मंगलवार, 30 जुलाई 2013

मुहब्बत मिट नहीं सकती …………।

मुहब्बत मिट नहीं सकती …………। 

मुहब्बत अमर कहानी है, मुहब्बत मिट नहीं सकती।। 

मेरे दिल में - बसी हो तुम, तेरे दिल में - बसा हूँ मैं
तडफता मैं - अकेले में, तड़फती तुम - अकेले में 
ना मुझ को भूल पायी तू ,ना तुमको भूल पाया मैं  
जमाने के - हटकने से, मुहब्बत टल नही सकती ……

मेरा हर ख़्वाब तुम से है, तेरा हर ख़्वाब है मुझ से 
ना खुद को रोक पायी तुम, ना खुद को रोक पाया मैं  
तेरी हर साँस  मुझ से है: मेरी हर आस है तुम पर
जमाने के - बवन्डर से, मुहब्बत हिल नहीं सकती ……

मेरे रँग में - रँगी हो  तुम, तेरे रँग में - रँगा हूँ  मैं
मेरे बिन- तुम अधूरी हो, तेरे बिन- मैं अधुरा हूँ
मेरी तक़दीर तुम पर है, तेरी तजबीज है मुझ पर
ज़माने के बदलने से, मुहब्बत बदल नहीं सकती ……

सफर पर चल पड़ा था मैं, निभाया साथ तुमने भी  
कसम खायी थी  मेने भी, किया वादा है तुमने भी
मुझे विश्वास तुम पर है, तुझे विश्वास है मुझ पर
जमाने के- मिटाने से, मुहब्बत मिट नहीं सकती …… 

तुम्हारा साथ है पथ में, तो मंजिल दूर नहीं लगती
तुम्हारा प्यार है दिल में, तो साँसे थम नहीं सकती 
तेरी मंजिल - है  मुझ से, मेरा मुकाम-है  तुम पर
जमाने से - डर कर के, मुहब्बत रुक नहीं सकती …….


                                                                                           (इमेज गूगल से साभार )

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

जानता हूँ क्या उचित है पर करने की इच्छा नहीं है !

जानता हूँ क्या उचित है पर करने की इच्छा नहीं है !

भारत आज जिस समस्या से पीड़ित है उसमे गरीबी मुख्य समस्या बन गई है। नीति
और शास्त्र कहते हैं कि भूखा व्यक्ति पुन्य और पाप के पचड़े में नहीं पड़ता है वह तो
पेट भरने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है कैसा भी पाप हो वह उसे करने
के लिए तैयार रहता है और इस महामारी का ईलाज आज तक कोई भी राजनीतिज्ञ
खोजने में असक्षम रहा है ,इसके कुछ कारण है -पद का लोभ, इच्छाशक्ति का
अभाव, निजी स्वार्थ, देश प्रेम की भावना में गिरावट।

           कोई भी सरकार इस पीड़ा को ढकना चाहती है और ढकने मात्र से फोड़ा ठीक
नहीं होता है उलटे उसमे मवाद पड जाती है। वर्तमान सरकार तो इस पीड़ा को ढकने
के लिए विरोधाभासी योजनायें और आंकड़े रचने में व्यस्त है ,सरकार एक बार यह
स्वीकार कर ले कि इस देश में वर्तमान में गरीबी विकराल रूप ले चुकी है और यह
घटने की जगह बढ़ रही है तो इसको ठीक करने के उपाय भी मिल जायेंगे लेकिन
सरकार में इच्छाशक्ति और सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं रहा है इसलिए
वह आंकड़ो का जाल बिछाती है और प्रजा के रोष को बढाती है।

          क्या जिसका पेट भरा है वह अपराध करेगा ?किसी भी कोम का गरीब व्यक्ति
जब पेट भरने के,रोजी रोटी कमाने के सभी रास्ते खुद के लिए बंद देखता है तो वह
अनैतिक और गेरकानुनीकाम करने के रास्ते को सुगम समझ उस ओर मज़बूरी से
चलने को बाध्य हो जाता है।

    हम पढ़े लिखे और अपने को निपुण समझने वाले लोग गरीबी और उसकी मज़बूरी
को समझने में जब तक असफल रहेंगे तब तक विघटनकारी तत्वों को रोक पाने में
असफल रहेंगे। गरीब चाहे किसी भी धर्म का हो उसे योग्य राह नहीं मिलने पर भटक
जायेगा यह वास्तविकता है।

     गरीब लोग पेट भरने के लिए अपना मत भी बेचने में नही झिझकता और उसकी
कमजोरी का तुच्छ स्वार्थी नेता फायदा उठाते हैं। चुनावों के समय लालच देकर वोट
पा लेना उनको भी सुगम रास्ता लगता है।

        दूसरी बात बेरोजगारी की है। हमारी सरकार करोडो युवाओं को रोजगार देने में
फिस्सडी साबित हो रही है और गुणवत्ता युक्त शिक्षा देने में नाकारा साबित हो रही है
आज पढ़े लिखे लोग बेरोजगारी का दंश भोगते हैं और समाज के ताने सुनते हैं। उनके
हाथ में थमाई गई डिग्रियां उनका और उनके परिवार का पेट भरने में नाकामयाब हो
रही है और इसका परिणाम यह आता है कि युवा हताशा और निराशा से गैरकानूनी
काम करने को मजबूर हो जाता है।

        कानुन अपराध को रोकने के लिए दण्डका विधान करता है पर यह चिंतन कोई
नहीं करता है कि आपराधिक प्रवृति का उन्मूलन कैसे हो? क्या दण्ड से सुपरिणाम
पाए जा सकते हैं ? अगर यही सर्वश्रेष्ठ उपाय होता तो चरित्र और सदाचार का निर्माण
करना कहाँ जरूरी था ,सब चीजें दण्डसे व्यवस्थित हो जाती।

     स्वामी बुधानन्द ने अपनी पुस्तक में  समस्या का मूल कारण लिखा है -

      जानामि धर्मं न च मे प्रवृति:
      जानाम्यधर्मं न च मे निवृति:  (पाण्डवगीता )  
--मैं जानता हूँ की धर्म क्या है ,उचित क्या है ,अच्छा क्या है  परन्तु उसे करने में मेरी 
प्रवृति नही है और मैं यह भी जानता हूँ की क्या अनुचित है ,अधर्म है,बुरा है,पाप है ,
परन्तु उसे किये बिना रह नहीं पाता।

    आज देश के कर्णधार,शासक,पढ़े लिखे सभी यही तो कर रहे हैं। राजनीती वाला 
कानून सिखाता है ,अर्थशास्त्री नीतिदिखाता है, समाज सुधारक राजनीती के गुर 
पढाता है………………. फिर भी हम कल्याण की चाह रखते हैं यह बड़ा आश्चर्य है !                            

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मॊआ टिफिन सेंटर

मॊआ टिफिन सेंटर

रेस्टोरेंट ग्रेड - गरीब और शहरी धनवान के लिये

थाली रेट - २/- मिनिट

मेन्यू- रोटी 6  साइज़ २ *२ इन्च

           सब्जी -दो  (१ ) वाटर वेज  (२) वाटर मसाला

           चावल -तीन टी स्पून 

नोट - पीने का पानी अपने घर से लाये। २ मिनिट से ज्यादा समय लेने पर ५/- दण्ड।

समय - सुबह-शाम।   जनता की भारी भीड़ होने पर टोकन दिया जायेगा

नियम - जिसको सुबह नम्बर मिला है वह दुसरे दिन खाने की लाइन में लग सकेगा।

सुरक्षा व्यवस्था - जिनको वेतन में हजारो रूपये मिलते हैं वे लोग।

विज्ञापन प्रबन्धन - कुप्रबंधन संस्थान,भारत 



मंगलवार, 23 जुलाई 2013

सच बोलना है पर घेरे के अन्दर

सच बोलना है पर घेरे के अन्दर 

जब एक बच्चे को अध्यापक बनाया तो बच्चा अध्यापक का स्वांग रच कर क्लास में
आया और बोला-अब मैं मास्टर बन चूका हूँ इसलिए मैं जो कहूँ उसे ध्यान से सुनो -
आज तक मेरे से पीछे वालों ने एक काम नहीं किया ,क्या आपको मालुम है ?

बच्चे बोले -नहीं मालुम।

मास्टर बोला-आज तक देश के सामने किसी ने सच नहीं बोला  ………………

बच्चों ने जम कर तालियाँ बजाई तो मास्टरजी बोले -..............लेकिन अब सच बोलना
है।

बच्चे मायूस हो गए। उनमे से एक बोला- सर ,किसी ने हेराफेरी पर बात की तो सही
नाम उगल दूँ ?

दूसरा बच्चा बोला-कोई पिछली चोरी पर बात करे तो क्या सही सही बयान कर दूँ ?

तीसरा बोला- कोई घोटाले की रकम किसके पास है पूछे तो बता दूँ ?

चौथा बोला- आज तक के फर्जीवाड़े का ढोल पीट दूँ ?

पाँचवा बोला - क्या रिश्ते नाते के झूठ भी उघाड़ कर रख दूँ ?

मास्टरजी बोले -……चुप ! सच बोलना है पर घेरे के अन्दर रहकर।

बच्चे बोले -मतलब ?

मास्टरजी ने समझाया - तुम्हारे से कोई अपराध हो गया तो घेरे में आकर सच
बता देना ताकि उसका तोड़ ढूंढ़ लिया जाए अगर घेरे में झूठ बोला तो झूठा
कहलाओगे। समझ गए

बच्चे बोले -हाँ जी।

मास्टर जी ने आज की क्लास शांतिपूर्वक खत्म कर दी।     
 

सोमवार, 22 जुलाई 2013

सफलता और इच्छाशक्ति

सफलता और इच्छाशक्ति 

इस विश्व में अरबों लोग निवास करते हैं उनमें कुछ सफल कुछ संघर्षरत और बड़ी संख्या
में असफल लोग जीवन जीते हैं,प्रश्न यह उठता है कि बड़ी संख्या में लोग असफल जीवन
क्यों जीते हैं ?क्या उनका जन्म असफल बनकर व्यतीत करने हेतु हुआ है या फिर वे लोग
सफल होना नहीं चाहते ? कौन ऐसा व्यक्ति है जो सफल जीवन जीना नहीं चाहता,कोई भी
नहीं।तो फिर असफल होने का कारण क्या ?हमारे अन्दर द्रढ़ इच्छा का अभाव।

               सफलता की इच्छा और सफलता के लिए दृढ इच्छाशक्ति में गहरा अंतर है।
एक मशीन को चलाने के लिए मोटर उचित हॉर्स पावर की होनी आवश्यक है यदि मशीन
की आवश्यकता से कम HP की मोटर है तो मशीन काम नहीं कर पाएगी।ठीक इसी तरह
हर काम को सफलता से पूरा करने के लिए उचित इच्छा शक्ति का होना बहुत जरुरी है।

           सामान्य इच्छा और दृढ इच्छाशक्ति  

यदि कोई परीक्षार्थी इस आशय से परीक्षा की तैयारी करता है कि मुझे तो उत्तीर्ण होना है
तो उसके साथ अनुत्तीर्ण होने की सम्भावना भी जुड़ जाती है क्योंकि उत्तीर्ण होने के लियॆ
मानक अंक 36 % ही है और इस कारण उसकी तैयारी भी बहुत सीमित है।कम तैयारी
अपूर्णता का परिचायक है इसलिए असफलता की सम्भावना भी प्रबल हो जाती है।दृढ
इच्छा शक्ति वाला परीक्षार्थी परीक्षा की तैयारी अधिक से अधिक अंक अर्जित करने के
दृष्टिकोण से करता है इसलिए उसमे असफल होने की गुंजाइश नहीं रहती है।

             हारा हुआ मन ,अधुरा मन और आत्मविश्वास से लबालब मन ये तीन स्थितियाँ
हम सबके पास हर समय विद्यमान होती है,यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसी
काम की शरुआत किस मन के साथ करते हैं।हारा हुआ मन यह दिखाता है कि हम जिस काम
को करने जा रहे हैं उस काम के प्रति हम निषेधात्मक विचार रखते हैं और उस काम को करने
की तत्परता और तैयारी भी नहीं कर रखी है।किसी काम को करने से पहले ही हम सोच ले कि
इसमें सफलता नहीं मिलेगी तो उस काम के प्रति हमारी रूचि और श्रद्धा खत्म हो जाती है और
परिणाम भी हमने जो सोचा है वह तुरंत मिल जाता है
       
       अधुरे मन की स्थिति हमे संशय में डाले रहती है।काम को करने से पहले यदि हम
अनिश्चय में रहते हैं और सफलता के बारे में शंकित रहते हैं तो परिणाम भी कभी संतोष
जनक नहीं मिलते।इस स्थिति में मन नाना प्रकार के विकल्पों में उलझा रहता है इससे
एकाग्रता प्रभावित होती है ,परिणाम स्वरूप हम जीवन में संघर्षरत जीवन जीते हैं।

        आत्मविश्वास से भरा मन यह दर्शाता है कि हम हर काम को चुनौती के रूप में स्वीकार
करते हैं और उसे हर हाल में पूरा करना ही है इसी लक्ष्य को ध्यान में लेकर उस काम को
कैसे पूरा करना है ,के सूक्ष्म विश्लेष्ण में लग जाते हैं।किसी भी काम को करने से पहले
हम पूरी तैयारी कर लेते हैं तो हमारे मन में उत्साह और विश्वास का संचार लगातार होता
रहता है और हम बड़ी बाधाओं को भी पार कर जाते हैं

इच्छाशक्ति की उत्पत्ति कैसे होती है        

   स्वामी विवेकानंद कहते हैं "मनुष्य की यह इच्छा शक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और
वह चरित्र कर्मों से गठित होता है।अतएव,जैसा कर्म होता है इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति
भी वैसी ही होती है"

अगर हमारे कर्म दिव्य है तो हमारा चरित्र भी दिव्य होगा और चरित्र दिव्य है तो इच्छाशक्ति
भी दृढ होगी।अगर हमारी महत्वाकांक्षा बड़ी है तो उसे पूरा करने के लिए दृढ इच्छा शक्ति की
जरुरत पड़ेगी क्योंकि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए जो रास्ता है उसमे बहुत सी बाधाएं और
विपदाएं निश्चित रूप से होती हैं इन बाधाओं और विपदाओं से लम्बे समय तक मुकाबला
करना है इसलिए दृढ इच्छाशक्ति जरुरी है।हर असफलता हमे अपने लक्ष्य के करीब ले जाती
है।बार -बार आने वाली विपदा यह इंगित करती है की इस रस्ते पर आगे बढ़ते रहे यही वो
रास्ता है जो लक्ष्य तक ले जाएगा। विपदाओं के बाद भी हमारा होसला ,उत्साह और जीवट
बना रहे इसलिए दिव्य इच्छाशक्ति का होना जरुरी है।  
                

शनिवार, 20 जुलाई 2013

धर्मनिरपेक्षता से साक्षात्कार .............

धर्मनिरपेक्षता से साक्षात्कार .............

समय - आप कौन हैं ?
मैं धर्मनिरपेक्षता हूँ मगर मेरा जन्म कब हुआ मैं इस बारे में कुछ नहीं जानती।

समय - आपका परिवार ....?
मैं अपने माँ -बाप को भी नहीं पहचानती हूँ परिवार तो दूर की बात है।

समय -आप विश्वव्यापी हैं या सिर्फ भारत में ही बसती हैं ?
विश्व अपने अपने सम्प्रदाय में खुश है मैं ही एक अभागिन हूँ जो भारत में भटकती
फिरती हूँ।

समय -.........लेकिन भारत में तो आप सम्मान से जी रही हैं फिर भटकने से तात्पर्य ?
सम्मान तो दिखावा है ,छलावा है ,सपना है।मैं जिसकी चोखट पर जाती हूँ वो मेरा
शोषण करता है ,मुझसे हर समय कुछ पाने की लालसा रखता है।

समय - भारतीय राजनीति में आपका बड़ा रुतबा है,हर नेता आपके साथ खड़ा रहना
पसंद करता है  ?
यही तो सबसे बड़ी समस्या है,पेंसठ साल से मैं राजनेताओ के बगल में खड़ी हूँ मगर
मेरा सिर्फ इस्तेमाल हुआ है ,मुझे मासूम,निर्दोष और निश्चल देख उन्होंने लाल डोरे
डाले हैं कभी प्रेम नहीं किया।

समय - इतना सह कर भी आप उफ्फ तक नहीं करती उलटे जिन्होंने आपको छला
उनको ही गद्दी पर पहुँचा देती हैं ?
बार - बार विश्वास  किया और हर बार वादा पाया और उस वादे पर पुन: विश्वास
किया।हर बार सब कुछ लुटा कर विश्वास किया।

समय -जब आप हर बार धोखा खाती हैं तो उनके पास फिर क्यों चली जाती है ?
यही तो मज़बूरी है मेरी,ये साये की तरह पीछा करते हैं।मेने बहुत बार कोशिश की
इनसे छूटकर अपनी सहेली के घर पर रहने की,मगर ये अपने सुख की तृष्णा को
पूरा करने के लिए उसको और मुझको लड़ाते रहते हैं।

समय - आप मुझे अपनी सहेली का नाम बताये मैं खुद आपको सकुशल छोड़ दूंगा  ?
मेरे को झाँसा दे रहे हो या सही कह रहे हो ...............

समय - नाम बता दे फिर भरोसा करे।
उसका नाम है साम्प्रदायिकता .........!

समय भी कोई उत्तर नहीं दे रहा था शायद मौके की तलाश में था कि जैसे ही धर्म-
निरपेक्षता दूसरी ओर देखे तो निकल ले।                         

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

काश! ऐसा होता ......................

काश! ऐसा होता ......................

विभिन्न लोक लुभावन योजनाओं में सरकार जनता के धन को खर्च करती है।अरबो 
रुपया मनरेगा ,सस्ता अनाज,खाद्य सुरक्षा,मीड डे मील,निशुल्क दवाइयों पर खर्च 
होता है मगर उसका पूरा फायदा गरीब जनता को नहीं मिलता है,सब योजनाओं में 
खूब धांधली और गपले चलते हैं और गरीबों के नाम पर चलने वाली योजनाओं में 
बेफाम लूट चलती है।सरकार हर योजना को ठीक से संचालन भी नहीं कर पाती है।
क्यों नहीं सरकार इन लोक लुभावन योजनाओं को खत्म करके गरीबो के हित के 
लिए चल रही सभी योजनाओं पर खर्च की जाने वाली राशी को डाकघर के मार्फत
गरीबों के घर तक मासिक रूप से रोकड़ के रूप में पहुँचाने की व्यवस्था कर दे ताकि
गरीबों के हाथों में पूरा रूपया भी पहुंचे और गपले घोटाले भी बंद हो जाए।        

सोमवार, 15 जुलाई 2013

काल्पनिक कुत्ता

काल्पनिक कुत्ता

एक चोपाल पर दो गाँव वाले बैठे थे।करने धरने को कुछ काम नहीं था ,आपस में
बतीया करके भी थक गए तो उनमे से एक बोला - देख फकीरा ,अपन दोनों बातें
करते -करते उब गए हैं इसलिए कुछ करते हैं।


 उसकी बात सुन फकीरा बोला-ऐसा करे दयाला  ,अपन आपस में झगड़ पड़े।आपस 
में लड़ेंगे तो और लोग भी इकट्टे हो जायेंगे।

उसकी बात सुन दयाला बोला -बात तो तेरी जँचती है ,मगर बिना बात कैसे लड़ेंगे।

फकीरा बोला -लड़ने का तरीका ....................

दयाला बोला -देख,मैं लड़ने का तरीका बताता हूँ ....इतना कहकर दयाला ने जमीन
पर अंगुली से एक चोरस आकृति बनाई और बोला-फकीरा ,ये मेरा खेत है और
एक और आकृति बनाकर बोला -यह पास वाला तेरा खेत है।

फकीरा बोला -मान लेता हूँ।

उसके बाद दयाला ने कहा -तेरे खेत में फसल मेरे से ठीक पनप रही है परन्तु मेरे
खेत में फसल कम पनप रही है।

फकीरा बोला -तेरे किस्मत ही खराब है तो मैं क्या करू।

इस पर ताव देते हुए दयाला बोला -खेत मेने बनाया ,फसल तेरी ज्यादा पनप
रही है यह बात मेने कही और तू मेरी ही किस्मत को ख़राब बता रहा है।

फकीरा बोला -हाँ,पास -पास में खेत और तेरे फसल कम तो इसको तेरी फूटी
किस्मत ही तो कहूंगा।

दयाला ने गुस्से में कहा -तूने मेरी किस्मत को फूटा कहा ना ,अब ले मैं अपने
खेत में बंधी दोनों भेंसे,चारों गायें तेरे खेत में छोड़ देता हूँ।मेरे जानवर तेरा खेत
उजाड़ देंगे और तेरी किस्मत भी फूट जायेगी।

अब तो फकीरा  भी गुस्से में आकर चिल्लाया  -मेरी फसल को बर्बाद करने वाले,क्या
मेने हाथों में चूड़ियाँ पहन रखी है तेरा एक भी जानवर मेरे खेत से सलामत बाहर
नहीं जायेगा।

दयाला उसे चिल्लाता देख ताव में आ गया और बोला -अगर मेरे एक भी जानवर के
हाथ लगाया तो तेरी हड्डियाँ तोड़ दूँगा।

उसे ताव में देख अब तो फकीरा भी लाल हो गया और पास में पड़े डंडे से एक मार दी।
बस अब तो दोनों गुथमगुथा हो गए।उनको झगड़ते देख लोग इकट्टा हो गए और उनको
अलग किया।एकत्रित भीड़ से एक बुजुर्ग बोला -दोनों तो दोस्त हो ,फिर लड़ क्यों पड़े?

बुजुर्ग की बात का उत्तर देते हुए फकीरा बोला -दादा ,ये मेरे खेत में अपने जानवर
छोड़ने की धमकी दे रहा था।

बुजुर्ग बोला -मगर तेरे पास खेत था कब और दयाला  के पास तो बकरी ही नहीं हैफिर
जानवर कहाँ से आ गए।

दयाला बोला -दादा ,हम तो बैठे बैठे थक गये तो काल्पनिक खेल खेलने बैठ गए थे।

                 यही हाल तो इस देश की राजनीति का हो गया है।एक ने उदाहरण दिया
और विपक्षी उस काल्पनिक कुत्ते का पोस्टमार्टम करने लगे,देश का मीडिया,अखबार
उस काल्पनिक कुत्ते पर घंटो बहस करने लगे और पन्ने भरने लगे।वाह ....क्या खेल है
देश चलाने वालों का!!!               
                      

रविवार, 14 जुलाई 2013

क्या कारण है .................?

क्या कारण है .................?

क्या कारण है कि वर्तमान में भारत की 67% आबादी बाजार मुल्य पर अनाज खरीद 
कर अपना पेट भी नहीं भर सकती है ?इस शोचनीय दशा के लिए आप किसे 
जबाबदार मानते है ? क्या है आपकी राय ................. 

शनिवार, 13 जुलाई 2013

खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले साम्प्रदायिक धर्म के देवों की पूजा क्यों करते हैं

खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले साम्प्रदायिक धर्म के देवों की पूजा क्यों करते हैं 

क्या धर्म साम्प्रदायिक होता है ?किस धर्म ग्रन्थ में लिखा कि दुसरे अन्य धर्म हल्के या हिन
हैं ?क्या वेद ऐसा कहते हैं या कुरान  या बाईबल ?संसार का कोई धर्म मानवता में द्वेष करने
का सन्देश नहीं देता है फिर साम्प्रदायिकता की उपज कहाँ से हुयी ?आपस के धर्मों में और
धर्मावलम्बियों में द्वेष की भावना क्यों फैलाई जा रही है ? आपस में धर्मों के नाम पर लड़ाई
करवाने में किसका हित है ?

   एक शब्द का हमारे देश में खूब जोर से इस्तेमाल किया जाता है -कट्टरपंथ या चरमपंथ ?
विश्व का ऐसा कौनसा धर्म ग्रन्थ है जिसमे लिखा है अमुक धर्म का पालन विश्व की जनता
करे ?सभी धर्म स्वधर्म का पालन करने और मावनता की सेवा का ही सन्देश देते हैं।

  हर धर्म या पंथ परहित चिंतन और उदार भावनाओं का पोषण करता है चाहे वह वेद हो या
कुरान या बाईबल।धर्म का अर्थ है मानवता की भलाई के विचारों का पोषण करना और उन्हें
आचरण में लाना।अभी पवित्र रमजान चल रहा है और हर मुस्लिम बंधू खुदा से इबादत
करके यही दुआ माँगता है कि मनुष्य मात्र का भला हो ,इस भाव में यदि किसी को चरमपंथ
या कट्टरपंथ लगता है तो इस देश को यह कट्टरपंथ स्वीकार होना चाहिए,यदि जैन धर्म के
इन पवित्र महीनों में सद्भाव के प्रवचन दिए जाते हैं और इसमें भी कट्टरपन किसी को दीखता
है तो यह कट्टरपन उचित है यदि श्रावण मास में हिन्दुओ के महादेव जो मानवता की रक्षा के
लिए गरल तक पी जाने का आचरण करने का सन्देश देते हैं तो यह कट्टरपन पुरे विश्व की
आवश्यकता है और विश्व को यह कट्टरपन की वास्तव में अब जरुरत है।

    गीता में श्री कृष्ण अपना मत रखते हैं कि स्वधर्म का पालन करों यदि हम मनुष्य हैं तो
मानव धर्म का पालन राग द्वेष छोड़ कर अविरत करते रहे।श्री कृष्ण ने यह नहीं कहा था की
सब मनुष्य अपने अपने धर्म को छोड़कर किसी एक धर्म का अवलम्बन करे ?क्या यीशु ने
धर्म की कोई अनर्थकारी परिभाषा दी है ,नहीं दी है ,उन्होंने सेवा का सन्देश दिया।यदि यह
बात किसी को चरमपंथ की पोषक लगती है तो कोई क्या करे।

     इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ के तुच्छ नेता ही विभिन्न धर्मो में द्वेष की भावना उत्पन्न
करते है और उसका  पोषण या तुष्टिकरण करते हैं।क्या कारण है कि वे लोग बाहर में  धर्म
निरपेक्षता की बातें करते हैं और दफ्तर,घर या सार्वजनिक जगहों पर जिस धर्म को ही वे
साम्प्रदायिक ठहराते हैं उसी धर्म के देवों की पूजा अर्चना या जियारत करते हैं ?केवल पद
की भूख के लिए एक दुसरे को लड़ाना और द्वेष फैलाना ही उनका काम रह गया है।क्या
किसी धर्म विशेष के लोगों को अनुचित प्रलोभन देकर निरपेक्ष कहलाया जा सकता है ?
नहीं ,अगर बाप एक पुत्र को विशेष सुविधा दे और दुसरे पुत्र को आवश्यक सुविधा से वंचित
रख दे तो यह कृत्य उस बाप की निरपेक्षता नहीं पक्षपात ही कहलायेगा।

          इस देश का मुस्लिम यदि यह कहे कि मैं राष्ट्रवादी मुस्लिम हूँ और मुझे इस पर
गर्व है तो यह बात पुरे देश के लिए गर्व करने की है और यदि एक हिन्दू या अन्य धर्म में
आस्था रखने वाला यह कहे कि मुझे राष्टवादी हिन्दू होने में राष्ट्रवादी इसाई होने में गर्व है
तो यह बात इस देश के सोभाग्य का चिन्ह है।

          धर्म की मनमानी व्याख्या करने वाले कुत्सित मानसिकता वाले राजनीतिज्ञ क्या
हम सबका भला कर पायेंगे या धर्म की मनमानी व्याख्या करनेवाले धर्म गुरु मानवता का
भला करने में समर्थ हैं?

         गलती इस देश की प्रजा की भी है ,शायद वह अनजाने में अनुचित तुष्टिकरण को
सही देख लेती है क्योंकि बार बार बोला जाने वाला झूठ भी सच लगने लगता है मगर सही
क्या और गलत क्या इसमें जब भी संदेह हो जाता है तो उसका सही उत्तर बाहर ढूंढने की
जरुरत नहीं है उनके अपने धर्म ग्रन्थ का अध्ययन उन्हें सही या गलत का रास्ता दिखाने
में पूर्ण रूप से सक्षम हैं।                 

बुधवार, 10 जुलाई 2013

आपकी क्या राय है .............

आपकी क्या राय है .............

क्या शासन चलाने वाली सरकार लोक लुभावन योजनाओं में जनता के कर के पैसे का
दुरूपयोग करने का अधिकार रखती है ?

 कृपया हाँ या ना में जबाब दे। 

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

सहयोग से सफलता :भगवत गीता का सन्देश

सहयोग से सफलता :भगवत गीता का सन्देश 

आज की दुनियाँ की सबसे बड़ी समस्या है मैं सफल हो जाऊं चाहे साधन कितना भी अनर्थकारी
क्यों ना हो और दुसरे लोग मुझसे पिछड़ते जाएँ।इस सोच ने मानसिक संताप के परिणाम ही
इस संसार को दिए हैं।बड़ी -बड़ी कम्पनियाँ इसी सोच के कारण कुछ समय चमक कर राख के
ढेर में तब्दील हो गई है।इसी सोच के कारण मनुष्य का मनुष्यत्व खत्म होता जा रहा है और
सामाजिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो रही है।यह सोच परिणाम में गहरी हताशा पैदा करती है।
इसी सोच के कारण मानव समूह में रहकर भी अकेला बन गया है लेकिन स्वार्थ के वश में होकर
सहयोग के डंडे का सहारा लेकर उबरने के बजाय गर्त में गिरना  करता है।

                     वेद कहते हैं कि मनुष्य एक दुसरे का सहयोग करते हुए उन्नति की ओर अग्रसर
हो।रामायण कहती है कि परहित चिंतन में स्वयं की भलाई भी निहित है और श्री कृष्ण कहते हैं
कि निष्काम कर्म के माध्यम से परहित में लग जाओ।परस्परं भावयन्त:श्रेय:परमवाप्स्यथ

                परहित और स्वहित क्या है :- स्वहित मेरेपन के भाव से अहंकार का पोषण पाकर
मनुष्य को असफलता की ओर धकेल देता है और परहित दुसरे के हित चिंतन से जुड़कर परस्पर
एक दुसरे का सहयोग करते हुए पूर्ण सफलता के शिखर पर पहुँचा जा सकता है।

परहित की भावना का विकास कैसे करे :- अपने स्वार्थ और अभिमान के त्याग से सहयोग की
भावना का विकास होता है।जैसे ही मनुष्य "मैं "को छोड़ "हम सब" की विचार धारा पर आता है
तब एक सकारात्मक श्रंखला से जुड़ जाता है और जिस उन्नती की उसने अकेले चलकर पाने की
कामना की थी उससे कई गुना बड़ी सफलता हासिल कर लेता है।हम दूसरों से इस तरह का
व्यवहार करना सीखे कि खुद का भी काम बन जाए और दूसरों का हित भी हो जाए।

परहित क्यों करे :- यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से आम व्यक्ति के मन में पैदा होता है कि हम
परहित या सहयोग क्यों करे? किसी वस्तु को ,पदार्थ को पाने के लिए अथक मेहनत किसी
ओर ने की तथा उसकी प्राप्ति के बाद उसमे से किसी को देना मुर्खता नहीं है।किसी ज्ञान को
बड़ी मेहनत से प्राप्त किया ,कई कई रात जगे ,निरंतर अध्ययन किया तब जाकर कोई विषय
पल्ले पड़ा और पल्ले पड़ने के बाद उसे सबको बाँट देना क्या उचित निर्णय है?इन शंकाओं का
उत्तर हाँ ही है।इसका कारण है कि मनुष्य सामाजिक और समूह में रहने वाला प्राणी है तथा
विवेक और बुद्धिशाली भी है।अगर किसी को करोड़ो की संपदा देकर निर्जन जगह पर अकेला
रहने को कहा जाए तो क्या कोई रह पाता है।किसी विषय को जानने के बाद में उसका परिक्षण
भी होना चाहिए और उस चीज का विश्लेषण भी ,क्या उस ज्ञान का प्रयोग खुद पर करके कोई
लाभान्वित हुआ है।हमने जो कुछ भी जाना क्या वह परिपूर्ण है उस बात को जांचने के लिए भी
हमे किसी का सहारा चाहिए।कोई इसे टीम भावना कहता है तो कोई इसे सहयोग और कोई
परहित।इन तीनो के अन्दर कर्ता का हित छिपा हुआ है क्योंकि हम जब सेवा करते हैं तो
केवल दो हाथ से ही कर सकते हैं जब हम किसी के लिए सोचते हैं तो एक ही मस्तिष्क से सोचते
हैं मगर जन हमे सहयोग की जरूरत पड़ती है तब सैंकड़ो मस्तिष्क और हाथ सहायता को तैयार
हो जाते हैं।सिद्धांत यह है कि यदि हमें सुख चाहिए तो दुसरो को सुख पहुँचाना ही हमारा कर्तव्य
है दुसरो का अनर्थ कर हम सुखी हो नहीं सकते।अगर इस कथन कि सत्यता जाँचनी हो तो किसी
पाप का दंड भोग रहे पापी से मिलकर जाँची परखी जा सकती है।

हम परहित के योग्य कैसे बने :- बहुत से लोग बहाना करते हैं कि हम परहित की सामर्थ्य ही
नहीं रखते क्योंकि न तो हमारे पास धन है और ना ही साधन।बात भोतिक रूप से ठीक भी
लग सकती है ,यदि हमारे पास धन नहीं है साधन नहीं है तो भी हम सहयोग कर सकते हैं।जब
कोई दुखी हो और हम भी सच्चे ह्रदय से उसके दुःख में सह भागी बन जाते हैं और कोई सुखी
हो तो उसके सुख में भी सच्चे ह्रदय से सहभागी बन जाते हैं तो हम उस व्यक्ति का बहुत बड़ा
सहयोग कर देते हैं।अगर हमारे पास कुछ है और उसके सूक्ष्म भाग का त्याग कर देने से किसी
का निर्वाह हो जाता है तो हम उस कर्तव्य को करने से पीछे नहीं हटे।यह काम कोई भी धर्म का
व्यक्ति अपने स्वधर्म का निर्वाह करते हुए कर सकता है।

गीता में कृष्ण कहते हैं -परस्परं भावयन्त: एक दुसरे का हित करे।                       
        

रविवार, 7 जुलाई 2013

संवेदना

संवेदना 

सेठजी अपने आलिशान ऑफिस में बैठे अपने व्यवस्थापकों से राय मशवरा कर रहे थे।
चर्चा का विषय था कि उनकी प्रतिस्पर्धी कम्पनियों को किस तरह तहस नहस कर उनके
बाजार पर कब्जा जमाया जाये।सभी सलाहकार अपनी -अपनी योजनाये बता रहे थे।

आखिर में सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया गया की सबसे पहले छोटी कम्पनियों को रास्ते
से हटाना है और जब तक वे तहस -नहस नहीं हो जाती तब तक माल की बिक्री लागत से
कम दाम पर करते जाना है और उनके हटने के बाद उनके व्यापार को हड़प कर लेना है।

सेठजी फुल प्रूफ योजना बना कर काफी संतुष्ट नजर आ रहे थे क्योंकि भविष्य में उनकी
कम्पनी छोटी कम्पनियों को रोंद कर आगे बढ़ने वाली है।

शाम को जब खुश मन से घर लौटे तो पत्नी को उदास पाया।उन्होंने पत्नी से तनाव का
कारण पूछा तो पत्नी ने बताया कि घर पर कपडे धोने वाली नौकरानी बीमार है और उसके
स्वस्थ होकर आने में काफी समय लगने वाला है।

सेठजी बोले -तो इसमें तनाव की क्या बात है,कपडे धोने का काम किसी और नई नौकरानी
को दे दो ,हमे तो पैसा देकर किसी से भी काम करवाना है।

सेठानी बोली -मेने भी यही सोचा था और दूसरी काम करने वाली नौकरानियों से बात भी
की थी मगर वो सब कहती है कि उसका काम हम कैसे ले ? वह विधवा है और उसके छोटे
बच्चे हैं अगर उसका काम हमने ले लिया तो वह अपना और बच्चों का पेट कैसे भरेगी?

सेठजी बोले -इन छोटे लोगों में बुद्धि कम होती है इसलिए ये गरीब ही रह जाते हैं तुम एक
दौ दिन में नयी कामवाली रख लो।उस दिन बात आई गयी हो गई और अगले दिन सेठजी
जब ऑफिस से शाम को घर लौटे तो पत्नी के चेहरे पर प्रसन्नता पायी।उसे प्रसन्न देख
कर उन्होंने पूछा -क्या नयी नौकरानी मिल गयी ?

उत्तर में सेठानी ने कहा -नयी तो नहीं मिली पर आस पास के घरों में काम करने वाली
नौकरानियों ने हल खोज लिया जिससे पुरानी नौकरानी का काम भी बना रहेगा और वह
नहीं आती है तब तक अपना काम भी हो जाएगा ?

सेठजी ने पूछा -वो कैसे होगा ?

सेठानी ने कहा -बाकी काम वालियों ने तय किया कि जब तक बीमार काम वाली स्वस्थ
होकर नहीं आ जाती तब तक उसका काम वे सब बारी बारी से करती रहेगी और उसके
काम की तनख्वाह भी उसे दे देगी ताकि उसके घर का चूल्हा जलता रहे।

सेठजी ये सुन कर भोंचक्के रह गए !                

भगवान और बाजार

भगवान और बाजार 

सृष्टि कर्ता के अलावा भी तीन भगवान इस संसार में है 1.माता -पिता ,गुरु और डॉक्टर .इस
युग में ये भी कम ज्यादा मात्रा में बाजारवाद के कुचक्र में फँस गए हैं या फँसते जा रहे हैं।

माता पिता का दायित्व होता है कि वे अपनी सन्तान को गुणवान बनाएँ लेकिन अफसोस है
कि वे भी केवल आर्थिक हित को साधने की कला को ही अपनी संतान के लिए सर्वोपरी मानते
हैं चाहे हित योग्य रीति से पूरा हो या अयोग्य अनैतिक बाजारुपन से।

अगर पिता व्यापारी है तो उसे अच्छे व्यापारी के गुण नहीं सिखाता है उसे ईमानदार ,कर्तव्य-
निष्ठ या संवेदनशील नहीं बनाता है बल्कि ग्राहक को कैसे मिट्ठी बातों में फांस कर उसका
धन हड़पना है या कैसे उसे माप तोल में कम देना है यह परोक्ष -अपरोक्ष रूप से सीखा देता है

अगर पिता नौकरी पेशा वाला है तो पुत्र को लगन और मेहनत की जगह कैसे भ्रष्ट तरीके से
अनैतिक कमाई की जाती है और कैसे कम काम करके भी पूरा पैसा वसूला जाए यह जरुर
सिखा देता है।

कला और पेशे से जुड़े माँ -बाप चार पाँच साल के बच्चे को भी फूहड़ और अश्लील गानों पर
नचाना शुरू कर देते है यानी कि अर्थ के इर्द गीर्द जीवन को घुमाया जा रहा है।

गुरु ,यह शब्द ही कभी अँधेरे में उजाला भर देने की सामर्थ्य रखता था।गुरु का केवल कभी
एक ही ध्येय रहता था कि वह अपनी पाठशाला में राम ,कृष्ण ,अर्जुन ,चन्द्रगुप्त जैसे योग्य
नागरिक का निर्माण करे मगर आज गुरु की जगह पेशेवर शिक्षक ने ले ली है जिसका खुद
का उद्देश्य केवल बच्चों से पेसा अर्जित करना रह गया है।बड़े-बड़े स्कुल कॉलेज ,ट्यूशन
क्लास बनते जा रहे हैंऔर उनसे पैसा बनाने की जुगत बिठायी जा रही है।जो बच्चे पढ़ रहे
हैं उनसे धन वसूलना ही उद्देश्य रह गया है चाहे उसका भविष्य संवरे या बिखरे उससे दूर
तलक कोई लेना देना नहीं है

डॉक्टर और वैद्य -डॉक्टर को जीवन दाता समझा जाता है।रुग्ण ,असक्त ,हताश और निराश
जीवन में आशा भर देता हैडॉक्टर मगर इस युग में जैसे सब कुछ बहता जा रहा है धन के
सामने।बड़े बड़े डॉक्टर,आधुनिक सुसज्जित भवन और उपकरण मगर संवेदन हिन लोगों
का जमावड़ा ही नजर आता है सब जगह।रोगी को ठीक तरह से जांचने से पहले ही अपनी
फीस ले लेना और आधुनिक उपकरणों के जरिये रोगी को भय दिखा कर उसका धन हडफना
बिना जरूरत की दवाईयाँ देना और अनावश्यक जांचे करवाना और शल्य क्रिया करना ये
हिन काम करते डॉक्टर खूब देखें जा रहे हैं।

हर जगह बाजारी करण ,क्या हो गया है मानव को ,अर्थ के इर्द गीर्द दौड़ती असभ्यता को
विकास कहे या पतन .....समझ नहीं आता!!

उपरोक्त तीनों भगवान् यदि वर्तमान में ऊपर लिखी सच्चाईयों के घेरे से बाहर अभी भी
बचे हुए हैं वो वास्तव में देव पुरुष हैं जिन्हें मेरा सादर प्रणाम ..........              

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

वाह !अब खाद्य सुरक्षा - Jagran Junction Forum

वाह !अब खाद्य सुरक्षा 

पहले गरीबी हटाओ ,खूब फेशन चली थी उस जमाने में ,जबरदस्त हथकंडा था कुर्सी पर
विराजने का ,काम भी आया ,क्योंकि खुबसूरत सपना था मगर हश्र यह हुआ कि काठ की
हांडी बन गया।

फिर लाये आर्थिक उदारीकरण ,खूब चला ,पढ़े लिखे भी मुर्ख बन गए हश्र यह हुआ कि बाप
की सम्पति को बेच बेच कर बेटा धनवान दिखने का अभिनय करने लगा और नतीजा यह
कि सब कुछ ठप्प .....

चासनी पीने की आदत वाली जनता को बाद में इन्वेस्टमेंट के नाम पर शेयर का धंधा
बताया ,रातों रात करोडपति बनिए और काम भी मत कीजिये ,वाह! क्या खुबसुरत झूठ
था और खूब चला ,चाय की केंटिन वाला भी शेयर की बात करता था सा'ब और जब फुग्गा
फुटा तो दिन में तारे दिख गए जनाब को ...

मुर्ख बनाने के हजार तरीके होते हैं सा 'ब ,अब नया तुक्का ले आये -रोजगार गारंटी,भाई
को करना कुछ नहीं गड्ढे खोदो और आराम से रूपये ले जाओ ,मरे हुए ,पैदा भी नहीं हुए
और जिन्दे सबने मजा लिया नतीजा जो रोटी रूपये में मिल जाती थी वह पाँच की हो गई
और अरबों रूपये गड्ढों में गिर गए .......

इस बार धार पर थी नारी ...बेचारी भावुक ,बोले कि आप बराबरी करे ,आधी दुनियाँ आपकी
मुठ्ठी में ,शासन में आधा भाग आपका ,बस बात इस तरह उड़ी कि कुर्सी चल कर पास आ गई
और साहब विराजमान हो गए और परिणाम यह की शासन तो दूर की बात ,घर से निकलते
ही डरने लगी .........

फिर मथने लगे तस्वीर बनाने ,सब के सब लग पड़े और ऐसी तस्वीर बनाने लगे कि बेचारा
किशोर समय से पहले जवाँ दिखने लगा ,अब क्या था सब उसके कंधे पर ,माथे पर जहाँ
जगह मिली उस पर सवार होने लगे ,बेचारा किशोर ...बेहाल हो गया और समय से पहले
बोझ से दब गया ........

जो वोट बैंक थी उसे गुमराह करने लगे ,मगर वह भी अब शिक्षित हो गयी ,भला बुरा विचार
सकने की समझ पैदा कर ली और नतीजा यह कि साहब की कुर्सी के पाए चरमरा गए और
कुर्सी लुढकने लगी ............

अब आई नयी नवेली खाद्य सुरक्षा ,बत्तीस और छब्बीस की गणित का सवाल हल करने की
बारी ,छब्बीस और बत्तीस को असल में धनवान बनाने का वादा ,क्या हश्र होगा ,भविष्य के
हाथों तय होगा मगर इस खाद्य सुरक्षा ने एक सच्चाई देश के सामने उगल दी कि इस देश के
67% लोग अजीबोगरीब धनवान हैं जो बाजार भाव से अन्न खरीद सकने की स्थिति में नहीं
है .......
 और अंतिम बात समर्थन मुल्य पर ख़रीदे गए अन्न को पानी में भिगोने की ,साहब के पास
उस अन्न को बचाने की काबिलियत भी नहीं ,बड़े बुजुर्ग ने कहा -67% तथाकथित धनवानों
में बाँट दो,मगर कौन सुने ,क्यों सुने ,आखिर सवाल कुर्सी की बनावट का है ........