शनिवार, 13 जुलाई 2013

खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले साम्प्रदायिक धर्म के देवों की पूजा क्यों करते हैं

खुद को धर्म निरपेक्ष कहने वाले साम्प्रदायिक धर्म के देवों की पूजा क्यों करते हैं 

क्या धर्म साम्प्रदायिक होता है ?किस धर्म ग्रन्थ में लिखा कि दुसरे अन्य धर्म हल्के या हिन
हैं ?क्या वेद ऐसा कहते हैं या कुरान  या बाईबल ?संसार का कोई धर्म मानवता में द्वेष करने
का सन्देश नहीं देता है फिर साम्प्रदायिकता की उपज कहाँ से हुयी ?आपस के धर्मों में और
धर्मावलम्बियों में द्वेष की भावना क्यों फैलाई जा रही है ? आपस में धर्मों के नाम पर लड़ाई
करवाने में किसका हित है ?

   एक शब्द का हमारे देश में खूब जोर से इस्तेमाल किया जाता है -कट्टरपंथ या चरमपंथ ?
विश्व का ऐसा कौनसा धर्म ग्रन्थ है जिसमे लिखा है अमुक धर्म का पालन विश्व की जनता
करे ?सभी धर्म स्वधर्म का पालन करने और मावनता की सेवा का ही सन्देश देते हैं।

  हर धर्म या पंथ परहित चिंतन और उदार भावनाओं का पोषण करता है चाहे वह वेद हो या
कुरान या बाईबल।धर्म का अर्थ है मानवता की भलाई के विचारों का पोषण करना और उन्हें
आचरण में लाना।अभी पवित्र रमजान चल रहा है और हर मुस्लिम बंधू खुदा से इबादत
करके यही दुआ माँगता है कि मनुष्य मात्र का भला हो ,इस भाव में यदि किसी को चरमपंथ
या कट्टरपंथ लगता है तो इस देश को यह कट्टरपंथ स्वीकार होना चाहिए,यदि जैन धर्म के
इन पवित्र महीनों में सद्भाव के प्रवचन दिए जाते हैं और इसमें भी कट्टरपन किसी को दीखता
है तो यह कट्टरपन उचित है यदि श्रावण मास में हिन्दुओ के महादेव जो मानवता की रक्षा के
लिए गरल तक पी जाने का आचरण करने का सन्देश देते हैं तो यह कट्टरपन पुरे विश्व की
आवश्यकता है और विश्व को यह कट्टरपन की वास्तव में अब जरुरत है।

    गीता में श्री कृष्ण अपना मत रखते हैं कि स्वधर्म का पालन करों यदि हम मनुष्य हैं तो
मानव धर्म का पालन राग द्वेष छोड़ कर अविरत करते रहे।श्री कृष्ण ने यह नहीं कहा था की
सब मनुष्य अपने अपने धर्म को छोड़कर किसी एक धर्म का अवलम्बन करे ?क्या यीशु ने
धर्म की कोई अनर्थकारी परिभाषा दी है ,नहीं दी है ,उन्होंने सेवा का सन्देश दिया।यदि यह
बात किसी को चरमपंथ की पोषक लगती है तो कोई क्या करे।

     इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ के तुच्छ नेता ही विभिन्न धर्मो में द्वेष की भावना उत्पन्न
करते है और उसका  पोषण या तुष्टिकरण करते हैं।क्या कारण है कि वे लोग बाहर में  धर्म
निरपेक्षता की बातें करते हैं और दफ्तर,घर या सार्वजनिक जगहों पर जिस धर्म को ही वे
साम्प्रदायिक ठहराते हैं उसी धर्म के देवों की पूजा अर्चना या जियारत करते हैं ?केवल पद
की भूख के लिए एक दुसरे को लड़ाना और द्वेष फैलाना ही उनका काम रह गया है।क्या
किसी धर्म विशेष के लोगों को अनुचित प्रलोभन देकर निरपेक्ष कहलाया जा सकता है ?
नहीं ,अगर बाप एक पुत्र को विशेष सुविधा दे और दुसरे पुत्र को आवश्यक सुविधा से वंचित
रख दे तो यह कृत्य उस बाप की निरपेक्षता नहीं पक्षपात ही कहलायेगा।

          इस देश का मुस्लिम यदि यह कहे कि मैं राष्ट्रवादी मुस्लिम हूँ और मुझे इस पर
गर्व है तो यह बात पुरे देश के लिए गर्व करने की है और यदि एक हिन्दू या अन्य धर्म में
आस्था रखने वाला यह कहे कि मुझे राष्टवादी हिन्दू होने में राष्ट्रवादी इसाई होने में गर्व है
तो यह बात इस देश के सोभाग्य का चिन्ह है।

          धर्म की मनमानी व्याख्या करने वाले कुत्सित मानसिकता वाले राजनीतिज्ञ क्या
हम सबका भला कर पायेंगे या धर्म की मनमानी व्याख्या करनेवाले धर्म गुरु मानवता का
भला करने में समर्थ हैं?

         गलती इस देश की प्रजा की भी है ,शायद वह अनजाने में अनुचित तुष्टिकरण को
सही देख लेती है क्योंकि बार बार बोला जाने वाला झूठ भी सच लगने लगता है मगर सही
क्या और गलत क्या इसमें जब भी संदेह हो जाता है तो उसका सही उत्तर बाहर ढूंढने की
जरुरत नहीं है उनके अपने धर्म ग्रन्थ का अध्ययन उन्हें सही या गलत का रास्ता दिखाने
में पूर्ण रूप से सक्षम हैं।                 

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