रविवार, 8 दिसंबर 2013

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

परिपक्व जनादेश : कर्तव्य निभाओ या रास्ता देखो ?

चार राज्यों के चुनावी नतीजे भारतीय मतदाता की परिपक्वता दर्शाता है , भारतीय युवा
मतदाता अब अपना भला बुरा सोचने लगा है और यह बात इस चुनाव में यह बात उभर
कर सामने आयी है. भारतीय अब जिंदाबाद और मुर्दाबाद से ऊपर उठ कर देश का सही
मायने में विकास देखना चाहता है।

 कुछ सच्चाईयाँ जो चुनावी परिणाम से सामने आयी है - 

        जनता की स्मरण शक्ति कमजोर होती है और वह गलतियों को नजर अंदाज कर
देती है यह बात अब बीत चुकी है।

         जनता मुर्ख होती है उसे मुर्ख बनाने की कला को राजनीति की कभी परिभाषा कहा
जाता था लेकिन अब यह परिभाषा खत्म हो चुकी है।

        जनता आज तक नेता चुनती थी लेकिन अब जनता जनसेवक चुनने कि दिशा में
आगे बढ़ रही है।

        जनता अपने कर के पैसे को कहाँ खर्च किया जा रहा है उसे गहराई से देख रही है
और जैसे ही कोई पार्टी उस धन का दुरूपयोग करने लगती है उसे जनता गेट आउट कहना
सीख चुकी है।

      जनता अपना उचित हक़ हर कीमत पर चाहती है वह किसी नेता या पार्टी की भीख
या दया नहीं चाहती है।

      जनता नेताओं के किए गए वायदो को ध्यान से सुनती है और उसे खुद की सोच के
तराजु पर तोलने के बाद निर्णय लेती है।

        जनता हर मीडिया को सुनती है और खुद निर्णय पर पहुँच रही है कि मीडिया कितना
झूठ या सच है ,वह खबरों पर अँधा विश्वास नहीं  कर रही है।

       जनता जनसेवक का सम्मान तभी करेगी जब जनसेवक अपने कर्मो से यह साबित
करे कि वह राजनीति में पैसा बनाने के लिए नहीं सेवा करने के लिए आया है।

    जनता आंकड़ो के मायाजाल के फेर में नहीं पड़ कर यथार्थ को देखने लगी है जनता को
जब भी उद्घाटन के पाटिये चिड़ाते हैं तो जनता उस नेता को ही चिढ़ा देती है।

    जनता को हाथ जोड़कर वोट ले जाने वाले नेता जब खुद को जनता का राजा समझने
लगता है तो जनता उस अभिमानी को वापिस जनता बना देती है।

  जनता अब तभी बदलाव चाहती है जब सरकारें उसके मिजाज के खिलाफ काम करती
है जब तक जनता कि मर्जी के काम होते रहते हैं तब तक जनता दखल नहीं देती है।

   जनता टीम के कप्तान को ही नहीं पूरी टीम और सरकारी अफसरों को भी ईमानदार
देखना पसन्द कर रही है।

 जनता न तो छद्म धर्मनिरपेक्षता चाहती है और न ही छद्म राजनीति ,जनता धुर्त लोगों
पर कालिख पोतना सीख चुकी है।

जनता का मिजाज अब बदल गया है वह सीधा और सपाट कह रही है  -अपना मेहनताना
लो और देश की सेवा करो और सेवा की जगह मेवा पाना है तो रास्ता नापो  …… 
           

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