मंगलवार, 9 जुलाई 2013

सहयोग से सफलता :भगवत गीता का सन्देश

सहयोग से सफलता :भगवत गीता का सन्देश 

आज की दुनियाँ की सबसे बड़ी समस्या है मैं सफल हो जाऊं चाहे साधन कितना भी अनर्थकारी
क्यों ना हो और दुसरे लोग मुझसे पिछड़ते जाएँ।इस सोच ने मानसिक संताप के परिणाम ही
इस संसार को दिए हैं।बड़ी -बड़ी कम्पनियाँ इसी सोच के कारण कुछ समय चमक कर राख के
ढेर में तब्दील हो गई है।इसी सोच के कारण मनुष्य का मनुष्यत्व खत्म होता जा रहा है और
सामाजिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो रही है।यह सोच परिणाम में गहरी हताशा पैदा करती है।
इसी सोच के कारण मानव समूह में रहकर भी अकेला बन गया है लेकिन स्वार्थ के वश में होकर
सहयोग के डंडे का सहारा लेकर उबरने के बजाय गर्त में गिरना  करता है।

                     वेद कहते हैं कि मनुष्य एक दुसरे का सहयोग करते हुए उन्नति की ओर अग्रसर
हो।रामायण कहती है कि परहित चिंतन में स्वयं की भलाई भी निहित है और श्री कृष्ण कहते हैं
कि निष्काम कर्म के माध्यम से परहित में लग जाओ।परस्परं भावयन्त:श्रेय:परमवाप्स्यथ

                परहित और स्वहित क्या है :- स्वहित मेरेपन के भाव से अहंकार का पोषण पाकर
मनुष्य को असफलता की ओर धकेल देता है और परहित दुसरे के हित चिंतन से जुड़कर परस्पर
एक दुसरे का सहयोग करते हुए पूर्ण सफलता के शिखर पर पहुँचा जा सकता है।

परहित की भावना का विकास कैसे करे :- अपने स्वार्थ और अभिमान के त्याग से सहयोग की
भावना का विकास होता है।जैसे ही मनुष्य "मैं "को छोड़ "हम सब" की विचार धारा पर आता है
तब एक सकारात्मक श्रंखला से जुड़ जाता है और जिस उन्नती की उसने अकेले चलकर पाने की
कामना की थी उससे कई गुना बड़ी सफलता हासिल कर लेता है।हम दूसरों से इस तरह का
व्यवहार करना सीखे कि खुद का भी काम बन जाए और दूसरों का हित भी हो जाए।

परहित क्यों करे :- यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से आम व्यक्ति के मन में पैदा होता है कि हम
परहित या सहयोग क्यों करे? किसी वस्तु को ,पदार्थ को पाने के लिए अथक मेहनत किसी
ओर ने की तथा उसकी प्राप्ति के बाद उसमे से किसी को देना मुर्खता नहीं है।किसी ज्ञान को
बड़ी मेहनत से प्राप्त किया ,कई कई रात जगे ,निरंतर अध्ययन किया तब जाकर कोई विषय
पल्ले पड़ा और पल्ले पड़ने के बाद उसे सबको बाँट देना क्या उचित निर्णय है?इन शंकाओं का
उत्तर हाँ ही है।इसका कारण है कि मनुष्य सामाजिक और समूह में रहने वाला प्राणी है तथा
विवेक और बुद्धिशाली भी है।अगर किसी को करोड़ो की संपदा देकर निर्जन जगह पर अकेला
रहने को कहा जाए तो क्या कोई रह पाता है।किसी विषय को जानने के बाद में उसका परिक्षण
भी होना चाहिए और उस चीज का विश्लेषण भी ,क्या उस ज्ञान का प्रयोग खुद पर करके कोई
लाभान्वित हुआ है।हमने जो कुछ भी जाना क्या वह परिपूर्ण है उस बात को जांचने के लिए भी
हमे किसी का सहारा चाहिए।कोई इसे टीम भावना कहता है तो कोई इसे सहयोग और कोई
परहित।इन तीनो के अन्दर कर्ता का हित छिपा हुआ है क्योंकि हम जब सेवा करते हैं तो
केवल दो हाथ से ही कर सकते हैं जब हम किसी के लिए सोचते हैं तो एक ही मस्तिष्क से सोचते
हैं मगर जन हमे सहयोग की जरूरत पड़ती है तब सैंकड़ो मस्तिष्क और हाथ सहायता को तैयार
हो जाते हैं।सिद्धांत यह है कि यदि हमें सुख चाहिए तो दुसरो को सुख पहुँचाना ही हमारा कर्तव्य
है दुसरो का अनर्थ कर हम सुखी हो नहीं सकते।अगर इस कथन कि सत्यता जाँचनी हो तो किसी
पाप का दंड भोग रहे पापी से मिलकर जाँची परखी जा सकती है।

हम परहित के योग्य कैसे बने :- बहुत से लोग बहाना करते हैं कि हम परहित की सामर्थ्य ही
नहीं रखते क्योंकि न तो हमारे पास धन है और ना ही साधन।बात भोतिक रूप से ठीक भी
लग सकती है ,यदि हमारे पास धन नहीं है साधन नहीं है तो भी हम सहयोग कर सकते हैं।जब
कोई दुखी हो और हम भी सच्चे ह्रदय से उसके दुःख में सह भागी बन जाते हैं और कोई सुखी
हो तो उसके सुख में भी सच्चे ह्रदय से सहभागी बन जाते हैं तो हम उस व्यक्ति का बहुत बड़ा
सहयोग कर देते हैं।अगर हमारे पास कुछ है और उसके सूक्ष्म भाग का त्याग कर देने से किसी
का निर्वाह हो जाता है तो हम उस कर्तव्य को करने से पीछे नहीं हटे।यह काम कोई भी धर्म का
व्यक्ति अपने स्वधर्म का निर्वाह करते हुए कर सकता है।

गीता में कृष्ण कहते हैं -परस्परं भावयन्त: एक दुसरे का हित करे।                       
        

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