बुधवार, 31 दिसंबर 2014

शुभ कामनाएँ विक्रम संवत की ओर से ………

शुभ कामनाएँ  विक्रम संवत की ओर से ……

विक्रम संवत 2071 पोष शुक्ल 10 की ओर से ईस्वी सन 2015 के जन्म दिवस
पर शुभ कामनाएँ।

तुम में और मुझ में काफी अंतर है तनय ,पहला तो यही कि मैं तुमसे 57 साल
पहले जन्म ले चूका था। दूसरा मेरा जन्म तेरी तरह रात के घोर अंधकार में नहीं
बल्कि सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ हुआ था। तीसरा मेरा DNA ब्रहा के साथ
जुड़ा हुआ है तो तेरा   .... जिसे मालूम है वो बताये क्योंकि मैं तेरे से बड़ा होकर भी
नहीं जानता हूँ। तेरे जन्म के साथ ही अश्लील नाच, मदिरा पान और भी बहुत सी
बुराइयाँ क्यों शुरू हो जाती है जबकि मेरे जन्म के साथ मंगल गान,पूजा अर्चना
के साथ होती है। तेरी तरह मेरे जन्म के समय आलिंगन की वीभत्सता नहीं है लेकिन
मेरे जन्म पर आशीर्वाद जरूर बरसता है।  तेरे जन्म पर प्रकृति भी ठंडी होकर जम
जाती है मगर मेरे जन्म पर माँ भारती की गोद में प्रकृति हरी हो जाती है।

मैं तब भी था जब कोई संवत ब्रह्माण्ड में नहीं था ,मेरे देखते -देखते कितने संवत
आये और चले भी जाएंगे परन्तु मुझे प्रलय तक बने रहना है। मेने ब्रहा की पृथ्वी
को सुसंस्कारों से सींचने का पूरी ताकत से प्रयास किया है। पुरे सौर मंडल की गति
को मेने परखा और समझा है लेकिन मैं तुझे समझ ही नहीं पाया हूँ क्योंकि तेरा
तारतम्य इनके साथ कभी भी नहीं रहा है।

मेरे भारत में तुझे 1957 में लाया गया वह भी एक हिन्दू सेक्युलर के कारण  …
जबसे तू आर्य खंड में आया है तबसे मैं दुःखी और पीड़ित हूँ। इसका कारण तू नहीं
तेरे अमर्यादित कुसंस्कार हैं। तूने मेरे बच्चों को सभ्यता की चासनी में जो जहर
बाँटना शुरू किया है वह मुझ से देखा नहीं जाता।

मेरी सलाह है तुम्हें तुम भी मेरे घर में रह मगर अतिथि बनकर। मेरे भारतवासियों
को कुसंस्कार में मत लपेट।  

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

भारत में 2015 का बड़ा परिवर्तन ...

भारत में 2015 का बड़ा परिवर्तन

एक ही रहा कि धर्म निरपेक्षता सिकुड़ते हुये मौत की कगार पर आ गयी 👏👏👏और हिन्दु✊होकर बड़ा वोट बैंक बन गया✌️✌️✌️

2016 की सबसे बड़ी घटना यह होने वाली है कि सभी दल हिन्दु वोट बैंक की और रुख करते जायेंगे  🙏🙏🙏

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

हिन्दू नव वर्ष

हिन्दू नव वर्ष

हिन्दू नव वर्ष को संवत्सर कहा जाता है जो ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की उत्पति का प्रथम दिन है। यह दिन हिन्दू
माह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है।
संवत्सर काल को मापने की ऋषियों द्वारा खोजी गयी वैज्ञानिक विधि है जिसे सौर ,चन्द्र और नक्षत्र सावन
और अधिमास के आधार पर परखा गया है
सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा 365 दिन में पूरी करता है और चन्द्र 355 दिन में। तीन साल में यह अंतर 30 दिन का
होता है इसलिए अधिक मास की गणना की गई है.
रात्री के अँधेरे में नए दिन की शरुआत हिन्दू कलेंडर में नहीं होती है। हिन्दू कैलेंडर में दिन सूर्योदय से अगले
सूर्योदय तक माना जाता है।
हिन्दू त्यौहार चन्द्र कलेंडर के आधार पर मनाये जाते हैं। तिथियों का क्षय और बढ़ना चन्द्र की गति के आधार
पर है और चन्द्र की गति असमान है।
नव संवत्सर का प्रारम्भ यानि विक्रम संवत की स्थापना राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व 57  साल में की
थी।
राजा विक्रमादित्य ने विदेशी राजाओं शक और हुण की दासता से भारत को मुक्त कराया था।
राजा विक्रमादित्य ने अखंड भारत के  नागरिकों के कर्ज को अपने राजकोष से चुका कर नव वर्ष की स्थापना
की थी।
राजा विक्रमादित्य चक्रवती सम्राट होने के बाद भी ऐश्वर्य का त्याग कर भूमी पर शयन करते थे और अपने
सुख के लिए राजकोष से धन नहीं लेते थे।
राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में धन्वन्तरि (वैद्य )वराहमिहिर (ज्योतिषाचार्य )कालिदास ( साहित्यकार )शामिल
थे।
श्री राम ,कृष्ण ,बुद्ध ,महावीर ,नानकदेव की जयंती हिन्दू कलेंडर के आधार पर मनाई जाती है।
जवाहरलाल नेहरू ने २२ मार्च 1957 को ग्रेगेरियन कलेंडर को सरकारी कामकाज के लिए उपयुक्त समझ
इसे राष्ट्रिय कलेंडर घोषित किया !!और हम भारतवासी उसके बाद से हिन्दू नव वर्ष को छोड़ते चले गए
और 1 जनवरी को नया साल समझने और मनाने लग गये।
 नया वर्ष का ईसा के जन्म से भी संबंध नहीं है और ना ईसा की मृत्यु से , फिर भी जनवरी को नया वर्ष मानना
सिर्फ अवैज्ञानिक दृष्टिकोण है।
हिन्दू नव वर्ष को विश्व के कौन -कौन धर्मावलम्बी मनाते हैं ? कोई भी नहीं ,फिर हम किसी और के धर्म का
गुणगान क्यों करने लग जाते हैं और खुद के गौरव को छोड़ देते हैं ?







शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

चिंता की बात ………

चिंता की बात   ………

 
बहुसंख्या के बल से नेतागिरी शुरू होती है और बहुसंख्या की ताकत से सत्ता भी चलती है ,इस बात 
की ख़ुशी कम हो जाती है क्योंकि नेता बन जाने के बाद हर अदना सा आदमी इसी प्रजातंत्र में 
बहुसंख्यक लोगों के हित में कुछ भी करना अपना धर्म नहीं समझता है सब अल्पसंख्या के दल -
दल में फंसने का जुगाड़ बिठाने में उम्र गंवाते रहते हैं। 

चिंता इस बात की नहीं है कि किस धर्म के अनुयायियों की जनसँख्या बढ़ रही है मगर चिंता की 
यह बात जरूर है कि बहुसंख्यक का खून पानी बन रहा है ,कान बहरे हो रहे हैं ,जबान गूँगी हो 
रही है , आँखों से देखना नहीं चाहता है ,दिल कमजोर हो रहा है।

चिंता धर्मान्तरण की नहीं है मगर धर्मान्तरण का दोगलापन चिंता बना हुआ है। हिन्दू धर्म को 
त्याग कर कोई धर्मान्तरण करता है तो किसी के कान में जूँ नहीं रेंगती मगर कोई हिन्दू बनता 
है तो मक्कार दिलों को नागवार गुजरता है। 

चिंता की बात आतंक नहीं है क्योंकि इसका माकूल ईलाज  है ,दवा है। चिंता की बात यह 
है कि आतंक को पैदा करने वाले और पोषण करने वाले जिन्दा है। 

चिंता की बात गरीबी और भुखमरी नहीं है मगर चिंता की बात यह जरूर है कि गरीबी और 
भुखमरी को मिटाने की दवा पर ताकतवर लोग बेजा हक जमाये बैठे हैं। 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

कड़वी करेली

कड़वी करेली

पाकिस्तान में तीन दिन का शोक उनके लिये दुःख को सहने के लिए था जो उनके हुक्मरानों के कारण झेलना पड़ा मगर भारत के टी वी समाचार चैनल के लिये यह घटना सेक्युलिरीज्म के लिये मातम मनाने की है जिसे तब तक बताया जा सकता है जब तक इसे क्युमिनल हिंसा में ना खपा दिया जाये!!!

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

समझाया था तुम्हें !!!


हिन्दुस्थान की ओर से पाकिस्तान में स्कुली बच्चों पर हुये हमले पर व्यथा और वहां की हुकूमत तो सीख-

समझाया था तुम्हें !!!

बरसों से 
समझाया था तुझे ,
छोड़ दे ये राह ए मातम,
क्योंकि -
इस राह पर आँसू  टपकते हैं
गम पसरा है 
घोर अँधेरा है 
निर्दोष सिसकियाँ है। 
मगर -
आज तक तूने 
अनसुना किया था 
नहीं की थी समझने कि कोशिश ,
क्योंकि- 
तुझे रंज ना था!
मेरा दुःख 
मेरी पीड़ा 
मेरा रोना 
मेरी टीस
तेरे सुकून में शामिल थे !!
तू, 
चेहरे पर नकाब ओढ़ 
सियार बन खड़ा था
जब-  
लहूलुहान थी मुंबई 
सिसक रही थी दिल्ली
सुलग रही थी घाटी   
खून सनी थी माटी।   
तेरे 
क्रूर शोख ने 
छीन लिए थे धरा से 
लाखों बाँके जवान 
हजारो बच्चों के पिता 
सैंकड़ों बहनों के भाई 
इंसानियत का चैन 
आज- 
तेरी राह ए मातम 
तुझे भी रुला रही है 
मुझे भी रुला रही है 
जगत को रुला रही है। 
एक बार फिर 
तुम्हें 
नेक सलाह -
लौट आ उस राह से 
जहाँ बर्बादियों के कांटे बिछे हैं 
आजा अमन की राह पर 
जहाँ इंसानियत के फूल खिले हैं।    

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

अजीब धर्मनिरपेक्ष

अजीब धर्मनिरपेक्ष 

नाम -मुलायम
धर्म -हिन्दू
-----------------
नाम -मायावती
धर्म -हिन्दू
------------------
नाम -ममता
धर्म -हिन्दू
----------------
नाम -नितीश
धर्म -हिन्दू
----------------
नाम -लालू
धर्म -हिन्दू
---------------
नाम -प्रकाश
धर्म -हिन्दू
---------------
नाम -अरविन्द
धर्म -हिन्दू
-------------
नाम -आजम
धर्म -मुस्लिम
--------------
नाम -ओवैशी
धर्म -मुस्लिम
-------------
नाम -रश्दी
धर्म -मुस्लिम
--------------
नाम -खुर्शीद
धर्म -मुस्लिम
---------------
… तो फिर धर्मनिरपेक्ष कौन ?
जबाब -कोई नहीं।
-----------------------------------------------------------
.... तो फिर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर छाती पीटना क्यों ?
जबाब -यह इनको भी समझ में नहीं आता तो आपको कैसे आयेगा।
-------------------------------------------------------------
.... तो धर्मनिरपेक्षता लोगों को बेवकूफ बनाने का काम है ?
जबाब -सब समझते हो तो फिर सवाल क्यों करते हो।
-------------------------------------------------------

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

कोई शक

कोई शक 
भारत के मुस्लिम विश्व के सब देशों से ज्यादा अधिकार सम्पन्न है इस बात
में शक की गुँजाइश है क्या ?

भारत के बाहर मुस्लिम राष्ट्रों में रहने वाले हिन्दुओं को कितने अधिकार मिले
हैं इस सच को सब जानते हैं !!

क्यों तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता हिन्दुओं के अधिकारों के बारे में संघर्ष नहीं
करते हैं और देश के मुस्लिम वर्ग को जान बुझ कर तुष्टिकरण और उन्माद की
राह पर ले जाना पसन्द करते हैं ?

देश फैसला करता जा रहा है,फिर भी नासमझ नेता खोटे धर्मनिरपेक्ष वाद में
संगठित होकर डूबते जा रहे हैं,देश इनके चेहरों पर छिपे स्वार्थ और मक्कारी
को बारीकी से पढ़ना सीख गया है और सर्वधर्म समभाव के रास्ते पर चल पड़ा है।

देश के ओछे राजनीतिज्ञों! ये बचकाना हरकत बंद करो और सकारात्मक
विचार से राष्ट्र हित के लिए कर्म करो वरना भारत केवल काँग्रेस मुक्त ही
नहीं बल्कि एक ही पार्टी का देश बन जायेगा,इस बात में संदेह नहीं है।   

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

कचरा

कचरा 

पप्पू ,उठो और कचरे पर निबंध सुनाओ ?

मेडम, कचरा बहुत पसंदीदा पदार्थ है .... !!

टीचर - साफ -साफ बताओ और सही से बताओ ?

पप्पू - कचरा एक मोहक और मनभावन पदार्थ है जिसे ईंटो और पत्थरो के बने
घर के फर्श से,सार्वजनिक स्थानों से झाड़ू से बुहारा जाता है और  …

टीचर - पूरा सही से बताओ ?

पप्पू - .... और उसे मानव अपने दिमाग ,मन और ह्रदय में इकट्ठा करके गाहे-बगाहे
       अपनों पर,रिश्तेदारो पर,दोस्तों पर,समाज पर,देश पर फेंकता रहता है।       

सोमवार, 17 नवंबर 2014

कार्य सम्पादन :बोझ या कला

कार्य सम्पादन :बोझ या कला 

काम को कैसे पूरा किया जाये ?जब हम लक्ष्य को तय कर लेते हैं तो अगला स्टेप
आता है जमीनी स्तर पर काम करना। यह सच है कि हम सब अपने अपने तय
लक्ष्य को पूरा करने के लिए हर दिन प्रयास करते हैं ,काम करते हैं लेकिन क्या
कारण है कि बहुत कम लोग अपने लक्ष्य को भेद पाते हैं और ज्यादातर रास्ता
भटक जाते हैं।

काम बोझ कब बन जाता है ? यदि हम काम को मज़बूरी या लक्ष्य प्राप्ति के तनाव
से जोड़ देते हैं तो काम बोझ बन जाता है जिसे हमें ढोना पड़ता है। ज्यादातर कार्य
स्थल पर कर्मचारी अपने नित्य के काम को बोझ समझ कर निपटाते हैं जिससे
कार्य स्थल का वातावरण बोझिल और नीरस बन जाता है और घडी को देखते
रहने का स्वभाव बन जाता है। जब हम ज्यादा महत्वाकांक्षी बन कर लक्ष्य को
प्राप्त करने का बोझ माथे पर रख कर काम की शरुआत करते हैं और कठिन प्रयास
के बावजूद भी लक्ष्य को खुद से दूर पाते हैं तब भी हम टूटने और बिखरने लगते हैं।
यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है की फिर कार्य सम्पादन कैसे करे कि हम नियत किये
लक्ष्य को सही समय पर प्राप्त कर सके ?

इसका उत्तर है -हम कार्य सम्पादन के समय खेल भावना रखे ,कार्य के साथ खेले।

अब स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होगा कि काम से खेले कैसे कि कार्य सम्पादन करते
हुए ख़ुशी और मन माफिक परिणाम भी मिल जाये।

कार्य सम्पादन में ख़ुशी तब मिलती है जब हमें यह अच्छी तरह से मालूम हो जाये
कि कार्य की प्रणाली और प्रकृति हमारे स्वभाव से मेल खाती है। जब तक हमें काम
का तरीका या सूत्र मालूम नहीं होता है तब तक हम व्यर्थ परिश्रम कर रहे होते हैं।
काम को शुरू करने से पहले उसका रोड मेप बनाओ और उसे नये और रचनात्मक
तरीके से कैसे किया जाए इस पॉइन्ट पर गहन अध्ययन करो उसके बाद काम को
शुरू करो ,ऐसा करने से काम के सम्पादन के साथ साथ हमारी प्रसन्नता भी बढ़ती
जायेगी और हम लक्ष्य के करीब भी आते जायेंगे।

हमने काम का रोड मेप बना लिया मगर कार्य को पूरा करते हुए ख़ुशी नहीं होती है
इसका मतलब हमने कार्य की सफलता के बोझ को दिमाग पर रख लिया है ,हमे
सफलता या लक्ष्य को छूना है इसका भार नहीं उठाना है। लक्ष्य को छूने के लिए
अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करो और परिणाम की चिंता से मन और दिमाग
को मुक्त कर दो ,अगर ऐसा हम करेंगे तो निश्चित रूप से हमारा काम कला बन
जायेगा चाहे निकट समय का परिणाम असफलता के रूप में भी क्यों नहीं आया हो।

क्रिकेट का भगवान सचिन बहुत बार शून्य पर बाहर हुआ है इसका मतलब यह
नहीं है कि वो भाग्य वश रन बना लेते थे ,सचिन ने क्रिकेट को पूजा समझा और
हमेशा सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास किया इसी लिए क्रिकेट उनके लिए कला और कैरियर
दोनों बना। 

क्या रोहित शर्मा खेल के मैदान में जाने से पहले 264 रन बनाने का लक्ष्य लेकर
जाते तो सफल हो पाते ? नहीं !उन्होंने विश्व रिकॉर्ड बनाया इसका कारण परिणाम
से मुक्त सर्वश्रेष्ठ रूप से काम को अंजाम देना था।

श्री कृष्ण इसीलिए गीता में कह रहे थे कि तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है
कर्म का परिणाम देना मुझ पर छोड़ दो।  

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

पर उपदेश कुशल बहुतेरे 

एक बाबाजी जँगल में कुटिया बना के रहते थे। समीप के गाँवों से भिक्षा अर्जन
करके पेट भर लेते थे। बाबाजी समीप के गाँवों में प्रसिद्ध थे। गाँव वालो के दुःख
दर्द सुनते और उचित उपचार और सलाह देते। उनकी कुटिया पर दिन भर कोई
ना कोई भक्त अपना दुःख दर्द लेकर आता रहता। कोई बच्चे के निरोगी होने की
कामना से,कोई पालतू जानवर के बीमार हो जाने पर,कोई बिगड़े काम को
सँवारने की आशा से।

एक दिन सुबह सवेरे बाबाजी गाँव की ओर गये और गाँव वालो को खुद की बीमार
गाय का हाल बताया और ठीक होने का उपाय पूछा। गाँव वालो ने दूसरे गाँव के
जानकार के पास भेजा ,दूसरे ने तीसरे गाँव वाले जानकार के पास। एक गाँव से
दूसरे गाँव घूमते-घूमते बाबाजी थक गए इतने में एक किसान उधर से गुजरा।
बाबाजी को प्रणाम कर उसकी भैंस को भभूत से ठीक कर देने के लिए आभार
जताया और बाबाजी को वहाँ होने का कारण पूछा।

बाबाजी ने अपनी बीमार गाय के बारे में सुबह से गाँव-गाँव बिमारी के बारे में
जानकारी रखने वाले की खोज में घूमने की बात कही। उनकी बात सुन किसान
बोला -बाबाजी,आपकी भभूत से मेरी भैंस ठीक हो गयी तो क्या आपकी गाय
ठीक नहीं हो सकती ?

बाबाजी बोले -वो तेरी भैंस थी बेटे,मगर यह मेरी गाय है।

हम अपनी पीड़ा के बोझ तले दब जाते हैं। दूसरे का दुःख छोटा और खुद का बड़ा
समझने की फितरत है इंसान में। आप कहेंगे यह तो हर कोई जानता है,इसमें
नया क्या ?दूसरों को उपदेश देना सहज,सरल है क्योंकि उसमें "मेरा"या "मेरापन"
नहीं है। जहाँ मेरापन झुड़ा हो,वहां क्या करे,कैसे करें ?

जब दुःख स्वयं से जुड़ जाता है तो उसको दूर करने के लिए हम निष्णात व्यक्ति
से,अपने हितेषी के निर्णय से और परमात्मा की न्याय व्यवस्था से जुड़ जाये।
खुद की बुद्धि का संकटकाल में अधिक उपयोग ना करेंक्योंकि चिंतित मन कभी
भी सही निर्णय समय पर नहीं करता है।       

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

लक्ष्मी कृपा मन्त्र

लक्ष्मी कृपा मन्त्र 

कल की पोस्ट में एक मित्र ने कहा -यार ,यह तो काफी बड़ा मन्त्र समूह है
क्या आप ऐसा कोई मन्त्र बता सकते हैं जो छोटा हो और भरपूर धन दे सके
तथा ख़ुशी दे सके ?

वेदों में विभिन्न मन्त्र हैं जिससे मनोकामनाएँ पूरी होती है। लक्ष्मी कृपा का
छोटा मन्त्र है जिसे आप कसौटी पर कसे -

आपके दायें हाथ में पुरुषार्थ है तो बायें हाथ में विजय निश्चित है। 

ख़ुशी और प्रसन्नता प्राप्ति के लिए मन्त्र -

सैंकड़ों हाथों से धन अर्जित करो और हजारों हाथों से बाँटो। 

दीपावली की हार्दिक मंगल कामना। 

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

धन लाभ का शुभ योग

धन लाभ का शुभ योग 

धन लाभ और लक्ष्मी प्राप्ति की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति को अपनी आदतों में
निचे लिखी आदतें भी जोड़ लेनी होती है।
क्या आप वास्तव में धनी बनना चाहते हैं या दिखावा कर रहे हैं ?
यदि आप दिखावा नहीं कर रहे हैं तो धन योग का शुभ अवसर आपके हाथों की
पहुँच में है ,मुठ्ठी में है।
आपको इसके लिए कुछ खर्च नहीं करना है ,बस कुछ मन्त्र हैं जिनका जाप तो
आपने सुना होगा मगर अब आपको इन मंत्रो का जाप नहीं करना है। अब
आपको इन मंत्रो के परीक्षण के लिए तैयार होना है। आप खुद इन मंत्रो को
अपनी कसौटी पर कस कर देखें ,उचित और अनुकूल प्रतिफल मिले तो इन्हें
प्रतिदिन कसौटी पर कसे और धन लाभ अर्जित करते रहें।

मन्त्र समूह -

अटूट लक्ष्य 

स्वयं में आस्था और विश्वास

ह्रदय में लक्ष्य तक पहुँचने की धधक 

आलस्य का त्याग 

हाथ में लिए काम को समय पर पूरा करना 

अपने व्यवसाय का गहन अध्ययन और चिंतन 

समय का सदुपयोग 

बात का धनी होना

विपरीत परिस्थितियों में धैर्य 

अनुकूल परिस्थितियों में अदम्य साहस और पहल 

नयी आवश्यकताओं और संभावनाओं की खोज 

जुए और सट्टे से दुरी 

प्रसन्न और खुश मिजाज बने 

लोगों की प्रशंसा करना सीखें 

परमात्मा के प्रति कृतज्ञ भाव रखें 

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

मैं पीछे रह गया,क्योंकि

मैं पीछे रह गया,क्योंकि 

मेरा पूरा ध्यान लोगों के क्रियाकलापों का सूक्ष्म अध्ययन करने में ही बीत गया ,मैं 
जानकार बन गया। लोगों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यही बताता रहा 
मगर प्राप्त जानकारियों से मेरे क्या कर्त्तव्य थे उसे स्वयं से भी छिपाता रहा। 

किसके कहने का क्या गूढ़ार्थ था यह विषय मेरी पहली पसन्द बन गया था। लोगों 
की सफलता या असफलता दोनों में नुक्ताचीनी निकालने में महारत हासिल करता 
गया। 

कैसे तैरा जा सकता है इस विषय पर मेरी थ्योरी सटीक थी ,घुटने तक के पानी से 
मनुष्य को कैसे गहरे पानी में डुबकी मारनी चाहिये यह सूत्र मेने कईयों को सिखाया 
मगर मैं खुद पानी से डरता रहा और किनारे पर बैठा रहा। 

मैं जीतने वाले धावक के सम्मान में तालियाँ बजाता रहा मगर दौड़ने से साँस फुलने 
और पसीना बहाने जैसे कष्टों से खुद को बचाता रहा। 

मेने चलने गिरने और उठने की प्रक्रिया को तब तक ही उचित समझा जब तक मेने  
चलना सीखा वह मेरा बचपन था ,लेकिन जब मैं युवा हुआ तो मुझे चलने की प्रक्रिया 
में गिरने,पड़ने और फिर से उठने का काम जोखिम भरा लगा और बैठे रहने को 
सुरक्षित समझा। 

गहन अँधेरे से लड़ने के लिए एक तीली काफी है,यह पाठ मुझे पक्का याद था मगर 
मैं हर बार तीली जलाने में जलने का खतरा देख तीली जलाने से बचता रहा। 

मैं दैव पर आस्थावान था और उसकी कृपा पाने के लिए उसकी चापलूसी और स्तुति 
में लगा रहा मगर देव बड़ा निष्ठुर था वह उसी का साथ दे रहा था जो पसीना बहा रहे थे।     

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

सच

सच 

जब मुझे थोड़ा सा ज्ञान हुआ तो मैं अपने को विद्वान समझ घमण्ड और अहँकार
में जीने लगा कुछ समय बाद जब मेने श्रेष्ठ लोगों की संगत में रहकर कुछ ज्ञान और
पाया तो मेरा घमण्ड और अहँकार ज्वर की तरह उतर गया और मुझे लगा कि
दुनियाँ से मुझे बहुत कुछ सीखना चाहिये ,बस फिर मैं शिक्षार्थी बन गया।

बहुत फरक पड़ता है जब बच्चा कहता है कि हम अपने माता -पिता के पास रहते हैं
और माता -पिता कहते हैं कि हम बच्चे के पास रहते हैं।

युवा बच्चे को उसके बूढ़े बाप के कारण जाना जाए तो बाप के मन में ख़ुशी नहीं छलकती
है मगर जब इसका उल्टा चरितार्थ होता है तो बाप की ख़ुशी अनपढ़ भी पढ़ लेता है।

जब मैं युवा था तब मुझे लगता था मेरे पिता को अपने आप में बहुत परिवर्तन करना
चाहिए आज जब मैं उनकी उम्र में हूँ तो महसूस करता हूँ वो सुलझे हुए और दूर की
सोच रखने वाले जबाबदार पिता थे। 

महापुरुषों के विचारों को सुनने की भीड़ दुनियाँ के हर कोने में लगती है क्योंकि लोग
उन्हें सुनना पसन्द करते हैं मगर उन विचारों से अभी तक परिवर्तन नहीं हुआ कारण
कि भीड़ उन्हें सिर्फ सुनने आती है। 

खुद को अजर अमर समझ कर अर्थ और ज्ञान का संग्रह करो और मृत्यु कभी भी आ
सकती है यह सोच कर धर्म का पालन करो मगर खुद को अमर समझ धर्म को बाद में
कर दिया और मृत्यु कभी भी आ सकती है ऐसा सोच भोग को आगे कर दिया।   

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

स्वच्छता से पवित्रता की ओर

स्वच्छता से पवित्रता की ओर 

मानव या पशु हर कोई स्वच्छता पसन्द होता है भले ही पवित्रता पसन्द ना भी
करता हो। यह सत्य सार्वभौमिक है। फिर क्या कारण रहा कि जो आर्य पवित्रता
का संदेशवाहक था वह पवित्रता तो भुला ही मगर स्वच्छता भी भूलता चला गया।
आज हम लापरवाह और बेजबाबदार हो चुके हैं हमारी स्वच्छता खुद के शरीर तक
खुद के कमरे या मकान तक सिमित हो गयी है ,सार्वजनिक स्थान की हर जबाबदारी
चाहे वह रखरखाव की हो या स्वच्छता की,हम उसमे अपना कर्तव्य नहीं देखते ;
उसको प्रशासन का कर्त्तव्य मानते हैं।
    हम अपने घर का कूड़ा कचरा बाहर सड़क पर इसलिए भी बेहिचक फैंक
देते हैं कि सफाई कर्मचारी को काम मिलता रहे !!हमारी इस सोच के कारण सफाई
कर्मचारी भी कुण्ठित हो अपने काम के प्रति उदासीन हो जाता है क्योंकि वह जानता
है हर दिन ऐसे ही होना है।
    हम हवा,जल और पृथ्वी तीनों ही सम्पदा का दुरूपयोग करने में लगे हैं। बड़े पैसे
वाले जमकर प्रदुषण करते हैं जिसका कुफल निचे से मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा
पड़ता है और हमारा पर्यावरण विभाग कुम्भकर्ण की नींद में रहता है या कभी कभार
खानापूर्ति करके चुप हो जाता है या अपनी जेब में सिक्के का वजन देख अनदेखी
करता रहता है।
    हम वर्षो से स्वच्छता पर राष्ट्र के धन को खर्च करके भी आज तक शून्य ही हासिल
कर पाये हैं ,क्यों ? यह प्रशासनिक अव्यवस्था है जो कटु सत्य है इसे मानकर दुरस्त
करने के लिए हमें जबाबदेही तय करनी पड़ेगी,कार्य के प्रति प्रतिबद्धता रखनी पड़ेगी।
    सड़को को टॉयलेट आम आदमी क्या चाह करके बनाता है ?नहीं ना। इसके पीछे
का कारण है सार्वजनिक जगहों पर टॉयलेट का अभाव। यह काम किसको करना था ?
क्या उस आम आदमी को जिसके पास पेट भरने तक का साधन नहीं है ?हम फैलती
जा रही गन्दगी के लिए उसे तब तक जिम्मेदार नहीं मान सकते जब तक हम हर
नागरिक की पहुँच तक टॉयलेट ना बनवा दे।
    हमारे पास कूड़ा निष्पादन की आधुनिक तकनीक का अभाव है। प्रशासन शहर का
कूड़ा या तो शहर की सीमा पर या समीप के गाँव के पास ढेर लगा देता है। क्या इसे
समाधान कहा जा सकता है ?
    स्वच्छता के लिए जरुरी है पवित्रता। पवित्रता मानसिक और आत्मिक विचारों में
भी झलकनी चाहिए और बाहर वातावरण में भी दिखनी चाहिये। कूड़ा -कचरा बाहर
फैलाने या पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने से पहले हमें खुद से प्रश्न करना चाहिए कि
क्या मुझे ऐसा करना चाहिये ? जब हम इस प्रक्रिया को शुरू करेंगे तो परिणाम भी
पायेंगे। आइये- हम केवल स्वच्छ ही नहीं पवित्र भारत के निर्माण के लिए स्वयं की
गन्दी आदतों को अभी से बदले और राष्ट्र निर्माण में सहयोगी बनें।         

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

देखादेखी

देखादेखी 

व्यक्ति जब लक्ष्य को भूलकर अपने को बड़ा बताने के चक्कर में ऐसे अटपटे, बहूद्दे
और गैर-जरुरी फैसले लेता है जिनके लेने से नुकसान होता है ,जग हँसाई होती है 
और मन में प्रतिशोध सुलगता है तो निश्चित मानिये वह व्यक्ति मूर्ख और मूढ़ है। 

कोई व्यक्ति बणिये की दुकान से घी खरीदने के लिए जाता है और पैसे वाले पड़ोसी 
को एक सेर मूँगफली खरीदते देख उन पैसो से घी की जगह काजू खरीद लेता है। 
इस घटना का प्रभाव या दुष्प्रभाव सामने वाले पर पड़ा या नहीं पड़ा यह पक्का नहीं 
है परन्तु यह जरूर पक्का है कि काजु खरीदने का निर्णय मूर्खता और मूढ़ता है। 

        हम झूठे आडम्बर में क्यों जीना चाहते हैं जिससे संतोष की जगह ईर्ष्या,डाह 
और कुंठा मिलती है। अपने आप को पैसे के अभाव में शूद्र समझना या झूठा दिखावा 
करके खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करना दोनों सोच संकीर्ण है,केवल पैसे को बड़ा 
नहीं माना जाता है क्योंकि मैने फकीरों और संतों के आगे बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्षों को झुकते 
देखा है। 

      देखादेखी करने का मतलब यह है कि आज हम जिस जगह पर खड़े हैं वह हमें पसंद 
नहीं है ,हम उससे ऊपर के पायदान पर खुद को देखना चाहते हैं। यह बढ़िया सोच है ,सुन्दर 
सपना है इसको पूरा करने के लिए झूठे दिखावे या खुद को भ्रम में डालने की आवश्यकता 
नहीं है। जब भी हम इस सच्चाई को जान जाते हैं कि दुनियाँ ,साथी या कुटुंब के लोग 
आगे बढ़ गए हैं और मैं पीछे रह गया हूँ तो कुण्ठित और डाह में पड़ने की जरूरत नहीं 
है.हम जहाँ हैं ,जैसे हैं उसे उसी रूप में स्वीकार कर के ऊँचे पायदान की ओर बढ़ने का मार्ग 
ढूंढने में लग जाये और उस मार्ग पर चलना शुरू कर दे। देखादेखी नहीं,पसीना बहाने और 
पुरुषार्थ करने का ध्येय बना ले ,इससे ही रास्ता निकलेगा। इसके सिवा बाकि के रस्ते 
भटकाव की अंधेरी गली में ले जाते हैं जहाँ सम्मान भी नहीं मिलता और चरित्र भी 
बिखर जाता है।       

शनिवार, 27 सितंबर 2014

पाकिस्तान का रोना

पाकिस्तान का रोना 

पाकिस्तान को रोने की आदत हो चुकी है क्योंकि नासमझ बच्चा जब भी रोता
है तो समझदार लोग उसके हाथ में लॉलीपॉप थमा देते हैं,तब बच्चा समझता
है रो कर के मेने कुछ पाया और समझदार जानते हैं कि उसका लॉलीपॉप चूसना
ही बेहतर है ताकि वे लोग महत्वपूर्ण काम कर सके।

जब समझदार लोग अपने महत्वपूर्ण काम पुरे कर लेते हैं और बच्चा फिर रोने
लगता है तब उसे चाँटा मारकर चुप करा दिया जाता है या फिर गला फाड़ कर
रोने दिया जाता है और बच्चा दोनों ही परिस्थिति में अपनी औकात समझ मुँह
बंद कर लेता है।

पाकिस्तान का सँयुक्त राष्ट में जाकर कश्मीर पर रोना !! कोई ज़माना था जब
इस मातम मनाने के तरीके पर उसे समझदार पुचकारा करते थे मगर अब
उसके रोने हश्र उस हठीले बच्चे जैसा होगा जो चाँटा खा कर चुप होता है या
गला फाड़ कर रोने से गला दर्द करने लगता है और वह मौका पाकर स्वत: ही
रोना बंद कर देता है।

पाकिस्तान का कश्मीर पर रोने का हश्र क्या होगा ?आज विश्व को ताकतवर
भारत के सहयोग की आवश्यकता है खण्डहर हो चुके पाकिस्तान का सहारा
लेकर कोई भी भारत से रिश्ता खट्टा नहीं करेगा।

विश्व जानता है कि भारत अपना मसला खुद सुलझाने का माद्दा रखता है और
इस मसले पर टाँग फँसा कर कौन आफत मोल लेगा,इसलिए अब वो होने वाला
है जो भारत चाहता है। यह है शक्तिशाली भारत की नयी पहचान।   
   

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

निराशा अपराध है

निराशा अपराध है 

हम चाहते हैं कि सब कुछ हमारी इच्छा के अनुकूल हो। हमारी यही सोच हमारे
में निराशा उत्पन्न करती है और निराशा का परिणाम यह होता है कि हम विराट
होते हुए भी खुद को वामन बना लेते हैं।

हम बहुत कम समय में समय से ज्यादा पाना चाहते हैं,मूल्य से ज्यादा पाने की
प्रवृति हमें उतना भी नहीं दे पाती जितने के वास्तव में हम हक़दार थे। जब हम
इस हकीकत से रूबरू होते हैं तो हम कुंठा और निराशा में डूब जाते हैं।

हम अधकचरी जानकारी और अति आत्मदंभ के कारण बहुत सी जानकारियाँ
छोड़ देते हैं जिनकी वास्तव में जरूरत थी। आधी अधूरी जानकारी के बल पर
हम वो सफलता पाना चाहते हैं जिसके लिए उस विषय की पूर्ण जानकारी
आवश्यक थी ,नतीजन हम असफल होते हैं और निराशा में डूब जाते हैं।

हम दूसरों के गुणों और ज्ञान की प्रशंसा करने से कतराते हैं और अच्छे के
अनुकरण की जगह आलोचना में लग जाते हैं या आत्म प्रशंसा में लग
जाते हैं मगर दुनियाँ हमारा असली मोल तुरंत निकाल लेती है। दुनिया
जब आईना दिखाती है तो हम उस कड़वे सत्य को पचा नहीं पाते और अकेले
हो जाते हैं ,यह अकेलापन मानसिक रुग्णता देता है।

जो पा लिया है उसका उपयोग और उपभोग करने की जगह हम दूसरों पर
निगाह डालते हैं और जो पाया है उसे कमतर मानते हैं तथा दुसरो का अधिक।
यह आदत मन को संतुष्टि नहीं देकर ईर्ष्या की आग में जलाती है जिसका
नतीजा निराशा में बदल जाता है

निराशा के पाप को धोने का सरल उपाय है सोच को सकारात्मक और
व्यावहारिक बनाना। सफल व्यक्ति का पीछा करने की जगह सफलता के
कारण का पीछा करना।



  

दौलत

दौलत 

एक आदमी निराश हताश अवस्था में एक संत के पास पहुँचा और बोला- महात्मा ,
मेरे पर कृपा कीजिये ताकि मैं भी सुखी हो जाऊँ ?

महात्मा ने पूछा -तेरे पास किस चीज की कमी है जिसे पाकर तुम खुश हो सकते हो ?

वह आदमी बोला -महात्मन ,मेरे पास दौलत नहीं है और यही मेरे दुःख का कारण है।

महात्मा ने कहा -तुम झूठ बोल रहे हो। मुझे तो तुम ऐश्वर्यवान और सम्पन्न लग
रहे हो ?

वह आदमी बोला -महाराज यदि मैं सम्पन्न होता तो इस दयनीय हाल में नहीं रहता।

महात्मा बोले -तेरे दयनीय हाल में जीने का कारण या तो तेरी अज्ञानता है या फिर
तेरा हताश मन। अब बता तेरे को कितना धन चाहिए ?

वह बोला -महात्मन ,दौ से बीस लाख तक।

महात्मा बोले -तेरे पास दौ आँखे हैं इसमें से एक आँख दौ लाख में दे दे ?

वह बोला -यह कैसी माँग है एक आँख रहने पर मैं काणा हो जाऊँगा,आँख के बदले
दौ लाख़ नहीं चाहिये।

महात्मा बोले -चल आँख मत दे पर पाँच लाख लेकर दाहिना हाथ दे दे ?

वह बोला -बिना हाथ के मैं अपाहिज हो जाऊँगा और दाहिना हाथ क्या मैं पाँच
लाख के लिए तो अँगुली भी नहीं दूँगा।

महात्मा बोले -ऐसा कर ,दस लाख मैं एक गुर्दा दे दे तू एक गुर्दे से भी जी सकता है।

वह व्यक्ति बोला -एक गुर्दा दस लाख में देकर मैं अधमरा होकर नहीं जीना चाहता।

महात्मा बोले - तू तेरे हर अंग की कीमत बढ़ चढ़ के समझ रहा है फिर मेरे पास
दौलत के लिए क्यों आया ?क्या मेरे झोले में तेरे को दौलत नजर आती है ?

वह व्यक्ति बोला -फिर आप मस्तमौला बन के कैसे जीते हैं ?

महात्मा बोले -मैं अपनी कद्र खुद करता हूँ ,दिन भर के किये कर्तव्य से खुश हूँ और
जो कुछ मिला उसका आनन्द से उपभोग करता हुआ भगवान का कृतज्ञ भाव से
गुणगान करता हूँ। मेरे पास यही दौलत है जो जितनी मात्र में चाहता है मेरे से लेता
जाए।    

सोमवार, 22 सितंबर 2014

कामयाबी

कामयाबी 

तेरी राह में कितने ही रोड़े बिछा ले, ऐ! कामयाबी 
हम वो मुसाफिर हैं जो रोड़े से सीढ़ी बनाना जानते हैं 

नाकामयाबी पे नाकामयाबी सफ़र में मिलती गयी 
कह दिया मेने भी उनसे दिल कामयाबी के हवाले है 

चल हट, यूँ ना डराने की कोशिश कर मायूसी मुझे
मेरे बढ़ते हर कदम से बुलंद इरादों के दीप जलते हैं  

हवाओँ बहती रहो पुरे दमखम से विपरीत दिशा से 
तेरी छाती को चीर कर दौड़ने का मेरा भी इरादा है 

बस आखिरी नाकामयाबी है यह सोच के लड़ता गया 
इस सोच से हौसला मिला और हौसले से कामयाबी 

  



    

रविवार, 14 सितंबर 2014

अपनी भाषा अपनी माटी

अपनी भाषा अपनी माटी

 (हिंदी दिवस पर )

जब तक हम अपनी भाषा और माटी पर गर्व करना नहीं सीखेंगे तब तक बदलाव
कागज के फूल से मिलने वाली खुशबु की तरह झूठा है। जब देश स्वतन्त्र नहीं था
तब इस देश के लोग हिंदी या मातृभाषा का उपयोग करते थे और स्वतंत्रता के बाद
हम फिरंगी भाषा के गुलाम होते गये,आज गाँव से महानगर तक हर कोई अंग्रेजी
का आशिक होता जा रहा है ,आज कहीं भी किसी को अपनी भाषा को छोड़ने का
मलाल नहीं है और जानबूझ कर अनावश्यक होते हुए भी विदेशी भाषा बोलने पर
शर्म नहीं है। हिन्दी की समस्या वह पढ़ा लिखा समाज है जो अंग्रेजी की जी हजुरी
करता रहा है।

पिछले 65 वर्षों में हमारी सरकार ने हिंदी भाषा को कुछ नारे के अलावा क्या दिया।
इस देश के संत्री से मंत्री टूटी फूटी अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करते हैं जबकि
सहज रूप से सभी को समझ में आने वाली हिंदी बोलने से भी कतराते हैं। देश के
भूतपूर्व प्रधान मंत्री जब सँसद में बोलते थे जो यदा कदा हिंदी में बोलते थे ,कुछ
राजनेता तो वोट लेने के खातिर हिंदी बोलने का दिखावा करते हैं ऐसे में हिंदी का
विकास कैसे हो ?

अंग्रेजी का हिंदी अनुवाद क्लिष्ट हिंदी में जानबूझ कर किया जाने लगा ?सिर्फ
यह जताने के लिए कि अंग्रेजी सरल भाषा है। सरकारी काम काज में अंग्रेजी का
उपयोग हिंदी भाषा की दुर्दशा करता रहा है। आज विश्व में कितने जापानी,चीनी
अमेरिकी हिन्दी भाषा पर प्रभुत्व रखते हैं ?और कितने भारतीय अंग्रेजी भाषा
पर प्रभुत्व रखते हैं ? हर बार देशी अंग्रेजी पंडित फिजूल का तर्क रखते हैं कि
अंग्रेजी के बिना विश्व स्तर पर तरक्की करना असंभव है जबकि चीन जापान
अपनी भाषा में काम करके विश्व को उनके देश की भाषा सीखने की स्थिति बना
चुके हैं। एक अंग्रेज यात्री जब भारत आता है तो हिंदी के काफी शब्द सीख कर
आता है और वह जब किसी  हिन्दुस्तानी से "नमस्कार" के प्रत्युत्तर में "good
morning "सुनता है तो भौंचक्का रह जाता है।

हिंदी के गौरव के लिए देश के साँसद सँसद में हिंदी में अनिवार्य रूप से बोले,
हर साँसद को अपनी मातृभाषा के साथ सहज हिंदी में बोलने का अभ्यास
करना चाहिए,अंग्रेजी बोल कर काम निकालने का रास्ता बंद करना चाहिए।
हमें विश्व की भाषाएँ सीख कर ज्ञान की वृद्धि करनी है परन्तु अपनी भाषा का
अपमान नहीं करना चाहिए। किसी भी विदेशी के साथ उसकी भाषा में बात
करना अच्छी बात है पर अपने ही देश में एक दूसरे से अन्य देश की भाषा में
बात करना एक ओछी हरकत के अलावा विशेष कुछ नहीं है।

हिंदी सप्ताह नहीं ,हिंदी पखवाड़ा नहीं ,365 दिन हिंदी में काम यह लक्ष्य होना
चाहिये। हिन्दुस्थान को समझना है तो हिंदी जानना और उपयोग में लाना
जरुरी है।         

शनिवार, 13 सितंबर 2014

क्या धर्मनिरपेक्षता अब हिंदुत्व की परिभाषा समझ पायेगी ?

क्या धर्मनिरपेक्षता अब हिंदुत्व की परिभाषा समझ पायेगी ?

वर्तमान में कश्मीर को जब प्रकृति का प्रकोप झेलना पड़ा तब विश्व भर के इस्लाम 
और अन्य धर्मों ने ,पुरे भारत में फैली धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों ने ,धर्म के 
नाम पर पक्षपाती खबरे चलाने वाले निकृष्ट पत्रकारों ने हिंदुत्व और राष्ट्रवादी हिंदु
दर्शन की हजारों सालों से चली आ रही जीवन पद्धति को बहुत दिनों तक साँसे 
थामे देखा होगा। "हिन्दू सांप्रदायिक होता है !" यह बात हिन्दू जाती में जन्म 
लेने वाले निकृष्ट टुच्चे नेता और कुछ टको पर खुद को बेच देने वाले निकृष्ट पत्रकार
पिछले कई वर्षो से करते रहे हैं ,काश हिन्दू का हर बेटा सांप्रदायिक होता तो इन  
कपटी दुरात्माओं को मालूम पड़ता कि कश्मीर में कितने लाख लोग पानी में डूब 
कर खत्म हो गये होते,मगर सत्य हमेशा सनातन होता है और कठोर भी। कटु सत्य 
विश्व ने देखा कि हजारों हिन्दू युवा अपनी जान की बाजी लगाकर गैर हिन्दुओं के 
जीवन दीप को बुझने नहीं दे रहे थे,उन्हें जीवन दान दे रहे थे। यह विश्व बंधुत्व का 
भाव केवल हिन्दू धर्म में ही संभव है ,विश्व में एक ओर एक ही धर्म के लोग आपस 
में मर कट रहे हो, उसी विश्व में  हिन्दुस्थान के मस्तिष्क कश्मीर में हिन्दू युवा 
अन्य धर्मावलम्बियों के जीवन को सहेज रहे थे,सुरक्षित बना रहे थे। 

   देश के वर्तमान प्रधान मंत्री को आतँकवाद के घोर विरोधी की जगह उनके विरोधी 
कोमवादी कहते रहे हैं ,उन पर वर्षों से झूठे आरोप विरोधियों ने लगाये मगर हिन्दू 
जीवन ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर विश्वास रखता है। समय ने पलटा खाया और 
झूठे धर्मनिरपेक्ष दल हिन्दुस्थान की राज व्यवस्था से दूर हो गये ,बड़ी हाय तौबा तो 
इन सब झूठे नेताओं ने और पक्षपाती खबर बेचने वालों ने मचायी और देश में भय 
फैलाने की कोशिश की मगर प्रकृति को यह मंजूर कहाँ था ,राष्ट्रवादी हिन्दू के कमान 
सँभालते ही कश्मीर की पीढ़ियों ने नहीं देखी ऐसी विनाशलीला हुयी मगर राष्ट्रवादी 
ने पूरी ताकत से संघर्ष किया और जो उसके नाम से खौफ खाते थे उसके वहम को 
हिंदुत्व के बंधुत्व भाव से खत्म किया। क्या अब भी विश्व इस नेता को सांप्रदायिक 
कहेगा? ओबामा भी हिंदुत्व को फिर से देख ले यह वही हिंदुत्व है जो शिकागो विश्व 
धर्म सम्मेलन में था,वही विश्व बंधुत्व का भाव ,वही मानवता का भाव। 

आज जब हिंदुत्व की बात देश में होती है तो प्रपंची मीडिया के कुछ शातिर कलमुँहे 
इसे सिर्फ जन्म और जाती से जोड़ कर विवाद फैलाते रहते हैं और अन्य मत के लोगों 
को डराने का खोटा प्रयास करते हैं। आज हिन्दुस्थान का हिंदुत्व ही कश्मीर घाटी 
में प्राकृतिक आपदा से लोहा ले रहा है,उनके जीवन का रक्षण कर रहा है और हिंदुत्व 
के कारण ही घाटी पुन: स्वर्ग के समान सुंदर बनेगी क्योंकि हिंदुत्व जाती नहीं जीवन 
पद्धति और सभ्यता का पर्याय है।           

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

सहनशीलता

सहनशीलता 

ठूँठ (सूखी लकड़ी का मोटा तना) पर लकड़हारे ने पहले कुल्हाड़ी से वार किये और
उसके हर अँग के टुकड़े कर दिये ,अभी उसका दर्द खत्म ही नहीं हुआ था कि वह
सुथार के हाथों में पहुँच गया। सुथार ने उसकी छाल को अलग करना शुरू किया
तो वह चिल्लाया और सुथार से बोला -तुम मेरी खाल क्यों उधेड़ रहे हो,मैं तो पहले
से किस्मत का मारा हूँ अभी कुछ समय पहले कुल्हाड़ी से घाव खा कर आया हूँ और
अब तुम रहम करने की जगह मेरे दर्द को बढ़ा रहे हो ?
सुथार बोला -ठूँठ ,घबराओ नहीं ,तुम मेरे योग्य हाथों से सुरक्षित रहोगे यदि किसी
अनाड़ी के हाथों में पड़ गए होते तो कभी के राख बन गए होते।
ठूँठ चुपचाप दर्द सहता हुआ सुथार के हाथों से अपनी छाल उतरवाता रहा। छाल
उतारने के बाद सुथार उस पर रन्दा चलाने लगा। ठूँठ दर्द से बिलबिला उठा और
सुथार से बोला -तुम बहुत निष्ठुर हो पहले मेरी छाल उधेड़ दी और अब रन्दे से
चमड़ी घिस रहे हो ?
सुथार बोला -मैं तुझे निखारना चाहता हूँ। पहले तुम खुरदरे,बेडोल और
कोरे थे कुछ भी गुण नहीं था थोड़ा कष्ट सहना सीखो क्योंकि हर गुणी व्यक्ति और
वस्तु कष्ट सह कर ही विराट बनता है।
ठूँठ चुप हो गया और सुथार उस पर रन्दा चलाता रहा। जब वह काष्ठ चिकना और
सपाट हो गया तब सुथार उसे अलग -अलग प्रकार के औजारों से काट छाँट करके
मूर्ति की शक्ल में बदलने लगा। मूर्ति जब बन के तैयार हो गयी तो उस पर रंग
रोगन किया जाने लगा। मूर्ति खूबसूरत बन गई थी। ठूँठ अपने रूपांतरण को देख
प्रसन्न हो रहा था। मूर्तिबने चुके ठूँठ ने सुथार से पूछा -दुनियाँ अब मुझे किस रूप
में पहचानेगी ?
सुथार ने कहा -दुनियाँ में वस्तु का मुल्य उसकी उपयोगिता से आँका जाता है,अच्छी
सँगत,दुःख और कठिनाइयों को सहने के गुण से ही सर्जन होता है। अयोग्य हाथों में
पड़ने से व्यक्ति अनुपयोगी रह जाते हैं। मेरा काम तरासना था और तेरा कर्तव्य था
दुःख दर्द को सहना। दुनियाँ स्वत:ही मोल लगा देती है और नाम दे देती है।

तभी एक नगर सेठ आया और बोला -भैया इस जगन्नाथ की मूर्ति का क्या मूल्य है?
इसे मुझे दे दो मैं इसे मंदिर में लगवाऊंगा। ठूँठ बनी मूर्ति कृतज्ञता से सुथार को
निहार रही थी।             

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

अलगाववादी क्या अब भी सेना को कहेंगे GO BACK ?

हमारे कश्मीर पर आई विपदा से आज सेना झुंझ रही है और इस विपदा में अपने प्राण
न्योछावर करके भी कश्मीरी भाई बहनों का जीवन बचा रही है। कश्मीर की अलगाववादी
ताकतें की जबान से अभी सेना के प्रति GO BACK के शब्द नहीं निकल रहे हैं और
पाकिस्तान फिरस्त ये अलगाववादी ताकते भारत के कश्मीर और पाकिस्तान के हिस्से
के कश्मीर के राहत काम को देख भी रही है। आज पूरा भारत अपने कश्मीर के लिए
तन मन धन से सहयोग कर रहा है ,आज भारतीयों के मन में जातिवाद का जहर
नहीं है सबके मन में बची है तो विपदिग्रस्त भारतीयों की जिंदगी को पटरी पर लाने की
आशा। जो लोग धारा 370 का विरोध करते हैं क्या वो अब भी यही कहेंगे कि कश्मीर को
उसके हाल में मरने दो,नहीं ना। कश्मीर हमारा है और कश्मीरी भी हमारे हैं यह भाव
देश की सरकार में ह्रदय से बह रहा है,मोदी को सांप्रदायिक कहने वाली कांग्रेस और मिडिया
जमात और धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीटने वाले वोट बैंक वाले नेता चुप हैं। क्या देश के
अल्पसंख्यक इस बात को समझेंगे की कौन पार्टियाँ देश में धर्म के नाम पर सत्ता का सुख
भोगना चाहती है ? क्या हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहने वाले चैनल आज सच्चे धार्मिक समभाव
को देख कर अपने पिछले कुकर्मों पर अफ़सोस जाहिर करेंगे कि वे भी जाने अनजाने में
जाती और धर्म के आधार पर मक्कार नेताओं की बातों में आकर भारतीयों को अलग करने
के खेल में शामिल थे।

कश्मीर की जनता आज जो कुछ महसूस कर रही है वह सकारात्मक दृष्टिकोण लम्बे
समय तक बनाये रखें। ये भारतीय जवान आज अपने प्राणों का मोह त्यागकर आपकी
जिन्दगी को बचा रहे हैं ,क्यों ?क्योंकि आप भारतीय हैं। 125 करोड़ भारतीय अपने
कश्मीर को तबाह होते नहीं देखेंगे उसे स्वर्ग बने रहने देंगे और इसके लिए प्रयास भी
करेंगे। क्या कश्मीरी भाई बहन भी भारतीय फौजी भाई की सलामती के लिए भविष्य
में कुछ करेंगे ?हमारे फौजी जवानों का भी परिवार है वे भी किसी के भाई हैं ,पिता हैं ,
पुत्र हैं ,जब पाकिस्तानी आतंकी घाटी में घूम कर उन पर हमला करते हैं तो कश्मीरियों
का फर्ज बनता है उस समय उन आतंकियों को पनाह ना दे.पाकिस्तान जिंदाबाद के
नारे मत लगाये,हिन्दुस्तानी तिरंगे का अपमान ना करे और ना होने दे। अपने देश की
फौज का साथ दे ,उन्हें सही सुचना से अवगत कराते रहे।

कभी कभी विपत्तियाँ भी सौगात लेकर आती है। इस विपति में जो धन हानि हुयी है
उसकी भरपाई हो जायेगी ,यह समय चिंता का नहीं है ,आज सभी भारतीय और विशेष
कर वो अल्पसंख्यक समुदाय जो गुमराह में है प्रण करे कि हम भी भारतीय हैं,भारत
की रक्षा के लिए काम करेंगे, बहुसंख्यक की भावनाओं का आदर करेंगे उनकी बहु -
बेटियों की इज्जत करेंगे।

मोदीजी आपने गुजरात को हर प्राकृतिक आपदा से बचाया और खड़ा किया ,आज
धर्म का तकाजा है आप कश्मीर का नवसृजन करेंगे,आपके पास आज प्रकृति भी
भारतीय एकता की सौगात देने के लिए विपदा के रूप में आई है आप मुकाबला कर
रहे हैं ,जब तक विपति हार नहीं जाती तब तक लड़िये और कश्मीरियों की हर संभव
सहायता कीजिये,शायद नियति आपसे बहुत कुछ करवाना चाहती है जो भारत के
हित में है।          

तेज धार

तेज धार

हम में से अधिकांश व्यक्ति काफी मेहनत करते हैं और मेहनत के अनुपात में कम
फल प्राप्त करते हैं इसका मतलब यह नहीं होता है कि मेहनत करने से ऊर्जा ज्यादा
खत्म होती है और फल थोड़ी मात्रा में मिलता है और हम में से कुछ व्यक्ति कम
मेहनत करते दिखाई देते हैं तो ज्यादा फल की प्राप्ति होती है। जब भी इस विषय पर
वाद प्रतिवाद होता है तो लोग "किस्मत" कह कर मन को तसल्ली दे देते हैं। क्या
आप भी इस बात को किस्मत में खपाना चाहते हैं ? या फिर आगे की कहानी पढ़
कर तय करना चाहेंगे !!

एक दिन एक बूढ़े लकड़हारे ने अपने जवान पुत्र को कुल्हाड़ी देकर जँगल में लकड़ी
काटने को भेजा। युवक कुल्हाड़ी लेकर जंगल में गया और एक मोटे तने के सूखे पेड़
को काटने में लग गया। लड़का कुल्हाड़ी चलाते -चलाते थक गया मगर वह तना
उससे कटा नहीं। अत्यधिक श्रम करने के कारण पूरा शरीर थक कर चूर हो गया था
मगर लकड़ी बटोर नही पाया। आखिर थक हार कर बैठ गया और पिता के आने का
इन्तजार करने लगा। कुछ समय बाद बूढ़ा लकड़हारा जँगल में आया ,उसने देखा
उसका पुत्र थक कर विश्राम कर रहा है।

लकड़हारे ने पूछा -पुत्र,काफी थके हुए लग रहे हो ,लगता है बड़ा परिश्रम किया है।

युवक बोला - मेने परिश्रम तो बहुत किया है ,मोटे तने के ठूँठ को काटने में पूरी
ताकत झोंक दी मगर वह कट नहीं पाया।

लकड़हारे ने कहा -पुत्र,तू कुछ समय तक विश्राम कर ले बाद में काट लेना,तब तक
मैं उस तने को काटने की कोशिश करता हूँ ।

 पुत्र विश्राम करने लगा और बूढ़ा लकड़हारा उस दरमियान कुल्हाड़ी को पत्थर पर
घिसता रहा। कुल्हाड़ी की धार चमकने लगी और काफी तेज हो गयी। लकड़हारे का
पुत्र विश्राम करके पेड़ के पास में आया तो देखा उसके पिता ने अभी तक पेड़ काटने
का प्रयास तक नहीं किया है इतने समय तक बैठे बैठे कुल्हाड़ी को पत्थर पर घिसते
जा रहे हैं।
युवक ने पिता को उलहाना देते कहा -आपने तो मेरी मदद करने की बात कही थी
मगर आपने तो कुछ काम किया ही नहीं। इतना कहकर उस युवक ने पिता के हाथ
से कुल्हाड़ी ले ली और पूरी ताकत से तने पर वार करने लगा,कुछ ही देर में तना
कट गया।

लकड़हारा अपने पुत्र के पास आया और बोला -पुत्र, अब समझ में आ गया होगा कि
मैं तेरे विश्राम के समय खाली नहीं बैठा था,तेरे काम में मदद कर रहा था। केवल
परिश्रम से ही काम नहीं बनता है अपनी धार को तेज बना कर काम हाथ में लेने से
व्यक्ति सफल बनता है।

हम विषय की उचित जानकारी लिए बिना ही काम करने में लग जाते हैं तब आंशिक
सफलता ही प्राप्त होती है या नहीं भी होती है,विषय वस्तु की सम्पूर्ण जानकारी से
सफलता सहज ही मिल जाती है।             

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

आचार्य और टीचर

आचार्य और टीचर

पण्डित विष्णु शर्मा और आचार्य चाणक्य को शिक्षक दिवस पर हिन्दुस्थान नमन
करता है। इनकी बात आज इसलिए क्योंकि हिन्दुस्थान में इनके जैसा शिक्षक
नहीं हुआ। बिना भारी भरकम किताबों के बोझ के इन्होने सम्राट बनाये। विष्णु
शर्मा की पंचतन्त्र की कहानियाँ मुर्ख राजकुमारों को बुद्धिमान और चतुर राजकुमार
बना देती है तो आचार्य चाणक्य की नीति साधारण बच्चे को सम्राट बना देती है। उस
समय भारतीय शिक्षा और शिक्षकों में ऐसा कौनसा गुण था जो नीडर ,साहसी ,देशभक्त
नीतिज्ञ,धर्मात्मा और पुरुषार्थी नागरिक देता था और आज की शिक्षा प्रणाली में कौनसे
ऐसे दोष पनप गए हैं कि राष्ट्र ऐसे नागरिकों के लिए तरस रहा है। आज के अंग्रेजी पढ़े
लिखे युवाओं से जब मैं सवाल करता हूँ कि "तुम आगे क्या करना चाहते हो "?इसका
90 %उत्तर मिलता है -अच्छी नौकरी। पहले हमारे देश के शिक्षक राजा बनाते थे और
आज के शिक्षक नौकरी करने वाले युवा तैयार कर रहे हैं। फिर भी हम गर्व करते हैं कि
हम पढ़ लिख गए हैं ! शिक्षा सर्वांगीण विकास के लिए दी जाती थी और अब मेकाले
आधारित शिक्षा पद्धति पेट भरने का झुगाड़ सिखाती है। शिक्षा जब व्यवसाय बन जाती
है तब शिक्षार्थी शिक्षक का आदर क्योंकर करेगा और शिक्षक को समय पर वेतन मिल
रहा है तो वह छात्रों की चिन्ता क्यों करेगा। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों को अनुभव पथ
पर चलना सीखा कर मंजिल तक पहुँचाना होना चाहिये और हमारी सरकार बच्चों को
केवल रट्टा तोता बना कर कर्तव्य पूरा कर रही है। आजाद भारत के युवकों को
स्वावलम्बी शिक्षा चाहिये वह कब मिलेगी   … क्या पता !!!   

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

भारत और जापान

भारत और जापान 

हिन्दुस्थान और जापान में पिछले साठ वर्ष में एक बड़ा अंतर आया है। भारत में पिछली
सरकारों ने भारतीयों के देश प्रेम की धधकती ज्वाला पर ठण्डा पानी डाला है या देश भक्ति
के अँगारे पर राख की मोटी परत जमने दी। पिछली सरकारों ने देश के गौरवपूर्ण इतिहास
को झूठी धर्मनिरपेक्षता की घास को उगाने के लिए तोड़ मरोड़ दिया,देश को विदेशी भाषा के
नागफाँस में झकड दिया ,देश की भाषा और संस्कृति को तहस नहस किया,भारत के वेद
पुराण और शास्त्रों से भारतीयों को अन्धविश्वास कह कर अलग कर दिया। इसका दुष्परिणाम
यह हुआ कि भारतीयों को अपना गौरव पूर्ण इतिहास बासी लगने लगा ,हमारे रामायण ,गीता
से ग्रन्थ काल्पनिक कहानी लगने लगे ,हमारी देवीशक्तियाँ देवत्व खो कर तामसिक बनने
लगी। हमारे देव पुरुष पौरुषहीन होते चले गये जबकि जापान पर अणुबम्ब गिरा कर रीढ़
हीन करने का प्रयास हुआ मगर जापान अपने इतिहास,अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति पर
गर्व और विश्वास करके कर्म पथ पर चलता रहा ,लाखों बार प्राकृतिक आपदाएँ आयी मगर
जापान सिर उठा के चलता रहा। देश भक्ति का जज्बा भारतीयों में जो स्वतंत्रता से पहले
था वो ना जाने कहाँ दफन हो जाने दिया जबकि जापानियों में आज भी देश भक्ति का जज्बा
जगमगा रहा है। हम अपने ही देशवासियों के धन को लोकतंत्र की दुहाई देकर खुद ही लूटते
रहे और भ्रष्टाचार के विषधर को पोषण देते रहे और जापानी लोग देश का पैसा देश का समझ
सबका विकास करते गए।
  आज कितने काँग्रेसी नेता ऐसे बचे हैं जो देश के सामने यह कहने की हिम्मत रखते हैं कि
मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है ,अपने हिंदुत्व पर गर्व है ,श्री राम और कृष्ण जैसे महापुरुषों
की संतान होने पर गर्व है ?कोई नहीं ना ,यही कारण है देश की दुर्गति होने का ,क्योंकि हम
करोडो देशवासी वर्षों तक अपने पर गर्व महसूस ना कर सके,खुद को भूलकर जिन्दा लाश
की तरह घसीटते रहे। 
 इस देश को अब भी जापान के समकक्ष बनाया जा सकता है,यह काम हम हिंदुस्थानी लोगों
को ही करना है चाहे आज करे या कल। हमें अपने धर्म के महापुरुषों से जुड़ना होगा जिनके
एक हाथ में पुष्प है तो एक में चक्र भी है। एक हाथ से शांति की अपील है तो दूसरे हाथ में
धनुष भी है। जिनके एक हाथ में ज्ञान का शास्त्र है तो दूसरे हाथ में शस्त्र भी है। हमारे महा
पुरुष हमें सद्भाव और शक्ति का तालमेल सीखाते हैं।
हम देश भक्त बनने से पहले परिवार भक्त बने,अपने परिवार को सभ्य,सुसंस्कृत ,शिक्षित,
नीडर और धर्म का अनुसरण करने वाला बनाये यदि हम तीन चार साल लगातार इस काम
पर डटे रहे तो देश को जापान से बढ़कर बनने में देर नहीं लगेगी             

शनिवार, 30 अगस्त 2014

विनम्रता

विनम्रता 

लोहे के तार ने रबर के तार से कहा - तेरे शरीर में जान नहीं है,कितना दुर्बल
शरीर पाया है तुमने। मेरा शरीर देख,मैं लोहे का बना हूँ ,बहुत मजबूत हूँ।

रबर के तार ने कहा -मजबूत होना बुरा नहीं है दोस्त परन्तु मजबूती का
घमण्ड करना बुरा है।
कुछ दिन बाद बारिस आयी। बारिस को देख लोहे के तार को भय लगने लगा
और कुछ ही दिनों में जंग खा गया। लोहे के तार ने रबर के तार से पूछा -तुम
कमजोर होकर भी पानी को कैसे सहन कर लेते हो,जबकि मैं मजबूत होकर
भी टूटने की कगार पर हूँ?

रबर के तार ने कहा -तुम शक्ति के घमण्ड में चूर होकर अकड़ते हुये जीते रहे
और मैं विनम्र होकर जीता रहा। वक्त कब बदल जाता है मालुम नहीं पड़ता
दोस्त,तेरी अकड़ के कारण तू अंतिम साँसे गिन रहा है और मैं विनम्रता के
कारण कमजोर होते हुए भी शान से जी रहा हूँ।      


गुरुवार, 28 अगस्त 2014

क्या हिन्दुओं के पर्व - त्यौहार साजिश का शिकार हो रहे हैं ?



क्या हिन्दुओं के पर्व - त्यौहार साजिश का शिकार हो रहे हैं ?

हिन्दुओं के हर त्यौहार को परम्परागत तरीके से मनाने पर अतिवादी,अंग्रेजी तोते ,
तथाकथित धर्मनिरपेक्ष,बिके हुए पत्रकार आये दिन ध्वनि प्रदुषण फैलाते रहते हैं और
उनके अनुपयोगी,असैद्धांतिक,अव्यावहारिक और सत्यहीन तर्कों पर अज्ञानी हिन्दू
बिना सोचे विचारे समर्थन भी कर देते हैं जैसे -

होली के त्यौहार पर ही अख़बार वाले हिन्दुओं को पानी से होली खेलने के विरुद्ध
उकसाते हैं और सूखी होली खेलने का प्रचार करते हैं,अगर पानी बचाने की इतनी
चिंता इन लोगों को है तो देश को ठण्डा पेय उपलब्ध करने वाली विदेशी कम्पनियों
के खिलाफ क्यों नहीं जाग्रत करते हैं जो प्रतिदिन लाखों लीटर पेयजल नष्ट कर रही
है।

हिन्दुओं के त्यौहार दिवाली पर पटाखे से वायु प्रदूषण फैलने के विज्ञापन ये शातिर
लोग पुरे देश में दिखाते हैं अगर इनको पर्यावरण से इतना ही प्रेम है तो ये लोग बूचड़
-खानों के खिलाफ प्रदर्शन क्यों नहीं करते हैं और उन कारखानों के खिलाफ आवाज
क्यों नहीं उठाते हैं जिनके कारण से देश की नदियां और हवा हर पल प्रदूषित हो रही
है।

हिन्दुओं के त्यौहार गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की मूर्तियॉ का आकार छोटा
करने की और उनको विसर्जन से पानी प्रदुषित होने की बातें होती है मगर अन्य
समुदाय के लोगों के द्वारा उनके त्यौहार पर वायु और पानी प्रदुषण की बात पर ये
लोग खामोश हो जाते हैं।

हिन्दुओं के त्यौहार नवरात्री पर रात्रि के दस बजने के बाद साउंड पर प्रतिबन्ध लगाने
की प्रशासन द्वारा तथाकथित विद्वानों द्वारा पैरवी की जाती है और अन्य समुदायों को
उनके त्यौहार पर सप्ताहों तक रात भर हल्ला मचाने की छूट रहती है।

ये सब क्यों किया जा रहा है ?क्या हिन्दू धर्म को कमजोर करने की साजिश रची
जा रही है ? हिन्दुओं के त्यौहार मनाने के रिवाज और परम्परा पर सवालिया निशान
क्यों लगाये जा रहे हैं ?यह खेल निकृष्ट हिन्दुओं का साथ लेकर कौन खेल रहे हैं और
क्यों ? अपनी परम्परा को जीवित रखिये,परम्परा जीवित रहने से इतिहास नूतन
बना रहता है और इतिहास को समय -समय पर याद करते रहने से संस्कृति और
सभ्यता का गौरव बना रहता है। 













      

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

सफल होना कहाँ मना है

सफल होना कहाँ मना है 


टू -व्हीलर के प्लग पर थोड़ा सा कार्बन आ जाने पर उसके बाकी सभी पार्ट ठीक
होने पर भी स्टार्ट नहीं होता है ठीक इसी तरह से मनुष्य पूर्ण स्वस्थ होने पर भी,
विषय का आवश्यक ज्ञान होने पर भी,जरुरी संसाधन उपलब्ध होने पर भी बहुत
बार असफल हो जाता है? उसकी असफलता का कारण उसके मन पर कार्बन की
हल्की सी परत जम जाना है और वह परत है नकारात्मक सोच  .... नकारात्मक
सोच हमें सफल होने से रोक देती है क्योंकि इसका पहला कुप्रभाव हमारे हौसले
पर पड़ता है। हौसला टूटने से हमारा उत्साह खत्म हो जाता है। उत्साह खत्म होने
से हमारा लक्ष्य बिखर जाता है और लक्ष्य धुँधला होते ही हम असफल हो जाते हैं।

नीची उड़ान भरने वाले पंछी अक्सर मौके की तलाश में घूमते रहते हैं मगर अवसर
उनकी पकड़ से प्राय:दूर ही रहता है जबकि बाज बहुत ऊँचाई पर उड़ता है और अवसर
को मजबूती से दबोच लेता है। यह अंतर है सामान्य और बड़ी सोच में। हम किनारो
पर बैठकर मोती पाना चाहते हैं यानि हम पर्याप्त पुरुषार्थ के बिना वो हासिल करना
चाहते हैं जिसे हासिल करने के लिए ऊँची उड़ान,अवसर की टोह ,सटीक निर्णय क्षमता
और कड़ी मेहनत की जरुरत होती है। लक्ष्य अगर छोटा है तो भी असफलता और बहुत
बड़ा है तो भी असफलता। हमें उतनी ऊँचाई पर उड़ना चाहिए कि वहाँ से लक्ष्य स्पष्ट
दीखता रहे और मौका बनते ही बिना देरी किये दबोचा जा सके।

मजदुर कड़ी मेहनत करता है फिर भी कितना कमाता है सिर्फ पेट भर पाता है और
एक सेठ कम मेहनत करके भी बहुत अर्जन कर लेता है। इस कटु सत्य को लोग
किस्मत या भाग्य कहते हैं जबकि हकीकत में यह सोच,नजरिया या लक्ष्य का
फर्क है। लक्ष्य बहुत छोटा होगा तो कड़ी मेहनत भी सार्थक परिणाम नहीं दे पायेगी
नजरिया यदि संकीर्ण होगा तो बड़ी सोच पनप ही नहीं पायेगी और सोच  केवल
पेट भरने के जुगाड़ तक की होगी तो इससे ज्यादा मिलेगा क्यों ? सोच सकारात्मक
रखिये ,नजरिया स्पष्ट रखिये और लक्ष्य ठीक नाक के सामने रखिये  तब आप
जान जायेंगे की पुरुषार्थ का दूसरा नाम ही किस्मत है  …।

मेंढक और कछुवे में एक समानता यह है कि दोनों जल के जीव हैं मगर इनके स्वभाव
में जो भिन्नता है उनमें भी जीवन सूत्र छिपा है। थोड़ा सा सुहाना मौसम और बारिस
का पानी देख मेंढक जोर -जोर से टर्राने लग जाते हैं और उछलने लगते हैं जबकि कछुआ
गहरे पानी के बीच भी शान्त रहता है इसी प्रकार का स्वभाव मनुष्य का होता है ,जब
थोड़ी सी सफलता प्राप्त कर लेते हैं या थोड़ा सा अनुकूल समय आता है तो खुद को अहँकार
से भर लेते हैं या आडम्बर को पकड़ लेते हैं या अपने को महत्वपूर्ण और दूसरों को हिन
समझने का दिखावा करते हैं और विपरीत परिस्थिति आते ही गुमनामी में खो जाते हैं।
कछुआ पर्याप्त जल में रहकर भी धीर गंभीर बना रहता है और आपत्ति काल में अपनी
समस्त इन्द्रियों को वश में कर आत्म चिंतन करता है और अनुकूल समय ना आने तक
धीरज रखता है।   …। index of happiness . 

किसी भी घटना को तटस्थ भाव से समझना और महसूस करना भी योग या ध्यान का
एक प्रकार है। हम अपनी गलतियों को प्राय :पकड़ नहीं पाते हैं या उनको जैसी है वैसी
देखने का साहस नहीं कर पाते हैं। मनुष्य की आदत है की वह जब भी वह कोई गलती
करता है तब उसे देखने के लिए जिस रंग का काँच (लैंस )उसे पसंद है उसी से देखता है
जिस कारण से उसे अपनी भूल और गलती भी उचित लगती है और जब उसे अन्य की
गलती देखनी हो तो वह अपनी आँखों पर पारदर्शी काँच (लैंस)लगा कर सूक्ष्मता से
अवलोकन करता है। यदि हम इसका उल्टा करके जीने की कला सीख जाये तो सफलता
को शीघ्र पा सकते हैं औरयदि हम तटस्थ भाव से विषय वस्तु या घटना को देखते हैं और
गलत और सही की पहचान कर गलत की वास्तविक आलोचना और सही का सहयोग
करते हैं तो समाज,देश और मानवता का भला कर सकते हैं।  



  

बुधवार, 20 अगस्त 2014

शायरी

शायरी

....  नन्हीं सी कोशिश आपकी खिदमत में शायरी सजाने की 


दिल की बैचेनी का इल्जाम क्यों गैरो पर थोपें 
कमबख्त की झलक से ही धड़कनें बढ़ जाती है

दास्तान ए परवाने बेखुबी समझ रहा हूँ
शमा के जलने से क्यों जान जाती है तेरी

हुश्न के समंदर में कब के डूब चुके थे हम
वो हमें जिन्दा समझते हैं,अजीब वाकया है

जिंदगी उलझती गई उड़ती रेशमी जुल्फों में
छोड़ दी हमने भी जिद्द उलझी को सुलझाने की

ऐ वक्त ,जरा इंतजार कर,यूँ आगे ना बढ़ 
जी भर के जीने दे मोहब्बत के हसीँ लम्हे को 

लज़ीज पकवान भी बेस्वाद क्यों लगता है
क्या किसी रसीले फल का स्वाद चख लिया है

सुलगते हुश्न ने बढ़ा दी सर्द मौसम में तल्खी
लबों से रोक पाने की यह आखिरी कोशिश है

गीत गुनगुनाने के लिए सुखद अहसास चाहिए 
राग की नही जरुरत बस दिल की आवाज चाहिए 

उल्फत के पल को जी भर कर जी लो  
सुना है ,वक्त की रफ़्तार बड़ी तेज होती है 






रविवार, 17 अगस्त 2014

सफलता के लिए गीता अध्ययन करे

सफलता के लिए गीता अध्ययन करे 

श्रीमद भगवत गीता को धार्मिक ग्रन्थ मानकर हम उसे पढ़ते नहीं है जबकि
अन्य विदेशी लेखकों के अपूर्ण ज्ञान की ढेरों किताबें पढ़ लेते हैं। सँस्कृत
साहित्य की घोर उपेक्षा आजादी के बाद हुयी जब देश के ओछे राजनीतिज्ञ
इन शास्त्रों के ज्ञान को केवल हिन्दुओं से जोड़कर देखने लगे जबकि ज्ञान तो
सबका कल्याण करता है पर स्वार्थियों और मूढ़ों को क्या कहे।

संसार का हर मनुष्य सफल होना चाहता है और वह प्रयासरत भी रहता है
परन्तु फिर भी असफल हो जाता है ,क्यों ? इसी प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण गीता
के माध्यम से दे चुके हैं।

कार्य को कैसे शुरू करे 

हम जब भी कोई काम करते हैं तो उसका लक्ष्य जरूर बनाते हैं और उसे प्राप्त
करने का प्रयास भी शुरू करते हैं मगर कुछ दिनों के बाद जब वांछित फल
दिखाई नहीं देता है तो हम विषाद और निराश हो जाते हैं और काम को करने
की गति को कम कर देते है या रोक देते हैं या ध्येय बदल लेते हैं या अन्य लोगों
का अनुसरण करने की कोशिश करते हैं इनका सबका परिणाम शुभ नहीं आता
और अंत में हम पराजय को स्वीकार कर लेते हैं।

  श्री कृष्ण कहते हैं कि हम इस पद्धति को बदल डाले। मनुष्य को अपना लक्ष्य
बहुत सोच समझ कर तय करना चाहिए ,उसका रोडमेप तैयार करे,संभावित
बाधाओं को रेखांकित करे,आवश्यक ज्ञान और उपयोगी सामग्री एकत्रित करे
और उस लक्ष्य को स्थापित कर दें ,लक्ष्य बनाने के बाद लक्ष्य को बदलना
पराजय को वरण करना है या मन में लक्ष्य को पाने में खुद को छोटा समझना
खुद को अयोग्य समझना भी पराजय को स्वीकार करना कहा जायेगा।

हमें लक्ष्य तय करने के बाद अपने मन में संकल्प को मजबूत करना होगा ,यदि
हमारा संकल्प मजबूत होगा ,शंका रहित होगा ,स्पष्ट होगा तो हमारा आत्म विश्वास
मजबुत होता जायेगा। अब हमें लक्ष्य की ओर चलना है और इस मार्ग पर ढेरो
बाधाएं रहेगी। बाधाओं से लड़ने के लिए धीरज चाहिए ,सकारात्मक नजरिया
चाहिये,कर्तव्य को पूरा करने की तत्परता चाहिए अगर हम लक्ष्य की उपेक्षा
कठिनाइयों को देख कर करेंगे तो पराजय और अपयश निश्चित है। श्री कृष्ण
का सन्देश है कि सफलता के मार्ग पर आप हानि और लाभ,जय या पराजय
के बोझ को सिर से उतार कर केवल प्रयास रत रहे ,थोड़ा -थोड़ा ही मगर आगे
बढ़ते जाये ,यहाँ पर आत्महीनता या कुशंका मन में ना लाये। ओलम्पिक दौड़
में सभी मैडल नहीं पाते हैं मगर दौड़ते तो सभी हैं और लक्ष्य को किसी ना किसी
समय में छूते जरूर हैं। अंतिम दौड़वीर को भी हारा हुआ नहीं माने क्योंकि उसने
भी कुछ ज्यादा समय भले ही लिया हो मगर लक्ष्य को छुआ तो है। हमे सफलता
अन्य लोगों के मुकाबले देरी से मिल रही है यह सोच के निराश ना हो बस दौड़
चालू रखे,बंद ना करे ,यह सफलता के लिए पर्याप्त है।

हम प्राय: दौड़ पूरी करके वांछित फल ना पाकर उदास हो जाते हैं और नई दौड़
में भय के कारण भाग नहीं लेते ,यह उदासी ही अकर्म है ,अकर्तव्य है। श्री कृष्ण
यही कहते हैं कि काम को काम की भावना से करो उसको असफलता या सफलता
से तत्काल मत जोड़ो। किसी भी परीक्षा में जब हम असफल हो जाते हैं इसका अर्थ
यह नहीं कि हम अयोग्य हैं ,इसका मतलब यह भी है कि उस परीक्षा के लिए और
अधिक ज्ञान बढाने या मेहनत करने की समय द्वारा माँग है जिसे हमें एकाग्र मन
बुद्धि से पूरा करना है। मन की एकाग्रता ही कार्य कौशल है।कर्म को सावधानी
पूर्वक निरंतर करते रहने से सफलता आती ही है ,शंका का कोई स्थान नहीं है।

श्री कृष्ण कहते हैं कि लक्ष्य के मार्ग पर बढ़ते समय आलस्य ना करे ,स्वामित्व के
दावे के बिना काम करे ,लाभ हानि के पचड़े को छोड़कर काम करें। प्राय:जब भी हम
कोई काम करते हैं तब अहँकार के प्रभाव में आ जाते हैं यह अति आत्म विश्वास
भयावह है ,इससे बचे। सफलता के लिए तीन बातों को छोड़ देना है १. फल की
आसक्ति 2. भय या निराशा 3. क्रोध। इस रोडमेप पर चलकर हम सफल हो सकते
हैं ,बाधाओं से झुंझना सीख सकते हैं ,जीवन रूपी नौका को सहजता से लक्ष्य
तक पहुँचाना सीख सकते हैं।

 
         

शनिवार, 16 अगस्त 2014

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं 

वे गाँव के बुजुर्ग थे शायद अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाते हैं। आज की
वर्तमान टेक्नोलॉजी की बिलकुल जानकारी नहीं रखते हैं। उनके पास बैठा मैं
बतिया रहा था। बातों ही बातों में मैने उनसे पूछा -बाबा,क्या आपको अब तक
जी हुयी जिंदगी से संतुष्टि है ?
बाबा बोले -बेटे ,हर मनुष्य भूलों का पुतला है। मैनें भी एक भूल की जिसका
पछतावा है ?
मैनें पूछा-क्या वह बात मुझे बता सकते हैं ?
बाबा बोले -क्यों नहीं,वह बात बताने से मेरा मन भी पश्चाताप करके हल्का हो
जायेगा और कोई उससे सीख भी लेगा।
थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ याद करते हुए कहना शुरू किया -बेटा ,जब मैं दौ
साल का था और ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था तब मेरे पिता जवान थे
उन्होंने मुझे खड़ा होना सिखाया और जब मैं लड़खड़ाते हुए डग भरना सीखता
था तो उनके मजबूत हाथ मेरी पीठ की तरफ सुरक्षा कवच बन कर तैयार
रहते थे। उनके कारण मैं दौड़ना सीख गया। वो मुझे जब भी मन्दिर ले जाते
थे तब मैं भगवान के दर्शन नहीं कर पता था तब वे अपने कन्धे पर बैठा कर
दर्शन करवा देते थे। जब मैं उनके साथ मेले में जाता था कुछ कदम चल कर
भीड़ देख घबरा जाता था तो वे बिना झिझक के मुझे पुरे मेले में कंधे पर या
गोदी में सवारी कराते थे। मेरे पिता कभी कभार कमीज पहनते थे ,प्राय :
बनियान ही पहनते थे कारण उनके पास आमदनी कम थी मगर मेरे लिए
३-४ कमीज हर साल लाते थे। जब मैं किशोर आयु का हुआ तो उनका प्रयास
रहता था कि मैं अच्छा पढ़ लिख जाऊँ मगर मैं पढता नहीं था केवल स्कुल
जाने का ढोंग रचता था,मेरी असफलता के समय वो मेरा हौसला बढ़ाते और
पढ़ने को प्रोत्साहित करते मगर मैं उन्हें धोखा दे देता। मेरी स्कुल बंद हो
गयी और मैं उनके साथ खेत पर जाने लगा। कुछ साल बाद मेरी शादी कर
दी ,उस समय उन्होंने जितनी पूँजी जमा की थी सब मेरी शादी में खर्च कर दी।

कुछ साल बाद मेरे बच्चे हो गए और मेरे पिता बूढ़े हो गये। अब वो खेत का
काम नहीं कर पाते थे तब मुझे लगता कि सारा काम का भार मुझ पर डाल
अब ये आराम फ़रमाते हैं। उन्हें बैठे देख बहुत बार मैं उन्हें झिड़क देता वो
मेरी कठोरता से उदास हो जाते और कभी कभी शुन्य में ताकने लगते। मेरी
पत्नी को वे अप्रिय लगते थे क्योंकि वे दिन भर खाँसते रहते या उसके गैर-
बर्ताव पर चिल्ला उठते। पत्नी जब उनकी शिकायत मुझसे करती तो मैं उन्हें
खूब भली बुरी सुनाता  .... कहते हुये बुजुर्ग का गला भराने लगा। बूढी आँखों
में आँसू आ गए थे। मैं उनकी ओर ताक रहा था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद
वो बोले -कुछ साल बाद मेर पिता को आँखों से दिखना बंद हो गया ,मुझे
लगा अब आफत गले पड  गयी है। उनको पाखाने लेकर जाना ,नहलाना
जैसे काम बढ़ गए थे। मेरी पत्नी उनके मरने की राह देखने लगी। उन्हें
दौ समय खाना भी रुखा सुखा दिया जाने लगा मगर वो कभी शिकायत नहीं
करते थे। कुछ महीने बीमार रह कर वो स्वर्ग सिधार गए उस समय मैं
50 साल का हो चूका था। मुझे उनकी मौत पर बहुत कम अफ़सोस और मन
में सुकून ज्यादा था। अब मैं अपनी गृहस्थी में लग गया। मेरे बच्चे पढ़ लिख
गए थे और देखते ही देखते मेरे बाल सफेद हो गए ,हाथ पैर जबाब देने लगे
अब मेरे साथ भी वही होने लगा जो मेने अपने पिता के साथ किया था।
एकाद बार बच्चो और बहु से अच्छा व्यवहार करने को कहा तो लड़के ने जबाब
दिया -आपने कौनसा सेवा का काम अपने बाप के लिए किया। बस तब से
मुझे पछतावा होता है कि काश!मेने माँ -बाप की सेवा और इज्जत की होती
मगर…… अब समय चला गया हाथ से।     

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

हम और हमारा देश

हम और हमारा देश 

हम शिकायत कर्ता बनें ,यह जरूरी भी है परन्तु शिकायत करने से पहले हम अपने
गिरेबान में झाँक कर देखें कि कहीँ सिस्टम की समस्या का एक कारण हम स्वयं
तो नहीं बने हुए हैं।

मतदान करके सरकार चुन कर हम अपने कर्तव्यों से फ़ारिग होते रहे हैं। हम यही
सोचते हैं कि अब सारी समस्याओं पर बैठे -बैठे निराकरण पाना है। घर का एक
मुखिया परिवार को ठीक से चलाने के लिए सब सदस्यों की जरुरत महसूस करता
है वरना घर चलाने में खुद को असहाय महसूस करता है  और हम 125 करोड़ लोगों
का परिवार 550 से कम प्रतिनिधियों पर छोड़ कर अच्छे दिन का सपना पूरा होते
देखना चाहते हैं।

इस गरीब देश के नागरिक गरीब होते हुए भी दान देने में जुटे रहते हैं,यह एक श्रेष्ठ
बात है मगर वह दान सृष्टि कर्ता के नाम पर देने के बाद अनुपयोगी रह जाता है।
जब एक सरकार अपने नागरिकों से कर के रूप में दान माँगती है तब उसे अनुपयोगी
कृत्य समझ हम दूर हट जाते हैं। साल में पचास -सौ रूपये भी हर नागरिक सरकार
को सहर्ष कर्तव्य समझ कर देता है तो छोटे-छोटे समाधान रास्ता बनाते जायेंगे।

विदेशी भाषा सीखना उत्तम बात है क्योंकि उस भाषा के माध्यम से हम सृष्टि के
उस भाग में रहने वाले लोगों के विचार समझते हैं लेकिन हद तो तब होती है जब
यह सब हम राष्ट्र भाषा का मूल्य चूका कर करते हैं,जिस भाषा को देश के ९०%
लोग पूरी तरह से समझते भी नहीं है उनके सामने उस भाषा का प्रयोग हमें कैसे
समृद्ध करेगा ?लेकिन हम विदेशी भाषा को कन्धे पर लाद कर अच्छे समय की
आशा करते हैं।

बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारा मीडिया बे सिर पैर के विश्लेषण कर देश के लोगों
का समय नष्ट करता है या मूल्यहीन खबरें दिखाता है। इनका तो धन्धा है यह
समझा जा सकता है मगर इस देश के नेता,विद्धवान और शिक्षित लोग जब इस
प्रकार के घटिया मूल्यहीन,वास्तविकता से परे विश्लेषणों और बहस में भाग लेते
समय नष्ट करते हैं तब आम नागरिक माथा पीटता है।       

आजादी

आजादी 










निरी अहिँसा के बुते तो सपना बन जाती आजादी  
दुश्मन के सर कलम किये उसका नतीजा आजादी 

निशस्त्र खड़े होते रण में तो सपना रहती आजादी
लावा बनके बही जवानी उसका नतीजा आजादी 

भूखे रह कर तप करने से किसने किसको दी आजादी
वीर शहीदों ने जब खेली होली उसका नतीजा आजादी 

आग्रह अनशन करने भर से कभी ना मिलती आजादी
चुन चुन कर दुश्मन को मारा उसका नतीजा आजादी 

शांति मन्त्र जपते रहने से सपना बन जाती आजादी 
इन्कलाब और जय-हिन्द जिसका नतीजा आजादी 

     

रविवार, 10 अगस्त 2014

स्वाधीनता के मायने

स्वाधीनता के  मायने

हमारे पर मुगलों ने शासन किया ,अंग्रेजों ने किया ,लम्बे संघर्ष के बाद देश दासता से मुक्त
हुआ और हम वापिस मानसिकता से गुलाम कर दिये गये।
आजाद होने के बाद देश का नेतृत्व भारतीय नागरिको को भारतीयता की जगह धर्म के
आधार पर देखने का निर्णय किया और देश में विभिन्न धर्मावलम्बी देख एक नई विचार
धारा को रखा जिसे धर्म निरपेक्षता नाम दिया। धर्म निरपेक्षता ने भारतीयता को हासिये
पर धकेल दिया इसका दुष्परिणाम तुष्टिकरण के जहर के रूप में आया और अपने ही देश
में बहुसंख्यक हिन्दुओं को राजनेता सांप्रदायिक परोक्ष रूप में समझने लगे। देश का इतिहास
गलत प्रस्तुत किया गया और पढ़ाया जाने लगा। हम अपने बच्चों को मुग़ल शासनकाल को
महान बता कर पढ़ने को मजबूर करते रहे। क्या जिसने भी हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया
वह समय हमारे लिए स्वर्णयुग हुआ ?फिर मुग़ल आक्रमणकारियों को महान पढ़ कर हम
देश का किस रूप में गौरव बढ़ा रहे हैं ,भविष्य में यह हाल रहा तो अंग्रेजों को भी महान
हमारी पीढ़ियों को पास होने के लिए पढ़ना पड़ेगा !!!


भारत को जबसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र माना गया है तबसे सबसे बड़ी क्षति देशप्रेम की भावना और
आपसी सौहार्द की हुई है इसका कारण थी तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियाँ। भारत
की ताकत धर्मनिरपेक्षता ना कभी थी और ना कभी होगी। इस देश की असली ताकत वेद से
आई है जो सर्व धर्म समभाव  है। अब सवाल यह उठता है कि क्या संविधान से धर्म निरपेक्ष
भारत की जगह "सर्व धर्म समभाव "भारत लिखने का समय आ गया है ?यदि सर्व धर्म समभाव
आयेगा तब समान नागरिक अधिकार का उदय होगा और पक्षपात/तुष्टिकरण की राजनीती का
नाश होगा।
आज जब भी समान नागरिक अधिकार और कानून की बात आती है तो लोग धर्म के नाम पर
हायतौबा मचाने लगते हैं। क्या भारत के नागरिक एक ही जुर्म पर अलग अलग सजा पाएंगे ,
धर्म प्रधान है या राष्ट्र ?यह तय करने का समय आ गया है।
व्यंग -अंतरिक्ष में भारत से मानव भेजने की बात आई ,बात राजनेताओं तक पहुंची। राजनेताओं
ने सर्वदलीय मीटिंग रखी और सबने तय किया -अंतरिक्ष में चार हिन्दू,दो मुस्लिम ,एक दलित ,एक
ईसाई ,एक पारसी भेजा जाये जब वैज्ञानिकों के पास यह फैसला गया तो वे सर पकड़ कर रह
गए। 

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

.... स्वार्थी मित्र है या हितेषी ?

.... स्वार्थी मित्र है या हितेषी ?

आप जब कमजोर होते हैं तब स्वार्थी मित्र आपसे दूरियाँ बढ़ा लेते हैं और आपको
भूलने का या फिर अनुचित दबाब बढ़ाने का प्रयास करते हैं। अपने को ताकतवर
समझने वाले लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए या आपको नीचा दिखाने के लिए
आपके दुश्मन तथा विरोधी का सहयोग करते रहते हैं लेकिन जब आप ताकतवर
बन उभरते हैं तो स्वार्थी मित्र आपकी वाहवाही में लग जाते हैं,आपके दिए स्लोगन
या आपके द्वारा कही गई सामान्य बात पर भी तालियाँ पीटने लगते हैं। अपनी सीमा
से स्वार्थी लोग आपको इसलिए दूर रखते हैं ताकि उनका स्वार्थ सिद्ध होता रहे।
क्या ऐसे लोग कभी मित्र भी हो सकते हैं ?

ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाये ? हमारे नीति शास्त्र कभी भी ऐसे
तुच्छ लोगों से मित्रता करने की सलाह नहीं देते हैं और ना ही उन पर विश्वास
जताने की सलाह देते हैं जिस तरह शठ के लिए शठ नीति है उसी तरह स्वार्थी लोगों
से खुद का स्वार्थ पूरा करके उन्हेँ बरगलाये रखना अच्छा है। स्वार्थी लोग खुद को
अच्छी तरह से पहचानते हैं वे स्वार्थ पूरा करने के लिए जो मिठ्ठी बात करते हैं
या सहयोग करने का वादा करते हैं वास्तव में उसका मूल्य कौड़ी का होता है। यदि
हम उन चिकनी बातों पर विश्वास करते हैं तो हम ही फिसलते हैं और चोट खाते हैं.

विश्व के डरावने स्वार्थी मित्र जब आपको निमंत्रण देते हैं और आपके पैरों तले लाल
कालीन बिछाते हैं इसका मतलब यह नहीं मानना चाहिए कि ये आपकी सफलता की
कद्र कर रहे हैं। ये लोग अपना स्वार्थ और आर्थिक हित देखने आते हैं और हमें भोन्दु
समझ अपना काम निकालने की फिराक में रहते हैं। जो लोग स्वार्थी मित्र से बढ़िया
सम्बन्ध बनाने में ऊर्जा नष्ट करते हैं वास्तव में अपने सच्चे मित्रों की उस समय
अवहेलना करते हैं क्योंकि हम तब उन्हें सम्मान देने में लगे रहते हैं जिसकी पात्रता
नहीं है और उत्साह अतिरेक में सच्चे मित्रों को खुद से दूर कर लेते हैं।

"सबका साथ और सबका विकास "तो भारतीय दर्शन का  मूलमंत्र रहा है हमारे ग्रन्थ
वसुधैव कुटुम्बकम का मन्त्र हजारों साल से दे रहे हैं मगर स्वार्थी लोग उसकी कद्र
आज तक नहीं कर पाये हैं परन्तु अपना हित साधने के लिए अभी वो इस मन्त्र की
प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं ?क्या हम वास्तविकता को समझ रहे हैं ? हमारे सच्चे
मित्र छोटे हैं तो भी हमारे लिए उत्तम है क्योंकि इतिहास और पुराण गवाह है श्री राम
की विजय में सहयोग करने वाले निषाद,भील,वानर ,काक जैसे सहयोगियों के समर्पित
भाव का।

कोयला जलता हुआ होता है तो भी उसका सम्पर्क हाथ जला सकता है और बुझा हुआ
है तो हाथ काले कर देता है ,स्वार्थी त्याज है। स्वार्थी मित्र को दूर करना है तो मनुष्य को
शांति पूर्वक अपना बहुत बड़ा स्वार्थ पूरा करने की बात रख देनी चाहिए वह उलटे पाँव
खिसक जाता है।    

रविवार, 27 जुलाई 2014

सच में ,जीतना आसान है।

सच में ,जीतना आसान है।

कार्य का परिणाम क्या आना चाहिये इस बात पर गहन चिंतन और विचार विमर्श
तब तक होना चाहिए जब तक उस काम को करना शुरू नहीं किया है। पूर्ण चिंतन
के बाद करने योग्य काम में देरी करना हमारे कमजोर आत्मविश्वास को दर्शाता है।
काम को शुरू नहीं करना हमारे निठल्लेपन को दर्शाता है। हाथ में लिए काम को
भय वश बीच में छोड़ देना हमारी अयोग्यता को दर्शाता है। कार्य के पूरा ना होने
तक हार जीत की परवाह किये बिना पुरे मनोयोग से डटे रहना दैवीय सत्ता को
उचित परिणाम देने के लिए मजबूर करना दर्शाता है। इसलिए वेद कहते हैं कि
देव भी पुरुषार्थ के पीछे चलता है  ………

यदि सही में आप जीत चाहते हैं तो दुनियाँ की कोई ताकत आपको हरा नहीं सकती।
जीत के लिए खुद को पूर्ण रूप से तैयार तो कीजिये, आप ने अपने को हार की जंजीरो
से झकड रखा है!! एक बार आत्म विश्लेषण कीजिये ,खुद को जानिये। अगर आप खुद
को जान जायेंगे तो आप निश्चित रूप से अपने असफल होने के सही कारण को पकड़
पायेंगे। क्या आपने अपने प्रति हीन विचार बना रखे हैं ?क्या आप अपने पर शंका
करते रहते हैं ?क्या आप अपने मन को कार्य शुरू करने से पहले ही नकारात्मक
सन्देश देने लग जाते हैं ?क्या आप अपने मन में भय,चिन्ता,निराशा,असफलता ,
हानि और दुःस्वप्न को स्थान दे चुके हैं ? यदि हाँ तो फिर आप जीत के लिए बने ही
नहीं है। जीत से पहले मन में जीत के ,केवल जीत के विचार लाने पड़ते हैं और यह
काम दूसरा नहीं कर सकता सिर्फ आप ही कर सकते हैं  

आप सफलता के शिखर तक पहुँचना चाहते हैं इसलिए तो उस अनजान मार्ग की ओर
कदम बढ़ा चुके हैं ,मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है ,इस मार्ग पर आपको जगह -जगह
निश्चित रूप से मार्गदर्शक पट्टिकाएँ मिलेगी जो आपका मार्ग दर्शन करेंगी। मैं चाहूँगा कि
आप उन साइनबोर्ड को पढ़कर वापिस नहीं लौटेंगे और नयी रह चुनते हुये आगे बढ़ते जायेंगे।
मार्ग में लिखे उन साइन बोर्ड पर मोटे अक्षरों में लिखा मिलेगा -"यह रास्ता सफलता की ओर
नहीं जाता " वास्तव में असफलता हमे नए मार्ग की तरफ बढ़ने को प्रोत्साहित करने के लिए
आती है हमारी सही मार्ग दर्शक बनकर,यह हमे हताश करने नहीं आती मगर हम इसे राह का
रोड़ा मानकर खुद के आत्मविश्वास को कमजोर कर लेते है ओर असफलता को नकारात्मक
रूप में लेकर कदम थाम लेते हैं या पीछे मुड़ जाते हैं  ...................     
  

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

जीवन सूत्र

जीवन सूत्र 

जो जीतना चाहता है वह समस्या को सिरे से समझने पर ध्यान केंद्रित कर देता
है और हारने वाला समस्या को नजरअंदाज कर देता है

बेशक, झूठ बोलने से काफी काम बन जाते हैं मगर झूठ गढ़ने, झूठी योजना तैयार
करने, झूठे साक्ष्य बनाने, झूठ को पेश करने और जिंदगी भर हर झूठ पर दी गई
दलील को याद रखने में बहुत ऊर्जा और उम्र (समय) खर्च हो जाती है जबकि सच
बोलने में बहुत कम ऊर्जा और समय लगता है। उम्र छोटी होती है और फैसला स्वयं
को ही करना होता है कि किसको चुने - झूठ या सच  .......

यह सच है कि हम सबके पास अपने स्वर्णिम भविष्य की योजना है लेकिन यह भी
सच है कि हम में से अधिकांश असफल या गुमनाम हो जाते हैं इसका कारण यह है
कि हम अपने लिए अच्छी योजना आज "TODAY"बनाते हैं और उसे कल TOMORROW
से शुरू करना चाहते हैं।

परमात्मा ने जिस मनुष्य को जो कुछ दिया है उसको वह न्यूनतम लगता है तथा
और ज्यादा पाने की याचना करता है,मगर किसी मित्र,परिचित या रिश्तेदार को कुछ
देता है तो मनुष्य उसे बहुत ज्यादा मानता है और ईर्ष्या से सुलगता रहता है। मनुष्य
ने जो कुछ भी अर्जित किया है उसका श्रेय खुद को देता है और जिसे प्राप्त नहीं कर
सका उसका कारण भगवान में ढूंढता है। जो मनुष्य इससे परे है वह पूजनीय है  ....

इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है की एवरेस्ट की चोटी हजारों फीट की
ऊँचाई पर है परन्तु यह भी सच है कि कदम दर कदम चल कर इसके शिखर को
पैरों तले रौंदा जा सकता है। इरादा जब अटूट बन जाता है तो काँटे गुलाब की
मुस्कराहट को रोकने में कामयाब नहीं होते और कीचड़ भी कमल को खिलने से
रोक नहीं सकता।

पँछी अपने घोंसले से सुबह चहचहाता हुआ उड़ान भरता है और शाम को कलरव
करता लौट आता है,उसके लिए कोई भी दिन बुरा नहीं होता क्योंकि उसको अपनी
उड़ान पर भरोसा है ,भयंकर दुष्काल में भी वह जमीन के अन्दर पड़े दाने को खोज
निकालता है और एक तरफ विवेक और बुद्धि से सम्पन्न मनुष्य है जो हर समय
अच्छे वक्त के इन्तजार में बैठा रहता है,प्रतिकुल समय में आर्थिक मंदी का मातम
मनाता हुआ दीन हीन बन कर बैठ जाता है या सरकार के कंधे की सवारी कर वैतरणी
पार करना चाहता है,क्या हम रोना रोते बैठे रहने वालो की कतार में खड़े रहना चाहते
हैं या पुरुषार्थ के पँख लगाकर उड़ना चाहते हैं ?फैसला भगवान ने मनुष्य पर छोड़
रखा है कि उसे क्या मिलना चाहिये और क्या नहीं  ………।

परचर्चा  हर घर में होनी चाहिये और सपरिवार परचर्चा करने की शुभ आदत दैनिक
कार्यक्रम में अवश्य शामिल होनी चाहिये। परचर्चा सुबह या रात में सोने से पहले
हो तो उत्तम है। जब भी हम परचर्चा में शामिल होते हैं तो उसके लाभों से वंचित
रह जाते हैं क्योंकि हम उस समय परचर्चा नहीं करके पर दोष दर्शन कर रहे होते
हैं ,किसी अन्य के अवगुणों की विस्तृत व्याख्या कर रहे होते हैं या ईर्ष्या ,द्वेष से
किसी को नीचा दिखाने के तर्क दे रहे होते हैं। यदि हम परचर्चा का सकुटुम्ब ,
सामूहिक रूप से अमृत पान करना चाहते हैं तो हमे मामूली सा बदलाव करना है।
सार्थक परचर्चा के लिए नजरिया बदलना है। किसी के दोष दर्शन की जगह गुण
दर्शन करना है।गुण दर्शन अगर परचर्चा में होगा तो हम सकारात्मक ऊर्जा से जुड़
जायेंगे ,हमारे में आत्म विश्वास बढ़ेगा ,हमारा उत्साह हिलोरे लेने लगेगा ,हम उस
समय श्रेष्ठ करने को प्रेरित रहेंगे। गुण  दर्शन की परचर्चा ही सत्संग है और दोष
दर्शन की परचर्चा कुसंग है।



जो हमारे होते हैं वे हमसे क्या चाहते हैं ? कोई बहुमूल्य भेंट ,रुपया ,सम्पति,जमीन
जायदाद !! शायद इनमें से कुछ भी नहीं। हमारे अपने हमसे वह चीज चाहते हैं जो
बाजार से मूल्य देकर नहीं खरीदनी है और वह हम सबके पास विपुल मात्रा में पड़ी
है मगर इसे विडंबना ही कहिये कि हम अपनों को बिना धन खर्च किये जो वस्तु
खुद के पास पड़ी है देने में भरपूर कंजूसी करते हैं। क्या आप जानना चाहेंगे उस वस्तु
के बारे में ?वह चीज है अंतस का प्रेम। आज हम ह्रदय में उमड़ते प्रेम को लुटाना तो
दूर,चिमटी भर भी बाँटना नहीं चाहते। एक बार बूढ़े माँ -बाप को ,पत्नी और बच्चो को ,
भाई और बहनो को ,मित्र और मानवता को निश्छल प्रेम दे कर के देखिये उसके
बदले में आप जो पायेंगे वही तो जीवन का सार है , Index Of Happiness ...?..... प्रेम
में कंजूसी से माँ -बाप की कद्र घट रही है,भाई बहन के रिश्ते कच्चे हो रहे हैं ,मित्रता
व्यावसायिक बन रही है,पत्नी और बच्चे किसी और में खुशियाँ ढूँढ़ते हैं,मानवता क्रूरता
में तब्दील हो रही है।  जब भी जिंदगी बोझिल लगे तब प्रेम को लुटाने का प्रयोग कीजिये
आप निश्चित रूप से खुशहाल जिंदगी को पा लेंगे।   

हम विचित्र आडम्बर को लाद कर सुख की खोज के लिए मारे-मारे फिरते हैं। यह
आडम्बर है -अपनों से शिकायत और गैरों से ,बाहर वालों से शिष्ट व्यवहार। कहने का
तात्पर्य यह है कि हम जितनी शिष्टता का ध्यान गैरों के साथ व्यवहार में देते हैं उतनी
शिष्टता और अपनापन अपनों को क्यों नहीं दे पाते हैं ?हम पिता ,माँ ,भाई,बहन,पत्नी ,
बच्चों और निकट के रिश्ते वालों को उचित शिष्टता दिखाने से क्यों चूकते हैं ?हम
प्राय: जानबूझकर भी बेमतलब के अहँकार को जिन्दा रखने के लिए ऐसा करते हैं।
क्या अपनों के मुल्य पर दूसरों के साथ आडम्बर पूर्ण शिष्टता हमें सुख दे पायी है ?
यदि हम अपनों को अपनायेंगे तो दुनियाँ खुद ब खुद आपको अपना लेगी,यही
वास्तविकता है जीवन पथ की  … प्रयोग कीजिये ,सुखद जीवन का यह सूत्र आपको
वह सुख देगा जो जीवन का मकसद है      

सोमवार, 14 जुलाई 2014

सरकार किन समस्याओं से पहले लड़े ?

सरकार किन समस्याओं से पहले लड़े ?

विगत साठ साल के दरमियान हमारे देश में समस्याएँ बढ़ती गयी ,कारण क्या
रहे इस विषय पर खूब विचार जानने को मिलते हैं ,दोषरोपण करने से कोई हल
निकलने वाला नहीं है। अब जब काँग्रेस मुक्त सरकार के हाथ में कमान है तब
आम जनता की आशाएँ बढ़ जाना स्वाभाविक है।
देश की प्रमुख पच्चीस समस्याएँ जिनसे निजात पाना बहुत आवश्यक है और
पाठकों की राय में वे पाँच प्रमुख समस्याएँ जिन्हें मोदी सरकार को प्रमुखता देकर
अपने कार्यकाल में खत्म करने का प्रामाणिक प्रयास करना चाहिए। प्रबुद्ध पाठक
उनका क्रम क्या होना चाहिए,बताये।

1. गरीबी 
2 बेरोज़गारी 
3. भ्रष्टाचार 
4. कर चोरी और काला धन  
5 . ऊर्जा की कमी 
6.  आतंकवाद और सांप्रदायिक दँगे
7. लचर न्याय प्रणाली 
8. कार्य संपादन में देरी /कामचोर नौकरशाही 
9. गलत शिक्षा प्रणाली 
10. प्राकृतिक संसाधनो को दुरूपयोग 
11. पिछड़ी ग्रामीण व्यवस्था
12. परम्परागत कृषि 
13. पिछड़ी तकनीक और ख़राब रिसर्च व्यवस्था 
14. खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाएँ 
15. ख़राब पर्यावरण और अस्वच्छता 
16. महँगाई 
17. पेयजल आपूर्ति समस्या 
18. घटता निर्यात
19. सामरिक ताकत में अनुत्साह 
20.  कुपोषण
21. सड़क और परिवहन समस्या 
22. खाद्य और भंडारण की अव्यवस्था 
23. खस्ताहाल वितरण व्यवस्था 
24. सही सुचना का अभाव 
25. नागरिकों में जागरूकता का अभाव 

शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

पंक्चर वाला और बजट

पंक्चर वाला और बजट 

बाईक चलते -चलते डगमगा गयी ,मेने टायर की ओर देखा जो पिचका जा रहा था।
बाईक को घसीटते हुए पंक्चर की दुकान तक लाया और पंक्चर वाले से पंक्चर
बनाने को कहकर वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। ट्यूब में दौ -तीन पंक्चर पड़े देख
मेने पंक्चर वाले से कहा -भैया ,पंक्चर बनाना रहने दो तुम ऐसा करो कि जल्दी से
नया ट्यूब डाल दो ,थोड़ी देर में बजट आने वाला है उसे लाइव सुनना है।
       पंक्चर वाले ने नया ट्यूब निकाला और उसमें हवा भर के लीकेज चेक किया
ट्यूब सही था। मेने एक नजर से ट्यूब को देखा और बोला -भैया जल्दी करो ,मुझे
बजट सुनना है।
       पंक्चर वाले ने हाँ में सिर हिलाया और नए ट्यूब में भरी हवा को निकाल दिया
और टायर को चेक करने लगा। टायर चेक करता देख मेने पूछा -भैया ,नया ट्यूब
डलवा रहा हूँ फिर टायर को चेक करके टाइम क्यों बिगाड़ रहे हो ?
    पंक्चर वाला मुस्कराया और टायर चेक करता रहा -एकबार  … दो बार  … तीन
बार  … वह टायर के अंदर हाथ घुमाता जा रहा था। उसे टाइम पास करता देख मैं
अकला गया और बोला -भैया ,चेक हो गया ;अब फिटिंग कर दो ,मुझे बजट सुनना
है   .......
    मेरी बात काटते हुए वह बोला -क्या फर्क पड़ता है साब बजट सुनने या ना सुन
पाने में। हर साल बजट तो नया ही आता है ना फिर यह देश पंक्चर क्यों है ?
   मै उसकी बात का हल खोजने के लिए सोचने लगा ,इतने में वह उठा ,पास पड़ा
एक ड्राइव उठाया और टायर में घुसेड़ कर छोटी सी लौहे की कील को निकाल दिया।
अब उसके चेहरे पर संतुष्टि थी। टायर फीट करते हुए बोला -साब ,क्या सोच रहे हैं ?
इतने साल बजट आते गये और देश पंक्चर ही रहा इसका कारण टायर में दबी
कीले ही तो है। जब तक ये कीले खोज खोज कर नहीं निकाली जायेगी तब नए
ट्यूब से क्या फायदा !
     मुझे लगा यह पंक्चर वाला सही सोच रहा है। नीतियाँ बनती है पर उसका लाभ
व्यवस्था में आड़े आ रही असंख्य भ्रष्ट कीले चाट जाती है।    

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

विदेशी वस्तुओं का मोह : दलदल या प्रगति पथ

विदेशी वस्तुओं का मोह :  दलदल या प्रगति पथ 

जिस देश की ३०% जनता के हाथ में 70%प्रतिशत खरीद शक्ति हो और वो 30%
लोग स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग प्राय :टालते हो तो देश की अर्थ व्यवस्था कैसे
मजबूत बनेगी ? इस देश की 70% प्रतिशत जनता पेट भरने के लिए संघर्ष
करती है और ना ही उसे यह पता है कि वह जो भी चीज खरीद रही है उससे मुनाफा
किसको होता है और जिस पढ़े लिखे वर्ग में यह जानकारी है वह आडम्बर में
रचा बसा है उसे वाही वस्तु ब्रांडेड लगती है जिसे विदेशी कम्पनियाँ बेचती हो
चाहे वह वस्तु खाने -पीने की हो ,पहनने की हो या विलासिता की हो।
            हम यह जानते हैं कि ठेले पर शुद्ध सामग्री से बना समोसा या पराठा
हमारे शरीर को नुकसान नहीं पहुँचाता लेकिन हम हानिकारक पित्ज़ा,बर्गर
खाने में शान समझते हैं। हम यह नहीं सोचते हैं कि रेहड़ी से एक परिवार पलता
है ,छोटी दुकान से एक साधारण परिवार में खुशियाँ आती है जबकि पित्ज़ा बर्गर
बेचने वाली आलिशान रेस्तरा से देश की पूँजी विदेशी हाथों में चली जाती है।
             हम हमारे वेदों में सुझाया नीम बबूल आदि का बना स्वदेशी दन्त मंजन
उपयोग में लाने से कतराते हैं जबकि हानिकारक टूथपेस्ट मुँह में डाल लेते हैं।
पहले छोटे शहरों से लेकर महा नगरो तक नीम और बबूल की टहनियों का ताजा
आरोग्य दायी ब्रश मिलते थे और गरीब ग्रामवासी उन्हें बेच कर अपने परिवार का
पालन पोषण कर लेते थे ,हमने उनको दरकिनार करके बड़ी विदेशी कम्पनियों के
पेस्ट उपयोग में लाने शुरू कर दिये जिसका परिणाम यह हुआ कि हर साल अरबों
रुपया विदेशी कम्पनियों की जेब में चला जाता है।
            हम भारत वासी दूध,लस्सी या निम्बू शिकंजी से अपने दिन की शुरुआत
करते थे ,मेहमानों की आवभगत करते थे तब बीमारियाँ कोसों दूर थी मगर हमने
बड़ी विदेशी कम्पनियों के कुप्रचार में आकर ठन्डे नुकसान दायक पेय पदार्थो का
सेवन करना शुरू किया नतीजा यह हुआ कि हम पैसे देकर केमिकल पीना सीख
गये और स्वास्थ्य और धन खोने लगे,विदेशी कम्पनियाँ खरबो रूपये कमा कर
ले जाने लग गयी।
             विदेशी रेशमी वस्त्रों की होली जलाने वाले हमारे पूर्वज देशप्रेमी थे खादी
भले ही मोटा कपडा थी मगर वे उसे पहन कर और विदेशी चीजों की होली जलाकर
इस देश को आजाद करा चुके थे मगर हम अपने पूर्वजों के भी नहीं रहे,तन को
सुन्दर दिखने की चाह में हम स्वदेशी उत्पाद को भूलते चले गये। आज हाल यह है
कि घरेलु वस्त्र उद्योग मरणासन्न है और विदेशी कपडे की दुकाने चमन है।
                यह देश के लिए जीने का युग है। हम जाग्रत बने और स्वदेशी को
अपनाये। जब हम स्वदेशी को अपनाएंगे तो हमारे उद्योग चल निकलेंगे उनमे अच्छा
उत्पाद बनाने का हौसला आयेगा ,अगर ब्रांड इण्डिया की धाक विश्व में पैदा करनी है
तो स्वदेशी उत्पाद को अपनाना होगा।     

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

… और कंगाल होता गया देश ?

… और कंगाल होता गया देश ?    

एक परिवार का मुखिया अच्छा कमा रहा था। परिवार में सबकी जरूरतें पूरी हो रही थी।
धीरे -धीरेबिन जरुरी आवश्यकताएं भी पैदा होने लगी,परिवार का मुखिया भविष्य में
अच्छा कमा लेने कीआशा में चुपचाप खर्चे बढ़ाता गया ,अब उस घर में अनिवार्य
आवश्यकताओं की जगह विलासिता ने ले ली ,सब सदस्य गुलछर्रे उड़ाने लगे।
संचित धन भी ज्यादा समय तक साथ नहीं दे पाया तबआवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
उधार लेना पड़ा ,लोग आसानी से उधार दे दें इसके लिए दिखावे के खर्चे और बढ़ा लिये ,
देखते ही देखते कर्ज बढता गया। मुखिया अपने परिवार को वास्तविकतानहीं बता पाया
और ना ही कमाई के साधन बढ़ा पाया ,अब उसका समय नए साहूकार से कर्ज पाने के
तरीके ढूढ़ने में बीतने लगा ,काम सारा चौपट होने लगा। परिवार वालों की आवश्यकता
पूर्ति समय पर नहीं होने लगी तो सब उसे ताने देने लगे ,आखिर उसने एक उपाय ढूंढा
जिससे की सारी निष्फलता का ठीकरा उस पर नहीं फूटे। उसने सभी सदस्यों को बुलाया
और अपने बुढ़ापे का वास्ता देकर यह परिवार ज्येष्ठ पुत्र को सँभालने को कहा।
अगले दिन ज्येष्ठ पुत्र काम पर गया एक ही दिन में सभी मांगने वालों का तकादा हुआ।
परिवार की यथास्थिति समझ उसने उसी रात घर के सभी सदस्यों को फरमान सुना
दिया कि सभी अनावश्यक खर्चे अभी से बन्द कर दिए जायेंगे जो पुरुष काम नहीं करेगा
उसका खर्चा वह खुद उठायेगा। उसका यह फरमान सबको गलत लगा और सब मुखिया
के राज की तारीफ करने लगे।
   अगले दिन सभी ने मुखिया को फिर से व्यवस्था सँभालने को कहा ,मुखिया ने हामी भर
दी और सबको पूर्ववत सुविधाएँ देनी शुरू कर दी। कर्ज चुकाने के लिए खेत की जमीन को
अनुपयोगी बताकर बेच दी ,कुछ पैसे ब्याज के चूका दिए और कुछ से विलासिता बढ़ा ली ,
यह खेल वर्षो तक चलता रहा ,बाप दादा की बपोती बिकती रही मगर थोथे खर्चे बंद नही
हुए।
      इसी तरह के  दुष्चक्र में यह देश भी फंसा है।गरीब के नाम पर धन बाँटने की योजना
बनती है और धन लुटेरों की जेब में चला जाता है बस कुछ सिक्के जरूर उछाल दिए जाते
हैं जिसका अहसान वह हर पाँच साल में चुकाता रहा है। विगत साठ सालों में देश की
जनता का दिवाला निकलता गया ,गरीबी रफ़्तार से बढ़ती रही ,गरीब बढ़ते गये और
गरीबी हटाने वाले मालदार और रुतबे वाले बनते गये।
         

सोमवार, 7 जुलाई 2014

क्या देश करवट बदलेगा ?

क्या देश करवट बदलेगा  ?

देश की नयी सरकार का पहला बजट आने वाला है और देश का बजट ही यह
तय करता है कि देश किस दिशा में जाने वाला है।

आज समस्या बढ़ती हुयी महँगाई नहीं है,समस्या है घटता हुआ रोजगार। यदि
बजट रोजगार उत्पन्न करने में सक्षम होता है तो महँगाई समस्या नहीं रहेगी।

ग्रामीण क्षेत्र हमेशा रोजगार से वंचित रहे हैं क्योंकि आज तक गाँवों को सुदृढ़
बनाने का सोचा तक नही गया। गाँवों तक औद्योगिक विकास नहीं पहुँच पाया
और ना ही कृषि को उद्योग का दर्जा मिला ,गाँवों को मिला अकुशल श्रमिक का
काम जैसे -मनरेगा!!!

                             आप कल्पना कीजिये कि भारत की 65 %से ज्यादा प्रजा
गाँवों में बसती है और इतनी बड़ी जनसँख्या को हम उद्योग से जोड़ने में असफल
रहे हैं। इसका कारण अब तक की सरकारों की नकारात्मक सोच है जो इतने
बड़े जनसमूह का उपयोग देश के विकास में करने में नाकाम रही। आज
महँगाई से सबसे ज्यादा कौन प्रभावित है ? गाँव ही ना। बड़ा अजीब समाधान
है खाद्य सुरक्षा जिसे काँग्रेस लायी थी और भाजपा आगे बढ़ा रही है। सोच जब
बूढी हो जाती है तो अजीबोगरीब उपचार और टोटके ढूंढे जाते हैं ,अगर मोदी
सरकार भी गाँवों के विकास को आगे नहीं बढाती है तो देश की नींद अभी टूटने
वाली नहीं है और विकास के सपने सिर्फ सपने और वादे ही रह जाने वाले हैं
क्योंकि गाँवों में जब तक रोजगार नहीं बढ़ेगा तब तक महँगाई के नाग का तांडव
रुकने वाला नहीं है। आम व्यक्ति गरीब इसलिए है कि उसके पास भरपूर काम
और काम की सही दिशा नहीं है। आज सस्ते में अनाज बाँट देने से क्या गाँवों की
बदहाल हालत सुधर जायेगी ?सरकार गरीब के पेट में रोटी पहुँचाने की जुगत में
है ,मगर यह खाद्य सुरक्षा का हल कब तक ? क्या गरीब का पेट भर देने मात्र से
विकास का रास्ता निकल जायेगा ? किसी भी सुराख़ पर पैबंद लगाना आकस्मिक
व्यवस्था हो सकती है मगर दीर्घकालीन व्यवस्था के लिए नव सर्जन जरूरी होता
है।

मोदी सरकार कृषि को उद्योग की तरह सुविधा दे ,व्यवस्था दे ,तकनीक दे ताकि
देश का अन्न भण्डार बढे और निर्यात से आर्थिक सुदृढ़ता आये।

मोदी सरकार लघु उद्योगो को गाँवों में बढ़ाये ,छोटे उद्यमियों को कर और निवेश
में सहायता दे ,गाँवों में बिजली की आपूर्ति और सड़कों का निर्माण  करे ताकि
लघु उद्यमी वहां रोजगार पैदा कर सके।  

सोमवार, 30 जून 2014

भक्त और भगवान

भक्त और भगवान 

भक्त -भक्त अपने आराध्य का गुणगान करता है और उसकी शरण लेना चाहता है।
       भक्त अपने आराध्य की कृपा से मनुष्यों के कष्ट दूर करने के प्रयास में लगा
       रहता है। भक्त भगवान को रिझाने में अपना जीवन समर्पण कर देता है। भक्त
       मानव कल्याण के लिए पुरुषार्थ करता है और अपने शक्ति स्त्रोत भगवान से
       प्रार्थना करता है। भक्त भगवान का पूजन -अर्चन करता है और अपने स्वामी
       की सेवा में प्रस्तुत रहता है। मगर मनुष्य अपने लौकिक स्वार्थ को पूरा करने
      के उद्देश्य को लेकर इन दोनों के समीप जाता है और धन या पदार्थ के बल से
      इनकी प्रसन्नता चाहता है और भक्ति मार्ग में यह कृत्य आडम्बर कहलाता है।

      भक्त अपने गुणगान,धन ,सम्मान या किसी पदार्थ को पाकर प्रसन्न नहीं होता
      वह तो उसके आराध्य को प्रसन्न करने के प्रयास करने वाले सच्चे मनुष्य से
      हमेशा खुश रहता है और भगवान से उसके कल्याण की दुआ करता है। भक्त
      भगवान की महिमा का गान सुन कर प्रसन्न हो जाता है ,स्व-प्रशंसा उसे खिन्न
     कर देती है। भक्त की चाह भगवान के चरण वंदन और दर्शन की रहती है वह तो
     अपने स्वामी के बराबर स्थान पर स्वप्न में भी बैठना नहीं चाहता है मगर मनुष्य
    अपनी अभीष्ट की प्राप्ति के लिये उसे भगवान मान लेता है,बहुत स्वार्थी है ना मनुष्य !

    भक्त भगवान की लीला का अनुकरण नहीं करता है यदि उसके कारण से मानव जाति
     का दू:ख दूर हो जाता है तो वह अपने स्वामी की कृपा मानता है मगर इंसान अपने
    लालच के कारण भक्त को महिमा मंडित करने में लग जाता है। क्या कोई भक्त खुद
    को भगवान कहलाने की इच्छा रखता है ?क्या कोई भक्त खुद को भगवान के स्थान
    पर विराजमान होते देखना चाहता है ? तो फिर भक्त की इच्छा क्या रहती है ?क्या
   भक्त खुद की मृत्यु के उपरांत उसकी याद में मंदिर,मूर्ति या प्रतिष्ठा चाहता है ?भक्त
    का जीवन या लौकिक शरीर भगवान को समर्पित होता है उसका रोम -रोम हर क्षण
    अपने आराध्य के नाम स्मरण में बीतता है यह तो मनुष्य का स्वार्थ है जिस कारण
    से भक्त को भगवान मान उसे महिमा मंडित करता है। हमारी आस्था और विश्वास
    का केंद्र  सर्व शक्तिमान भगवान है और भक्त का जीवन चरित्र  अनुकरण के योग्य
    होता है।

भगवान - भगवान को सबसे अधिक प्रिय उसका भक्त लगता है। भगवान अपने ह्रदय
      में भक्त को स्थान देता है। जो मनुष्य भगवान के भक्त की सेवा करता है भगवान
      उस पर प्रसन्न हो जाते हैं। भक्त का पूजन,सत्कार और आदर भगवान खुद चाहते
     हैं। भगवान खुद अपने भक्त की रक्षा में लगे रहते हैं ,उसके कष्टों को दूर करते हैं।
     भगवान तो खुद भक्त की गाथा में तल्लीन रहते हैं परन्तु भगवान यह नहीं कहते
    हैं कि भक्त सम्पूर्ण सत्य स्वरूप है। भगवान तो उसे अपना अंश मानते हैं। भक्त
    भगवान में समा जाये यही भक्ति की पराकाष्ठा है।

मनुष्य भगवान की माया में उलझ कर रह जाता है। उसे अपने स्वार्थ के अनुकूल जो
अच्छा लगता है उसके कीर्तन में लग जाता है उसे भक्त या भगवान से खास लेना -देना
नहीं है। मनुष्य तो ठगना चाहता है चाहे वह भक्त हो या भगवान मगर सच्चाई यह है कि
मनुष्य से ना भक्त ठगा गया है और ना ही भगवान।         
     

शुक्रवार, 27 जून 2014

85 %लीकेज वाला ट्यूब है अर्थ व्यवस्था

85 %लीकेज वाला ट्यूब है अर्थ व्यवस्था 

श्री राजीव गांधी ने कहा था सरकार रुपया खर्च करती है मगर आम जनता को
पंद्रह पैसे ही मिलते है !!बाकी पैसे कहाँ जाते हैं ?इसका उत्तर वो नहीं दे पाये थे।
ट्यूब में एक पंक्चर हो तो गाडी चलती नहीं है फिर 85 %पंक्चर अर्थ व्यवस्था
का कायाकल्प कैसे होगा ?अर्थव्यवस्था में इतने पंक्चर किसने हो जाने दिये ?

    रुपया सरकार की तिजोरी से निकलते ही घिसना चालू हो जाता है। भ्रष्ट
नेता,भ्रष्ट उद्योगपति ,भ्रष्ट नौकरशाही और भ्रष्ट हो रही न्याय व्यवस्था और
इनके दलदल में फँसे हैं 80%भारतीय जो इसलिए ईमानदार हैं क्योंकि उनके
पास तो अर्थ है ही नहीं।

   देश की जन कल्याणकारी योजनायें जनता के लिए तमाशा और उससे जुड़े
भ्रष्ट लोगों के लिए लॉटरी है। देश की नौकरशाही कागजों पर फूल बनाती है और
फाइलों पर चिपका देती है। जनता इसलिए खुश होती है कि ये कागज के फूल
मुरझाते नहीं हैं और बाकी चैनल इसलिए खुश है कि उन्हें असल में खुशबु आती
है।
   हमारी वितरण व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसका recheck का
बटन अँधा ,बहरा और लकवाग्रस्त है। राशन का अनाज बाजार में बिक जाता
है  या बड़ी मिलों में सप्लाई हो जाता है। अनाज सरंक्षण की व्यवस्था हर गरीब
के घर में है परन्तु उसको अनुपयोगी समझ लिया गया है। क्या कोई भी सरकार
रातों रात भंडारण और सरँक्षण व्यवस्था तैयार कर लेगी ?तो फिर उस अनाज
का सड़ना और बाजार के हवाले होना तय है।

  BPL से निचे का बड़ा वर्ग जिसके पास ना गाँव है ,ना समाज ;वह तो फुटपाथ
पर जीता और मर जाता है या जंगलों में गुजर बसर कर जिंदगी घसीट रहा है ,
उसके जीवन में उजाला कैसे होगा क्योंकि सरकार के पास उसके लिए कोई
योजना है ही नहीं। यह वर्ग सरकार की वितरण व्यवस्था के दायरे में कैसे और
कब आयेगा ?

   सरकार की सफलता का पैमाना हम बढ़ते स्टॉक मार्केट,बढ़ते अरबपति और
करोड़पति,बड़े उद्योग धंधों में देखते हैं मगर हम इस चकाचोंध में यह भूल जाते
हैं कि करोड़ों भारतीय बहुत पीछे छूटते जा रहे हैं। सरकार की कोशिश यह होनी
चाहिये कि पीछे छूटने वाले का रुक कर साथ करे और उन्हें साथ लेकर चले ना
कि उन पर रहम की रोटी बरसायें।     

बुधवार, 25 जून 2014

महँगाई से लड़ने का तरीका क्या हो

महँगाई से लड़ने का तरीका क्या हो 

महँगाई नहीं रोक पाने में अभी तक सरकारें असफल क्यों रही है?

हमारा रुपया खर्च कहाँ होता है और उसे कहाँ खर्च करना होगा ,यह व्यवस्था
ही महँगाई को कम करेगी। भारत के लोग उधार के रूपये पर कितने दिन घी
पियेंगे।

हमारे पास पेट्रोल नहीं है और बाहर से खरीद करना पड़ता है फिर भी हम
पेट्रोल की खपत को कम करने के उपाय नहीं ढूंढते हैं.हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट
की सेवा को दुरस्त नहीं कर पाते हैं,सड़कों को दुरस्त नहीं कर पाते हैं,यातायात
व्यवस्था को सहज नहीं बना पा रहे हैं, निजी कारों को सब्सिडी भाव से ही
पेट्रोल ,गैस  या डीजल की आपूर्ति कर रहे हैं। जब तक पेट्रोल की बचत के
तरीके नहीं खोजे जायेंगे तब तक हमारे धन का दुरूपयोग नहीं रुकेगा और
महँगाई भी नहीं रुकेगी। क्या पेट्रोल की राशनिंग का वक्त नहीं आ गया है ?
क्या 80 % भारतीयों के पास कार है ,नहीं हैं ना तो 20% रहीशो को सब्सिडी
वाला पेट्रोल,डीजल ,गैस उपलब्ध क्यों ?

आधुनिकीकरण,उदारीकरण ने हमें जेब खाली होने पर भी खर्च करने को
प्रोत्साहित किया। उधार लेकर जलसे करना सिखाया। गरीब के शौक को
बढ़ावा देना सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है। हम ब्याज पर पैसा
लेकर शौक पुरे करते हैं और ब्याज को चुकाने के लिए कर्ज लेते हैं। हमारे
बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाता है और इस कारण से
रुपया मूल्य खोता जा रहा है।

बड़े उद्योगो को बढ़ावा दिया मगर पाया क्या ?सिवाय पूँजी के केन्द्रीयकरण के।
आज बहुत से बड़े उद्योगपति देश की बैंकों का ब्याज और मूल रकम कुछ भी नहीं
चूका रहे हैं तो बैंकों का घाटा पूरा कैसे होगा और उस बोझ को कौन ढोयेगा ?
80%गरीब भारतीय ही ना। बड़े उद्योगो को सब्सिडी क्यों ?उन्हें धंधा बढ़ाना है
तो सरकार सहायता दे और 80%वाले अपनी मेहनत से व्यापार करे!! क्या
किसानों,फुटकर व्यापारियों ,अति लघु ,कुटीर और लघु उद्योगो को बिना
ब्याज के कोई बैंक कर्ज देती है। 

हम अच्छी बन्दुक और तोप भी अपने यहाँ नहीं बना पा रहे हैं दूसरे स्वचालित
सामरिक उपकरणों की बात क्या करे। आज हमारा रुपया सामरिक उपकरण
पर खर्च हो रहा है। विकसित देश भारी मुनाफे पर सामरिक उपकरण हमें
बेचते हैं और हम उनकी पुरानी टेक्नोलॉजी को ऊँचे दाम देकर खुश होते हैं और
उनके कबाड़ को खरीद कर पैसा चुकाते हैं ?कब तक चलेगा ऐसा ??

महँगाई का भार गरीब जनता पर ना पड़े इसका ख्याल मोदी सरकार को करना
होगा ?कड़वी दवा उनके लिए जरुरी है जो तीन लाख सालाना से ज्यादा आय कमाते
हैं। 50-100 रुपया दिन के कमाने वाले पर कड़वी दवा इस्तेमाल करने की भूल
करने पर इस सरकार का ५साल बाद क्या हश्र होगा ?जिस तरह काँग्रेस गयी ,यह
भी चली जायेगी।

नेताओं और नौकरशाहों के काले धन पर हाथ डालो,राष्ट्रिय बैंकों का कर्ज ना चुकाने
वाले बड़े मगरमच्छों के जबड़े पकड़ो, कामचोर और रिश्वत खोर अफसरों को घर
बैठाओ ,जमाखोरी वाले से राजनैतिक साँठगाँठ ख़त्म करो। प्रशासनिक जबाबदेही
के मानक तय करो। गरीबी भगाने के लिए कागजी योजनायें आज तक असफल
हुयी है ,समय पुरुषार्थ को पुकार रहा है।