रविवार, 29 दिसंबर 2013

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव

नैतिक भारत के लिए शिक्षा प्रणाली में बदलाव 

अंग्रेजों ने जब भारत छोड़ा तो कहा था कि इस देश को भारतवासी नहीं चला पायेंगे
और यह फिर से गुलाम हो जायेगा ,क्यों कहा था उन्होंने ऐसा ?क्योंकि वह जानते
थे हम भारत को ऐसी शिक्षा प्रणाली देकर जायेंगे जिसको पढ़ कर युवा दिशा हिन हो
जायेगा और भटक जायेगा।

आज इस देश के सामने मुख्य दौ समस्याएँ हैं पहली भ्रष्टाचार और दूसरी बेरोजगारी
इन दोनों समस्याओं ने कई नयी समस्याओं को जन्म दिया है जैसे- ध्वस्त होती
संस्कृति,महिला असुरक्षा ,जातिवाद,कर्तव्य बोध का अभाव आदि।

मुख्य समस्या भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से भारत ने निपटने के प्रयास किये और
वे प्रयास असफल होते गये और देशवासी इन समस्याओं से तालमेल बैठाकर जीना
सीख गए हैं और नतीजा यह कि ये बीमारियाँ बढ़ती ही जा रही है।

इन मुख्य समस्याओं से झुंझने का प्रयास सिर्फ फोरी तोर पर समय -समय पर
होता रहा है जैसे -आरक्षण,धरना ,आंदोलन प्रदर्शन या कानून लिख कर। ये उपाय
स्थायी नहीं हैं क्योंकि इससे समस्याओं की जड़ को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
क्या कठोर सजा ही सब समस्याओं का हल है ?समाज विज्ञान इसे नहीं मानता।
हमारे देश में अब बच्चे भी अवैधानिक काम कर के पकडे जा रहे हैं,प्रश्न यह उठता
है कि बच्चों के मन में अपराध को अंजाम देने के भाव आये कहाँ से ?ये अपराध
बच्चा सीखा कैसे ?इसके लिए कौन जिम्मेदार है ?

विडंबना है कि इन बातों पर हमारे जनसेवक कभी संसद में चर्चा नहीं करते ,ना
सामाजिक सगंठन इस विषय पर चर्चा करते हैं। बड़ा दुःख है कि हम लीव इन
रिलेशन लाते हैं ,हम समलैंगिगो के लिए संवेदना लाते हैं.हम गर्भपात को बढ़ावा
देते हैं,हम महिलाओं कि असामान्य वेशभूषा को प्रोत्साहित करते हैं मगर शिक्षा
पर कभी बृहद चर्चा नहीं करते जो की मुख्य है।

गणतंत्र भारत को कैसी शिक्षा प्रणाली की जरुरत है इस पर कभी कोई NGO
आंदोलन या धरना नही करता।शिक्षा का स्वरुप कैसा हो इस पर कभी जनमत
नहीं लिया जाता ,जबकि अनैतिक जोड़ गणित के लिए जनमत होते रहते हैं
कारण यही की इससे सत्ता नहीं मिलती।

देश के नेता इस पर चर्चा नहीं करते जबकि चुनाव के समय अपने लिए वोट की
गुहार लगाने घर-घर योजना बद्ध तरीके से पहुँच जाते हैं।

KG से कक्षा पाँच तक का सेलेबस क्या हो ?क्योंकि बच्चा इस समय कोमल मन
का होता है उसे जो सिखाया जाता है वह उसे ग्रहण करता है और यही बाल संस्कार
उसके जीवन को गढ़ते हैं। कक्षा 6 से 8 तक का सेलेबस क्या हो ?इस उम्र में बच्चा
सीखता है और सोचता है। हमारी शिक्षा यहाँ आकर किताबी बन जाती है। बच्चा
किताबों में उलझ जाता है और कीड़ा बनने का प्रयास करता है जबकि सर्वांगीण
विकास हमारा लक्ष्य होना चाहिए।हम यहाँ से बच्चे को संविधान का धर्म नहीं
पढाते हैं ,सँस्कार और संस्कृति को लिखना सिखाते हैं मगर उसे जीवन में उतारना
नहीं सिखाते। कक्षा 9 से 12  जिसमे बच्चा बालिग़ होने लगता है तब तक वह
केवल यही जानता है कि तोता रटन्त परीक्षा पास करने के लिये जरुरी है।
अभिभावक भी कुछ नहीं कर पाते और शिक्षा प्रणाली के अनुरूप बच्चों को तोता
रटन्त करवाते हैं नतीजा बच्चा संस्कार, संस्कृति, सदाचार,नैतिकता को जीवन
में उतारने का अवसर खो देता है।

मेरे देश में कक्षा 12 के बाद बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ना छोड़ देते हैं और ये अनगढ़
बच्चे भारत निर्माण में लग जाते हैं ,ये बच्चे कैसा और कितना योगदान श्रेष्ठ
भारत निर्माण के लिए दे पायेंगे ,जरा आप खुद सोचे।

कॉलेज और मास्टर डिग्री के छात्र सिर्फ जीवन यापन के लिए पढ़ते हैं ,वे इस
कर्तव्य से अनजान हैं की उनकी समाज के लिए कोई जबाबदेही है। हमारी
कागजी डिग्रियाँ जब रोजगार का निर्माण नहीं कर पाती तो युवा हताश हो जाता
है और छोटी मोटी सरकारी नौकरी के लिए चक्कर लगाता है और उसे पाने के
लिए भ्रष्टाचार से समझौता कर लेता है और यही से वह खुद भ्रष्ट जीवन जीने
को धकेल दिया जाता है।

शिक्षा स्वावलम्बी हो ,सभ्य समाज का निर्माण करने वाली हो ,संस्कृति और देश
भक्ति प्रधान हो। इस व्यवस्था के बिना सुराज्य संभव नहीं है             

भू-लोक तन्त्र !!

भू-लोक तन्त्र !! 

एक गाँव के प्रवेश द्वार के पास एक कँटीला पेड़ था और उस पेड़ से कुछ दुरी पर
एक साधु की कुटिया थी। पेड़ के बड़े-बड़े काँटों से आये दिन कोई न कोई आदमी
चुभन का शिकार होता रहता।

एक दिन किसी राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से बिलबिला उठा। उसे लगा
की कुछ ऐसा काम कर दूँ ताकि अन्य राहगीर को काँटे न चुभे। अगले दिन उसने
एक बड़ा बोर्ड बनाया और पेड़ से कुछ फलाँग पहले लगा दिया। उस बोर्ड पर लिखा
था -"सावधान ,आगे काँटे का पेड़ है "
साधू ने उस बोर्ड को देखा और मुस्करा कर कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद दूसरे राहगीर को काँटा लग गया ,वह राहगीर भी दर्द से बिलबिला
उठा। कुछ समय बाद वह एक कुल्हाड़ी लेकर वापिस आया और पेड़ कि कुछ टहनियाँ
जो रास्ते पर आ रही थी उनको काट डाला।
साधु उस राहगीर के पास आया और मुस्करा के अपनी कुटिया में चला गया।

कुछ दिन बाद फिर तीसरे राहगीर को काँटा चुभ गया ,वह दर्द से चिल्ला उठा और
गुस्से से भरा दौड़ता हुआ घर पर गया और घर से आरा लाकर उस पेड़ के तने को
काट डाला। पेड़ को कटा देख सब गाँव वाले इकट्टे हुये और उसे कंधों पर बिठा कर
उत्साह से नाचने लगे।

साधु गाँव वालों के पास गया और सब तमाशा देख चुपचाप मुस्कराता हुआ कुटिया
में चला आया। गाँव वाले कुछ दिन सुकून से रहे। किसी ने उस बोर्ड को वहाँ से हटा
दिया मगर कुछ ही महिनों में वह पेड़ फिर से फलफूल गया और राहगीर फिर से
घायल होने लग गये।

आने जाने वालों ने फिर से बोर्ड लगा दिया ,किसी ने फिर से बड़ी टहनियों को काटा
तो कोई आरा लेकर फिर से तने को काट डालता। तने को काटने वाले को गाँव वाले
कंधों पर बैठाते और नाचते। साधु हर बार घटना क्रम को देखता और मुस्करा कर
कुटिया में चला जाता।

पेड़ का तना कटने के बाद कुछ दिन गाँव में शान्ति रहती और जैसे ही पेड़ वापिस
फलफूल जाता वापिस वही  चक्र शुरू हो जाता। बार-बार के इस चक्र से गाँव वाले
परेशान हो गये और इस समस्या का स्थायी हल ढूंढने के लिए साधु के पास उपाय
पूछने गये।

साधु ने कहा -"आप सब मिलकर इस पेड़ को जड़ सहित उखाड़ दो ,यह इस समस्या
का स्थायी हल है "

गाँव वालों में से एक बोला -हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इस उपाय से हम नेता
विहीन हो जायेंगे ,हम में से जो बोर्ड लगाता है वह सेवा भावी कहलाता है जो कुछ
टहनियाँ काटता है वह समाज सुधारक कहलाता है और जो आरा लेकर तना काटता
है वह नेता कहलाता है.इस चक्र ने हमें सेवाभावी ,समाज सुधारक और नेता दिये हैं
इसके रुकने पर सब बराबर हो जायेंगे। यह उपाय नामंजूर है  …
गाँव के सेवा भावी ,समाज सुधारक और नेता इस उपाय से असहमत थे।

उन सबकी बात सुनकर साधू जोर-जोर से हँस पड़ा और बोला -हाय! भू-लोक तन्त्र !!       

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

नयी परिभाषा

नयी परिभाषा 

इस देश के नेता कब क्या कह जाते हैं यह सोच कर की जनता याद नहीं रखती। आये दिन
नयी परिभाषाएँ बनाने की जुगत में हर कोई लगा है चाहे वह अपनी सोसायटी के किसी
पद पर है या फिर समाज,गाँव ,शहर राज्य या देश के किसी नेता पद पर।
कुछ शब्दों कि नयी सीमा रेखाएँ -

सच :- मैं जो कहूँ और जिसे मानू  वही सत्य 

सरलता :- जो व्यक्ति मेरे  गलत इशारे पर भी नाचे वह सरल 

नैतिक :- जो मुझे रूचिकर लगे और लोग उस पर अँगुली ना उठाये 

वादा :- वो शब्द जिसे मेरी मर्जी से तोडा या टुकड़े टुकड़े कर जोड़ा जा सके  

कसम :- लोग तब भी विश्वास करे जब मैं इसे तोड़ मरोड़ दूँ 

वफादार :- जो मेरे काले कारनामों को दबा दे ,मिटा दे 

ईमानदार :- जो व्यक्ति मेरे पक्ष में खड़ा हो सके 

भ्रष्ट :-मेरा विरोधी तथा मेरे पक्ष में रहकर आँखे और कान खुले रखता हो 

व्यवहार :- उचित काम करने पर दी जाने वाली अनुचित राशी 

होशियारी :- मैं कसम तोड़ता जाऊँ और जनता समर्थन देती रहे 

समझदार :-नाव डूबती देख विरोधी का पल्ला थाम ले 

सेवा :- जिस काम को खूब प्रचारित जा किया जाये और आडम्बर भी फैले 

त्याग :- अपराध सिद्ध हो जाने पर पद से लिया गया इस्तीफा 

अहँकार :- विरोधी द्वारा कहा जा रहा कड़वा सच 





रविवार, 22 दिसंबर 2013

जनमत तो श्री राम के साथ भी था …।

जनमत तो श्री राम के साथ भी था  …। 

केजरीवाल के दाँत क्या खाने और दिखाने के अलग हैं ?यह प्रश्न सहज है ,क्योंकि वे युवा
भारत को नैतिकता और ईमानदारी का स्वराज्य देने का सपना दे रहे थे। जिस भ्रष्टाचार
से लड़ने की बात किया करते थे वो केजरीवाल अब कहाँ गायब हो गया ?क्या सत्ता की
भूख हर बार नैतिकता पर भरी पड़ जाती है ?

"आप" कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ वोट माँग रही थी और जब राजा बनने की
बारी आयी तो कांग्रेस से समर्थन पाकर राज जमाने की तैयारी में लग गयी है। क्या
यही नैतिकता है या यही स्वराज्य का स्वरुप था केजरीवाल का। क्या जनता ने इसलिए
केजरीवाल को वोट किया था। नहीं ,जब जनता ने वोट किया था तो उसकी सोच कांग्रेस
के शासन से मुक्ति की थी और "आप"के निर्दोष नए चेहरे थे। जनता ने इस विश्वास के
साथ "आप"को वोट दिया कि उसे नया स्वराज्य मिलेगा।

जब जनता ने केजरीवाल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया तो उसे भी भाजपा कि तरह सत्ता
को हाथ जोड़ देना चाहिए था ,लेकिन हाथीके दाँत खाने और दिखने के अलग होते हैं उसी
तरह "आप" ने सत्ता का सुख भोगने का शॉर्ट कट लिया उसका अर्थ यह था कि सत्ता मिल
गयी तो राज करते रहेंगे और काँग्रेस ने हाथ हटाया तो जनता को कह देंगे कि हमने तो
आपके कहने पर यह सब पाप किया।

  मुझे रामायण का वह खंड याद आता है जब राम के वनवास कि बात सुन अयोध्या की
प्रजा ने राजा दशरथ का साथ छोड़ श्री राम को राजा मान लेने का निर्णय कर लिया था।
खुद दशरथ भी राम से कह चुके थे कि -"बेटा ,मुझे कारावास में बंदी बनाकर तुम राज कर
लो "मगर श्री राम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि उनके इस आचरण का
दूरगामी प्रभाव प्रजा पर पडेगा और वह भी धीरे -धीरे अनैतिक हो जायेगी। राम ने वनवास
को सुराज्य कि स्थापना के लिए स्वीकार किया था। श्री राम ने उस समय जनमत के
विरुद्ध आचरण करके वन जाना स्वीकार क्यों किया ?उन्होंने जनमत का आदर क्यों नहीं
किया जो उन्हें उसी समय राजा के रूप में स्वीकार कर चूका था।

केजरीवाल जनता कि भावुकता और सरल ह्रदय का फायदा उठाने कि सोच चुके हैं ,अगर
जनता ने भावावेश में कोई निर्णय कर लिया तो इसका मतलब यह नहीं की केजरीवाल
सिंहासन पर बैठ जाये। केजरीवाल और उनकी टीम ने कभी भी जनता से यह प्रश्न नहीं
किया कि हमें वापिस जनता के पास जाना चाहिए ,क्यों ? आप जनता से हाँ या ना क्यों
पूछ रहे थे ?उनको यह क्यों नहीं समझा रहे थे कि काँग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना
अनैतिक है ?

इसके जबाब में "आप"यह तर्क दे कि जनता इतना जल्दी चुनाव का खर्च नहीं बर्दास्त
कर पायेगी लेकिन इस बात में कोई दम नहीं है क्योंकि जनता जानती है की उसने सही
बहुमत नहीं दिया इसलिए वापिस चुनाव का खर्च उठाना पडेगा। देश की जनता मौका
परस्त नहीं है ,देश कि जनता नैतिकता के प्याले में अनैतिकता का घोल पसंद नहीं
करती है मगर उससे छद्म और छल से गलत फैसला करवा कर हम किस ढ़ंग की
नैतिकता की स्थापना करने जा रहे हैं यह शोचनीय है

   

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

क्या हर चावल से पूछोगे .............

क्या हर चावल से पूछोगे      ............. 

माँ चावल पकाने के लिए चूल्हे पर तपेले को रख रसोई के दूसरे काम निपटा रही थी
और कभी कभार तपेले की ओर नजर कर लेती थी। पानी गर्म होकर उबल रहा था
और उसमें रखे चावल भी पक रहे थे। मैं टीवी ऑन कर समाचार सुनने लगा। ताजा
खबर दिल्ली कि उलझी गुत्थी थी। "आप "के विरोधी केजरीवाल को सरकार बनाने
का न्यौता और समर्थन दे रहे थे मगर केजरीवाल जनता से राय सुमारी की बात
कर रहे थे। 25 लाख लोगों से राय लेकर फैसला करने को कह रहे थे। मुझे यह बात
हजम नहीं हो रही थी। केजरीवाल कैसे मालूम करेंगे की उनकी राय सुमारी में उनके
समर्थक शामिल है या विरोधी ? क्या उनको मिली सीट और वोट से वे नतीजे पर
नहीं पहुँच सकते थे ?यह सब सोचता मैं उठकर माँ के पास रसोई में चला गया।
मेने देखा कि माँ ने तपेली से कुछ चावल के दाने निकाल कर चिमटी से दबाये और
चूल्हा बंद कर दिया।
मेने माँ से पूछा -माँ आपने दो चार दाने तपेली से निकाल कर देखा और चावल पक
गए ऐसा मानकर चूल्हा बंद कर दिया  .............
माँ ने मेरी बात काटते हुए कहा -तो क्या सब चावल को दबा कर देखती ?
मेने कहा -नहीं ,पर एक चौथाई तो देखने ही थे
माँ ने कहा -मैं कोई अनाड़ी थोड़े ही हूँ केजरीवाल की तरह जो सबसे पूछता फिर रहा
है कि सरकार बनाऊ या ना बनाऊ
मेने पूछा - तो केजरी अंकल को क्या करना चाहिए ?
माँ बोली -मेरी तरह व्यवहारिक निर्णय लेना सीखना चाहिए।     

रविवार, 15 दिसंबर 2013

व्यवहार

व्यवहार 

 एक बार किसी ने सूर्यदेव से पूछा -आप बहुत ही तेजस्वी हैं आपके तेज से समस्त लोक 
आलोकित होते हैं मगर जब भी आप चंद्रदेव से मिलते और बिछुड़ते हैं तब आप सोम्य 
और शीतल क्यों हो जाते हैं ?

सूर्यदेव ने कहा -यही तो जीने की सरल और सुंदर पद्धति है और यही नीति का सार है 
यदि सामने वाला सोम्य और शीतलता से मिलता है तब हमे भी सारा ऐश्वर्य ,तेज और 
बल भूल कर सोम्य और शीतल व्यवहार करना चाहिए।सज्जन को बल और तेज के 
घमंड से मित्र नहीं बनाया जा सकता उसे मित्र बनाना है तो हमे अपना खुद का व्यवहार 
सुधार लेना चाहिए और बिना कारण अनुचित समय में अपने बल को दिखाकर खुद को 
अहँकारी भी नहीं बनाना चाहिये।  

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

दिल्ली की गुत्थी !

दिल्ली की गुत्थी !

दिल्ली में २८ सीटे जीत कर अरविन्द केजरीवाल ने सरकार बनाने के लिए काँग्रेस और
भाजपा से अपने मुद्दों पर समर्थन माँगा और गेंद दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के पाले में डाल
कर अपरोक्ष रूप से चुनाव फिर से हो इसकी घोषणा कर दी।

  श्री अरविन्द की शर्तों को मानकर यदि भाजपा उन्हें उनके मुद्दों पर समर्थन दे देती है
तो इसका बड़ा फायदा भाजपा को राष्ट्रीय लोकसभा के चुनाव में हो सकता है क्योंकि
अरविन्द के मुद्दों पर समर्थन करके भाजपा इन्ही मुद्दो को आने वाले लोकसभा चुनाव
में अरविन्द से छीन सकती है और खुद  की छवी को राष्ट्रीय फलक पर और ज्यादा
निखार सकती है क्योंकि अरविन्द के मुद्दे काफी हद तक मोदीजी के विचारों से मेल
खाते हैं और भाजपा के विचार -भय, भूख और भ्रष्टाचार से मिलते हैं।

   अरविन्द को सहकार नहीं देने पर "आप" जब जनता के पास फिर से जायेगी तो
वह इस बार भाजपा को मुख्य प्रतिद्धन्दी मानकर चुनाव लड़ेगी इसमें मुख्य लड़ाई
"आप "और भाजपा की रहेगी ,हो सकता है भाजपा इस बार बाजी मार भी ले मगर
उसे एक राज्य में अपनी सरकार बनाने के फायदे से ज्यादा फायदा मिलना सम्भव
नहीं लगता क्योंकि दिल्ली की लोकसभा सीटों पर "आप"के कारण से उसे नुकसान
भी हो सकता है।

 "आप "जब भी भला बुरा कहती है तो सबसे ज्यादा चोट काँग्रेस पर ही करती है और
इन चुनावों में भी उसने काँग्रेस का वोट बैंक तोड़ा है। काँग्रेस यदि उन्हें समर्थन उनके
मुद्दों पर देती है तो उसे भविष्य में भी नुकसान होने कि सम्भावना प्रबल रहने वाली है

देखिये अब गोटी कौन किस तरह से चलता है। फिर से चुनाव ,जिसकी सम्भावना
दिखती है या बड़ी जीत के लिए छोटा तथा पीछे हटने का कदम भाजपा का। …           

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

उच्चतम न्यायलय ने भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया

उच्चतम न्यायलय ने भारतीय संस्कृति का गौरव बढ़ाया 

हमारी संस्कृति पर अन्य जातियों ने वर्षो से हमले किये और उसे नेस्तनाबूत करने की
नाकामयाब कोशिशे आज तक जारी है। भला हो उच्चतम न्यायालय का जिसने "गे "
दुराचरण के खिलाफ फैसला दिया।

 हमारी संस्कृति और सद साहित्य को मिटाने पर दूसरी जातियाँ मौके की तलाश में
रहती है ,हिंदुत्व की जीवन शैली को अन्य जातियाँ  पुरानपंथी ठहराकर खुद के कुसंस्कार
के जहरीले बीज हिंदुस्तान में रोपना चाहती है। "गे " जीवन पद्धति भारतीय संस्कृति के
दर्शन के खिलाफ है। हमारे आदर्श राम और कृष्ण जैसे सर्वशक्तिमान दिव्यात्मा हैं ,
हमारा साहित्य वेद और उपनिषद है। हमारे वेदों में "गे "जीवन का उल्लेख तक नहीं है।
हमारे ऋषि मुनियों के लिखित यौन शास्त्रों ने इस प्रकार जीने की सोच वाले निकृष्ट
सोच वाले कुंठित लोगों का जिक्र करना भी उचित नहीं समझा। फिर सवाल यह उठता
है कि विश्व की अन्य जातियाँ जो खुद "गे "जीवन की निकृष्टता के दलदल में फँसी है
वो इस दलदल से बाहर आने का उपाय ढूंढने की जगह अन्य जातियों को इस विष का
पान कराने को क्यों आतुर है ?
       
     क्या अप्राकृतिक यौन संबंध हमारी दैव संस्कृति से मेल खाते हैं ?क्या स्वतंत्रता के
नाम पर निकृष्ट ,अनुपयोगी ,अप्राकृतिक और हेय विचारों पर चिंतन ,मंथन या बहस
जायज है ?
   
     यह इस देश का प्रतिकुल समय है क्योंकि भारतीय संस्कृति से अनजान, भारतीय
साहित्य से अनजान, भारतीय जनता की भावनाओं से अनजान राजनेता के पुत्र "गे "
जैसे निकृष्ट प्राणियों के अधिकारों के पक्ष में बात करते हैं।

अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अब जग कर हुँकार भरने का समय आ गया है।
ये विदेशी दुराचरण भारत में पग पसारे उसके पहले उसे नष्ट कर दे। हमारी उच्च तम
न्यायलय ने इस विचार धारा को अपराध की श्रेणी में रखा इसके लिए साधुवाद  …।           

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

क्या राजनीति से कभी नैतिकता का जन्म हुआ ?

क्या राजनीति से कभी नैतिकता का जन्म हुआ ?

आज देश में एक शोर सुनायी दे रहा है कि देश को राजनीति के गर्भ से नैतिकता दे देंगे।
क्या बबुल भी कभी आम का फल देते हैं ,नहीं ना ; तो फिर देशवासियों को यह आशा
क्यों जगायी जा रही है ? क्या धर्म ग्रंथ सदाचरण की शिक्षा के सार से लबालब नहीं है ?
फिर क्यों हर जगह अनैतिकता फैलती जा रही है ?क्या कठोर कानून से समाज नैतिक
बन जाएगा ?यदि ऐसा हो सकता था तो सजा ए मौत ही हर अपराध को रोकने में
समर्थ होती।

 राजनीति से नैतिकता लाने कि बात करने वाले नेता देश और समाज को भ्रमित कर
खुद का स्वार्थ ही पूरा करते हैं। आम जनता नैतिकता की बात करती है और चाहती भी
है कि कोई ऐसा सूत्र या उपाय मिल जाए जिससे अपराध कम हो जाये और यही कारण
है कि वह जो भी नैतिकता कि बात करता है उसका बिना सोचे समझे समर्थन करने
निकल पड़ती है वह यह नहीं देखती है कि सामने कोई ढोंगी बाबा है या कुशल विक्रेता।

  राजनीति के क्षेत्र में नैतिकता का झण्डा लेकर कुछ व्यक्ति निकल सकते हैं मगर
उनके पीछे चल रही करोड़ो कि भीड़ नैतिक है ,इसमें पूरा सन्देह है। सन्तो के प्रवचन
को सुनने वाले सभी सात्विक और धार्मिक प्रवृति के लोग होते तो यह देश कभी का
सात्विक बन गया होता ,अगर सात्विक विचारों का प्रवाह लोगों का नैतिक नहीं बना
सकता है तो फिर राजनीति से नैतिकता का जन्म कैसे हो सकता है क्योंकि राजनीति
में तो छल बल छद्म सब कुछ जायज है।

 सत्ता से नैतिक मूल्यों कि स्थापना हो सकती थी तो राजकुँवर सिद्दार्थ को राजा
बन जाना चाहिए था उसे बुद्ध क्यों बनना पड़ा ?सत्ता के परिवर्तन मात्र से देश या
समाज नैतिक और स्वच्छ बनता है तो कितनी सत्ता हजारों वर्षों में बदली लेकिन
नैतिकता का पतन क्यों होता गया ?

नैतिकता का सपना दिखा कर वोट और सत्ता पा लेना सरल है मगर सत्ता से नैतिकता
की स्थापना का सपना दिखाना समाज को मुर्ख बनाना है। कोई कहता है कड़ा कानून
ले आओ ,कोई कहता है मुझे आजमा कर देखो  ये सब आडंबर से देश का क्या भला होगा ?

 कोई संत चोरों की बस्ती में जाकर बढ़िया प्रवचन दे दे और उपस्थित लोग उनकी बात
का समर्थन भी कर दे तो क्या यह मान लिया जाए कि वहाँ नैतिकता का साम्राज्य हो गया ?

 नैतिकता के लिये मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए किसी राजनैतिक पार्टी की
जरूरत नहीं होती है ,उसके लिए खुद को अपने परिवार को सुधारने कि आवश्यकता होती है
यदि मनुष्य खुद स्वत: नैतिक बनने का संकल्प करता है तभी नवचेतना आ सकती है

पार्टी बनाने ,आलोचना करने,दुसरो में खामियाँ ढूंढने से नैतिकता नही आने वाली है और
इसीलिए शायद गाँधीजी पद से दूर कर्म से ये साबित करते रहे और उनका अनुकरण
करते अन्ना हजारे दिखायी पड़ते हैं  ……………           

रविवार, 8 दिसंबर 2013

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

चार राज्यों के चुनावी नतीजे भारतीय मतदाता की परिपक्वता दर्शाता है , भारतीय युवा
मतदाता अब अपना भला बुरा सोचने लगा है और यह बात इस चुनाव में यह बात उभर
कर सामने आयी है. भारतीय अब जिंदाबाद और मुर्दाबाद से ऊपर उठ कर देश का सही
मायने में विकास देखना चाहता है।

 कुछ सच्चाईयाँ जो चुनावी परिणाम से सामने आयी है - 

        जनता की स्मरण शक्ति कमजोर होती है और वह गलतियों को नजर अंदाज कर
देती है यह बात अब बीत चुकी है।

         जनता मुर्ख होती है उसे मुर्ख बनाने की कला को राजनीति की कभी परिभाषा कहा
जाता था लेकिन अब यह परिभाषा खत्म हो चुकी है।

        जनता आज तक नेता चुनती थी लेकिन अब जनता जनसेवक चुनने कि दिशा में
आगे बढ़ रही है।

        जनता अपने कर के पैसे को कहाँ खर्च किया जा रहा है उसे गहराई से देख रही है
और जैसे ही कोई पार्टी उस धन का दुरूपयोग करने लगती है उसे जनता गेट आउट कहना
सीख चुकी है।

      जनता अपना उचित हक़ हर कीमत पर चाहती है वह किसी नेता या पार्टी की भीख
या दया नहीं चाहती है।

      जनता नेताओं के किए गए वायदो को ध्यान से सुनती है और उसे खुद की सोच के
तराजु पर तोलने के बाद निर्णय लेती है।

        जनता हर मीडिया को सुनती है और खुद निर्णय पर पहुँच रही है कि मीडिया कितना
झूठ या सच है ,वह खबरों पर अँधा विश्वास नहीं  कर रही है।

       जनता जनसेवक का सम्मान तभी करेगी जब जनसेवक अपने कर्मो से यह साबित
करे कि वह राजनीति में पैसा बनाने के लिए नहीं सेवा करने के लिए आया है।

    जनता आंकड़ो के मायाजाल के फेर में नहीं पड़ कर यथार्थ को देखने लगी है जनता को
जब भी उद्घाटन के पाटिये चिड़ाते हैं तो जनता उस नेता को ही चिढ़ा देती है।

    जनता को हाथ जोड़कर वोट ले जाने वाले नेता जब खुद को जनता का राजा समझने
लगता है तो जनता उस अभिमानी को वापिस जनता बना देती है।

  जनता अब तभी बदलाव चाहती है जब सरकारें उसके मिजाज के खिलाफ काम करती
है जब तक जनता कि मर्जी के काम होते रहते हैं तब तक जनता दखल नहीं देती है।

   जनता टीम के कप्तान को ही नहीं पूरी टीम और सरकारी अफसरों को भी ईमानदार
देखना पसन्द कर रही है।

 जनता न तो छद्म धर्मनिरपेक्षता चाहती है और न ही छद्म राजनीति ,जनता धुर्त लोगों
पर कालिख पोतना सीख चुकी है।

जनता का मिजाज अब बदल गया है वह सीधा और सपाट कह रही है  -अपना मेहनताना
लो और देश की सेवा करो और सेवा की जगह मेवा पाना है तो रास्ता नापो  ……