गुरुवार, 22 अगस्त 2013

छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

छद्म धर्मनिरपेक्षता का जबाब हिन्दू वोट बैंक ?

"मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है अपने हिन्दू धर्म पर गर्व है अपनी हिन्दू संस्कृति पर
गर्व है।"  यह बात लिखते हुए मुझे गर्व है क्योंकि यह बात विवेकानंद ने कही और इस
बात को महात्मा गाँधी ने दोहरा कर गर्व महसूस किया।

         हिन्दू संस्कृति को सांप्रदायिक ठहराने वाले दुर्बुद्धि नेताओ की जमात को नेतागिरी
भुलाने के लिए क्या हिन्दू वोट बैंक की वर्तमान समय में देश को आवश्यकता है ?क्या
तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की ईंट को जबाब देने के लिए हिन्दू वोट बैंक को संगठित
होकर चट्टान बनने की आवश्यकता आ चुकी है ? इन प्रश्नों को उठाने का समय अब पक
गया है।

         हमारे ही हिन्दुस्थान में कोई भी तथाकथित बुद्धिशाली, हिन्दुओं को, जब चाहे ,
जिस मंच से चाहे,उस मंच से साम्प्रदायिक शक्ति ठहराने की बात उछालता है ,क्यों ?
कारण कि हिन्दु वोट बैंक में तब्दील नहीं हुआ है ,वह कट्टरवादी और चरमपंथी नहीं है
और उसकी इसी सहनशीलता को स्वार्थी नेता भद्दी मजाक बनाते रहते हैं।

        इस देश के हिन्दुओ को ऊँच नीच ,अगड़ा पिछड़ा , सब कुछ छोड़ कर एक मकसद
के लिए संगठित होना होगा और वह मकसद है जो दुर्बुद्धि नेता चुनाव लड़ता है और
चुनाव जीतने की खातिर हिन्दुओं को सांप्रदायिक शक्ति कहता है उस नेता के और उसकी
पूरी पार्टी के खिलाफ अपने मत का उपयोग करना है ताकि उनकी हार हो और वो भविष्य
में कभी भी स्तरहीन राजनीति ना करे।

      हिन्दू कोई सम्प्रदाय नहीं है एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन है ,जीवन पद्धति है। क्यों इस
धरती पर आज विभिन्न धर्म पोषित हो रहे हैं ?हिन्दू धर्म एक सागर है जिसमे अनेको
धर्मो को साथ लेकर चलने की गंभीरता है। किसी भी प्रकार का तुष्टिकरण अंत में
देश के लिए समस्या ही पैदा करता है। हिन्दू तुष्टिकरण में विशवास नहीं करता है ,
वह तो सम दृष्टि में विश्वास करता है.हिन्दू तुष्टिकरण नहीं चाहता है हिन्दू समानता
का अधिकार चाहता है। हिन्दू तो विश्व बंधुत्व की मंगल कामना से अपने दिन की
शरुआत करता है, सब में एक ही ब्रह्मा को देखता है ,परहित ही धर्म मानता है ,उसे
चरम पंथी और कट्टरपंथी कहने का क्या भावार्थ समझा जाये।

        क्या कोई विद्वान यह सिद्ध कर सकता है कि हिन्दू - धर्म सांप्रदायिक है ?

केवल स्वार्थी मनुष्य ,गिरे हुए स्तर के पशु तुल्य मूढ़ पामर लोग अपने स्वार्थ के लिए
खुद को भी गाली देने से नहीं चूकते हैं,ऐसे लोग हर समाज के लिए बोझ है और उनकी
चुनावी हार ही अब जरूरी है ताकि स्वस्थ भारतीय समाज का निर्माण पोषण पा सके          

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