गुरुवार, 4 जुलाई 2013

वाह !अब खाद्य सुरक्षा - Jagran Junction Forum

वाह !अब खाद्य सुरक्षा 

पहले गरीबी हटाओ ,खूब फेशन चली थी उस जमाने में ,जबरदस्त हथकंडा था कुर्सी पर
विराजने का ,काम भी आया ,क्योंकि खुबसूरत सपना था मगर हश्र यह हुआ कि काठ की
हांडी बन गया।

फिर लाये आर्थिक उदारीकरण ,खूब चला ,पढ़े लिखे भी मुर्ख बन गए हश्र यह हुआ कि बाप
की सम्पति को बेच बेच कर बेटा धनवान दिखने का अभिनय करने लगा और नतीजा यह
कि सब कुछ ठप्प .....

चासनी पीने की आदत वाली जनता को बाद में इन्वेस्टमेंट के नाम पर शेयर का धंधा
बताया ,रातों रात करोडपति बनिए और काम भी मत कीजिये ,वाह! क्या खुबसुरत झूठ
था और खूब चला ,चाय की केंटिन वाला भी शेयर की बात करता था सा'ब और जब फुग्गा
फुटा तो दिन में तारे दिख गए जनाब को ...

मुर्ख बनाने के हजार तरीके होते हैं सा 'ब ,अब नया तुक्का ले आये -रोजगार गारंटी,भाई
को करना कुछ नहीं गड्ढे खोदो और आराम से रूपये ले जाओ ,मरे हुए ,पैदा भी नहीं हुए
और जिन्दे सबने मजा लिया नतीजा जो रोटी रूपये में मिल जाती थी वह पाँच की हो गई
और अरबों रूपये गड्ढों में गिर गए .......

इस बार धार पर थी नारी ...बेचारी भावुक ,बोले कि आप बराबरी करे ,आधी दुनियाँ आपकी
मुठ्ठी में ,शासन में आधा भाग आपका ,बस बात इस तरह उड़ी कि कुर्सी चल कर पास आ गई
और साहब विराजमान हो गए और परिणाम यह की शासन तो दूर की बात ,घर से निकलते
ही डरने लगी .........

फिर मथने लगे तस्वीर बनाने ,सब के सब लग पड़े और ऐसी तस्वीर बनाने लगे कि बेचारा
किशोर समय से पहले जवाँ दिखने लगा ,अब क्या था सब उसके कंधे पर ,माथे पर जहाँ
जगह मिली उस पर सवार होने लगे ,बेचारा किशोर ...बेहाल हो गया और समय से पहले
बोझ से दब गया ........

जो वोट बैंक थी उसे गुमराह करने लगे ,मगर वह भी अब शिक्षित हो गयी ,भला बुरा विचार
सकने की समझ पैदा कर ली और नतीजा यह कि साहब की कुर्सी के पाए चरमरा गए और
कुर्सी लुढकने लगी ............

अब आई नयी नवेली खाद्य सुरक्षा ,बत्तीस और छब्बीस की गणित का सवाल हल करने की
बारी ,छब्बीस और बत्तीस को असल में धनवान बनाने का वादा ,क्या हश्र होगा ,भविष्य के
हाथों तय होगा मगर इस खाद्य सुरक्षा ने एक सच्चाई देश के सामने उगल दी कि इस देश के
67% लोग अजीबोगरीब धनवान हैं जो बाजार भाव से अन्न खरीद सकने की स्थिति में नहीं
है .......
 और अंतिम बात समर्थन मुल्य पर ख़रीदे गए अन्न को पानी में भिगोने की ,साहब के पास
उस अन्न को बचाने की काबिलियत भी नहीं ,बड़े बुजुर्ग ने कहा -67% तथाकथित धनवानों
में बाँट दो,मगर कौन सुने ,क्यों सुने ,आखिर सवाल कुर्सी की बनावट का है ........     

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