रविवार, 7 जुलाई 2013

भगवान और बाजार

भगवान और बाजार 

सृष्टि कर्ता के अलावा भी तीन भगवान इस संसार में है 1.माता -पिता ,गुरु और डॉक्टर .इस
युग में ये भी कम ज्यादा मात्रा में बाजारवाद के कुचक्र में फँस गए हैं या फँसते जा रहे हैं।

माता पिता का दायित्व होता है कि वे अपनी सन्तान को गुणवान बनाएँ लेकिन अफसोस है
कि वे भी केवल आर्थिक हित को साधने की कला को ही अपनी संतान के लिए सर्वोपरी मानते
हैं चाहे हित योग्य रीति से पूरा हो या अयोग्य अनैतिक बाजारुपन से।

अगर पिता व्यापारी है तो उसे अच्छे व्यापारी के गुण नहीं सिखाता है उसे ईमानदार ,कर्तव्य-
निष्ठ या संवेदनशील नहीं बनाता है बल्कि ग्राहक को कैसे मिट्ठी बातों में फांस कर उसका
धन हड़पना है या कैसे उसे माप तोल में कम देना है यह परोक्ष -अपरोक्ष रूप से सीखा देता है

अगर पिता नौकरी पेशा वाला है तो पुत्र को लगन और मेहनत की जगह कैसे भ्रष्ट तरीके से
अनैतिक कमाई की जाती है और कैसे कम काम करके भी पूरा पैसा वसूला जाए यह जरुर
सिखा देता है।

कला और पेशे से जुड़े माँ -बाप चार पाँच साल के बच्चे को भी फूहड़ और अश्लील गानों पर
नचाना शुरू कर देते है यानी कि अर्थ के इर्द गीर्द जीवन को घुमाया जा रहा है।

गुरु ,यह शब्द ही कभी अँधेरे में उजाला भर देने की सामर्थ्य रखता था।गुरु का केवल कभी
एक ही ध्येय रहता था कि वह अपनी पाठशाला में राम ,कृष्ण ,अर्जुन ,चन्द्रगुप्त जैसे योग्य
नागरिक का निर्माण करे मगर आज गुरु की जगह पेशेवर शिक्षक ने ले ली है जिसका खुद
का उद्देश्य केवल बच्चों से पेसा अर्जित करना रह गया है।बड़े-बड़े स्कुल कॉलेज ,ट्यूशन
क्लास बनते जा रहे हैंऔर उनसे पैसा बनाने की जुगत बिठायी जा रही है।जो बच्चे पढ़ रहे
हैं उनसे धन वसूलना ही उद्देश्य रह गया है चाहे उसका भविष्य संवरे या बिखरे उससे दूर
तलक कोई लेना देना नहीं है

डॉक्टर और वैद्य -डॉक्टर को जीवन दाता समझा जाता है।रुग्ण ,असक्त ,हताश और निराश
जीवन में आशा भर देता हैडॉक्टर मगर इस युग में जैसे सब कुछ बहता जा रहा है धन के
सामने।बड़े बड़े डॉक्टर,आधुनिक सुसज्जित भवन और उपकरण मगर संवेदन हिन लोगों
का जमावड़ा ही नजर आता है सब जगह।रोगी को ठीक तरह से जांचने से पहले ही अपनी
फीस ले लेना और आधुनिक उपकरणों के जरिये रोगी को भय दिखा कर उसका धन हडफना
बिना जरूरत की दवाईयाँ देना और अनावश्यक जांचे करवाना और शल्य क्रिया करना ये
हिन काम करते डॉक्टर खूब देखें जा रहे हैं।

हर जगह बाजारी करण ,क्या हो गया है मानव को ,अर्थ के इर्द गीर्द दौड़ती असभ्यता को
विकास कहे या पतन .....समझ नहीं आता!!

उपरोक्त तीनों भगवान् यदि वर्तमान में ऊपर लिखी सच्चाईयों के घेरे से बाहर अभी भी
बचे हुए हैं वो वास्तव में देव पुरुष हैं जिन्हें मेरा सादर प्रणाम ..........              

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