रविवार, 22 दिसंबर 2013

जनमत तो श्री राम के साथ भी था …।

जनमत तो श्री राम के साथ भी था  …। 

केजरीवाल के दाँत क्या खाने और दिखाने के अलग हैं ?यह प्रश्न सहज है ,क्योंकि वे युवा
भारत को नैतिकता और ईमानदारी का स्वराज्य देने का सपना दे रहे थे। जिस भ्रष्टाचार
से लड़ने की बात किया करते थे वो केजरीवाल अब कहाँ गायब हो गया ?क्या सत्ता की
भूख हर बार नैतिकता पर भरी पड़ जाती है ?

"आप" कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ वोट माँग रही थी और जब राजा बनने की
बारी आयी तो कांग्रेस से समर्थन पाकर राज जमाने की तैयारी में लग गयी है। क्या
यही नैतिकता है या यही स्वराज्य का स्वरुप था केजरीवाल का। क्या जनता ने इसलिए
केजरीवाल को वोट किया था। नहीं ,जब जनता ने वोट किया था तो उसकी सोच कांग्रेस
के शासन से मुक्ति की थी और "आप"के निर्दोष नए चेहरे थे। जनता ने इस विश्वास के
साथ "आप"को वोट दिया कि उसे नया स्वराज्य मिलेगा।

जब जनता ने केजरीवाल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया तो उसे भी भाजपा कि तरह सत्ता
को हाथ जोड़ देना चाहिए था ,लेकिन हाथीके दाँत खाने और दिखने के अलग होते हैं उसी
तरह "आप" ने सत्ता का सुख भोगने का शॉर्ट कट लिया उसका अर्थ यह था कि सत्ता मिल
गयी तो राज करते रहेंगे और काँग्रेस ने हाथ हटाया तो जनता को कह देंगे कि हमने तो
आपके कहने पर यह सब पाप किया।

  मुझे रामायण का वह खंड याद आता है जब राम के वनवास कि बात सुन अयोध्या की
प्रजा ने राजा दशरथ का साथ छोड़ श्री राम को राजा मान लेने का निर्णय कर लिया था।
खुद दशरथ भी राम से कह चुके थे कि -"बेटा ,मुझे कारावास में बंदी बनाकर तुम राज कर
लो "मगर श्री राम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि उनके इस आचरण का
दूरगामी प्रभाव प्रजा पर पडेगा और वह भी धीरे -धीरे अनैतिक हो जायेगी। राम ने वनवास
को सुराज्य कि स्थापना के लिए स्वीकार किया था। श्री राम ने उस समय जनमत के
विरुद्ध आचरण करके वन जाना स्वीकार क्यों किया ?उन्होंने जनमत का आदर क्यों नहीं
किया जो उन्हें उसी समय राजा के रूप में स्वीकार कर चूका था।

केजरीवाल जनता कि भावुकता और सरल ह्रदय का फायदा उठाने कि सोच चुके हैं ,अगर
जनता ने भावावेश में कोई निर्णय कर लिया तो इसका मतलब यह नहीं की केजरीवाल
सिंहासन पर बैठ जाये। केजरीवाल और उनकी टीम ने कभी भी जनता से यह प्रश्न नहीं
किया कि हमें वापिस जनता के पास जाना चाहिए ,क्यों ? आप जनता से हाँ या ना क्यों
पूछ रहे थे ?उनको यह क्यों नहीं समझा रहे थे कि काँग्रेस के सहयोग से सरकार बनाना
अनैतिक है ?

इसके जबाब में "आप"यह तर्क दे कि जनता इतना जल्दी चुनाव का खर्च नहीं बर्दास्त
कर पायेगी लेकिन इस बात में कोई दम नहीं है क्योंकि जनता जानती है की उसने सही
बहुमत नहीं दिया इसलिए वापिस चुनाव का खर्च उठाना पडेगा। देश की जनता मौका
परस्त नहीं है ,देश कि जनता नैतिकता के प्याले में अनैतिकता का घोल पसंद नहीं
करती है मगर उससे छद्म और छल से गलत फैसला करवा कर हम किस ढ़ंग की
नैतिकता की स्थापना करने जा रहे हैं यह शोचनीय है

   

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