रविवार, 6 अक्तूबर 2013

नजरिया

नजरिया 

पौधे पर लगा गुलाब  पास खड़ी कांटे की झाड़ी पर लगे कांटो को देख खुद पर गर्व
महसूस कर रहा था . गुलाब अपने सौन्दर्य ,कोमलता ,महक ,रंग ,रूप,कुशल माली
के हाथों लालन पालन देख अहंकार से भर गया . उसे दुनिया में खुद की सार्थकता
नजर आने लगी . गुलाब ने मन ही मन सोचा - मेरे कारण ही यह उपवन शोभित है ,
तितलियाँ और भवरे मेरे कारण ही उपवन की सुन्दरता बढाते और नाचते गाते हैं .
मेरे कारण ही देव प्रतिमा सुसज्जित लगती है .जब मैं सुन्दरी के बालो में होता हूँ
तो उसका रूप खिल उठता है .यह सब सोच वह प्रफुल्लित हो गया और कांटे की झाड़ी
का उपहास करते हुए बोला- अरे शूल !तुम कांटो का बोझ ढ़ो कर निरर्थक जिन्दगी 
क्यों जी रहे हो ?न तुम सुन्दर हो ,ना सौरभ है ,ना ही तुम कोमल हो ?

कंटीली झाड़ी ने कहा - गुलाब , तुम सिर्फ खुद को देख कर ही ऐसा कह रहे हो मगर
यह भूल रहे हो कि तुम और मैं इस एक ही प्रकृति कि संतान हैं ,तुम्हे यह लग रहा है
कि तेरे अलावा बाकी सब कि जिन्दगी निरर्थक है मगर मुझे लगता है कि हम सभी
सार्थक जिन्दगी जी रहे हैं .

गुलाब हंसा और बोला -बताओ तेरे में क्या सार्थकता है ?

कांटे कि झाड़ी बोली -मेरे कारण कई छोटे छोटे पौधों का जीवन पशुओं से बच जाता है
मुझे देख वे दूर चले जाते हैं ,मेरे कारण तेरी रक्षा भी होती हैं तुम्हे अवांछित हाथों में
जाने से बचाता हूँ ,मेरे से ही सभी किसानों के खेत सुरक्षित हैं और किसान चिंता
रहित हो रात को सुकून से घर लौटते हैं .मेरे सूख जाने पर मैं अपने इन्ही कांटो से
भयंकर सर्द रातों में हर पथिक को गर्मी देता हूँ .यह तो आदमी कि फितरत है कि वो 
खुद को महान और दूसरों को तुच्छ समझता है   

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