मंगलवार, 5 नवंबर 2013

छद्म ढ़ोंगी बाबा और सन्त समाज

छद्म ढ़ोंगी बाबा और सन्त समाज 

संत समाज से विश्व समुदाय ह्रदय से जुड़ा है इसका कारण है संत का स्वभाव।
संत एक पेड़ की तरह है जिसकी छाया और फल उसके लिए नहीं होकर दुसरो के
लिए होते हैं ,संत एक नदी कि तरह है जो जिधर से भी गुजरती है उस स्थान को
हरा भरा बना देती है और अपने शीतल जल से सभी को तृप्त करती आगे बढ़ती
रहती है। संत उस दीपक कि तरह है जो स्वयं कष्ट सहन कर के भी दुसरो के मार्ग
को लक्ष्य कि ओर गति देता है उनके अन्धकार भरे जीवन में प्रकाश भरता है ,संत
अन्वेषण करता है ,सत्य के तत्व को जानने का प्रयत्न करता है और जितना जाना
उसे सब में बाँट देता है। यह सब हम एक गृहस्थ में ,एक वैज्ञानिक में ,एक सन्यासी
में भी पा सकते हैं।
एक गृहस्थ संत हो सकता है यदि वह देना सीख जाता है ,यदि गृहस्थ पाने की लालसा
से ऊपर उठ जाता है और शुभ तत्व को देना अपना लक्ष्य बना लेता है तो वह ग्रेट संत
है
कुछ पाने की कामना से रहित जीवन को कैसे जीया जाये इसके लिए हर धर्म और
दर्शन ने मंथन किया है और उस जीवन को जिसमें इच्छा ,कामना ,लालसा ,भोग
आदि पर विजय पायी जा सकती है उसे संन्यास कहा है जिसका वस्त्रों या वेशभूषा
से कुछ भी संबंध नहीं है। सन्यास में विश्व कल्याण कि भावना को प्रमुखता दी
गई है ,जब कोई वैज्ञानिक मानव हित कि कोई खोज करता है तो वह सन्यास धर्म
का पालन करता है और कोई  वैज्ञानिक विध्वंस कि खोज करता है तो वह अधर्म को
पोषित करने वाला बन जाता है  .
कैसे जाने कि अमुक छद्म बाबा या ढोंगी है - नीति कहती है कि जब तक हम किसी
अपरिचित के बारे में गहन जानकारी प्राप्त नहीं कर लेते तब तक उस पर विश्वास
न करे। मंगल वेश में अमंगल कारी तत्व भी छुपे हो सकते हैं , श्री सीताजी की
बुद्धि भी यह समझ ना पायी थी जिसके कारण उन्हें दुःख सहने पड़े थे ,यह उदाहरण था
मंगल वेश का। छद्म बाबा स्वभाव के मीठे और ह्रदय से काले ,देने की जगह लेने का
भाव प्रबल होता है ,सम्पति और धन को एकत्रित करने में दिन रात जुटे रहते हैं।
जब भी हम अपने स्वार्थ से किसी से जुड़ते हैं तो स्वाभाविक है सामने वाला भी अपना
स्वार्थ रख देता है ,यह एक व्यापार है जो लाभ हानि की  गणित से चलता है और
दुनियादारी कहलाता है ,इससे हटकर बिलकुल उलट बात है हम किसी परमार्थ के
लिए किसी परमार्थी से कुछ चाहते हैं ,यहाँ भी चाह है पर स्वार्थ से परे लोक कल्याण
के लिए। अगर यहाँ भी एक पक्ष स्वार्थी है तो उसे छद्म या ढोंग ही जाने।
संत से क्या माँगे -अगर हम सत्य तत्व के अलावा अपने स्वार्थ की पूर्ति किसी संत
से चाहते हैं और वो उसे पूरा करने का आश्वासन देता है तो समझो धोखा है। क्योंकि
इस संसार में स्वार्थ की  पूर्ति के लिए तो कुछ मूल्य निश्चित रहता है चाहे वह धन हो
या तन। संत पैसा नहीं दे सकता ,संत तक़दीर नहीं बदल सकता ,संत कामनाओं की
पूर्ति का स्त्रोत नहीं है। संत ज्ञान देता है। सत्य कहता है। संत मार्ग का निर्देश मात्र
करता है चलना तो खुद को ही पड़ता है
सन्त को केवल जीवन निर्वाह के लिए भोजन और शरीर ढकने को वस्त्र चाहिए
इसके अलावा उन्हें सच्चे अनुयायी चाहिए जो सत्य को मथते रहे ,अंधानुकरण ना
करे। हम मठाधीश पा सकते हैं मगर सरलता से संत नहीं पा सकते क्योंकि सन्त
कि खोज में भटकना पड़ता है और वह भी परमार्थ का उद्देश्य लेकर।        

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