सोमवार, 22 जुलाई 2013

सफलता और इच्छाशक्ति

सफलता और इच्छाशक्ति 

इस विश्व में अरबों लोग निवास करते हैं उनमें कुछ सफल कुछ संघर्षरत और बड़ी संख्या
में असफल लोग जीवन जीते हैं,प्रश्न यह उठता है कि बड़ी संख्या में लोग असफल जीवन
क्यों जीते हैं ?क्या उनका जन्म असफल बनकर व्यतीत करने हेतु हुआ है या फिर वे लोग
सफल होना नहीं चाहते ? कौन ऐसा व्यक्ति है जो सफल जीवन जीना नहीं चाहता,कोई भी
नहीं।तो फिर असफल होने का कारण क्या ?हमारे अन्दर द्रढ़ इच्छा का अभाव।

               सफलता की इच्छा और सफलता के लिए दृढ इच्छाशक्ति में गहरा अंतर है।
एक मशीन को चलाने के लिए मोटर उचित हॉर्स पावर की होनी आवश्यक है यदि मशीन
की आवश्यकता से कम HP की मोटर है तो मशीन काम नहीं कर पाएगी।ठीक इसी तरह
हर काम को सफलता से पूरा करने के लिए उचित इच्छा शक्ति का होना बहुत जरुरी है।

           सामान्य इच्छा और दृढ इच्छाशक्ति  

यदि कोई परीक्षार्थी इस आशय से परीक्षा की तैयारी करता है कि मुझे तो उत्तीर्ण होना है
तो उसके साथ अनुत्तीर्ण होने की सम्भावना भी जुड़ जाती है क्योंकि उत्तीर्ण होने के लियॆ
मानक अंक 36 % ही है और इस कारण उसकी तैयारी भी बहुत सीमित है।कम तैयारी
अपूर्णता का परिचायक है इसलिए असफलता की सम्भावना भी प्रबल हो जाती है।दृढ
इच्छा शक्ति वाला परीक्षार्थी परीक्षा की तैयारी अधिक से अधिक अंक अर्जित करने के
दृष्टिकोण से करता है इसलिए उसमे असफल होने की गुंजाइश नहीं रहती है।

             हारा हुआ मन ,अधुरा मन और आत्मविश्वास से लबालब मन ये तीन स्थितियाँ
हम सबके पास हर समय विद्यमान होती है,यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किसी
काम की शरुआत किस मन के साथ करते हैं।हारा हुआ मन यह दिखाता है कि हम जिस काम
को करने जा रहे हैं उस काम के प्रति हम निषेधात्मक विचार रखते हैं और उस काम को करने
की तत्परता और तैयारी भी नहीं कर रखी है।किसी काम को करने से पहले ही हम सोच ले कि
इसमें सफलता नहीं मिलेगी तो उस काम के प्रति हमारी रूचि और श्रद्धा खत्म हो जाती है और
परिणाम भी हमने जो सोचा है वह तुरंत मिल जाता है
       
       अधुरे मन की स्थिति हमे संशय में डाले रहती है।काम को करने से पहले यदि हम
अनिश्चय में रहते हैं और सफलता के बारे में शंकित रहते हैं तो परिणाम भी कभी संतोष
जनक नहीं मिलते।इस स्थिति में मन नाना प्रकार के विकल्पों में उलझा रहता है इससे
एकाग्रता प्रभावित होती है ,परिणाम स्वरूप हम जीवन में संघर्षरत जीवन जीते हैं।

        आत्मविश्वास से भरा मन यह दर्शाता है कि हम हर काम को चुनौती के रूप में स्वीकार
करते हैं और उसे हर हाल में पूरा करना ही है इसी लक्ष्य को ध्यान में लेकर उस काम को
कैसे पूरा करना है ,के सूक्ष्म विश्लेष्ण में लग जाते हैं।किसी भी काम को करने से पहले
हम पूरी तैयारी कर लेते हैं तो हमारे मन में उत्साह और विश्वास का संचार लगातार होता
रहता है और हम बड़ी बाधाओं को भी पार कर जाते हैं

इच्छाशक्ति की उत्पत्ति कैसे होती है        

   स्वामी विवेकानंद कहते हैं "मनुष्य की यह इच्छा शक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और
वह चरित्र कर्मों से गठित होता है।अतएव,जैसा कर्म होता है इच्छाशक्ति की अभिव्यक्ति
भी वैसी ही होती है"

अगर हमारे कर्म दिव्य है तो हमारा चरित्र भी दिव्य होगा और चरित्र दिव्य है तो इच्छाशक्ति
भी दृढ होगी।अगर हमारी महत्वाकांक्षा बड़ी है तो उसे पूरा करने के लिए दृढ इच्छा शक्ति की
जरुरत पड़ेगी क्योंकि बड़े लक्ष्य को पाने के लिए जो रास्ता है उसमे बहुत सी बाधाएं और
विपदाएं निश्चित रूप से होती हैं इन बाधाओं और विपदाओं से लम्बे समय तक मुकाबला
करना है इसलिए दृढ इच्छाशक्ति जरुरी है।हर असफलता हमे अपने लक्ष्य के करीब ले जाती
है।बार -बार आने वाली विपदा यह इंगित करती है की इस रस्ते पर आगे बढ़ते रहे यही वो
रास्ता है जो लक्ष्य तक ले जाएगा। विपदाओं के बाद भी हमारा होसला ,उत्साह और जीवट
बना रहे इसलिए दिव्य इच्छाशक्ति का होना जरुरी है।  
                

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