गुरुवार, 21 नवंबर 2013

नारे ले लो ,आरोप खरीद लो

नारे ले लो ,आरोप खरीद लो 

भर दोपहर में एक आवाज ने नींद ख़राब कर दी। बाहर  कोई फेरिया चिल्ला रहा था -"
नारे ले लो ,नारे नए पुराने ,आरोप एकदम ताजे ,चमत्कारी भाषण ले लो। "

मेने बाहर ताकझाँक की ,देखा एक युवा फेरिया गली में घूम रहा है। घर से बाहर
निकल कर मैं उसके पास गया और बोला -क्या क्या माल है तेरे पास ?

वो बोला -आप किस पार्टी से हैं ?चाबुक चलाने वाली पार्टी से हो या चलाने कि मंशा
रखने वाली पार्टी से ,इन दोनों में नहीं हो तो मौका देख रँग बदलने वाले हो ?

मेने कहा -मैं तो चाबुक खाने वाले में से हूँ ,सोचता हूँ कुछ सस्ता तुझ से मिल जाए
तो नयी पैकिंग में आगे सरका दूँ।

फेरिया को लगा मैं उसके काम का हथियार हूँ इसलिए उसने जाजम बिछा कर
अपनी दुकान दिखानी शुरू कर दी - देखिये जनाब ,ये कुछ नारे हैं ,पानी पर ,बिजली
पर ,सड़क पर ,रोजगार पर ,महँगाई पर.............इस तरफ जो मसाला है उसमे
आरोप हैं ,कुछ सच्चे ,कुछ बिलकुल झूठे ,कुछ अधूरे ,आपको भ्रष्टाचार पर ,चरित्र
हनन पर,साहेबगिरी पर ,रंग रास पर ,विकास पर ,सीनाजोरी पर  जिस पर भी
चाहो नए नवेले करारे ताजा आरोप मिल जायेंगे  ……… इस कोने में जो पड़े हैं
वो सब भाषण हैं जिन्हे सुनकर लोग हँसते हैं ,तालियां पीटते हैं ,चिल्लाते हैं
गुस्सा करते हैं और बफारा निकालने इ वी एम पर बटन दबाने पहुँच जाते हैं।

मैं बोला -कुछ सदाबहार कुछ नए नारे बता  …

फेरिया बोला -सदाबहार नारो में गरीबी हटाओ ,मीठा पानी ,खेतों में चौबीस घंटे
बिजली ,पक्की सड़क वाले नारे ही चल रहे हैं और रेट भी सबसे कम हैं  …

मेने पूछा -इनके रेट कम क्यों हैं ?

फेरिया बोला -जनता जानती है इनका कोई मूल्य नहीं है ,इन बातों पर विश्वास
नहीं करना है!

मैं बोला -अभी आरोप का बाजार कैसा है ?

फेरिया बोला -सा'ब , यह हाथो हाथ बिकने वाला माल है और दाम भी नेता के ग्रेड
पर निर्भर है। बड़े नेता पर आरोप लगाना है तो रेट ज्यादा और छोटे पर कम।
अभी चरित्र हनन के आरोपो का दौर है ,जनता भी मजे से सुनती है और तालियां
भी बजती है  … !!!

मेने पूछा -खरीदने वाले को वोट भी मिल जाते हैं या नहीं  …!

फेरिया बोला - वोट तो देना ही है ,वोट मुद्दे से नहीं पर्ची के अंकों से पड़ते हैं !!!

मेने कहा -भैया ,मेरे को तो भाषण बता दे दे !

फेरिया बोला -भाषण कौनसे वाले चाहिए -चटाकेदार ,चुट्कुलेवाले ,आरोपवाले
तथ्यहीन ,मिया मिठ्ठू वाले  …… !

मेने कहा -जो मुनाफे से बिक जाए !!

वो बोला - चटाकेदार ,सफेद झूठ वाले,रंगीन आरोप वाले अभी सुपर डुपर है,तथ्यहीन
का बाजार भी गर्म है !

मैं बोला -देश को इनसे कुछ मिलेगा ?

फेरिया बोला -मुझे लगता है आपको खरीदना नहीं है ,अपना रास्ता नापो और
मुझे जाने दो।

 फेरिया दूकान समेत कर आगे बढ़ा और टेर लगायी -चकाचक नारे ले लो ,रंगीन
आरोप ले लो ,तथ्यहीन भाषण ले लो  ………………………। 
  

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

चुनाव पूर्व सर्वेक्षण, परिवर्तन का शंखनाद ?

चुनाव पूर्व सर्वेक्षण, परिवर्तन का शंखनाद ?

चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में चार बड़े राज्यों में काँग्रेस लड़खड़ा रही है ऐसा समाचारों में
दिखाया गया है। कांग्रेस की लड़खड़ाहट के संभावित कारण !!
1. अहँकारी नेता
2. तथ्यों से परे सपनों में जीना
3. जन लोकप्रिय नेताओं का टोटा
4. भ्रष्टाचार को रोक पाने में असफलता
5. असफल विदेश नीति
6. मूल्य खोता रुपया
7. कागज पर सफल योजनाये ,धरातल पर असफल
8. नकारात्मक चुनावी प्रचार
9. आक्रमण की जगह बचाव की नीति
10. युवा शक्ति का मोह भंग होना
11. छद्म धर्मनिरपेक्षता का सहारा
12. जनता में भरोसा जमाने में नाकामयाब आभामंडल
13. लोकलुभावन योजनाओं की पुरानी थ्योरी
14. साथी दलों का हावी रहना
15. घोषित कामो का न हो पाना
16. निष्प्रभावी आर्थिक नीति
17. बिना सेनापति के चुनावी रण
18. जनता की अभिव्यक्ति को समझने में असफल
19. परिवार वाद का आरोप
20. घटता रोजगार    

सत्ताधारी दल चुनाव तक अपने को कैसे संभालता है यह आने वाला समय तय
करेगा। क्या चुनाव पूर्व सर्वेक्षण सही होंगे ? क्या देश कि जनता निर्णायक बदलाव
लाएगी या तिराहे पर देश को खड़ा कर देगी।

कौनसा दल सरकार बनायेगा यह मुख्य नहीं है ,सुदृढ़ लोकतंत्र के लिए जरुरी यह 
है की कितने प्रतिशत लोगों ने अपने वोट के अधिकार का उपयोग किया।  

चुनावी भाषण

चुनावी भाषण    

आपके दर्शन को नैन हर पाँच साल बाद प्यासे हो जाते हैं और मरते डूबते हर हाल 
में आपके किवाड़ खटखटाने पड़ते हैं। 

पीछे बैठे दादा सही फरमा रहे हैं कि मैं पिछली तीन यात्रा आपके तीर्थ की कर चूका 
हूँ मेने हर यात्रा पर इस तीर्थ के विकास की कहानी सुनायी थी ,इस क्षेत्र का विकास 
जरुर होगा जब मेरी अंतहीन कहानी खत्म हो जायेगी। 

मेने सबसे पहले इस तीर्थ की सड़क की बात करी थी और चौथी मरतबा भी मैं सबसे 
पहले सड़क कि बात ही करूँगा। पहली बार आपने जब मुझे चुना तो मेने यहाँ की सड़क 
का काम प्रमुखता से लिया था और आपको जानकर प्रसन्नता होगी कि काम प्रगति 
पर है ,काम अभी तक पूरा नहीं हुआ इसका कारण आपसे मेरा लगाव है यदि काम 
उस समय हो जाता तो आपके दर्शन का मुझे चौथी मरतबा सौभाग्य नहीं मिलता। 
यह टूटी सड़क और इसके गड्ढे मुझे हर बार आपको विश्वास बँधाने के काम आते हैं 

जब मैं दूसरी दफा आपके इलाके में आया था तब आपको पक्की सड़क के साथ 
बिजली देने का वादा किया था। मेरा मानना है कि ये सड़को के गड्ढे जैसे ही इतने 
गहरे हो जायेंगे कि बिजली के तार इन गड्ढो से खिंचवा दूँ इसलिए उस समय की 
राह देख रहा हूँ ,ये सड़क के गड्ढे गहरे हो जाए छठी मरतबा तक ताकि बिजली के 
तार ऊपर से लटकाना ना पड़े   

मैं जब पिछली मरतबा आया था तब सड़क ,बिजली और पानी तीनों की बात करी 
थी सड़क का काम प्रगति पर है ,बिजली कि व्यवस्था सड़क के साथ पूरी होने 
वाली है और पानी कि बात भी इन्ही सड़क के गड्ढो से ही पूरी होगी। मैं आशा 
करता हूँ कि सातवी बार तक ये गड्ढे छोटे छोटे सरोवर में तब्दील हो जायेंगे और 
बारिस के पानी के भरने से मिठ्ठे पानी कि व्यवस्था हो जायेगी। 

मैं इस मरतबा आपके पास सड़क,बिजली पानी के साथ रोटी कि व्यवस्था भी 
करने को आया हूँ। मैं जानता हूँ आप अभी तक इन सुविधाओ के बिना भी जिन्दा 
हैं ,वादे के जज्बे के साथ आपके जीने के अंदाज को सलाम करता हूँ और आपसे 
वादा करता हूँ कि इस बार बेड़ा पार लगाईये मैं आपको फोकट कि रोटियाँ तोड़ने 
के काबिल बना दूंगा ,भरपेट रोटी खाईये और चेन से पांच साल की झपकी 
लीजिये। 

भरपेट और फोकट में रोटी के सपने के आगे सड़क बिजली और पानी के क्या 
मायने रह जाते हैं। मैं आपके पेट तक फोकट में रोटी पहुंचाऊ इसके लिए मुझे 
कुर्सी तक आप पहुंचा दीजिये। हर बार आपने मेरे वादे को सुना ,समझा और 
सुकून लिया है ,इस बार भी इस गोल गोल रोटी के वादे पर भरोसा कीजिये। बस 
आप मुझे हर बार की तरह चौथी बार भी खूब वोट कीजिये 



मंगलवार, 5 नवंबर 2013

छद्म ढ़ोंगी बाबा और सन्त समाज

छद्म ढ़ोंगी बाबा और सन्त समाज 

संत समाज से विश्व समुदाय ह्रदय से जुड़ा है इसका कारण है संत का स्वभाव।
संत एक पेड़ की तरह है जिसकी छाया और फल उसके लिए नहीं होकर दुसरो के
लिए होते हैं ,संत एक नदी कि तरह है जो जिधर से भी गुजरती है उस स्थान को
हरा भरा बना देती है और अपने शीतल जल से सभी को तृप्त करती आगे बढ़ती
रहती है। संत उस दीपक कि तरह है जो स्वयं कष्ट सहन कर के भी दुसरो के मार्ग
को लक्ष्य कि ओर गति देता है उनके अन्धकार भरे जीवन में प्रकाश भरता है ,संत
अन्वेषण करता है ,सत्य के तत्व को जानने का प्रयत्न करता है और जितना जाना
उसे सब में बाँट देता है। यह सब हम एक गृहस्थ में ,एक वैज्ञानिक में ,एक सन्यासी
में भी पा सकते हैं।
एक गृहस्थ संत हो सकता है यदि वह देना सीख जाता है ,यदि गृहस्थ पाने की लालसा
से ऊपर उठ जाता है और शुभ तत्व को देना अपना लक्ष्य बना लेता है तो वह ग्रेट संत
है
कुछ पाने की कामना से रहित जीवन को कैसे जीया जाये इसके लिए हर धर्म और
दर्शन ने मंथन किया है और उस जीवन को जिसमें इच्छा ,कामना ,लालसा ,भोग
आदि पर विजय पायी जा सकती है उसे संन्यास कहा है जिसका वस्त्रों या वेशभूषा
से कुछ भी संबंध नहीं है। सन्यास में विश्व कल्याण कि भावना को प्रमुखता दी
गई है ,जब कोई वैज्ञानिक मानव हित कि कोई खोज करता है तो वह सन्यास धर्म
का पालन करता है और कोई  वैज्ञानिक विध्वंस कि खोज करता है तो वह अधर्म को
पोषित करने वाला बन जाता है  .
कैसे जाने कि अमुक छद्म बाबा या ढोंगी है - नीति कहती है कि जब तक हम किसी
अपरिचित के बारे में गहन जानकारी प्राप्त नहीं कर लेते तब तक उस पर विश्वास
न करे। मंगल वेश में अमंगल कारी तत्व भी छुपे हो सकते हैं , श्री सीताजी की
बुद्धि भी यह समझ ना पायी थी जिसके कारण उन्हें दुःख सहने पड़े थे ,यह उदाहरण था
मंगल वेश का। छद्म बाबा स्वभाव के मीठे और ह्रदय से काले ,देने की जगह लेने का
भाव प्रबल होता है ,सम्पति और धन को एकत्रित करने में दिन रात जुटे रहते हैं।
जब भी हम अपने स्वार्थ से किसी से जुड़ते हैं तो स्वाभाविक है सामने वाला भी अपना
स्वार्थ रख देता है ,यह एक व्यापार है जो लाभ हानि की  गणित से चलता है और
दुनियादारी कहलाता है ,इससे हटकर बिलकुल उलट बात है हम किसी परमार्थ के
लिए किसी परमार्थी से कुछ चाहते हैं ,यहाँ भी चाह है पर स्वार्थ से परे लोक कल्याण
के लिए। अगर यहाँ भी एक पक्ष स्वार्थी है तो उसे छद्म या ढोंग ही जाने।
संत से क्या माँगे -अगर हम सत्य तत्व के अलावा अपने स्वार्थ की पूर्ति किसी संत
से चाहते हैं और वो उसे पूरा करने का आश्वासन देता है तो समझो धोखा है। क्योंकि
इस संसार में स्वार्थ की  पूर्ति के लिए तो कुछ मूल्य निश्चित रहता है चाहे वह धन हो
या तन। संत पैसा नहीं दे सकता ,संत तक़दीर नहीं बदल सकता ,संत कामनाओं की
पूर्ति का स्त्रोत नहीं है। संत ज्ञान देता है। सत्य कहता है। संत मार्ग का निर्देश मात्र
करता है चलना तो खुद को ही पड़ता है
सन्त को केवल जीवन निर्वाह के लिए भोजन और शरीर ढकने को वस्त्र चाहिए
इसके अलावा उन्हें सच्चे अनुयायी चाहिए जो सत्य को मथते रहे ,अंधानुकरण ना
करे। हम मठाधीश पा सकते हैं मगर सरलता से संत नहीं पा सकते क्योंकि सन्त
कि खोज में भटकना पड़ता है और वह भी परमार्थ का उद्देश्य लेकर।        

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

धार्मिक चित्र और चिन्ह का ना हो अपमान

धार्मिक चित्र और चिन्ह का ना हो अपमान 

कुछ दिन पहले मैं बाजार में कुछ खरीदी के लिए गया था। दुकानदार अच्छी ग्राहकी के
कारण व्यस्त था। मेरे आगे जो ग्राहक खड़ा था उसका बिल दुकानदार बना रहा था।

ग्राहक ने दुकानदार से कहा -भैया ,मेरे दोनों बिल एक साथ पिन कर देना। दुकानदार
ने स्टेप्लर पिन लगा दी और फिर तसल्ली से भुगतान के पैसे गिनने लगा। मेने
देखा कि जिन दोनों बिलों को स्टेप्लर किया था उसी जगह श्री गणेश का फ़ोटो छपा था
और वह स्टेप्लर उन दोनों बिलों पर छपी फोटुओं पर लगी थी। इस बात का भान ना
तो दुकानदार को था और ना ही उस ग्राहक को।

मेने उस दुकानदार से पूछा -भैया ,आप भगवान् गणेश और लक्ष्मी में श्रद्धा रखते हैं ?

दुकानदार बोला -श्रीमान ,यह भी भला पूछने की बात है ,गणेश और लक्ष्मी कि अर्चना
पूजा तो हर दिन करते हैं ,देखो दुकान में पूजा स्थल भी है।

मेने पूछा -क्या आप पूजा करके फिर भगवान को सुई भी चुभोते हैं ?

दुकानदार को गुस्सा आ गया और गुस्से से बोला -आप कैसे व्यक्ति हैं जो बेहूदा प्रश्न
कर रहे हैं ,मुझे भगवान् में श्रद्धा है मैं उनका अपमान इन हाथो से करने कि सोच भी
नहीं सकता।

मेने कहा -भैया ,आपने अभी जो बिल स्टेप्लर किये हैं उनको देखिये ,आपने गणेश के
फ़ोटो पर पिन चुभो दी है।

दुकानदार ने स्टेप्लर किये बिल को देखा और बोला -सॉरी ,मगर यह अनजाने में हुयी
भूल है  …।

मेने कहा -यह मैं भी जानता हूँ। क्या आपका बिल इस धार्मिक फ़ोटो या चिन्ह का
उपयोग किये बिना भी छप सकता है ?

दुकानदार ने कहा -हाँ ,और आगे से मैं कभी इस तरह के धार्मिक फ़ोटो और चिन्ह का
उपयोग व्यावसायिक किताबों पर नहीं करूंगा।

मेने दुकानदार से कहा -भैया ,हम लोग श्रद्धा से व्यावसायिक बुक पर ये सब छपवाते हैं
परन्तु फिर इन पवित्र चिन्ह और फ़ोटो का अनजाने में अपमान करते रहते हैं। जिस
तरह से आपने भविष्य में धार्मिक फ़ोटो और चिन्ह का उपयोग बिल पर नहीं करने का
संकल्प लिया है वैसे ही सब जागरूक होकर इस छोटी बात पर ध्यान दे।

अपने व्यावसायिक लाभ के लिए जिन धार्मिक चिन्हो और फ़ोटो का उपयोग हम करते हैं 
उन पवित्र प्रतीकों कि पवित्रता कि रक्षा करना भी हमारा ही कर्तव्य है