्पसंख्यक समाज को वोट बेंक मानती है और उन्हें
काल्पनिक भय बहुसंख्यकों का दिखाती है।यह एक कटु सच्चाई है कि इस देश में सभी अल्प
संख्यक धर्मावलम्बी किसी पार्टी विशेष की नीतियों के कारण सुरक्षित नहीं है ...नहीं है। वे इस
देश के बहुसंख्यकों की विश्व बंधुत्व और सब में एक ही तत्व ( एक ही ईश्वर )है इस मूल सिद्धांत
से ही सुरक्षित हैं और वे यह भावना जब तक जिन्दा है तब तक सुरक्षित भी रहेंगे। 

स्वतंत्रता प्राप्ति से आज तक कौनसा चुनाव धर्म तथा जातिगत समीकरणों को अलग रख
कर भारतीयों के हितों को ध्यान में रख कर लड़ा गया।एक भी नहीं .......तो क्या इसका यह अर्थ
नहीं निकलता है कि केवल राजनीतिक दल ही साम्प्रदायिक है जो सत्ता के स्वार्थ में सभी
भारतीयों में धर्म का जहर फैलाते हैं और सत्ता सुख भोगते हैं।

सवाल यह है कि हम भारतीय इन राजनेतिक पार्टियों के नेताओं के बहकावे में आकर कब तक
इनका बोझ उठाये रहेंगे ?हम इनसे कब कहेंगे कि आप धर्म और जाती के मामलो से हटकर
इस देश के हित में क्या काम करेंगे इस पर अपने विचार खुल्ले कीजिये ,धर्म और जाती हम
भारतीयों का आस्था का मामला है जो एक दुसरे का पूरक ही है इसमें आप दखल मत कीजिये

आज करोड़ों भारतीय गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे हैं ....क्यों ?किसके पाप के कारण
कोई भी दल इसकी जिम्मेदारी लेगा ....?किसकी नीतियों के कारण करोड़ों भारतीय बदहाली
का जीवन जीने को मजबूर हैं ...क्या यह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सामूहिक जबाबदेही
नहीं निभा पाने के कारण हुआ

क्या अगला चुनाव भी राजनेतिक दल धर्म और जाती को मध्य में रख कर लड़ेंगे या विकास
और देश हित के मुद्दे पर।यह तय करोड़ों भारतीयों को करना है कि हम कब तक तकवादी
लोगो का बोझ ढ़ोते रहेंगे ............          

शुक्रवार, 14 जून 2013

शेर

शेर


ऐ, दिल! तेरी फितरत, क्यों समझ नहीं आती
उनके दीदार पर बैचेन, नजर ना आने पर बैचेन


जिन्दगी और मौत में फासला इतना ही
महबूब का मिलना या मिल के बिछुड़ जाना


आज उनके होटों पर मुस्कान बड़ी क्यों है
क्या किसी आशिक का दिल फिर से टुटा है


ज्यादा ना भीगिए पहली बारिस में
जमाने में आग लगते देर नहीं लगती



बुधवार, 12 जून 2013

रूठना और मनाना या खुद ब खुद मन जाना

रूठना और मनाना या खुद ब खुद मन जाना 

एक बच्चा गुब्बारे वाले को देखकर माँ से बोला -माँ मुझे गुब्बारा चाहिए।

माँ ने कहा - तूने इस सप्ताह खूब गुब्बारे फोड़ लिये ,आज गुब्बारा नहीं मिलेगा।

    बच्चे ने मन ही मन सोचा कि गुब्बारा तो आज ले कर ही रहना है ,बच्चे ने जिद की मगर माँ
ने एक भी नहीं सुनी।बच्चा बात बनती नहीं देख कर रूठता हुआ बोला -माँ ,आपने गुब्बारा नहीं
दिलाया तो मैं शाम का दुध भी नहीं पीऊँगा।

माँ बोली- जीद मत कर ,ज्यादा जिद करेगा तो शाम को पापा से पीटेगा।

बच्चा अपनी बाजी पलटते देख रोने लग गया।उसको रोते देख माँ ने एक बार समझाया।बच्चे
को लगा शायद यह हथियार कारगर रहेगा ,यह सोच वह जोर-जोर से रोने लगा।बच्चे को बेबात
पर गल्ला फाड़ते देख माँ ने गुस्से में बच्चे का कान मरोड़ दिया।अब तो बच्चा जोर -जोर से
रोने लगा।

बच्चे का बड़ा भाई उसे रोते देख बोला -चुप हो जा ,आज माँ तेरी सुनने वाली नहीं है।

यह सुनकर बच्चा और जोर से रोने लगा।थोड़ी देर में बच्चे की बहन भी आ गयी।बहन को
देख बच्चा और जोर से रोने लगा।बहन ने रोने का कारण पूछा और समझाते हुए बोली -भैया,
तुम गुब्बारे के लिए मत रोओ ,गुब्बारे तो जल्दी फूट जाते हैं।

बच्चा जिद पूरी ना होते देख रोता रहा।थोड़ी देर बाद बच्चे के पापा भी घर आ गये।बच्चे को रोते
देख रोने का कारण पूछा।बच्चे ने गुब्बारा ना दिलाने की बात बतायी।

बच्चे के पापा ने कहा -तेरी माँ ने जो किया वह ठीक ही किया।हर दिन जिद करना और जिद
से बात मनवाना ठीक बात नहीं है।यह कह कर उसके पापा भी अपने काम में लग गए।बच्चे
ने सोचा -गुब्बारा तो मिलने वाला नहीं है ,और रोते-रोते गला भी दर्द करने लगा है ,भलाई
इसी में है कि चुप हो जाऊं मगर चुप होने के लिए भी कोई वाजिब बहाना चाहिए।बच्चा सोचता
रहा और रोता रहा।थोड़ी देर में बच्चे ने देखा कि दादा आ रहे हैं।दादा को देख कर बच्चा फिर
से रोने लगा।बच्चे को रोते देख दादा ने रोने का कारण पूछा-

बच्चा बोला-दादा,मम्मी ने गुब्बारा नहीं दिलाया।

दादा ने कहा-कोई बात नहीं ,मैं तेरे को जब मेला लगेगा तब दिला दूंगा।

बच्चे ने सोचा -यह आखिरी मौका है कि मुझे रोना छोड़ देना चाहिए।बच्चे ने दादा से पूछा -
दादा ,मेला लगेगा तो आप गुब्बारा दिला देंगे।

दादा के हाँ भरते ही बच्चा रोना छोड़ नाचने लगा।

सवाल यही है कि बड़े -बड़े मँच पर यह खेल होता रहता है और सयाने लोग भी रोना छोड़
कर नाचने लग जाते हैं।बेचारे .....................  








दादा ,मेला लगने पर                               

सोमवार, 10 जून 2013

फाइल ........!!

मीलों चले ........!!

नेताजी बोले - हम मीलों चले और चलेंगे ........!!
जनता -मगर हम पहुंचे कहाँ ?
नेताजी - रुको ,मैं सामने घाणी चला रहे तेली से पता करके आता हूँ ...
जनता -तेली को कैसे पता ...?
नेताजी -वो दिन भर बैल चलाता है ना भाई  ....हमारा भी बता देगा ...!!
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नेता का नजरिया  ................!!

नेताजी - आप लोग दिल और विचार उच्च रखें .....
जनता -मगर महंगाई ...?
नेताजी-अरे,सबको चीज के दाम ज्यादा चाहिए और कुछ नहीं ...
जनता -घोटाले ....?
नेताजी -किसी न किसी का भला करने को घोटाला मत कहो ..
जनता-बेरोजगारी .......?
नेताजी -कोई घर आराम कर रहा है तो दुखी क्यों हो भाई ...!!
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विकास ......!!

नेताजी -मुझे ही वोट करें ,क्योंकि असल में विकास हम ही करते हैं
जनता - वो तो सही है मगर हमारा कब होगा?
नेताजी -छोटे विचार मत रखो,मेरा विकास देश का विकास और देश
              का विकास ही तेरा विकास ....
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फाइल ........!!

नेताजी -देश विकास कर रहा है ,सड़के बनी .....
जनता -कहाँ .....?
नेताजी - फाइल में दिखा देंगे !...और कुए भी खुदवाये .....
जनता -....पर कहाँ ...
नेताजी-फाइल में देखना ...और गारंटी से मजदूरी भी दी ...
जनता -किसे ....
नेताजी -फाइल में ...और रेल भी चली ...
जनता - ....कहाँ से कहाँ को ....
नेताजी - तेरे गाँव से शहर तक ...
जनता -मगर गाँव में तो पटरी ही कहाँ है ?
नेताजी- पटरी है,सबुत चाहिए तो देख लेना फाइल में ..!!
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रविवार, 9 जून 2013

इंसानियत

इंसानियत 

एक व्यक्ति समाज में बढ़ रहे पाप और अनाचार से दुखी होकर भगवान् के मंदिर गया और 
भगवान से प्रार्थना करके बोला -प्रभु ,इस धरती पर पाप और अनाचार बहुत बढ़ गये हैं कृपा 
करके संसार से पाप और अनाचार को हटाने के लिए देवता भेज दो।

भगवान् ने कहा -पुत्र ,इस पृथ्वी पर मैं जन्म तो देवताओं को ही देता हूँ परन्तु स्वार्थ और 
मोह के वशीभूत मानव के संग में आकर वो देवपन भूल जाते हैं और पाप और अनाचार में 
लिप्त हो जाते हैं।

भगवान का उत्तर सुन वह व्यक्ति वहां से चला गया।रास्ते में थोडा ही चल पाया था कि उसे 
एक दूसरा मंदिर दिखाई दिया।वह व्यक्ति उस मंदिर में गया वहां दुर्गा की मूर्ति थी।वह 
व्यक्ति माँ दुर्गा से प्रार्थना करते हुए बोला -माँ ,इस पृथ्वी पर पाप और अनाचार बढ़ गए हैं 
आप करुणा करके इस पृथ्वी पर शक्ति की स्थापना करो ताकि पाप का नाश किया जा सके।

दुर्गा बोली -वत्स, तुम ठीक कह रहे हो परन्तु जब -जब भी मेने शक्ति को भेजने की कोशिश 
कि तब तुम मनुष्यों ने उसे या तो कोख में मार दिया या वासना की पुतली समझ कर कुचल 
दिया।

दुर्गा का उत्तर सुन वह व्यक्ति पुन:रास्ते की ओर बढ़ गया।कुछ दूर जाकर उसने देखा कि 
एक सन्यासी घायल सूअर के घावों पर मरहम लगा रहा है।कुछ देर तक वह संत के क्रिया-
कलाप को देखता रहा और फिर समीप जाकर बोला -पूज्यवर,आप यहाँ इस निकृष्ट प्राणी 
के घाव पर मरहम कर रहे हैं जबकि आप जानते हैं कि पृथ्वी पर घोर अनाचार फैल रहा है 
आपको गाँव -गाँव जाकर पाप और अनाचार के खिलाप जागरूकता फैलानी चाहिए।

सन्यासी ने सूअर के मरहम लगाते हुए पूछा -क्या तुम गधे हो?

वह व्यक्ति बोला -आप क्या कह रहे हैं ,क्या मैं आपको इंसान नहीं दिख रहा हूँ ?

सन्यासी बोला-......तो फिर इंसानियत सीख ,पाप और अनाचार खुद ब खुद ख़त्म हो जाएगा।