शुक्रवार, 28 जून 2013

कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता

कर्तव्य का अभिमान -श्रीमद भगवत गीता 

श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण कहते हैं की कर्म की आसक्ति से,सफलता या असफलता के
भाव से परे हटकर कार्य किया जाए तो समता भाव आता है।किसी कार्य को करने से पहले
यदि हम उसे कर्तव्य निर्वाह मान कर शुरू करे और जब तक वह कार्य सम्पूर्ण नहीं हो जाता
तब तक सफलता या असफलता के भाव से दूर रहकर करे तो उसे कार्य कुशलता कहा जाता
है ,क्योंकि हमारा मस्तिष्क इस तरीके से काम करने पर बंधन में नहीं रहता है ,कोई बोझ
यदि मन पर नहीं है तो वह कार्य पूर्ण होने पर यज्ञ बन जाता है।यदि किसी परिणाम से बंध
कर हम काम शुरू करते हैं तब हमारी कार्य क्षमता कम हो जाती है ,खुद पर श्रद्धा कम हो जाती
है।परिणाम से बंध कर कार्य करने पर हम शंका में फँस जाते हैं और नकारात्मक चिंतन करते
हैं,इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम लक्ष्य रहित या लापरवाही से काम को अंजाम दे।हमारे
कर्तव्य की योजना स्पष्ट,समयबद्ध और सुनियोजित होनी चाहिएलेकिन उसका परिणाम
उस योजना के पूरा हो जाने के बाद ही देखना चाहिए।

                          दौ अलग -अलग व्यक्ति एक ही प्रकार के काम को शुरू करते हैं उसमे एक
व्यक्ति सफल हो जाता है और दूसरा असफल,ऐसा क्यों होता है ? इसका कारण उस विषय के
प्रति पूर्ण जानकारी का भिन्न होना भी हो सकता है या उस काम को करने के ढंग में अंतर हो
सकता है।उस काम को करते समय एक व्यक्ति उसके परिणाम को अपनी इच्छा के अनुकूल
आने की चिंता के साथ करता है और दूसरा उस काम को कुशलता से पूरा करने के नजरिये से
करता है।काम को कुशलता पूर्वक करने के नजरिये से करने वाला सफल ही होता है और इसी
को भगवान् कर्म यज्ञ कहते हैं।

                           कर्म या तो शुभ होते हैं या अशुभ। शुभ कर्म ही कर्म यज्ञ कहलाते हैं।अब
प्रश्न यह उठता है कि शुभ कर्म से तात्पर्य क्या,किसे शुभ कर्म माने और किसे अशुभ।देश की
रक्षा के लिये किया गया शत्रु वध शुभ कर्म होता है जबकि स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी की
हत्या करना अशुभ कर्म हो जाता है।शुभ कर्म का आशय यह है कि ऐसे काम जिसके करने से
किसी निर्दोष का अहित नहीं हो और परिणाम भी सुन्दर हो।एक चोर ने एक महिला का हाथ
काट कर उसके हाथ में पहनी सोने की चूड़ी लूट ली और दुसरे दृश्य में एक सर्जन डॉक्टर ने
किसी मरीज की जान को बचाने के लिए उसकी दोनों टाँगे काट दी,अब हम किस कर्म को शुभ
और किसे अशुभ कहेंगे ?

                         सभी कर्म यदि शुभ भाव से ,सच्ची निष्ठां से किये जाते हैं तो वह यज्ञ है और
यज्ञ ही पूजा है।श्री कृष्ण कहते हैं-फल की इच्छा,आसक्ति,कामनाऔर कर्तव्य के अभिमान से
रहित होकर कर्म करने के लिए कर्म करे।प्राय: मनुष्य कर्म करने से पहले यह सोचता है कि
मेरा भला हो  या मेरा भला हो चाहे दुसरे का अहित हो जाए  या मेरा भला ना हो तो दुसरे का भी
भला ना हो या मेरा भला हो तथा दुसरे का भी हित हो या चाहे मेरा अहित हो जाए मगर दुसरे
का भला हो।सबसे अंतिम सोच लोक कल्याण की भावना है जिसके उदाहरण बहुत कम वर्तमान
में मिलते हैं क्योंकि ये लोक शिक्षा के कर्म है मगर भगवान् कहते हैं की तुम इस भाव से कर्म
नहीं करोगे तो भी मैं तुम्हारे कर्म को यज्ञ मान लूँगा यदि तुम निर्लिप्त भाव से उन्हें करो।

                   वर्तमान समय हो या गुजरा हुआ समय हो एक सूत्र श्री कृष्ण ने सफल व्यक्ति
बनने के लिए प्राणी मात्र को दिया है वह यह है कि कर्तव्याभिमान से सदैव बचे।यह एक सूत्र
है ,सूत्र सार्वभोमिक सत्य होते हैं हर काल में लागू होते हैं और उनका प्रभाव पड़ता है।

                     व्यक्ति छोटा सा भी शुभ काम करता है तो उसके मन में खुद पर अभिमान
आता हैऔर वह हर किसी के सामने उस शुभ कर्म को रखना चाहता है।व्यक्ति जिसके
सामने अपने शुभ कर्म को रखता है तो उसके मन में इच्छा जाग्रत होती है कि सामने वाला
उसकी प्रशंसा कर दे।इसी इच्छा से अभिमान की उत्पत्ति होती है और अभिमान ही पतन
का कारण बनता है।व्यक्ति शुभ आचरण करके प्रशंसा की इच्छा करे इसे कुछ समय के
लिए ठीक मान ले मगर उस व्यक्ति का क्या होगा जिसने खुद ने शुभ काम किया ही नहीं
था लेकिन वह यह चाहे कि लोक में उसकी प्रशंसा हो जाए भले ही वह काम किसी और ने
किया हो।प्राकृतिक आपदाओं के समय राजनेता जनता के द्वारा प्राप्त कर की राशि में
से आपदाग्रस्त को देने का दिखावा इस तरह से करते हैं कि जैसे उन्होंने खुद ने अपनी
कमाई से दी हो।

                            उच्च पदों पर आसीन नेता जब भी जनता के कर से प्राप्त राशि को लोक
हित में खर्च करने की योजना बनाते है तब सबसे पहले खुद की फोटो अखबार में विज्ञापन
के साथ जरुर देते हैं जैसे वो जनता का धन जरूरतमंद को देकर कोई उपकार कर रहे हों।

                     कर्तव्य के अभिमान का रोग उस भारत में बुरी तरह से फैल गया है जिससे
बचने के लिए ही श्री कृष्ण ने उपदेश किया था।आज अधिकाँश लोग यह चाहते हैं की उसकी
जगत में प्रशंसा हो चाहे उसने कर्म कैसा भी क्यों ना किया हो।आम व्यक्ति भी भगवान् के
मन्दिर पर जाता है और खुद के कल्याण की प्रार्थना करता है फिर खुद की संतुष्टि के लिए
कुछ चढ़ावा भेंट करता है और उसके बदले में बड़ी सारी लिस्ट भगवान को सौंप देता है तथा
मंदिर से बाहर आकर जगत में ढिंढोरा पीटता है कि उसने आज शुभ काम किया है ,दान दिया
है।
                कर्तव्य अभिमान और अधिकारों का दुरूपयोग यह बहुत बड़ी बिमारी है जिससे
भारत ही नहीं पूरा विश्व ग्रसित है।इस खोटी प्रशंसा से उबरने की जरूरत है और उबरने
का उपाय भी गीता में निहित है कि कर्म के फल में आसक्ति ना हो ,कर्म में कामना ना
हो ,कर्म कर्तव्य बुद्धि से पूर्ण हो उसमे अभिमान की लालसा ना हो          
                              



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