गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

मोदी से भय क्यों है अन्य दलों को ?

मोदी से भय क्यों है अन्य दलों को ?

राष्ट्रिय राजनीति में नरेन्द्र मोदी जैसे ही आये बूढ़े और नये सभी राजनैतिक पार्टियों 
में सुनापन आ गया ,कुछ हक्के बक्के हैं तो कुछ बेहोश ,चारों तरफ सभी दलों में 
हाहाकार मचा है -रोको ,रोको  … मगर सबके उपाय अभी तक निरर्थक साबित हो 
रहे हैं ,क्या कारण है मोदी से भय खाने का --
1 .छद्म धर्म निरपेक्षता के खोल के लितरे हो जाना -ज्यादातर पार्टियाँ खुद को छद्म 
धर्मनिरपेक्षता की केंचुली में छुपाये रखना पसंद करती है जबकि यथार्थ के धरातल 
पर उन्होंने उनको अभी तक मुख्य प्रवाह से जोड़ा तक नहीं है। 66 वर्ष से तथाकथित 
धर्म निरपेक्ष सरकारे राज करती रही है मगर उनको साथ नहीं सिर्फ अँगूठा दिखाया 
है और मोदी इसी तथ्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि वो शठ को शठ और सज्ज्न 
को सज्ज्न कह देते हैं 
2. उदारीकरण का असफल हो जाना -देश को जबसे उदारीकरण के दौर में लाया गया 
तब से देश पिछड़ रहा है ,वर्तमान भी भूतकाल से कुछ सीख नहीं पा रहा है जिसका 
कुफल यह हुआ कि आम आदमी कि रीढ़ ही टूट गयी है और हम 26/-कमाने वाले को 
अमीर की श्रेणी में रख विश्व को और खुद को गुमराह कर रहे हैं। आज हम स्वदेशी का 
जनाजा निकाल कर FDI को प्रोत्साहन दे रहे हैं ,हमारा आलू हमसे १०/- में खरीद कर 
४००/-में चिप्स हमे ही खिला रहा है। हमारे ही पानी का दुरूपयोग कर हमे ही १५/- की 
पेप्सी कोक पिला रहा है  और मोदी गुजरात में देश के उद्योगपतियों कि पीठ थप थपा 
रहा है 
3. महँगाई कि सुनामी - इस उदारीकरण के कुचक्र से महँगाई कि देश में सुनामी आ गई 
है ,२६/-वाला अमीर भूख से बिलबिला रहा है ,मध्यम वर्ग के आँसू यह सरकार पोँछ 
नहीं पायी है ,आये दिन वादे और आश्वासन। … मोदी २६/- वाली अमीरी को बचपन में 
भोग चुके हैं और इसीलिए वो नागरिकों से सवाल करते हैं कि क्या क्या मिलता है २६/-में 
और जनता इनको आजमाने कि कोशिश में लगी है 
4. भ्रष्टाचार - विदेशों में भारतीय प्रधानमंत्री को इसलिए भी जाना जाता है कि वे अच्छे 
अर्थशास्त्री हैं मगर भ्रष्ट टोले के मुखिया है। इस सरकार के काल में बहुत ही कलंकित 
भ्रष्टाचार के कारनामे हुये हैं मगर किसी से आज तक देश का लूटा हुआ धन वापिस 
नहीं ले पाये और मोदी खुद बेदाग़ शासन दे रहे हैं और पुरे देश को देने का वादा भी कर 
रहे हैं 
5. रोजगार के अवसरों का अभाव -देश का युवा पढ़ने के बाद भी रोजगार का रास्ता 
नहीं ढूंढ पा रहा है ,बेरोजगार डिग्रीधारी हताश और निराश है ,उसके दोनों हाथ काम 
चाहते हैं मगर काम नहीं है और मोदी के शासन में बेरोजगार अन्य प्रदेशो की तुलना 
में बहुत कम है और मोदी जब युवाओ से भारत के भविष्य को जोड़ते हैं तो युवा 
खिल उठता है 
6. गिरती विकास दर - अर्थव्यवस्था का पहिया चरमरा रहा है ,सरकार अपना दामन 
साफ बताने के लिए पुरे विश्व को दोषी ठहरा देती है ,सबका बुरा हाल है तो हमारा तो 
होना ही है ,गाँव के सब बच्चे फेल हो गए तो मास्टरजी का बच्चा कैसे पास होगा ?
मोदी अपने राज्य को पुरे विश्व के गिरने पर भी सम्भाले हुए दौड़ रहे हैं। समूचा विश्व 
उन्हें देख रहा है और वो करिश्मा दिखा भी रहे हैं 
7. नए सूत्र नए सपने -सरकार एक तरफ कहती है कि गरीब जनता को दी जा रही 
सब्सिडी हटानी पड़ेगी और दूसरी ओर २/- किलो अनाज देने कि बात करती है। अजीब 
विरोधाभास   … चुनाव के साल में रेवड़ियाँ बाँटने का समय बीत गया है। देश आगे 
बढ़ने कि बात सुनना चाहता है और ये वही घिसे पिटे सूत्र आजमा रहे हैं और मोदी 
कहते हैं -नेशन पहले ,सबका साथ -सबका विकास   

ये कुछ मुख्य कारण हैं जिनके कारण पुराने और नए दल बोखला गए हैं और मोदी 
के भय से बीमार हैं   

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

पुराने कपड़े और संतुष्टी

पुराने कपड़े और संतुष्टी 

कुछ साल पहले का वाकया है और हर कस्बे ,शहर और महानगर में घटित होता
रहता है। वाकया यह था कि सडक के किनारे स्टील और प्लास्टिक के बर्तन लिए
दो -तीन औरते बैठी थी और कभी कभी आवाज भी लगा देती थी -पुराने कपड़े दे
दो ,बर्तन ले लो।

  गली की कुछ औरते पुराने कपडे लेकर गयी और मोल भाव करके पुराने कपड़े
देकर बर्तन ले आयी ,नए बर्तन लाने वाली औरतों में मेरी पत्नी भी शामिल थी
जब रात को मैं दुकान से लौट कर घर आया तो उन्होंने वे बर्तन मुझे दिखाए जो
पुराने कपड़ों के बदले लिए थे और बर्तनों को चाव से देख भी रही थी और सामने
वाले भाभी की प्रशंसा भी कर रही थी जो भाव ताव करके कम कपड़ो में ज्यादा
बर्तन दिलवा दी थी।

मेने पत्नी से पूछा -ये बर्तन कितने कपडे देकर लिए हैं और बाजार से खरीदती
तो कितने में आ जाते ?

उन्होंने बताया -मेरी पुरानी सात साड़ियाँ और आपके और बच्चो के मिलाकर
दस जोड़ी कपडे थे और बाजार से खरीदने पर चार सौ रूपये तो लग ही जाते।

मेने उनको समझाते हुए कहा -वैसे आपने जो किया वह अनुचित नहीं है लेकिन
क्या कपड़ों के बदले सामान लेने से आपको संतुष्टि मिली ?

वो बोली - ना ,मगर पुराने कपड़ो में जो मिला वह ठीक ही है।

मेने कहा -आप इससे ज्यादा पा सकती हैं और मन में संतुष्टि भी मिल जायेगी।

वो बोली -कैसे ?

मेने कहा -आज से निश्चय करलो कि आप कोई भी पुराना कपडा देकर सामान
नहीं खरीदेंगी और जो कपडे अच्छे हालत में हैं उन्हें आप गरीबों में वितरित कर
दोगी। आपकी पहनी हुई साडी से किसी गरीब की लाज ढकी जा सके ,आपके
बच्चों के कपडे किसी गरीब बच्चे का तन ढक सके यह काम संतुष्टि देगा।

उसके बाद उन्होंने अपनी साड़ियाँ जो पुरानी हो जाती है उन्हें समय से कुछ पहले
उपयोग में लाना बंद कर देती है और अपने ही घर में काम करने वाली कामवाली
बाइयों को पहनने के लिए दे देती है।

हममे से बहुत से ऐसे भारतीय हैं जो नये वस्त्रों का दान करने की सामर्थ्य नहीं
रखते हैं मगर पुराने कपड़ो को बेच कर उसके बदले में वस्तु लेने के लालच से
बच सकते हैं, हम गरीब देश के वाशिंदे हैं और आज भी हर राज्य के पिछड़े और
वनवासी इलाको में वस्तुओ का घोर अभाव है ,हम सामर्थ्य के अंदर कुछ अच्छा
कर सकते हैं जिसे पाकर किसी अभावग्रस्त के चेहरे पर मुस्कान आ सकती है।

कृपया पुराने कपड़े जो पहनने योग्य हो तो उन्हें किसी अभावग्रस्त जरूरतमंद को 
दे दे ,आपका यह काम निश्चित रूप से आपको मानसिक संतुष्टि देगा।    

रविवार, 27 अक्तूबर 2013

सोच का फर्क

सोच का फर्क 

सब्जी मंडी नहीं कह सकते उस जगह को क्योंकि वह एक चौड़ा रास्ता है उसके आस
पास रहीश और अमीर लोगों की कॉलोनियां हैं। उस चौड़े रास्ते पर कुछ ठेले वाले
सब्जियां बेच कर अपना परिवार चलाते हैं।
एक युवती सब्जी वाले से पूछती है - भईया ,भिन्डी क्या भाव है ?
सब्जी वाले ने कहा -बहनजी ,पचास रूपये किलो।
युवती -क्या कहा !पचास रूपये !! अरे बड़ी मंडी में चालीस में मिलती है  …
सब्जीवाला -बहनजी वहां से लाकर थोड़ी थोड़ी मात्रा में यहाँ बेचना है  में मुश्किल से
दस किलो बेच पाता हूँ ,मुझे तो उसी दस किलो की बिक्री से घर चलाना है
युवती -तो क्या करे हम ,हम भी मेहनत से कमाते हैं ,देख पेंतालिस में देता है तो
एक किलो दे दे ?
सब्जीवाला उसे एक किलो भिन्डी पेंतालिस के भाव से दे देता है और अनमने भाव से
बाकी के पैसे लौटा देता है
वह युवती घर लौटती है और अपने पति से बताती है कि किस तरह वह भाव ताल
करके सस्ती सब्जी लाती है। पति उसको गर्व से निहारता है और मॉल में खरीद दारी
के लिए ले जाता है। वह युवती पर्स पसंद करती है और उसे पेक करने का ऑर्डर दे
देती है यह देख उसका पति बोलता है -रुक ,जरा भाव ताल तय कर लेते है ,तुमने तो
उससे भाव भी नहीं पूछा और सामान पैक करने का भी कह चुकी हो  ….
युवती बोली -आपकी सोच कितनी छोटी है ,ये लोग अपने को फटीचर नहीं समझेंगे ?
युवक बोला -अरे चीज खरीद रहे हैं ,भाव पूछने में क्या जाता है ,वाजिब होगा तो
लेंगे नहीं तो दुसरे से खरीद लेंगे
युवती ने कहा - देख नहीं रहे हो ,यहाँ सभी अपने से ज्यादा पैसे वाले लोग खरीदी
कर रहे हैं और चुपचाप बिल चूका रहे हैं ,आप मेरी इज्जत का कचरा करायेंगे मोल
भाव करके ,ज्यादा से ज्यादा सौ -दो सौ का फ़र्क होगा
 मॉल से पर्स खरीद कर वो दरबान को दस रुपया टीप देकर बाहर निकल आते हैं
ये घटनाएँ छोटी हो सकती हैं मगर बहुत गहरा प्रभाव देश पर छोडती है। एक गरीब
मेहनत करके परिवार का पेट इमानदारी से पालना चाहता है तो हम उससे मोल
भाव करते हैं और वो बेचारा पेट की भूख की मज़बूरी को देख सस्ता देता है और एक
तरफ धन्ना सेठों की दुकानों पर मुहँ मांगे दाम भी देते हैं। कभी हमे पाँच रूपये बचाना
होशियारी लगता है तो कहीं सौ -दो सौ लुटाना वाजिब लगता है।

फैसला कीजिये खुद कि क्या आप सही कर रहे हैं ,आने वाले पर्व त्योहारों पर गरीब
लोगों से सडक पर छोटी छोटी वस्तुओं पर भाव ताव करके पैसे मत बचाईये ,जैसे
आप त्यौहार हर्ष से मनाना चाहते हैं वैसे इन मेहनत कश लोगों को भी त्यौहार के
दिन उनका माँगा मुल्य देकर उनके घर भी कुछ पल रौशनी के आ जाए ,ऐसा काम
कर दीजिये ,  आपके घर जलने वाले दीपक से कोई झोपडी में ख़ुशी आ जाए तो
आप इसमें सह भागी बनिये।

ठीक लगे यह विचार तो आगे अपने दोस्तों में शेयर कीजिये। 

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

हम …………

हम  …………

1. पाप करने का मौका मिल जाए तो छोड़ते नहीं और मौका नहीं मिला तो ताक
में बैठे रहते हैं और मौका मिलते ही पाप कर बैठते हैं बदकिस्मती से पाप करने
का मौका नहीं बना पाये तो सज्जन का तुकमा अपने पर फिट कर लेते हैं

2. स्वच्छता और सफाई को पसंद करते हैं मगर अपने घर तक ,अपने घर का
कचरा बड़े मजे से सोसायटी या सड़क पर उछाल देते हैं और सारा दोष नगर
पालिका पर डाल देते हैं कि कर्मचारी पगार लेते हैं पर काम नहीं करते हैं

3 . मानते हैं की रिश्वत तब बुरी है जब दूसरा लेता और देता है मगर देने और
लेने वाले में एक जगह हम खुद होते हैं तो वह व्यवहार की परिभाषा में ही आता
है
4 . जन सेवक तब ही बुरा होता है जब वह सत्य पर अड़ जाता है और बुरी चीज
एक जगह ज्यादा समय तक नहीं टिक पाए इसलिए हम तबादला शस्त्र का
उपयोग करवाते हैं

5 . पराई वस्तु को महान समझते हैं चाहे वह पहनावा हो,भाषा हो,या स्त्री
अपना पहनावा जाहिल लगता है ,अपनी भाषा अशिष्ट और स्त्री गँवार जो
इनसे हट कर खुद को देखता है वह या तो मंदबुद्धि है या फिर ढोंगी या कोई
काल विशेष का जीव
6 . फटे में टांग अडाने वाला सफल राजनीतिज्ञ बनता है और नए वस्त्र की
सिलाई कहाँ से उधेडी जा सकती है और उसमे किस तरह से टांग अड़ाई जायेगी
पर माथा लडाने वाला महान रणनीतिकार बनता है
7 एक निर्धन जब भीख मांगता है तो उसे भिखारी कह दुत्कारते हैं लेकिन
सरकार जब सब्सिडी बाँटती है तब हम वारिस बन जाते हैं और हक़ से मांगते हैं  

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

प्याज और सिंहासन

 प्याज और सिंहासन 

प्याज एक सब्जी भर नही है क्योंकि किसी भी सब्जी में आज तक वह दम देखने को
नहीं मिला जो प्याज में है। सत्ता के सिंहासन से जमीन पर पटकने का काम सिर्फ
प्याज ही करता है।
             जिन राज्यों में चुनाव माथे पर है उन सत्ताधिशो को नींद नहीं आ रही है
कारण यह नहीं कि विरोधी हावी है बल्कि प्याज गरीबी रेखा से ऊपर उठ गया है और
मीडियम वर्ग के ठीक ऊपर से निकल कर रहीश लोगों की थाली में जा गिरा है।
          वैसे आज तक बहुत घोटाले हुये मगर आम आदमी सब घोटाले पचा जाता
है इसे हम लोगों के बढिया हाजमे के उदाहरण के तोर पर देखा जा सकता है मगर
प्याज का घोटाला  …. सब की जबान से चक चक शुरू हो जाती है!
         एक भाई वातानुकूलित दूकान में सब्जी खरीदने गये  काफी सब्जियां देखी
और कुछ सौ दो सौ ग्राम खरीदी भी थोड़ी देर में पहुँच गए प्याज के काउंटर के
पास ,गहरा साँस लिया और प्याज को नाजुकता से छुआ ,पुरे शरीर में करंट दौड़
गया। प्याज का गुलाबी चेहरा दमक रहा था और मादक खुशबु से भरा था। भाई
प्याज को एकटक निहारने का आनन्द लेते रहे और फिर मिलने का वादा कर
पेमेन्ट काउन्टर की और बढ़े। जब बिल मिला जो प्याज का दस रूपये भी लिखा
था। उसने दूकान वाले से कहा -मेने प्याज ख़रीदा नहीं तो दस रूपये क्यों लिखे हैं ?
दुकानदार बोला -प्याज के काउंटर के पास से गुजरने के पाँच रूपये और हाथ से
उठाकर या कुछ देर रुक कर खुशबु लेने के पांच ,श्रीमान आपने ये दोनों काम किये
इसलिए दस का चार्ज लगा।
         प्याज के दाम बढ़ने से बहुत सारे सरकारी महकमे और छोटे बड़े व्यापारी
संतुलित बल्ड प्रेशर से जीते हैं। जब ये दोनों पॉइंट जुड़ जाते हैं तो इन दोनों के
घर सिक्के खनकते हैं ,रोता है बेचारा पैदा करने वाला या फिर प्याज की बलि देने
वाली।
       प्याज के दाम बढ़ते ही विरोधी दल इस तेज गेंद को हवा में तैर कर पकड़ने
की फिराक में रहते हैं। प्याज के नाम पर आंसू टपकाते हैं ताकि जनता की संवेदना
टपके और फिर चालु खटखटिया सरकार टपके। जो काम विरोधी दल के बड़े बड़े
मुद्दे नहीं कर सकते वो अकेले प्याज देवता कर देते हैं।
    देश की हर रूलिंग पार्टी जगती और सोती रहती है। जागने और सोने को रेशियो
कुछ भी हो यह मुख्य नहीं है मुख्य बात है उसके पास पक्के आंकड़े प्याज की
पैदावार के सम्बन्ध में होने चाहिए बाकी सब आंकड़े मौसम विभाग वाले हो तो
चलेगा क्योंकि प्याज के अलावा सब जगह सुंदर भड़कीले बहाने मिल जाते हैं मगर
प्याज के मुद्दे पर असल ही चाहिये यदि प्याज पर लीपापोती कर दी तो पक्का मानो
कि उस सरकार की पुताई होनी ही है
       यदि प्याज गरीबी की रेखा के नीचे भी भरपूर मिले तो समझिये आप फिर
सरकार बनाने वाले हैं और प्याज गायब तो वे सरकारे भी गायब  …………….

चलते चलते ---

       हम देश के सभी गरीबों को भरपेट भोजन देंगे क्योंकि हमारे पास खाद्य सुरक्षा
है मगर हमसे प्याज गारंटी ना मांगे क्योंकि इसका मिलना या ना मिलना भाग्य के
हाथ में है !!        

रविवार, 20 अक्तूबर 2013

चल सपना देख !!

चल सपना देख !!

सपना भी अजीब दुनियाँ रच देता है ,तरह-तरह के सपने ,सबके सपनों का रंग रूप भी
भिन्न -भिन्न। छोटे सरकार से बड़े सरकार सबको सपना देखना और दिखाना भाता है

   हमारे देश ने सालो पहले अपने प्रधानमंत्री की नजरों से एक सपना देखा -गरीबी
हटाओ। बड़ा रंगीन और मनभावन सपना था पुरे देशवासियों को भाया ,खेत ,ठाणी
गाँव ,क़स्बा ,शहर ,महानगर सब जगह हसीन सपने की चर्चा थी ,सबने सोचा -अब
बुरे दिन लद गए मगर हाय रे सपना ,ऐसा टुटा कि करोडो भारतीय टूट गये परन्तु
जिसने दिखाया उसका सिंहासन बना गया। ………।

 फिर आया शिक्षा का सपना ,सब पढने लगे ,रात और दिन ,बच्चे युवा और बूढ़े सब के
बस पढने लगे ,कोई नाम लिखना सीख गया ,कोई गिनती लिखना और कोई अक्षर
पढना सीख गया ,युवा और बच्चे किताबे गोकते गए ,कागज पर योग्यता कार्ड पाते
गये ,लेकिन हाय रे सपना , पढ़े लिखे निकम्मे और बेकार हो मख्खियाँ मारते रहे मगर
उनको सिंहासन मिलता रहा। …………

फिर आया भावनाओं का सपना  …. उनकी बदनसीब मौत एक जवान युवा सपने में
बदल गई। देश को लगा अब क्रांति की शरुआत होगी मगर हम देखंगे ,हम देख रहे हैं
हमे देखना है में सपना उलझ गया। ……………………।

फिर आया जातिवाद का सपना ,परमात्मा को घर देने का सपना। सबके सब लग पड़े
परमात्मा को घर देने के नाम पर।  दिखाया गया सपना चमत्कार से भरा था और
चमत्कार हुआ भी ,जिसको घर देने का वादा किया वह तो बेघर ही रह गया और घर
किसी और को मिल गया  ……। 

फिर आया आर्थिक उदारीकरण का सपना ,ले उधार ,ले उधार। बेच बाप दादा का माल
और पेल उदारीकरण। भाई ने कौडियाँ के दाम हीरे बेच दिए और जो दाम मिले उससे
जलसे करने लगे। देश डूब गया मगर उनका सपना तैर गया  …………

फिर लाये रोजगार गारन्टी का सपना ,खोद चोकड़ी और ले जा रोकड़ ,लिखा दे फर्जी
नाम और करले रोकड़ी ,गाँव के गाँव लग गए खोदने और रोकड़ पाने के चक्कर में
सपना फिस्स हो गया ,खुद के हाथ लुल्ले हो गए ,दूसरो की पीठ पर चढ़कर फिर आ
गए नया सपना लेकर   ……।

 चालू गाडी में सपना आया -लूट ले और झोली भर ले। जिसको जहाँ जो हाथ लगा
अपने खिस्से के हवाले किया ,अरबों लोगों के सपने टूट गए तो हजारों ने  सच भी
करा लिए गए

अब फिर सपना दिखाना था सो ले आये -खा खा कर तोंद भरने का सपना ,सबके
पेट भरेंगे ,सबकी तोंद निकल आयेगी ,बस इस बार कृपा कर दो नाथ  …. अगर
नाथ ने कृपा कर दी तो फिर राजा का सोना  …. कसम से पीगल कर फिर हजारो
हाथों में चला जाएगा और अरबों लोग कंगले हो जायेंगे और अमीरी के सपने देख
खुश होते रहेंगे  ……………    
   

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

विजयी भव :

विजयी भव :

सफलता के दस सूत्र

1. कर्तव्य का बोध - काम करने से पहले हम यह जरुर जान ले कि हमे क्या करना
चाहिए और क्यों करना चाहिए। अगर हम जो भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं क्या वह
अपना खुद का है या किसी ने थोप दिया है और हम बिना मन से उसे कर रहे हैं।
हमारा लक्ष्य निर्धारित होने के बाद हमें अपने कर्तव्य का बोध अनिवार्य रूप से होना
चाहिए यानि जबाबदारी। परिणाम के बारे में पहले से सोच कर हम जबाबदारी से
नही बचे क्योंकि परिणाम कार्य कुशलता और भाग्य यानि समय की अनुकूलता
दोनों पर निर्भर रहता है ,हमारे हाथ में कार्य कुशलता और जबाबदारी पूर्वक कार्य
को पूरा करने की निष्ठा होनी चाहिए

2. लाभ और हानि - हर कार्य के पूरा होने के बाद लाभ या हानि हमे परिणाम के रूप
में प्राप्त होते हैं इसलिए कार्य के फल और कुफल पर विस्तृत विचार करना चाहिए
कार्य के अच्छे और बुरे सभी पहलुओं पर विश्लेष्ण करने से हम संभावित आपदाओं
को रेखांकित कर सकते हैं और यु टर्न या प्रतीक्षा करने के टूल का उपयोग कर सकते
हैं

3. कार्य नीति -लक्ष्य का निर्धारण और लाभ हानि पर चिंतन के पश्चात् कार्य को
कैसे पूरा किया जाना है ,के बारे में रुपरेखा और सिद्धांत निश्चित कर लेना जरुरी है
यदि पालिसी नही होगी तो आपात प्रबन्धन में रूकावट आ जाती है

4. उपाय - काम उपाय पूर्वक करने से कठिन नहीं रहता है ,सामान्य परिस्थिति में
कार्य नीति के अनुसार चलते रहेंगे मगर आपात स्थिति आने पर उस काम की गति
में रूकावट नहीं हो इस बिंदु पर आकस्मिक उपाय पहले से ही तैयार रहना चाहिए।
ध्यान रहे हमारा लक्ष्य महत्वपूर्ण है कार्य योजना जो पहले से तय कर रखी है उसके
असफल होने पर दूसरी और तीसरी योजना हाथ में होनी ही चाहिए।

5. दीर्घसूत्रता - हर काम को निश्चित समय में पूरा करना सफलता के लिए जरूरी है
अगर अनावश्यक रूप से ज्यादा समय काम को पूरा होने में लगता है तो उस काम
के फल को काल चाट जाता है। टाल मटोल योजना के रूप को बीमार कर देता है।

6. उपलब्ध साधनों का सदुपयोग - काम को पूरा करने के लिए हमारे पास जितने भी
साधन उपलब्ध हैं उनका किस प्रकार उपयोग करना है कि लक्ष्य की राह आसान हो
जाए ,याद रखे छोटे छोटे साधनों के उपयोग से बड़ी विजय मिल जाती है ,घास के
तिनके मतवाले हाथी को बाँध देते हैं और गुरिल्ला पद्धति से भी युद्ध जीते जाते हैं।

7. आत्म शक्ति - हमारा आत्म बल जितना मजबूत होगा हमारी बाधाएं उतनी छोटी
होती जायेगी। चेहरे पर मुस्कान ,होंटों पर गीत और ह्रदय में सकारात्मक भाव ये
तीनो चीजे हमारी आत्म शक्ति को दुगुना कर देती है और हमारे संकल्प को जीवटता
प्रदान करती है।

8. धन -हमारे पास कितना धन उपलब्ध है और कितना धन कैसे आवश्यकता पड़ने
पर उपलब्ध होगा इस बिंदु पर तठस्थ आंकलन होना चाहिए ताकि धनाभाव से
योजना पर कुप्रभाव ना पड़े।

9. टीम -काम को अकेले हाथों से पूरा नहीं किया जा सकता है। हम जो भी सहायक
अपने पास रखते हैं उसमे टीम भावना होनी चाहिए। सफलता का श्रेय सहायको को
देते जाए और असफलता को बोझ खुद के कंधे पर डालते जाए यानि टीम आपात
समय में हतोत्साहित ना हो इसका ध्यान नेता को रखना होगा।

10. आस्तिक भाव -अगर उपरोक्त नौ बाते हमारे पास है तो हमें आस्थावान बनना
है। आस्था कार्यसिद्धि के लिए खुद पर ,खुद की टीम पर और शक्तिशाली परमात्मा
पर।  

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है

क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है


न्याय की पोथी के वो पन्ने सुलगा रहे थे 
पूछा क्यों ?तो बोले चुनाव जो आ रहे हैं 

इत्मीनान से कर रहे थे वो कश्ती में सुराख
नाव जब डूबी तो दोष जमाने पर मढ़ दिया 

सफेद बगुला तो नव निर्माण की बात करता है
मगर समन्दर की मछलियाँ क्यों रोने लगी है 

बड़ी जालिम है निरपेक्षता धर्म के नाम पर 
मरहम की बात करके वो चीरा लगा देते हैं 

कंठी,माला,टोपी सडको पर क्यों अटी पड़ी है 
लगता है- जरुर कोई नेता इधर से गुजरा है 

आज उसकी झोपडी में चूल्हा जला कैसे 
क्या फिर कोई धूर्त सन्यासी बन आया है 

वो दुश्मन से गले मिलकर अमन का ख़्वाब देखते हैं 
हकीकत सिर्फ यही थी कोई जवान शहीद हुआ है  

क्यों उदास है आज ये गुलजार गुलिस्ता 
क्या किसी दरिन्दे ने फिर कली नोच दी है
   

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

नजरिया

नजरिया 

पौधे पर लगा गुलाब  पास खड़ी कांटे की झाड़ी पर लगे कांटो को देख खुद पर गर्व
महसूस कर रहा था . गुलाब अपने सौन्दर्य ,कोमलता ,महक ,रंग ,रूप,कुशल माली
के हाथों लालन पालन देख अहंकार से भर गया . उसे दुनिया में खुद की सार्थकता
नजर आने लगी . गुलाब ने मन ही मन सोचा - मेरे कारण ही यह उपवन शोभित है ,
तितलियाँ और भवरे मेरे कारण ही उपवन की सुन्दरता बढाते और नाचते गाते हैं .
मेरे कारण ही देव प्रतिमा सुसज्जित लगती है .जब मैं सुन्दरी के बालो में होता हूँ
तो उसका रूप खिल उठता है .यह सब सोच वह प्रफुल्लित हो गया और कांटे की झाड़ी
का उपहास करते हुए बोला- अरे शूल !तुम कांटो का बोझ ढ़ो कर निरर्थक जिन्दगी 
क्यों जी रहे हो ?न तुम सुन्दर हो ,ना सौरभ है ,ना ही तुम कोमल हो ?

कंटीली झाड़ी ने कहा - गुलाब , तुम सिर्फ खुद को देख कर ही ऐसा कह रहे हो मगर
यह भूल रहे हो कि तुम और मैं इस एक ही प्रकृति कि संतान हैं ,तुम्हे यह लग रहा है
कि तेरे अलावा बाकी सब कि जिन्दगी निरर्थक है मगर मुझे लगता है कि हम सभी
सार्थक जिन्दगी जी रहे हैं .

गुलाब हंसा और बोला -बताओ तेरे में क्या सार्थकता है ?

कांटे कि झाड़ी बोली -मेरे कारण कई छोटे छोटे पौधों का जीवन पशुओं से बच जाता है
मुझे देख वे दूर चले जाते हैं ,मेरे कारण तेरी रक्षा भी होती हैं तुम्हे अवांछित हाथों में
जाने से बचाता हूँ ,मेरे से ही सभी किसानों के खेत सुरक्षित हैं और किसान चिंता
रहित हो रात को सुकून से घर लौटते हैं .मेरे सूख जाने पर मैं अपने इन्ही कांटो से
भयंकर सर्द रातों में हर पथिक को गर्मी देता हूँ .यह तो आदमी कि फितरत है कि वो 
खुद को महान और दूसरों को तुच्छ समझता है