शनिवार, 17 अगस्त 2013

क्यों भटक गया अर्थशास्त्र

क्यों भटक गया अर्थशास्त्र 

जंगल के राजा शेर ने एक सभा बुलायी और जंगल के अर्थशास्त्र के बारे में सभी
पशु पक्षियों और जीवों से सलाह माँगी।
सियार ने कहा - हम छल से सज्जनों को मुर्ख बनाते रहे और उदर पूर्ति करते
रहे।
बगुले ने कहा -हम नेक दिखावा करने का भ्रम उत्पन्न करे और उदर पूर्ति करते
रहे।
उल्लू ने कहा -हम दिन के उजाले में शांत रहे और रात के अँधेरे में धावा बोल कर
उदर पूर्ति करते रहे।
बन्दर बोला -चिन्ता की आवश्यकता नहीं है ,इधर उधर गुलांट मारते रहे ,उदर पूर्ति
हो जायेगी।
सभी पशु पक्षी कीट अपनी अपनी बात रखते जा रहे थे परन्तु राजा शेर संतुष्ट नहीं
थे। सभी की बात सुनने के बाद दो कीट पतंगे की बारी आयी तब-
मधुमख्खी ने कहा -हम सबको कमाए हुये धन, अन्न को आवश्यकता अनुसार की खर्च
करना चाहिए और भविष्य के लिए बचा कर रखना चाहिए।
चींटी ने कहा- सुख से जीने के लिए हमें सुंदर और सुदृढ़ योजना बनानी चाहिए ,योग्यता
अनुसार काम का वर्गीकरण करना चाहिए और मिलजुल  कर आपसी सहयोग से हर
बड़े से बड़े काम को पूरा करने में निरंतर जुटा रहना चाहिए।
राजा शेर को मधुमख्खी और चींटी की बात उचित लगी और उसका समर्थन किया।

    यह बात जंगल की थी लेकिन अपना अर्थशास्त्र क्यों पटरी से उतर गया। जिस देश
का प्रधान मंत्री अर्थशास्त्री हो वह देश कंगाल क्यों होता जा रहा है? कुछ कारण -

उधार के पैसों पर मौज और दिखावा
पड़ोसी के धन पर खुद का घर चलाने की जुगत
सफेद हाथी पालने की महत्वाकांक्षा
अनुत्पादक योजनाओं का क्रियान्वन
विकास के मुंगेरी सपने
उधार लेकर घी पीना
अँधा बांटे रेवड़ी अपनों को ही देत
मूर्खो का सम्मान और सज्जनों की उपेक्षा
किताब और धरातल की परख में कमजोरी

   
















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