सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

विजयी भव :

विजयी भव :

सफलता के दस सूत्र

1. कर्तव्य का बोध - काम करने से पहले हम यह जरुर जान ले कि हमे क्या करना
चाहिए और क्यों करना चाहिए। अगर हम जो भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं क्या वह
अपना खुद का है या किसी ने थोप दिया है और हम बिना मन से उसे कर रहे हैं।
हमारा लक्ष्य निर्धारित होने के बाद हमें अपने कर्तव्य का बोध अनिवार्य रूप से होना
चाहिए यानि जबाबदारी। परिणाम के बारे में पहले से सोच कर हम जबाबदारी से
नही बचे क्योंकि परिणाम कार्य कुशलता और भाग्य यानि समय की अनुकूलता
दोनों पर निर्भर रहता है ,हमारे हाथ में कार्य कुशलता और जबाबदारी पूर्वक कार्य
को पूरा करने की निष्ठा होनी चाहिए

2. लाभ और हानि - हर कार्य के पूरा होने के बाद लाभ या हानि हमे परिणाम के रूप
में प्राप्त होते हैं इसलिए कार्य के फल और कुफल पर विस्तृत विचार करना चाहिए
कार्य के अच्छे और बुरे सभी पहलुओं पर विश्लेष्ण करने से हम संभावित आपदाओं
को रेखांकित कर सकते हैं और यु टर्न या प्रतीक्षा करने के टूल का उपयोग कर सकते
हैं

3. कार्य नीति -लक्ष्य का निर्धारण और लाभ हानि पर चिंतन के पश्चात् कार्य को
कैसे पूरा किया जाना है ,के बारे में रुपरेखा और सिद्धांत निश्चित कर लेना जरुरी है
यदि पालिसी नही होगी तो आपात प्रबन्धन में रूकावट आ जाती है

4. उपाय - काम उपाय पूर्वक करने से कठिन नहीं रहता है ,सामान्य परिस्थिति में
कार्य नीति के अनुसार चलते रहेंगे मगर आपात स्थिति आने पर उस काम की गति
में रूकावट नहीं हो इस बिंदु पर आकस्मिक उपाय पहले से ही तैयार रहना चाहिए।
ध्यान रहे हमारा लक्ष्य महत्वपूर्ण है कार्य योजना जो पहले से तय कर रखी है उसके
असफल होने पर दूसरी और तीसरी योजना हाथ में होनी ही चाहिए।

5. दीर्घसूत्रता - हर काम को निश्चित समय में पूरा करना सफलता के लिए जरूरी है
अगर अनावश्यक रूप से ज्यादा समय काम को पूरा होने में लगता है तो उस काम
के फल को काल चाट जाता है। टाल मटोल योजना के रूप को बीमार कर देता है।

6. उपलब्ध साधनों का सदुपयोग - काम को पूरा करने के लिए हमारे पास जितने भी
साधन उपलब्ध हैं उनका किस प्रकार उपयोग करना है कि लक्ष्य की राह आसान हो
जाए ,याद रखे छोटे छोटे साधनों के उपयोग से बड़ी विजय मिल जाती है ,घास के
तिनके मतवाले हाथी को बाँध देते हैं और गुरिल्ला पद्धति से भी युद्ध जीते जाते हैं।

7. आत्म शक्ति - हमारा आत्म बल जितना मजबूत होगा हमारी बाधाएं उतनी छोटी
होती जायेगी। चेहरे पर मुस्कान ,होंटों पर गीत और ह्रदय में सकारात्मक भाव ये
तीनो चीजे हमारी आत्म शक्ति को दुगुना कर देती है और हमारे संकल्प को जीवटता
प्रदान करती है।

8. धन -हमारे पास कितना धन उपलब्ध है और कितना धन कैसे आवश्यकता पड़ने
पर उपलब्ध होगा इस बिंदु पर तठस्थ आंकलन होना चाहिए ताकि धनाभाव से
योजना पर कुप्रभाव ना पड़े।

9. टीम -काम को अकेले हाथों से पूरा नहीं किया जा सकता है। हम जो भी सहायक
अपने पास रखते हैं उसमे टीम भावना होनी चाहिए। सफलता का श्रेय सहायको को
देते जाए और असफलता को बोझ खुद के कंधे पर डालते जाए यानि टीम आपात
समय में हतोत्साहित ना हो इसका ध्यान नेता को रखना होगा।

10. आस्तिक भाव -अगर उपरोक्त नौ बाते हमारे पास है तो हमें आस्थावान बनना
है। आस्था कार्यसिद्धि के लिए खुद पर ,खुद की टीम पर और शक्तिशाली परमात्मा
पर।  

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