बुधवार, 28 अगस्त 2013

गलत उपाय से राष्ट्र का बदहाल

गलत उपाय से राष्ट्र का बदहाल 

आचार्य चाणक्य ने सूत्र दिया था कि-" जैसे भूख मिटाने के लिए बालुका रेत को
उबालना निरर्थक होता है उसी प्रकार गलत उपायों से राष्ट्र की उन्नती का
सपना सच नहीं होता है।"

"राजा का कर्तव्य है कि वह राजलक्ष्मी की सुरक्षा चोरो और राजसेवकों से करता
रहे।"

अगर देश की सरकार ने इन सूत्रों का पालन किया होता तो आज हमारे राष्ट्र की
यह आर्थिक दुर्दशा नहीं हुई होती ,मगर राष्ट्र की जगह राजा अपने समूह का हित
साधने लग जाए तो स्थिति विकट होनी ही थी और हुई भी। …

पिछले सालों में अर्थशास्त्री गलत नीतियाँ लाते ही गए ,उधारवाद की कुनीति से
सब बंटाधार हो गया ,हम उधार के पैसों से अपने को चमकता हुआ दिखलाना
चाहते थे ,चाणक्य ने ऋण,शत्रु और रोग को पूर्णतया खत्म करने की नीति बताई
और हमने ऋण लेकर उसको चोरों के, लुटेरों के हवाले कर दिया ,नतीजा देश का
धन विदेशी बैंको में काला होकर सड़ रहा है और हम बेबस हैं।

हमने अपने ही सरकारी उद्योगों को ठन्डे कलेजे से नीजी हाथों में बेचा और अपनी
पीठ ठोकते रहे ,अब जब सब कुछ कोडियों के मोल बिक गया तो असल तस्वीर
नंगी हो गयी और हम फकीर नजर आने लगे ,जिन महापुरुषों ने जो सम्पति बनायी
उसे बेचकर हम राष्ट्र निर्माण का सपना देखने लगे ! अजीब मुर्खता थी यह  …

हमने गुलाम रहकर उसके दुष्परिणाम भोग कर भी कुछ नहीं सिखा ,जिस ईस्ट इण्डिया
कम्पनी के कारण हम गुलाम हुए ,हमने उसके पुरे कबिले को न्योता दे दिया कि
वह भारत में आयें वे निवेशक के रूप में आये भी और भारतीय कम्पनियों के शेयरों
को सस्ते में खरीद कर रख लिया ,हमने उस समय कहा की देखो ,देश की तिजोरी
डॉलर से छलका दी है … हम अपनी मुर्खता का ढोल पीट कर गुणगान करते रहे
और देशवासियों को बरगलाते रहे। कुछ साल बाद वे विदेशी निवेशक कम दाम में
ख़रीदे शेयर ऊँचे दाम में हमको ही बेचकर उड़ने लगे और हम वापिस वहीँ आ गये 
जहाँ थे और जेब कब खाली हो गई ,पता ही नहीं चला।

हमने रिटेल में भी विदेशी लुटेरों को निवेशक बनाकर न्योता दिया ,वो अभी नहीं आ रहे
हैं क्योंकि वो जानते हैं कंगाल से दोस्ती करने पर बुरा हश्र होता है मगर वो उस
समय जरुर आयेंगे जब हम भारतीय पसीना बहा कर सम्पन्न हो जायेंगे और वो हमें
पुन: लूट कर चल पड़ेंगे।

हमने मुक्त व्यापार की नीति को अपनाया जबकि हमने अपनी ताकत और कमजोरियों
को नहीं जाँचा और नतीजा ये हुआ कि हम जिनको निर्यात करना चाहते थे वे देश
हमें निर्यात करके चले गए ,नतीजा देश का कुटीर ,लघु,मध्यम उद्योग लकवाग्रस्त
हो गया, सब कुछ ढेर  … और हम कहते हैं कि इसे ही प्रतिस्पर्धा कहते हैं ।

हमने वितरण क्षेत्र में लीकेज वाली नीतियाँ बनायी ,जानबूझ कर।  तब के प्रधान
कहते थे दिल्ली से चला रुपया गरीब के पास दो आन्ने बन कर पहुँचता है ,जब यह
सब जानते थे तो क्यों लीकेज बंद नहीं किये गए ,शायद गरीबों के नाम को आगे
रख कर कुछ स्वार्थी तत्वों के पेट भरने का मकसद रहा होगा ,और उन नीतियों का
परिणाम यह रहा कि गरीब और गरीब हो गया और धन को जोंक और साँपों ने डस
लिया।

सरकार भूखी, लाचार, निराश, महंगाई से त्रस्त जनता के सामने भारत निर्माण के
सपने परोस रही है। जनता यह समझ ही नहीं पा रही है कि निर्माण किसका हो रहा
है ,उसकी थाली में रोटी की संख्या हर दिन कम होती जा रही है  …। 

सरकार अपनी गलत नीतियों का दोष दुसरो पर थोपना चाहती है ताकि भेड़ें उसका
अनुकरण करती रहे और जो दोषी नहीं है उसे ही अपराधी मानती रहे  …. मगर
त्रस्त प्रजा का रोष कितना भयंकर होगा यह भविष्य में छिपा है …।  

ठोकम ठोक

ठोकम ठोक

 बच्चा :- पापा ,आप ने मेरे पाकेट में अठन्नी रखी या रुपया?
पापा - रुपया।
बच्चा -पापा, फिर ये अठन्नी कैसे बन गई ?
पापा -बेटे ,अर्थशास्त्र का सवाल हैं,दिल्ली से पूछ..

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नेता - गरीबी एक मानसिकता है
गरीब -…. तो बताओ अमीर कैसे बनूँ ?
नेता - आ जा राजनीति में !!

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VIP - मेंगो पीपल इन बनाना रिपब्लिक
जनता -भविष्य में जरुर पलीता लगाओगे ,क्यों सही है ना बाबा !

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नेता -देखो ,उसके बारे में कोई भी बोलेगा तो चौबीस घन्टे के बाद ही बोलेगा
चौबीस घंटे बाद बहुत सोच के प्रवक्ता बोला -  मेंढक !!

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जनता - साहब, रुपया गिर रहा है
अर्थशास्त्री -हाँ ,दिख रहा है
जनता -कुछ करो साहब ,रुपया गिर रहा है
अर्थशास्त्री - चिंता की बात नहीं है,मेरे पास दूरबीन है 
जनता -साहब ,रुपया गिरता ही जा रहा है
अर्थशास्त्री -तुझे गिरता दिखाई दे रहा है तो उठा कर जेब में डाल ,मुझे क्यों
                   उठाने को बोल रहा है ,क्या मुझे उचक्का समझ रखा है
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पत्नी -मुझे आज ही लॉन्ग ड्राइव पर ले चलो
पति -रात के ग्यारह बज रहे हैं प्रिये।
पत्नी -बारह बजते ही पेट्रोल महँगा हो जाएगा और आप ले जाओगे नहीं
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टीचर -सुरसा किसे कहते हैं?
छात्र -महँगाई को
टीचर -और कुम्भकर्ण ?
छात्र -सरकार को
टीचर -…… मारीच ?
छात्र -कुर्सी को
टीचर - और रावण
छात्र -टीचर ,ये शब्द स्त्रीलिंग है या पुर्लिंग
टीचर -मतलब
छात्र -यदि शब्द पुर्लिंग है तो रिमोट को और स्त्रीलिंग है तो रिमोट कन्ट्रोलर को
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शनिवार, 24 अगस्त 2013

हम रूपये को मजबूत सहारा दे सकते हैं

हम रूपये को मजबूत सहारा दे सकते हैं  

1. पेट्रोल ,डीजल का उपयोग सोच समझ कर करे क्योंकि इसका अनावश्यक खर्च
   हमें कंगाल बना रहा है।
2. भ्रष्ट नेताओं को हार का जबर्दस्त मजा चखाएं।चोर नेता जो जनता के कर के पैसे
   की लूट चलाते हैं ,उनके खिलाफ कठोर कानून लाओ।
3 . विदेशो में पड़ा काला धन वापिस लाने का जो दल लिखित में वादा करता है
     उसकी सरकार बनवाओ।
4 . विदेशी चीजों की खरीदी बंद करो स्वदेशी का सम्मान व उपयोग करो।
5. सरकार द्वारा बड़े उद्योगपतियों को दी जा रही सब्सिडी और अन्य रियायते
    बंद हो।
6. सरकार द्वारा समाज कल्याण या रोजगार के नाम पर चल रही अनुत्पादक
    लोक लुभावन योजनायें तत्काल बंद हो।
7. काम के घंटों में बढ़ोतरी हो और सरकारी छुट्टियों में कमी हो।
8. रक्षा उपकरणों में स्वदेशी उत्पाद को तीव्र गति से बढ़ाया जाए।
9.  उधार लेकर घी पीने की संस्कृति बंद करो और बचत करो।
10. लघु उद्योगों का संरक्षण हो और ग्रामीण क्षेत्रों में लघु इकाइयों को प्रोत्साहन
      दो।
11. उत्पाद की मजबूत गुणवत्ता हो।
12. परिश्रमी और पुरुषार्थी बनो ,शारीरिक मेहनत को हेय मत समझो।
13.हर प्रकार का सट्टा,जुआ बंद हो।
14. सरकारी खर्चो,भत्तों में भारी कमी हो। सरकारों द्वारा अपने काम के बखान
    के लिए किया जाना वाला खर्च और विज्ञापन बंद हो।
15. खेती को उद्योग का दर्जा दो।        

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

"मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है अपने हिन्दू धर्म पर गर्व है अपनी हिन्दू संस्कृति पर
गर्व है।"  यह बात लिखते हुए मुझे गर्व है क्योंकि यह बात विवेकानंद ने कही और इस
बात को महात्मा गाँधी ने दोहरा कर गर्व महसूस किया।

         हिन्दू संस्कृति को सांप्रदायिक ठहराने वाले दुर्बुद्धि नेताओ की जमात को नेतागिरी
भुलाने के लिए क्या हिन्दू वोट बैंक की वर्तमान समय में देश को आवश्यकता है ?क्या
तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की ईंट को जबाब देने के लिए हिन्दू वोट बैंक को संगठित
होकर चट्टान बनने की आवश्यकता आ चुकी है ? इन प्रश्नों को उठाने का समय अब पक
गया है।

         हमारे ही हिन्दुस्थान में कोई भी तथाकथित बुद्धिशाली, हिन्दुओं को, जब चाहे ,
जिस मंच से चाहे,उस मंच से साम्प्रदायिक शक्ति ठहराने की बात उछालता है ,क्यों ?
कारण कि हिन्दु वोट बैंक में तब्दील नहीं हुआ है ,वह कट्टरवादी और चरमपंथी नहीं है
और उसकी इसी सहनशीलता को स्वार्थी नेता भद्दी मजाक बनाते रहते हैं।

        इस देश के हिन्दुओ को ऊँच नीच ,अगड़ा पिछड़ा , सब कुछ छोड़ कर एक मकसद
के लिए संगठित होना होगा और वह मकसद है जो दुर्बुद्धि नेता चुनाव लड़ता है और
चुनाव जीतने की खातिर हिन्दुओं को सांप्रदायिक शक्ति कहता है उस नेता के और उसकी
पूरी पार्टी के खिलाफ अपने मत का उपयोग करना है ताकि उनकी हार हो और वो भविष्य
में कभी भी स्तरहीन राजनीति ना करे।

      हिन्दू कोई सम्प्रदाय नहीं है एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन है ,जीवन पद्धति है। क्यों इस
धरती पर आज विभिन्न धर्म पोषित हो रहे हैं ?हिन्दू धर्म एक सागर है जिसमे अनेको
धर्मो को साथ लेकर चलने की गंभीरता है। किसी भी प्रकार का तुष्टिकरण अंत में
देश के लिए समस्या ही पैदा करता है। हिन्दू तुष्टिकरण में विशवास नहीं करता है ,
वह तो सम दृष्टि में विश्वास करता है.हिन्दू तुष्टिकरण नहीं चाहता है हिन्दू समानता
का अधिकार चाहता है। हिन्दू तो विश्व बंधुत्व की मंगल कामना से अपने दिन की
शरुआत करता है, सब में एक ही ब्रह्मा को देखता है ,परहित ही धर्म मानता है ,उसे
चरम पंथी और कट्टरपंथी कहने का क्या भावार्थ समझा जाये।

        क्या कोई विद्वान यह सिद्ध कर सकता है कि हिन्दू - धर्म सांप्रदायिक है ?

केवल स्वार्थी मनुष्य ,गिरे हुए स्तर के पशु तुल्य मूढ़ पामर लोग अपने स्वार्थ के लिए
खुद को भी गाली देने से नहीं चूकते हैं,ऐसे लोग हर समाज के लिए बोझ है और उनकी
चुनावी हार ही अब जरूरी है ताकि स्वस्थ भारतीय समाज का निर्माण पोषण पा सके          

बुधवार, 21 अगस्त 2013

ये कैसा भारत निर्माण …?

ये कैसा भारत निर्माण  …?

देव भी पुरुषार्थ के पीछे चलता है ,ऐसा हिन्दू दर्शन और विद्धवानों का मानना है,मगर
वर्तमान भारत के हवा में उड़ने वाले अंधे नेता ऐसा नहीं मानते हैं। इसका कारण या
तो ये नेता समस्या को मूल रूप से समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समस्या को उलझाये
रख कर स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। देखिये कुछ बानगियाँ -

1 . पुरुषार्थी भारतीय की जगह 65 % भारतीयों को निकम्मा बनाने के लिए खाद्य
     सुरक्षा ,इसका कुफल ये होगा कि भारतीय मेहनत करके पेट भरने की जगह
     कोड़ी के भाव मिलने वाले अन्न से पेट भरेंगे और निठल्ले पड़े रहेंगे। वास्तव
     में समस्या बेरोजगारी की है ,करोड़ो युवा काम माँग रहे हैं ,सरकार उन्हें काम
     देने की जगह निठल्ला क्यों बना रही है जबकि इस देश में विश्व के अन्य देशों
    की तुलना में सबसे ज्यादा युवा बसते हैं।

2. समस्या है गुणवत्ता युक्त शिक्षा और उपाय निकाला है कि बच्चा अगर नहीं भी
    पढ़ रहा है यानि कम अंक अर्जित कर रहा है तो भी उसे अगली कक्षा में प्रवेश दे
    देना ,बच्चे को तरासना मकसद नहीं है ,बस शिक्षित भारत के आँकड़े जुटाने हैं।

3.  समस्या है गाँवों को स्वावलम्बी बनाने की मगर चला रहे हैं अकुशल मजदुर
     योजना और वह भी महात्मा के नाम पर , क्या महात्मा का यह सपना था कि
    उसके देश के गाँवों के लोग गढ्ढे खोदते रहे और कच्ची रेत की सडके बिछाते
    रहे.

4 . समस्या है नारी के गौरव को बढ़ाने की मगर उपाय खोजा है पारिवारिक रिश्तों
    में कलह पैदा करने का। बाप की सम्पति में पुत्रियों को बराबर का हक़ देकर
    भाई बहिन के पावन रिश्ते में आग लगाने की कोशिश और इसका नतीजा आने
   वाले समय में यह देखने को मिलेगा कि बहिने भाइयों की कलाई पर राखी की
   जगह पेतृक सम्पति में हक़ पाने के लिए हथकड़ी लगवायेगी और भाई उसे डोली
  में बैठने से पहले उसकी शादी के खर्च की तलपट तैयार करके उसे देगा।

5. समस्या है जनसँख्या दर को संतुलित करने की और उपाय निकाला है लीव इन
   रिलेशनशिप के रूप में यानि खूब व्यभिचार करो और असयंम रखो।

6. बात करते हैं सामाजिक सोहार्द की और नीति जिस पर अमल करते हैं वो है
   भेदभाव और तुष्टिकरण की।

7. समस्या है भ्रष्टाचार की जिसके लिए जरूरत थी शक्ति सम्पन्न लोकपाल
     की मगर उपाय खोज रहे हैं अशक्तपाल रिमोट से

8. समस्या है भुगतान संतुलन की और उपाय खोजा है F D I ,जो आर्थिक गुलामी
  की ओर ले जायेगा जबकि रास्ता था काले धन को विदेशो से वापिस लाने का।

9. समस्या है अकर्मण्यता और लालफीताशाही की और उपाय खोजा जा रहा है
    वाणी स्वतन्त्रता को कुचल कर रख देने का ताकि खूब मनमानी कर सके और
   विरोध करने वाले को कालापानी दिया जाये।

10. समस्या है सही नीति के निर्माण की और उसे अमल में लाने की मगर उपाय
     खोजा जा रहा है भव्य रंगीन विज्ञापन के जरिये खुशहाल भारत बनाने की          

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

धड़ाम से ………

धड़ाम से  ……… 

बात मौन के महत्व की है ,बड़ी ताकत है मौन में। जो काम चिल्लाने से पूरा नहीं होता
वह मौन से हो जाता है। सब कुछ इस तरह करो कि किसी के कानो कान खबर भी ना
हो ,कुछ सालों से मौन अपनी पराकाष्ठा पर है ,बिना कुछ चूं चपाटा किये रुपया धडाम
हो गया ,बस सब देखते रह गए मोहनी अदा से  …।

           कुछ सालों से अभी तक बेचारी ईमानदारी का जनाजा निकाला जा रहा है,किसी
ने यह पूछने की हिम्मत नहीं करी कि ये मरी कैसे ?ईमानदारी शिखर पर खड़ी थी और
मौन ने बड़ी मासूमियत से खाई की तरफ धकेल दिया ,ईमानदारी कुछ समझे उसके
पहले धड़ाम से खाई में जा गिरी  ……………. धड़ाम

         अर्थ का पहिया बड़े जोर से चक्कर खा रहा था ,यह चक्कर घूमता हुआ ऊपर जा
रहा था ,सब खुश थे कि ये चक्कर बड़ी तेजी से घूम रहा है लेकिन बड़ी शिफ्त से कब
रिवर्स लगा कि भागा धड़ाम से निचे की तरफ …….कोई रूकावट नहीं लगता है खाई
में जाकर विश्राम लेगा  …धड़ाम हो खुद ही ठहर जाएगा 

     पहली पार से उथल पुथल हुयी ,हमने उस ओर इशारा किया मगर वो बोले -बेटे ,
मौन  … थोड़े समय बाद एक आवाज आई - धड़ाम -धड़ाम  … और कुछ रण बाँकुरे
को सदा के लिए मौन कर गयी  …!!

    दामाद जी अपना कारोबार भी मौन हो चला रहे थे ,बड़ी अच्छी कट रही थी। रुपया
खुद ब खुद बढ़ रहा था ,सिलसिला आगे बढ़ रहा था क्योंकि कुछ चला था और मीलों
चलना था पर वाह रे किस्मत !ना जाने कैसे खे -खे करता मका आया और धड़ाम से
धक्का दिया ,इससे कुछ उल्टी बाहर आई मगर मौन हो कर वापिस निगल ली  …।

    वो बेतहाशा भागे जा रहे थे ,जब भी पीछे मुड़ कर देखते तो गरीबी पीछा करती
दिखती ,उनकी साँसे फुल रही थी मगर दौड़े जा रहे थे ,हमने उनको रोक कर पूछा -
यूँ भागने से क्या होगा ,इससे मुकाबला करो. वो बोले - रुकते ही यह पकड कर मुझे
धड़ाम से गिरा देगी इसलिए रुकना उपाय नहीं है मुझे किधर भी भागना है ,दोड़ना
है ताकि मेरा धड़ाम होना टल जाये !

       हम घर पर बैठे थे ,सोचा कुछ समाचार जान लूँ। टी वी ऑन किया कि समाचार
वाचक अजीब हरकतें करता हुआ बोला - हाय राम ,जोरदार मंदी की आंधी से पूरा
शेयर मार्केट धड़ाम से ओंधे मुंह गिर पड़ा। …….

        टी वी पर धड़ाम सुन हम घर के बाहर निकले शायद इस धड़ाम से पीछा छूटे
घर से कुछ दुरी पर एक अँधा माथे पर भारी बोझ रखे पृथ्वी की तरह गोल घेरे में
घूम रहा था। मेने उसके सर के बोझ को हटाना चाहा तो वो बोला -ये क्या कर रहा
है छोरा ,दीखता नहीं मैं निर्माण कर रहा हूँ ,सालो से दौड़ रहा हूँ और सालो तक
दौड़ने की अदम्य इच्छा रखता हूँ  … और तू इस बोझ को धड़ाम से मुझसे अलग
करना चाहता है ?

  मेने कहा -बूढ़े बाबा ,समय को पहचान ,अब तेरा सूरज अस्त हो रहा है क्योंकि
अब क्षितिज से शेर दहाड़ रहा है ,कट ले बाबा वरना शेर तेरा धडाम कर ही देगा !!    


शनिवार, 17 अगस्त 2013

क्यों भटक गया अर्थशास्त्र

क्यों भटक गया अर्थशास्त्र 

जंगल के राजा शेर ने एक सभा बुलायी और जंगल के अर्थशास्त्र के बारे में सभी
पशु पक्षियों और जीवों से सलाह माँगी।
सियार ने कहा - हम छल से सज्जनों को मुर्ख बनाते रहे और उदर पूर्ति करते
रहे।
बगुले ने कहा -हम नेक दिखावा करने का भ्रम उत्पन्न करे और उदर पूर्ति करते
रहे।
उल्लू ने कहा -हम दिन के उजाले में शांत रहे और रात के अँधेरे में धावा बोल कर
उदर पूर्ति करते रहे।
बन्दर बोला -चिन्ता की आवश्यकता नहीं है ,इधर उधर गुलांट मारते रहे ,उदर पूर्ति
हो जायेगी।
सभी पशु पक्षी कीट अपनी अपनी बात रखते जा रहे थे परन्तु राजा शेर संतुष्ट नहीं
थे। सभी की बात सुनने के बाद दो कीट पतंगे की बारी आयी तब-
मधुमख्खी ने कहा -हम सबको कमाए हुये धन, अन्न को आवश्यकता अनुसार की खर्च
करना चाहिए और भविष्य के लिए बचा कर रखना चाहिए।
चींटी ने कहा- सुख से जीने के लिए हमें सुंदर और सुदृढ़ योजना बनानी चाहिए ,योग्यता
अनुसार काम का वर्गीकरण करना चाहिए और मिलजुल  कर आपसी सहयोग से हर
बड़े से बड़े काम को पूरा करने में निरंतर जुटा रहना चाहिए।
राजा शेर को मधुमख्खी और चींटी की बात उचित लगी और उसका समर्थन किया।

    यह बात जंगल की थी लेकिन अपना अर्थशास्त्र क्यों पटरी से उतर गया। जिस देश
का प्रधान मंत्री अर्थशास्त्री हो वह देश कंगाल क्यों होता जा रहा है? कुछ कारण -

उधार के पैसों पर मौज और दिखावा
पड़ोसी के धन पर खुद का घर चलाने की जुगत
सफेद हाथी पालने की महत्वाकांक्षा
अनुत्पादक योजनाओं का क्रियान्वन
विकास के मुंगेरी सपने
उधार लेकर घी पीना
अँधा बांटे रेवड़ी अपनों को ही देत
मूर्खो का सम्मान और सज्जनों की उपेक्षा
किताब और धरातल की परख में कमजोरी

   
















गुरुवार, 15 अगस्त 2013

भ्रष्टाचार का समाधान

      भ्रष्टाचार का समाधान 

"हम सपथ लेते हैं कि हमारे परिवार तथा मित्र वर्ग में यदि कोई भ्रष्ट आचरण करता है तो हम उसके साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखेंगे "

बुधवार, 14 अगस्त 2013

स्वतंत्रता के बाद के दंश

स्वतंत्रता के बाद के दंश

स्वतंत्रता के बाद बहुसंख्यक समाज ने स्वतंत्र हिंदुस्तान से क्या पाया?

संसद में जो दल अपना बहुमत सिद्ध करता है उसे उस देश को चलाने का और नीति
निर्धारण करने का अधिकार मिल जाता है और इसके लिए उन्हें एक मत ज्यादा पेश
करना होता है लेकिन भारत के बहुसंख्यक 50 प्रतिशत से ज्यादा बहुमत रखते हैं फिर
उन्होंने क्या पाया स्वतंत्रता से ,यह प्रश्न आज यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर कोई भी दल
निष्पक्ष रूप से नहीं देना चाहता ,क्यों ?

तथाकथित मानवता वादी लोग बहुसंख्यक प्रजा के प्रति भेद भाव पूर्ण रवैया क्यों
रखते हैं ?जब बहुसंख्यक लोग उपद्रव का शिकार अपनी ही मातृभूमि पर हो जाते हैं
तो सब और चुप्पी ,सन्नाटा छा जाता है तब ये मानवता वादी लोग बहरे और गूंगे
बन जाते हैं और कहीं भी अल्पसंख्यक समुदाय जरा सा पीड़ित चाहे उनके अवेधानिक
रवैये से भी हुआ हो तो भी ये लोग बांहे चढ़ाकर चीखने चिल्लाने लग जाते हैं ,क्यों?

हमारे यहाँ कबीर जैसे लोग और उनके सिद्धांत अब कहीं भी नहीं झलकते। क्या
कारण है कि अधिकांश कर्णधार एक जगह तुष्टिकरण करते हैं और दूसरी तरफ
अधिकारों से वंचित करते हैं ?

क्या कारण है कि भारत के नागरिकों को समान अधिकार नहीं मिलते ?धर्म या जाती
के अनुसार कानून बनेंगे तो राष्ट्रीयता का अर्थ क्या रहेगा ?किसी एक वर्ग के लिए
अलग नीति और अन्य के लिए अलग ?क्या धर्म राष्ट्र से बढ़कर हो जाता है ?

गरीब और पिछड़े बहुसंख्यक गलत आरक्षण नीति का भोग बन रहे हैं। क्या गरीब
और निर्धन उच्च जाती का वर्ग अन्य से कुशल होने के बाद भी रोने और गिडगिडाने
के लिए बचा है ,क्यों नहीं उनको वो हक़ मिलते हैं जो अन्यों को धनवान होने के बाद
भी जाती धर्म के आधार पर मिल जाते हैं.

अधिकांश कर्णधार बहुसंख्यक समाज को साम्प्रदायिक शक्ति ठहराने पर तुले रहते हैं
जबकि उनको जो अधिकार मिले हैं वो बहुसंख्यक समाज के मत से ही मिले हैं। क्यों
ये पक्षपाती नेता उपद्रवियों को शरण देते हैं उनके अपराध को पोषित करते हैं उनके लिए
रोते हैं जबकि देश के वीरों के प्रति संवेदना शून्य बन जाते हैं उनकी देश भक्ति भी
मूल्यहीन बन जाती है और हुडदन्गियों के प्रति संवेदना झलकती है ,क्या ये लोग यह
चाहते हैं कि अपने अधिकारों के लिए समाज बागी बन जाये ?

गरीब और अशिक्षित भारतीयों के हक़ कानून के तहत छीन लिए जा रहे हैं और वो
लोग कुचले जाने के बाद निरंकुश कानून के खिलाफ खड़े होते हैं तो उनको बागी
या समस्या फैलाने वाले अराजक समूह के रूप में मान लिया जाता है ,क्या कोई
यह समजायेगा कि भगवान जब जन्म देते हैं तो अराजकता फैलाने वाले के लिए
देते हैं या फिर स्वार्थी लोगों के द्वारा उनका हक छीन लेने के कारण वे विद्रोही
बनते हैं ?

एक बड़ा समुदाय आज वनवासी और आदिवासी बन कर जी रहा है क्यों?
उनको योग्य कैसे बनाया जाये इस पर बहस न संसद में होती है ना सभ्य समाज
में,इनकी समस्या के समाधान को राहत की भीख देकर कर्तव्य पालन किया जा
रहा है।

देश की सरकारे यह तय कर पाने में अभी तक असमर्थ है कि हम गरीब किसे कहें ?
जब तक ये लोग यह परिभाषा ही नहीं गढ़ पायेंगे तो उनके लिए शिक्षा ,भोजन
आवास की सम्पूर्ण नीति कैसे बना पायेंगे ?क्या मात्र अक्षर ज्ञान को शिक्षा माने
भोजन विधेयक को भूखे नहीं रहने की गारंटी माने ,समस्या है भूख और गरीबी
और उसका समाधान राहत बांटना नहीं होता है ,भारतीय राहत पर जीने में कभी
गौरव नहीं महसूस करेगा उसे रोजगार दो ,मगर उसके लिए कोई नीति नहीं है ,
अगर यह हाल रहा तो आने वाले समय में मनरेगा में शिक्षित बेरोजगारों की भीड़
नजर आएगी।

स्वतंत्र देश के नागरिक समान अधिकारों का सुख पायें और सबके हाथों में रोजगार
हो ,राष्ट्रीयता ही आराधना बने ,सेना और सरहद को सम्मान मिले ,भ्रष्ट नेताओं को
कठोर दंड मिले ,क्या हम यह सपना देख रहे हैं उसे सपना ही समझे













छा 

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

सिसकते भारत की तस्वीर


सिसकते भारत की तस्वीर 

संसद का पावन मन्दिर झूठे ,धूर्त ,मक्कार ,दागी ,अपवित्र ,चरित्रहीन बोझ को झेल कर थकता 
जा रहा है 
  देश गरीबी और भुखमरी से त्रस्त है और नेता इस आपदा से अपना मनोरंजन खोजते हैं,किसी को 
गरीब सत्ता का साधन लगता है,किसी को मानसिक स्थिति लगता है,किसी को बाजार की वस्तु 
लगता है.…. 
इस देश के धन को काले चोर लूट रहे हैं  कोई संविधान की सौगंध खा कर लूट रहा है,कोई 
कानून की आँखों पर पट्टी बाँध के लूट रहा है,कोई सांठ गाँठ करके लूट रहा है,कोई जनसेवक 
बन कर लूट रहा है,कोई समाज सेवा के नाम पर लूट रहा है।
यहाँ सपने दिखाये जाते हैं पर देखने नहीं दिये जाते कोई गरीबी हटाने का सपना दिखाता है,
कोई विकास का सपना दिखाता है कोई भरपेट भोजन का सपना दिखाता है तो कोई एकता 
का सपना दिखाता है।
यहाँ पढ़ लिख कर भी लोग बेरोजगार हो जाते हैं,पढ़ लिख कर आरक्षण का गरल पीते हैं,पढ़ 
लिख कर भी संस्कार विहीन हो जाते हैं।
यहाँ धर्म के मर्म पर निशाना लगाते हैं कोई तुष्टिकरण को सही राह मानता है कोई मजहब 
को सुलगाता है कोई धर्म से सत्ता खोजता है तो कोई धर्म से खून बरसाता है।
यहाँ गाँव रोता है ,किसान भूख से मरता है ,मजदुर खून के आँसू रोता है,कभी मनरेगा में भविष्य 
देखता है,कभी खदानों में मरता है ,कभी रेल की पटरियों के करीब बस कर लंगड़ाता है ,कभी 
झुग्गियों में सिसकता है।
यहाँ नारी के सम्मान की बाते सजती है और अधिकार का दिखावा होता है मगर उसकी 
हालत हर बार खरबूज सी रह जाती है ,नारी सहती है ,भोगती है,खिलौने सी टूटती है।
यहाँ बच्चे बचपन बेचते हैं,किशोर बदकाम करते हैं युवा तेज़ाब फेंकते हैं क्यों ,इस प्रश्न तक 
कोई नहीं पहुँचते। 
यहाँ हर कोई महान है,हर कोई मार्गदर्शक है,हर कोई नेता है,हर किसी के पास में समाधान 
है इसलिए किसी को किसी की पड़ी नहीं है।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सियार के बारे में ..............

सियार के बारे में ..............

मुझे खेद है कि मैं सियारों पर अपूर्ण जानकारी दे रहा हूँ ,पाठक वर्ग इसमें एक
नया खंड टिपण्णी के रूप में जोड़ कर अन्य पाठकों की ज्ञान वृद्धि कर सकते हैं।

सियार भी एक अजीब बला है जंगल में. इनके कारनामे और करतूतें थूकने के योग्य
है। सियार की एक खासियत यह होती है कि जब जंगल की व्यवस्था उसके हाथ में
आ जाती है तब वह सबसे पहले शेरों की जान को खतरा पैदा करता है,यह सियारों
का पारिवारिक रिवाज है जो इनके जन्म से जुड़ा है।  

       सियार जंगल में सर्वत्र पाए जाते हैं अक्सर ये राज नगर में निवास करना ज्यादा
पसंद करते हैं .इनका कोई उसूल नहीं होता है.ये खुदगर्जी के उसूल पर पलते हैं.
ये अपनी खाल बचाने के लिए शेरों का शिकार पडोसी भेड़ियों से करवा देते हैं।

सियार रंग बिरंगे होते हैं.इनकी पहचान बिरला ही  कर पाता है क्योंकि ये अपनी
खाल को मनचाहे रंग में रंगने में माहिर होते हैं.इनका कोई धर्म या सिद्धांत नहीं होता
है इनके पाप अक्सर पुण्य में बदल जाया करते हैं।

        सियारों की आपसी लड़ाई के किस्से जंगल में हर वक्त उछलते रहते हैं मगर
जब इनकी अस्मिता पर खतरा मंडराता है तो यह सारी जमात न्यात जात भूल
कर एक हो जाती है इसी विशिष्ठता के कारण गायें और कबूतर इनको जंगल का
राजा बनाते हैं। 

    सियार दहाड़ नहीं सकते ये इनकी मज़बूरी है इसलिए इनसे दहाड़ मारने की
अपेक्षा ना करे,ये जाती मुँह उठाकर रो सकती है ,इनको आप दुसरो के जंगलों
में भी रोते देख सकते हैं.सियार आक्रमण भी करते हैं पर अपने ही जँगल में
दुश्मनों से ये भयभीत रहते हैं.

 कुछ चतुर सियार गूंगे सियार भी पालते हैं ताकि सही वक्त पर गूंगे बने रहे
और कुछ सियार बहरे सियार पालते हैं ताकि सत्य की आवाज ना सुन सके।
चतुर सियार दूर से मूढ़ सियार के कंधे पर शस्त्र रख खुद प्रहार करते हैं। 

सियार वैसे तो अपना पेट भरने की जुगत में सालों लगे रहते हैं परन्तु कभी
कभी बेतरनी पार करने के अवसर पर गायों और कबूतरों को विशेष दाना
डालते हैं।

सियार कूटनीति में माहिर होते हैं। जंगल के प्राणियों में फसाद कराने में इनको
महारत हासिल होती है। ये जब भी रोते हैं पुरे जंगल में आपदा प्रबन्धन हो जाता
है। अपने जँगल को बेच खाने में ये माहिर होते हैं। ये विपदाओं से अपनी रक्षा का
प्रबन्धन करने में निपुण होते हैं इसलिए अपनी पीढ़ियों तक का भोजन दुसरे
जंगलों में सुरक्षित रखते हैं।

सियार अपने जँगल के हितेषी नहीं होते हैं मगर बहरूपिया बन सबको झांसा देते
रहते हैं। इनकी खाल मोटी होने के कारण इनको पाप के प्रभाव से बचाती है। इनका
शिकार करने का मौका सालों में कभी कभार मिलता है पर देखा यह गया है कि ये
शिकारी को धोखा देकर सकुशल अपने मुकाम लौट आते है। 
 
         

बुधवार, 7 अगस्त 2013

अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी

अयोग्य राजा राष्ट्र के लिए अकल्याणकारी 

आचार्य चाणक्य की नीति में लिखा है -अयोग्य को राजा बनाने के स्थान पर किसी
को राजा न बनाने में राष्ट्र का कल्याण है,लेकिन हम भारतीय गलती करते ही
नहीं दोहराते भी हैं.

        नन्द वंश  केवल चाणक्य के समय में ही नहीं था हर काल में रहता है और
उसका हर काल में विनाश हुआ है. देश पूछता है -क्या चन्द्रगुप्त बनोगे ?

     केवल बातें, लच्छेदार बातें,खुद की गलतियों को ढकने की बातें,खुद की अक्षमता
को छिपाने की बातें,प्रजा को भ्रमित करने की बातें ……क्या इसे ही अतुल्य
भारत कहा जाएगा ?

    बातों से देश का शासन चलाओ,संसद में लच्छेदार शब्दों का भाषण पिलाओ,
दुश्मन राष्ट्र पर बातों से वार करो,बातों से वतन की रक्षा का दिखावा  …… क्या
इसी लिए चुनाव होता है    …?

   कड़े शब्दों में निंदा करके हम देश के बहादुर सैनिकों का अग्नि संस्कार करते
रहेंगे  …क्या इसी को प्रजातंत्र कहते है ?

   मौत दुश्मन की घात से हुई या दुश्मन के लुख्खो से  ……. मगर मरे तो इस देश
के जवान हैं  …जवानो की मौत का बदला दुश्मन से लेने की जगह खबर का
विश्लेषण करने वाले मंत्री को पद पर बने रहने का हक़ होना चाहिए ?

  जवान मर गये  …….  तुरंत अभिनय शुरू  …. संवेदना के स्वर ,चेहरे पर उदासी
की लकीरे ,हाथ में दस लाख की सहायता राशी … और इतिश्री शहीद श्री  …की कथा.
…क्या ऐसे कर्तव्यों के निर्वाह को स्वतंत्रता कहते हैं ?

 अरे दुश्मन की जाती पूछ कर बताओ  …फिर फैसला करेंगे कि उससे मार खाना है
या जबाब देना है. अगर वोट बैंक का दुश्मन है जुते  खा कर उसे बिरयानी खिलाओ,
उसकी सूजे गालों से आवभगत करो  …. क्या महान देश की यही कूटनीति है ?

   जवान शहीद हो गया  … अमर जवान ज्योति पर माथा टेक लो और दुश्मन या
उसके गुर्गे मर गए तो सब मिल कर मातम मनाओ ,  इस दुर्नीति से देश की दुर्दशा
को क्या यह नाम दें कि हो रहा भारत निर्माण  …. !!

  कल्पना करो की एक नेता का बेटा लुख्खो के हाथों मारा गया है  …. नेता और उसका
परिवार दहाड़े मार रहा है और हर देश प्रेमी भारतीय संवेदना और शोक दिखाने के
लिए कतार में उस लाश पर नोटों से श्रद्धांजली दे रहा है   …नोटों का ढेर देख कर भी
नेता रोता जा रहा है ,प्रजा को कुछ समझ नहीं आ रहा है  …अब भी नेता क्यों रोये जा
रहा है   …।
              

निकम्मे लोगों के हाथों में ……………

निकम्मे लोगों के हाथों में   …………… 

हम पल रहे हैं निकम्मे दरख्तों की छाँव तले
हम जी रहे हैं अब भी क्योंकि हम मरे नहीं हैं
हम अपने ही किये का फल भुगत रहे हैं
दिये हुए हर वोट की अब कीमत चूका रहे हैं

हम पल रहे हैं निकम्मे स्तम्भ की ओट तले
हम चमत्कार की आस में निठ्ठले पड़े हैं
हम अपने ही वतन में गुलाम हो गए हैं
दिए हुए हर वोट की अब कीमत चूका रहे हैं

हम बंधे हुए हैं निर्बल नेताओं की डोर तले
हम बेसिरपैर की बातों से मुद्दा ही मार देते हैं
हम बरसों से भूले वतन की आबरू पर मरना
अब चुल्लू भर पानी में हम खूब नहा रहे हैं

हम पल रहे हैं नालायक चोरों की दया तले
हम सो रहे निशंक क्योंकि हम जगे ही कब हैं 
हम बचा ना पाए अपनों से अपना वतन
तिल -तिल कर मर के भी क्या खूब जी रहे हैं

हम निकम्मे हाथो में यूँ देश सौंप कर क्यूँ चले
हम घर जला कर हाथों से क्यूँ तमाशा देख रहे
जबसे घुसाया सियारों को शेरों की हर मांद में
तब से हुये बेहाल बस अब बेतालों को ढो रहे हैं



 
  




शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

चुटकी

चुटकी

अध्यापक :- मुगलकाल के बारे में एक पंक्ति बोलो

छात्र  :-  दुर्गाशक्ति का निलंबन सही: 

अध्यापक :- "बाप का राज है" मुहावरे का अर्थ उदाहरण से समझाओ?

छात्र :- आर टी आई एक्ट से राजनितिक दलों को बाहर रखने के प्रस्ताव  को
          केबिनेट की मंजूरी।

अध्यापक  :- बच्चो ,तुम लोगों को चुप बैठने का बोला था फिर हल्ला क्यों
                     कर रहे थे?
छात्र  ---    हम लोग डर के मारे हल्ला कर रहे थे

अध्यापक -   क्या!!!

 छात्र    - आज कल चुप रहने पर प्रधानमंत्री बना दिया जाता है न सर। 
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निर्माता:-           आज की शोले का डायलॉग …? 

कहानीकार :- हम दौ सौ एक और वह अकेला मर्द ,………. हम पर भारी पड़
                     रहा है ,…… हा  … हा  .. क्यों हो रहा है ऐसा ?
                    कालिया - सर ,वह मर्द है इसलिए  ……………
निर्माता :-       एक और डायलॉग …?

कहानीकार :- तुम तीन और रोटी एक, … फिर भी रेट तय नहीं कर पाये

                     तोता :- सरदार ,हम कैसे जानते रोटी की रेट ,हमें तो आप की
                     तरह मुफ्त में तोड़ने की लत लग गयी है

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प्रवक्ता - अरे यार ,अपने सिक्के ने  शेर के दहाड़ने के ठीक चोबीस घंटे बाद
              बोलने को क्यों कहा ?
दूसरा - ………. ताकि घबराहट दूर कर सके.

पहला - ………. पर वो हर चोबीस घंटे में दहाड़ता रहा तो …. ?
दूसरा - ………. हमेशा के लिए चुप रहेंगे।
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