शनिवार, 28 सितंबर 2013

आप का क्या कहना है -

आप का क्या कहना है -

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने 'दांग़ी सांसदों और विधायकों' पर लाए गए यूपीए 
सरकार के अध्यादेश को 'बकवास' करार देते हुए कहा है कि इसे फ़ाडकर फेंक देना
चाहिए.

१. कांग्रेस की धूमिल हो रही छवि को बचाने का प्रयास 

२.शीघ्र चुनाव की आहट

३.मोदी की साफ छवि का भय 

४.खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की लालसा 

५.प्रधानमन्त्री को चोर दागी लोगो का पक्ष लेते दिखाना

६.UPA के गठबंधन में फेरफार 

७.अपने मतलब के लिए उपयोग करो और फेंको की नीति   

बुरे फंसे नानसेंस

बुरे फंसे नानसेंस 

चने के झाड़ पर पंच चढ़ गए तो गुज्जु ने हाथ खिंच लिए और हाथ खींचते ही पंच
फस गए कि अब इस हड्डी को कैसे उगले.उस दिन तो गुज्जु बड़ा भाईपना दिखा
रहा था -जोर जोर से चिल्ला रहा था -  चोर-चोर मोसेरे भाई !माँ ने कहा था कि ये
गुज्जु  बड़ा तीसमारखा है मगर हम ही नहीं माने ,माँ तो पटखनी खा चुकी थी
इसलिए डांट रही थी . सब पंचों ने विलाप किया -बबलू ,कुछ सोचो ,वो तो अनर्थ
करके भाग लिया और पिंडा अपने बांध गया .

बबलू बोला- तुम लोग तो खाए खेले हो ,ये फैसला तो सबके हक़ मैं था ,मेरे जीजू के
हक़ में था ,ये वाले अंकलजी ,छुक छुक वाले अंकलजी ,सिगड़ी वाले अंकलजी ,
फोन वाले अंकलजी ,भेंस वाले और बंगले वाले अंकलजी सबके हक़ में था ,नाश
हो उस गुज्जु अंकल का जो हाँ -हाँ में सर हिलाता रहा और अब साफ ना कर बैठा ,
अब मैं तो नया रंगरूट ,मैं क्या जानू कि चक्रव्यूह कैसे तोडा जाता है ,मैं तो इस
खटपट से दूर मामा के घर जाउंगा .

बबलू की बात सुन सब के मुंह उतर गए ,सब गले में अटकी हड्डी को लेकर परेशान
थे ,आखिर में तकले अंकल ने कहा - लुन्गीवाले,सब लपेटे में आ गए हैं ,गले में अटकी
ये हड्डी से गला लहुलुहान हो गया ,करमजले तूने ही तो कहा तो सब सेट हो गया ?

लुन्गीवाला बोला -सब सेट था ,मगर ये गुज्जु !हाँ कह रहा था की ना कह रहा था
ये समझने में मार खा गया और ऊपर से दादा भी दांत किटकिटा रहे हैं और सुपर
सर तो दूसरा धमाका नापसंद बम्ब से भी कर चुके हैं .

खुरखुरे बोला -एक उपाय है ,अम्मी के पास चलते हैं ,विलायती बादाम की खोपड़ी
में जरुर कुछ छटकने का उपाय होगा .

सब के सब अम्मी के घर की ओर भागे .सबको भागते देख अम्मी समझ गयी की
जरुर कुछ कलई खुलने वाली आफत आन पड़ी है .

अम्मी बोली -क्यों सिटपिटाये हो कर्मजलों?

दुग्गी बोला -गेम पेक होना है ,वो तो साहूकार बन गाँव भर में डुगडुग्गी पिट रहा है
और कह रहा है -मैं साहूकार ,अब अम्मी क्या करे ,हाय रे हड्डी ....

अम्मी बोली -फिक्र ना करो ,बड़ा चमचा तो अब काम आने वाला नहीं है इसलिए
उसे तोड़ दो !

सब एक साथ बोले -हैं ...!!! .फिर समझ गए तो तालियाँ बजा उठे और लगे बड़े
चमच्चे को घिसने .

बबलू भी जोश में आ गया और बोला -देखो,मैं इस चमचे के दो टुकड़े करता हूँ ,
तुम सब जयजयकार करना .

बबलू ने गाँव की टंकी पर चढ़ कर ऐलान किया -बेवकूफ,अब नयी पिक्चर का
हीरो अपुन खुद बनेगा  और बड़े चमच को घिस दूंगा

बाकी के कुछ चमचों ने तालियाँ बजाई ,समर्थन किया ,तुरंत थूंका तुरंत चाटा
और बड़ा चमचा दूर पड़ा कराहा-अपुन ने कुछ नहीं किया ,अपुन ने सबको खिलाया ,
अपुन का पेट भूखा है     

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

हम सुरती लाला

हम सुरती लाला 

सूरत के बासिन्दे अपनी जिन्दादिल्ली के लिए मशहूर हैं यहाँ के लोगों के लिए समस्या
या विपति  भी उत्सव से कम नहीं है . बाढ़ ,भूकंप ,महामारी कोई भी आपत्ति क्यों न हो ,
यहाँ के लोग समस्या से दो दो हाथ भी मुस्कराते हुए करते हैं ,आप जो तस्वीर देख रहे हैं
यह ताप्ति नदी के प्रचंड रोद्र रूप की है ,डेम से छोड़ा जा रहा अतिरिक्त जल से तापी रोद्र 
होकर बह रही है और इस कारण शहर के निचले हिस्सों में पानी आ गया है ,मगर 
सुरती बेफिक्र होकर इस समस्या को भी उत्सव की नजर से देखने उमड़ रहे हैं ,समस्या
को नजदीक से देखना उसे समझना उस पर विश्लेष्ण करना और फिर मिलझुल कर समस्या
से दो दो हाथ कर उसे पराजित कर देना यह सुरतीयो की खास विशेषता है  




यहाँ का बचपन निडर है ,ताप्ति रोद्र रूप में बह रही है
पर बच्चे इसे समझने की चेष्टा कर रहे हैं ,जिस धरती के बच्चे निडर हो
उस के बासिन्दे निश्चित ही कर्म शाली ही रहेंगे तभी तो व्यापार और उद्योग यहाँ फलते फूलते हैं


The southwest Monsoon has been vigorous over Gujarat state. (Photo courtesy: Hanif Malek)


इस पुल को ध्यान से देखिये यहाँ कारें चल नहीं रही है ,पार्किंग की है ताकि संभावित
बाढ़ से नुकसान ना हो ,यह विनोदप्रिय शेली यहाँ के लोगों को समस्या नहीं लगती है
एक को देख कर दूसरा भी अपनी कार को बाढ़ से बचाने पुल को पार्किंग करता जा रहा है
यहाँ के लोग मस्त रहते हैं ,हँसते खिलखिलाते हैं ,काम करते हैं परिश्रमी हैं ,जिन्ददिल्ली
के कारण ही इन्हें सुरती लाला कहा जाता है

यहाँ का यौवन सडको पर अटखेलियाँ करता है ,रोमांस करता है पर हमें परवाह नहीं हैं
क्योंकि सडक किनारे बैठ कर बतियाना  युवा दिलों को खूब भाता है .

हम बारिस देखने भी जाते हैं प्लेग से भी नहीं घबराते हैं कर्फ्यू को देखने का आनंद सडको
 पर जाकर ले आते हैं ,बाढ़ भूकंप या अन्य  आपदा सुरतियों के हौसले आज तक नहीं तोड़ पायी है


रविवार, 22 सितंबर 2013

सूत्र -जाकी रही भावना जैसी ( रामचरित मानस से )

सूत्र -जाकी रही भावना जैसी ( रामचरित मानस से )

सूत्र यानि वह पद्धति जिसको हर काल में लागू करने पर समान परिणाम प्राप्त होता
है उस पर काल ,परिस्थिति,स्थान का प्रभाव नहीं पड़ता है। तुलसी कृत मानस सफल
जीवन पद्धति के सूत्रों से भरी पड़ी है। उसी से एक सूत्र उठा रहे हैं "जाकी रही भावना
जैसी"

भावना यानि मन में उठने वाले विचार। हर विचार दो प्रकार का होता है  एक सकारात्मक
और दूसरा नकारात्मक। दोनों ही भाव परस्पर विरोधी परिणाम देने वाले हैं ,वस्तु
तठस्थ होती है परन्तु भावना अलग-अलग होती है। उस वस्तु के प्रति हमारे जैसे भाव
होते हैं उसी रूप में वह प्राप्त हो जाती है।

हमारा क्रिकेट खिलाड़ी युवराज एक गंभीर बिमारी से पीड़ित हो गया और बिमारी को
पराजित कर पूर्ण रूप से स्वस्थ भी हो गया। बीमार होने से स्वस्थ होने तक उस खिलाड़ी
के भाव उस बिमारी के प्रति क्या रहे होंगे ?क्या वह बिमारी से भयभीत होकर निराश
हो गया या बिमारी को समूल नष्ट करने के भाव से विजयी हो गया ,वह खिलाड़ी बिमारी
को हरा चूका था  …. यह चमत्कार हुआ कैसे ?उत्तर है उसकी विजयी होने की भावना से।

मनुष्य जब भी जीवन क्षेत्र में उतरता है तो उसे क्या धन सम्पति लेकर उतरना चाहिए ?
यदि आपको उत्तर हाँ में है तो इस लेख को आगे पढना बंद कर दीजिये क्योंकि यह
आपके लिए नहीं लिखा जा रहा है यह उनके लिए लिखा जा रहा है जो हाथ से खाली
और भावना से सम्पन्न हैं।

हम जब जीवन के क्षेत्र में उतरते हैं तो हमारे पास वस्तु को सही रूप में देखने और
समझने की क्षमता होनी चाहिए। वस्तु को देखने का भाव और नजरिया सकारात्मक
ही होना चाहिए। यदि हम अपने लक्ष्य के प्रति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों
चिंतन एक साथ रखेंगे तो हम अपने लक्ष्य को कभी भी प्राप्त नहीं कर पायेंगे चाहे
दैव कितना ही अनुकूल क्यों ना हो। अगर हम अपने लक्ष्य को ठीक वैसा ही देख रहे
हैं जैसा हमने सोचा है तो विजय के हम निकट आ जाते हैं उसके बाद ठीक वैसा ही
होने लगता है जैसा होना चाहिए।

हमारे देश के एक मुख्य मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण लीजिये उनके ऊपर विरोधी
नेताओं ने एक दंगे को भड़काने का आरोप लगाया लेकिन उन्होंने उस आरोप को
सकारात्मक भाव से देखा और तुरंत चुनाव घोषित करवा दिए और उसमे विजयी
हुये ,अगर उन्होंने उस चुनौती को नकारात्मक भाव से लिया होता तो विजय रथ रुक
भी सकता था।

हमारे देश के प्रधान मंत्री ने कहा था कि मेरे पास जादू की कोई छड़ी नहीं है जिससे
तुरंत समस्याओं का हल आ जाए ,यह कथन नकारात्मक भाव से भरा था और
नतीजा यह है कि देश मुश्किल दौर से गुजर रहा है ,यहाँ मेरा आशय किसी की प्रसंशा
या आलोचना करना नहीं है मेरा तात्पर्य है वस्तु को देखने के भाव से जुड़ा है।

कुछ दिन पहले देश के युवा नेता ने कहा था कि "तीन चार रोटी खायेंगे -सौ दिन काम
करेंगे -दवाई लेंगे  …। "यह कथन नकारात्मक और संकुचित दृष्टिकोण रखता है
इसको सुनकर देशवासी उत्साह से लबरेज नहीं हुआ ,क्यों  ……।

एक कथन अमेरिका के टावर हमले के समय राष्ट्रपति ओबामा का आया -"जिसने
भी यह अपराध किया है वह क्षमा का पात्र नहीं है उसे दण्डित करके ही रहेंगे "यह वाक्य
अमेरिकन प्रजा में आशा का संचार कर गया और उस विकट घड़ी में ओबामा को
पुरे राष्ट्र का समर्थन मिला।

हम अपने लक्ष्य के प्रति कैसा नजरिया रखते हैं यही महत्वपूर्ण है। यदि हम दृढ
निष्ठा,दृढ संकल्प के साथ आगे बढ़ते हैं तो उस लक्ष्य को पूरा करने का उत्तरदायित्व
प्रकृति स्वत:उठा लेती है। हमे अपने लक्ष्य को पूरा करने वाले लोग साधन मिलते
जाते हैं ,अगर ऐसा नहीं होता है तो निश्चित मानिए लक्ष्य पवित्र नहीं है ,कल्याणकारी
नहीं है। 

हमें शुभ नजरिया रखना है ,आशावादी विचारों से मन को भरे रखना है ,विजय का
विश्वास चेहरे से छलकना चाहिए हमारा संकल्प अटूट और अटूट उत्साह मन में
रखना है उसके बाद खुद को परमात्मा का अंश मानकर विराट भाव से कर्तव्य पथ
पर बढ़ जाना चाहिए  …। परिणाम अनुकूल ही रहेगा इस पर कोई शंका करने की
आवश्यकता नहीं है।
पत्थर में भी विराट परमात्मा को देखने का नजरिया रखिये। समस्या को झुका दीजिये ,
निराशा के भाव को दूर फ़ेंक दीजिये क्योंकि आप उस ईश्वर के अंश है जो सर्वसमर्थ है।
ये सब पदार्थ ईश्वर ने अपनी सन्तान के लिए आपके लिए ही तो बनाये हैं ,बस क़दम
बढ़ा दीजिये  ………………।       

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

बड़ी मज़बूरी है

बड़ी मज़बूरी है 

कैसे साधे इस पे निशाना, बड़ी मज़बूरी है 
मौन कुर्सी की टाँगे, इसने ही टिका रखी है 
सबूत हटाये इन्ही हाथों से, बड़ी मज़बूरी है
उसके हाथों ने चाबी ,कुर्सी की थाम रखी है 

गुम करनी थी ये फाइल, बड़ी मज़बूरी है 
कुछ स्याह तस्वीरे उसमे भी लगा रखी है 
थी टावर में कुछ गड़बड़, बड़ी मज़बूरी है 
कई काली चोंचों ने, गर्दन जो दबा रखी है 

सर्किट से पकड़ना आग, बड़ी मज़बूरी है 
जलते कुछ कागज ने, साख बचा रखी है 
लछमी का गिरते जाना, बड़ी मज़बूरी है 
जानो हूँ खिलौना,चाबी कहीं ओर रखी है 

मजदुर के घर भी रोटी, बड़ी मज़बूरी है
बस वोटों तक प्यारे, कंठी पहन रखी है 
तेरी बासी बस्ती में हम, बड़ी मज़बूरी है
हैं पक्के सियार ,गाय की खाल रखी है  

 

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

जननायक की जय हो

जननायक की जय हो

फूट गए जन-जन के किस्मत 
जब खलनायक ही अधिनायक 
क़ोम -क़ोम में लहू बहाकर 
कहलाते खुद को जननायक 

शाख -शाख पर उल्लू  बैठे 
साध रहे सब अपना मतलब 
जिस माता की कोख से जन्मे 
उसे उझाड़े क्रूर खल नालायक  

भारत माँ का भाग्य विधाता 
किसकी करनी किसको भरनी 
बस लाश गिरे, हो हिंसक बस्ती 
है कुटिल इरादा कुरसी मिलनी 

उत्तर दक्षिण पूर्व पश्चिम
धुं -धुं कर हर दिशा जले 
मारो काटो अमन चैन को 
नफरत का नंगा नाच चले

चाहे पराजीत हो प्रजातंत्र
चाहे जनतंत्र की कुर्बानी हो 
कीमत कितनी भी लग जाए 
गूँजे अधिनायक की जय हो 

रो-रो कर जन-जन पुकारे- 
जय हो,जननायक की जय हो

  
   



बुधवार, 18 सितंबर 2013

इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरी माँ के आँचल में पनाह पाता हर धर्म
मेरी माँ कि छाती से पोषित सब संस्कृति
मेरी माँ की गोदी में प्रफुल्लित है हर कोम
इसीलिये गर्व है -मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे वेद की ऋचाएँ मुझे सम दृष्टा बनाती है
मेरे उपनिषदो से धारा स्नेह की बरसती है
मेरे पुराणों की गाथा सत्य की लौ जलाती है
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे राम सिखाते हैं जीना आदर्श जिन्दगी
मेरे श्याम गाते हैं निष्काम कर्म है बन्दगी 
मेरे शंकर पीते रहे गरल बचाने को सृष्टि
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।

मेरे दिल में है रसखान मेरे मन में कबीरा है
मेरे दर्शन में महावीर भुजा में गुरु गोविन्दा है
मेरी धडकन में बसी टेरेसा मेरे कर्म में बुद्धा है 
इसीलिये गर्व है- मैं हिन्दू हूँ ,हिंदुस्तानी हूँ।


रविवार, 15 सितंबर 2013

हें -हें …हिंदी बोलता तू !!

हें -हें  …हिंदी बोलता तू !!

हिंदी दिवस है और हिंदी बोलना है ,यह देश चलाने वाले कर्णधारों को एक मिठ्ठी सजा
है वरना धकाधक इंग्लिश झाड़ना इनकी आदत है।

हिंदी अभी राष्ट्र भाषा की गरिमा और ताज से दूर है क्योंकि हमारे संविधान ने यह
ताज हिन्दी को नहीं बख्शा है।

हम अंग्रेजी के दीवाने हैं ,जो व्यक्ति फिरंगी भाषा में ऊल जलुल कुछ भी बक देता है
तो हम उसको ऊँचे दर्जे का साहब समझने लग जाते हैं। हम अपनी रगो में हिंदी को
बहने ही नहीं देना चाहते हैं क्योंकि हमें घर का जोगी जोगना और बाहर गाँव का
सिद्ध लगता है।

हिंदी बोलने वाले को आज अच्छी नौकरी और छोकरी नसीब नहीं होती है और ये
दोनों जीवन जीने के लिए जरुरी है। जब भी कोई पढ़ा -लिखा नौजवान किसी
महत्वपूर्ण सभा में राज भाषा में बोलने लग जाए तो कोई ना कोई फुलझड़ी बोल
पड़ती है - हें -हें  …हिंदी बोलता तू !!

हमारा भविष्य जब अंग्रेजी में बोलता है तो हम गर्व महसूस करते हैं और सोचते
हैं कि हमारे बुढ़ापे में सुखद समय आने वाला है ,इस मृग तृष्णा से हम बच नहीं
पाते हैं और खुद अपनी खुशियाँ कम करके देश के भविष्य को फिरंगी भाषा के
हवाले कर प्रगती के शिखर को तय करना चाहते हैं। हम बैसाखियों के सहारे चोटी
पर पहुंचना चाहते हैं इसलिए हम अढाई दिन में एक कोस चलते हैं।

हमारे नेता ,वाह! क्या कहना -जब देश का बजट भाषण संसद में पढ़ते हैं तो बड़े
गर्व से इंग्लिश जबान में बोलते हैं ,बेचारा देश उनके चेहरे को देख अपने भाग्य
को फोड़ता है ,हमारे प्रधान संसद में बड़ी सहजता से हिंदी को दरकिनार कर देते
हैं और फिरंगी भाषा में भारत निर्माण की बातें करते हैं। लोकसभा और राज्यसभा
में हिन्दी अपनी माथे की बिन्दी भी सुहागिन आधुनिका के ललाट की बिंदी की तरह
खोती जा रही है।

मुन्शी प्रेमचंद को कौन भारत रत्न देगा और क्यों देगा ? उन्होंने जो कुछ किया देशी
भाषा में किया और देशी का मोल गुलाम आत्माएँ कैसे समझे ?

हम विकास की बातें इंग्लिश में करते हैं और तुर्रा यह ठोकते हैं कि हिंदी अंतर्राष्ट्रीय
भाषा नहीं है इसलिए मज़बूरी में बोलना पड़ता है  … वाह रे कपूत !किसे उल्लू बना
रहा है ,इस देश के अगले कदम पर चीन है और वह अपनी भाषा के साथ विकास का
पर्याय बन रहा है,क्या चीन की भाषा विश्व के पल्ले पड़ती भी है ?

फिरंगी भाषा का बेजा फायदा नेता लोग उठा लेते हैं। वो जिनके सामने भाषण करते
हैं ,उनकी बर्बादी पर अंग्रेजी में बोलते हैं और उनसे तालियाँ भी बटोर लेते हैं!

बड़ी मुश्किल से बड़े लोग हिंदी दिवस पर इस तरह बोलते हैं -

"आज हिंदी दीन है,हमे एक भी वर्ड आज अंग्रेजी में नहीं बोलना है ,आज मेरा लेक्चर
हिन्दी के वास्ते हैं ,मैं इस टाइम आपसे वादा करता हूँ कि इण्डिया में हिंदी को डवलप
करने का हार्टली प्रयास करूंगा। बाई  ……  

रविवार, 8 सितंबर 2013

हिंदु सन्त समाज को बदनाम करने में व्यस्त मिडिया

हिंदु सन्त समाज  को बदनाम करने में व्यस्त मिडिया 

टेलीविजन के समाचार चैनल वर्तमान में क्या दिखा रहे हैं ? जो अपने आप को
लोकतंत्र का एक स्तम्भ समझते हैं वे एक व्यक्ति के दुर्गुणों को चटखारे लेकर
प्रस्तुत कर रहे हैं। हिन्दुस्थान में लाखों हिन्दू संत और सन्यासी हैं जो पूज्य ,
दिव्य और विद्धवान हैं,मेने कभी टेली मिडिया को उनके सुविचारों और कार्य
कलापों का गुणगान करते हुए कभी नहीं देखा। मेने कभी टेली मिडिया पर उनके
द्वारा किये जा रहे लोक कल्याण कार्यों पर विभिन्न तथाकथित विद्धवानो को
उनके गुणगान करते नहीं देखा। इसके पीछे क्या कारण हैं  ……

      हम देख रहे हैं कि लाखों सन्त समाज में से एक संत के घिनोने काम को किस
तरह मिडिया दिन रात बता रहा है जैसे देश की सबसे बड़ी समस्या वो अकेला ही है।
इस देश के संसद के मन्दिर में हल्के दर्जे के कुछ सांसद बैठे हैं उनके आचरण को
लेकर यह मिडिया इतना क्यों नहीं चिल्लाता है क्या उनका देश लूटने का आचरण
किसी व्यभिचार से कमतर है ?मगर मिडिया का मकसद कुछ  …. ।

    अन्य धर्मो के कुकर्मो पर पर्दा डालने वाला मिडिया करोड़ो हिन्दुओं की भावनाओं
का अपमान क्यों कर रहा है ,जबकि वह जानता है कि अपराधी को दंडित करने के
लिए एक स्तम्भ अपना काम कर रहा है,क्या मिडिया खुद को न्याय का देवता
समझता है या फिर किसी की घिनोनी हरकत से खुद की कमाई  …। ।

      गँगा नदी को प्रदुषण मुक्त करने की मुहीम में प्राण गवाने वाले हिन्दू संत पर
ये मिडिया चुप क्यों था ,जिस तरह आशाराम के कुकर्म को और उसकी गिरफ्तारी
को भरपूर उत्साह के साथ बताया था मगर प्रदुषण मुक्त गँगा के लिए प्राण
 न्योछावर करने वाले संत से यह मिडिया दूर क्यों भाग रहा था ? क्यों  … ?

    ये कुत्सित मानसिकता वाले समाचार वाचक एक आशाराम के कारण समस्त
संत समाज को बदनाम करने पर क्यों तुले हैं ,शायद इसका एक उत्तर यह भी हो
सकता है कि हिन्दू संत क्षमा और करुणा को धारण किये रहते हैं और सद्भावना के
मूल सिद्धांत पर जीवन जीते हैं। क्या किसी कट्टरपंथी या ईसाई पादरियों के कुकर्मो
पर ये अपना मुँह खोलने का साहस भी करते हैं ? शायद नहीं ,क्योंकि वो उसका
अंजाम समझते हैं या फिर जानबूझ कर चुप्पी साध लेते हैं । 

   पाप का उदय कभी भी किसी में भी हो सकता है ,क्या मिडिया अपने को चरित्रवान
समझता है ?क्या मिडिया अपने कर्तव्य का निष्काम पालन करता है ? मिडिया में
ज्यातर महानुभाव अच्छे हैं मगर सब के सब तो अच्छे नहीं हैं ना। जब मिडिया में
अच्छे और कुत्सित दोनों प्रकार के लोग बैठे हैं तो विशाल हिन्दू संत समाज में
कुछेक पाखंडी भी बैठे होंगे इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है। कुछ गलत लोगों
के कारण पुरे संत समाज को विश्व फलक पर संदेह के घेरे में खड़ा करके यह ओछा
मिडिया क्या सिद्ध करना चाहता है ?

   यह देश तुलसी का है ,रहीम का है ,मीरां का है ,रसखान का है,कबीर का है,नानक का
है ,ख्वाजा का है ,विवेका नन्द का है। हमें अपने इन विद्धवान संतों पर गर्व है। मिडिया
अपने कर्तव्यों का ठीक निर्वाह करे ताकि जनता में उसकी विश्वसनीयता बनी रहे 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

सफल जीवन और आचार्य तुलसी

सफल जीवन और आचार्य तुलसी 

चट्टान -किसी के पथ की बाधा बन सकती है और किसी के लिए सीढ़ी का एक चरण
यह हम पर निर्भर करता है कि हम मार्ग में आई चट्टान को किस नजरिये से लेते हैं।

समस्याओं के समाधान के लिए हमे स्वयं ईश्वर बनना पडेगा यानि हम ये सोच
कर समय व्यतीत कर दे कि हमारी समस्या कोई और सुलझायेगा तो यह बड़ी भूल
होगी

सफलता का अमोघ अस्त्र है -श्रम और साधना ,हमे मेहनती बनना पडेगा और विषय
का पूरा ज्ञान प्राप्त करना होगा।

चिंता नहीं ,चिंतन करो। व्यथा नहीं,व्यवस्था करो। प्रशस्ति नही,प्रस्तुति करो।

हम समस्या का समाधान नहीं कर सके कोई बात नहीं ,स्वयं समस्या ना बन जाए
इसका ध्यान रखना होगा ,अच्छे काम में हमे नहीं पूछा गया इसलिए कोई ना कोई
अडंगा डालना अनुचित है।

अशांति का मूल कारण आवश्यकताओं की वृद्धि है।

खुली आँख से देखे ,ठंडे दिमाग से सोचे ,पूर्ण निष्ठां से कार्य क्षेत्र में उतरे। ये करने से
कभी असफलता नहीं मिलेगी।

व्यक्ति की मन्जिल कितनी ही दूर क्यों नहीं हो ,उसे चलना तो एक-एक कदम ही
है। वर्तमान का यह कदम सही दिशा में है और पूरी मजबूती से टिका है तो अगला
कदम रखने के लिए ठोस धरातल स्वयं उपलब्ध हो जाएगा।

विस्फोट ध्वंस के लिए भी होता है और सृजन के लिये भी।

परिस्थितियाँ सबके सामने होती है ,पुरुषार्थी व्यक्ति उन्हें पारकर आगे बढ़ जाता है
और निष्क्रिय व्यक्ति उसके सामने घुटने टेक देता है।

थोडा सा ज्ञान प्राप्त करते ही व्यक्ति में अहंकार जग उठता है ,अभिमान का नशा
छा जाता है ,विनम्रता भूल जाता है ,यह क्या है ? ज्ञान या अज्ञान  … ?

आत्मविश्वास के अभाव में विकास का स्वप्न कभी साकार नही होता है।

तुम भाग्य की ओर मत झांको ,तुम झांको उस पुरुषार्थ की ओर जो तुम्हारे भाग्य
की रचना करता है।

इस संसार की सबसे बड़ी कला है दुसरो के ह्रदय को स्पर्श करना।

जो व्यक्ति अपने अतीत के पन्ने को नहीं पढता ,कार्य कारण के परिणाम पर
दृष्टि नही डालता ,जाग्रति और अभ्युदय ,भूल और सुधार के पन्ने नहीं उलटता ,
वह सफल व्यक्ति नही बन सकता।

विकास का अर्थ है जो सोये हुए हैं उन्हें जगाओ और जो जागे हुए हैं उन्हें प्रगति
की ओर ले जाओ।

धर्म की भूमिका यह होनी चाहिए कि अपनी बुराई को व्यक्ति स्वयं में समेटे
और अपनी अच्छाई को समाज में फैलाए। 












Sun Le Bapu Yeh Paigam

Sun Le Bapu Yeh Paigam Lyrics from Baalak

Sun le bapu yeh paigam, meree chitthi tere nam
Chitthi me sabse pehle, likhata tujhko ram ram
Likhata tujhko ram ram, sun le bapu yeh paigam.......

Kala dhan kala vyapar, rishwat kaa hai garam bajar
Satya ahinsa kare pukar tut gaya charkhe kaa tar
Tere anashan satyagrah ke badal gaye asali bartav
Ek nai vidya upaji jisko kehte hain gherav
Teree kathin tapasya kaa yeh kaisa nikla anjam

Prant prant se takarata hai maya par bhasha ki lat
Mai panjabi too bangali kaun kare bharat ki bat
Teree hindi ke panv me angreji naa dali dor
Teree lakdi thago ne thag li, teree bakari le gaye chor
Sabaramati sisakati teree tadap raha hai sevagram

Ram raj ki teree kalpana udi hawa me ban ke kapur
Bachcho ne padhana choda tod phod me hain magarur
Neta ho gaye dal badlu desh ki pagadi rahe uchhal
Tere put bigad gaye bapu daru bandi huyi halal
Tere rajghat par phir bhi phul chadhate subah sham