गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

क्या हर चावल से पूछोगे .............

क्या हर चावल से पूछोगे      ............. 

माँ चावल पकाने के लिए चूल्हे पर तपेले को रख रसोई के दूसरे काम निपटा रही थी
और कभी कभार तपेले की ओर नजर कर लेती थी। पानी गर्म होकर उबल रहा था
और उसमें रखे चावल भी पक रहे थे। मैं टीवी ऑन कर समाचार सुनने लगा। ताजा
खबर दिल्ली कि उलझी गुत्थी थी। "आप "के विरोधी केजरीवाल को सरकार बनाने
का न्यौता और समर्थन दे रहे थे मगर केजरीवाल जनता से राय सुमारी की बात
कर रहे थे। 25 लाख लोगों से राय लेकर फैसला करने को कह रहे थे। मुझे यह बात
हजम नहीं हो रही थी। केजरीवाल कैसे मालूम करेंगे की उनकी राय सुमारी में उनके
समर्थक शामिल है या विरोधी ? क्या उनको मिली सीट और वोट से वे नतीजे पर
नहीं पहुँच सकते थे ?यह सब सोचता मैं उठकर माँ के पास रसोई में चला गया।
मेने देखा कि माँ ने तपेली से कुछ चावल के दाने निकाल कर चिमटी से दबाये और
चूल्हा बंद कर दिया।
मेने माँ से पूछा -माँ आपने दो चार दाने तपेली से निकाल कर देखा और चावल पक
गए ऐसा मानकर चूल्हा बंद कर दिया  .............
माँ ने मेरी बात काटते हुए कहा -तो क्या सब चावल को दबा कर देखती ?
मेने कहा -नहीं ,पर एक चौथाई तो देखने ही थे
माँ ने कहा -मैं कोई अनाड़ी थोड़े ही हूँ केजरीवाल की तरह जो सबसे पूछता फिर रहा
है कि सरकार बनाऊ या ना बनाऊ
मेने पूछा - तो केजरी अंकल को क्या करना चाहिए ?
माँ बोली -मेरी तरह व्यवहारिक निर्णय लेना सीखना चाहिए।     

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