गुरुवार, 30 जनवरी 2014

लकीर पीटता लोकतंत्र

लकीर पीटता लोकतंत्र 

देश का लोकतंत्र लकीर पीटने में व्यस्त है शायद नेता समझते हैं कि लकीर पीटने से
लोकतंत्र चलता है और मजबूत बनता है।

   दोष निकालने,ढूंढने और दोषों के दर्शन और अध्ययन करने में पूरी राजनीति गले
तक डूबी है। कोई दल किसी दल केअच्छे काम की प्रशंसा नहीं कर पाता क्योंकि
प्रशंसा से दूसरे दल कहीं प्रेरणा न ले लें या कहीं विरोधी दल की प्रशंसा से उसकी जमीन
खिसक न जाये। सब केंकडावृति में मशगुल हैं। इस तू -तू,मैं-मैं में देश कि जनता पीस
रही है,मूक दर्शक है या फिर किसी के साथ मिलकर कुछ देर अपना टाइम व्यतीत
करती है और फिर अपने लम्बे दर्द तथा संघर्ष में डूब जाती है।

क्यों पीटते हैं लकीर नेता लोग - 1947 से लेकर अब तक विश्व बदल चूका है ,विकास
के नए आयाम तय कर रहा है और हम प्राथमिक सुविधा भी उपलब्ध जनता को नहीं
करा पा रहे हैं यह बात हर नेता अच्छी तरह से जानता है ,लोग कहीं उनसे इस बारे में
कटु सवाल कर ना ले इसलिये लकीर पीटने को खाल बचाने का माकूल उपाय मानते हैं।

      जो दर्द गुजर गया,जो घाव भर गये,जो यंत्रणा भोग ली गयी उसे गाहे बगाहे हरा
करने से क्या मुस्लिम ,हिन्दू ,सिक्ख या ईसाई क़ौम का भला हो जायेगा ?गुजर चुके
भयानक इतिहास को कोई सिरफिरी विचारधारा फिर हरी करती है उसे पोषण देती है
उसका उद्देश्य क्या है ?क्या उससे देश का भला होगा या किसी भी क़ौम का भला होगा ?
फिर भयानक पलों को याद करवाना राज धर्म क्यों बन रहा है। क्या फिर भारतीयों को
लड़वाने का इरादा है या उनमें नफरत की आग को जलाना है। राजनीति चमकाने के
रास्ते और भी चुने जा सकते हैं मगर सब लकीर पीटना चाहते हैं ताकि जनता पुराने
दुःख को याद कर उन्हें वोट दे दे।

कैसे निपटे भारतीय लकीर के फकीर से     -आज तक ये लोग लकीर पीटते रहे और
हम आपस में लड़ते हुए ,एक दूजे से काल्पनिक भय रख कर इन्हे वोट करते रहे और
लोकतंत्र को जीवित रखते गये ,इससे हमें उपहार में मिला कौमवाद,गरीबी ,असुविधा ,
भ्रष्टाचार,आश्वासन,अशिक्षा और गिड़गिड़ाता हुआ जीवन। इस कुचक्र को तोड़ने के
लिए क्या करें ? आईये एक  चित्रकार के पास चल उसके चित्र को देखते हैं जो एक
लम्बे कागज पर कुछ शेर बनाकर उनके गले में पाटिये लटका रहा है पहले के गले में
हिन्दू ,दूसरे के मुस्लिम ,तीसरे के सिक्ख ,चौथे के ईसाई ,पाँचवे के बौद्ध ,छठवें के
पारसी,सातवे के पिछड़ा ,आठवें के अगड़ा ? अब इस चित्र को देख कर इनका नाम
करण कर दीजिये  यानि शेर ,यही ना ! पहले सब भारतीय बन जाइये ,सबमे समान
ताकत और समान अधिकार हों और हम सब अपनी ऊर्जा का उपयोग जो उपहार हमे
अभी तक नेताओं ने दिए हैं उन्हें वापस लौटाने में करे , फिर देखो देश कैसे बदलता है।
देश नारों से नहीं बदलेगा ,देश बदलने के लिए हर भारतीय को एक होना पड़ेगा फिर
राजनीती की धारा खुद ब खुद बदल जायेगी। प्रेम और विकास ,समानता और सद्भाव
की राजनीती होगी।                   

बुधवार, 29 जनवरी 2014

आओ, कानून बना देते हैं !!!

आओ, कानून बना देते हैं !!!

देश अब कागज पर चलेगा क्या ? अगर नेताओं को यही रास्ता ठीक लगता है और इसी
रास्ते से सरकारें बनना सरल लगता है तो कुछ लाइनें और खिंच दीजिये ताकि देश वासी
यह मुगालते में रहे कि अब सब कुछ ठीक ठाक हो गया है -

1. रोजगार का अधिकार कानून
2. पानी आपूर्ति कानून
3. बिजली और सड़क का अधिकार
4. सड़क निर्माण कानून
5. दुर्घटना रोको कानून
6. महँगाई भगाओ कानून
7. बिना पढ़ें डिग्री का कानून
8. तुष्टिकरण और पक्षपात का कानून
9.अभिव्यक्ति पर लगाम का कानून
10. वादों और आश्वासन का कानून
11. झूठ बोलने की स्वतंत्रता का कानून
12. समाज सुधार का कानून
13. विकास का कानून

कागज पर लिखने से देश और नागरिकों का विकास सम्भव है तो फिर हर अव्यवस्था पर
प्रतिदिन कानून बनाते चलो। हर चौराहे पर निपटारा विभाग खोल दो। गाँव-गाँव में
कारावास बना दो। देश का विकास इसी रास्ते से होना सही लगता है तो कानून बनाते रहो। 

देश के पास पर्याप्त कानून है। देश के पास अगर कमी है तो निष्ठा और कर्तव्य परायणता की,
सेवा और समदृष्टि की।   

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

मेरा पाप जिंदाबाद ,उसका पाप मुर्दाबाद !!

मेरा पाप जिंदाबाद ,उसका पाप मुर्दाबाद !!

देश को बपौती समझने वाले लोग अपने पाप पर भी जिंदाबाद चाहे और किसी के काम
को सिर्फ मुर्दाबाद कहें तो किसे मुर्ख समझे ?उसको चुनने वाली जनता को या उसके 
दोहरे चरित्र को ,तय करें क्योंकि समय आप हिन्दुस्तानियों से जबाब माँग रहा है। 

कोई व्यक्ति खुद को स्वराज मानता है और अपने से बड़ों का अनादर भाषा से या हाव 
भाव से करता रहता है तो उसे देश स्वराज माने या अराजकता ,तय करे और पुनर्विचार 
करें क्योंकि यह देश कुछ लोगों कि जागीर नहीं है इसकी हर विचारधारा पर करोड़ों 
भारतीयों का भविष्य बंधा है। 

हजारों चूहे खाकर बिल्ली हज को चली ,क्या उसके बाद वह चूहे खाना बंद कर देती है ?

विधाता ने खून के रँग में फर्क नहीं किया मगर नेता अब सड़कों पर बह चुके खून को 
अलग-अलग भाव से देखता है ,उसको दर्द नहीं होता इस बात पर कि खून बहा है उसे 
दर्द है इस बात पर कि वह किसका बहा है !!  

रविवार, 26 जनवरी 2014

गणतंत्र केवल वोट का अधिकार नहीं

गणतंत्र केवल वोट का अधिकार नहीं 

हमारी आजादी और गणतंत्र की रक्षा का दायित्व केवल चुनी हुई सरकार की जबाबदारी
ही नहीं हर नागरिक का कर्तव्य है।  वह हर दिन भगवान् के बाद उनको भी नमन करें
उनके बलिदान को याद करें और समय पर अनुसरण करें जिनके त्याग के कारण हम
स्वतन्त्रता की साँसे ले रहे हैं।

     हमने जब अपना संविधान लिखा तब अधिकांश भारतीय अशिक्षित और गरीब थे
तब देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने सबको जीने की आजादी मिल सके इस बात को प्रमुख
रूप से संविधान में भारत के कर्तव्य के रूप में लिखा ,प्रश्न हर भारतीय के जेहन में
घूमता रहता है कि इतने सालों बाद भी सबको जीने का अधिकार ( जिसमे रोटी ,कपडा
मकान,शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोजगार शामिल है) क्यों नहीं मिला ,क्यों करोड़ों लोग
32/-प्रतिदिन भी नहीं कमा पा रहा है ?

    एक भारत में दो भारत कैसे बन गए ,एक ओर ५%लोगों के हाथ में सम्पन्नता है
१०%लोग  मध्यम जीवन जी रहे हैं और बाकी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं
कमी कहाँ है ?संविधान में या सरकार की  इच्छा शक्ति में या नेताओं की सत्ता लोलुप
प्रवृति में ? आप खुद चिंतन करें और अपनी सरकार चुने जो हँगामा खड़ा नहीं करे बल्कि
काम करें।     

       बात संविधान की करेंगे- संविधान ने कुछ समय के लिए जातियता के आधार पर
जीवन स्तर को सुधारने का मत रखा जो उस समय जरुरी था और उस व्यवस्था को
सुधारने का समय भी तय किया लेकिन हम आज तक उन भारतीयों के जीवन स्तर को
सुधार नहीं पाये,क्यों ?क्या देश की आज तक की सरकारें इसके लिए जबाबदार नहीं हैं ?
क्या सत्ता लोलुप लोगों की ईमानदार कोशिश वंचित वर्ग के प्रति आज तक झलक पायी
है ?

     हम आज तक गरीबी नहीं हटा पाये,प्राथमिक सुविधाएँ नहीं दे पाये ,शिक्षा का गुणवत्ता
युक्त ढांचा नहीं बना पाये ,करोडो हाथों को काम नहीं दे पाये ,क्यों ?क्या हमने पैसा खर्च
करने में कंजूसी की ? फिर  …। क्या पैसे को सही जगह खर्च नहीं किया या फिर अधिकांश
धन भ्रष्ट नेताओं ,अफसरों या नौकरशाही ने लूट लिया ?क्या कारण रहा है कि जनता खुद
जनता के हित से परहेज कर स्वार्थ साधने के खातिर अनाचार और भ्रष्ट मार्ग पर बढ़ रही
है। हमारे देश में नेता कोई आकाश से नहीं टपकते,हम लोग ही चुनते हैं सवाल यह है कि
क्या हम खुद ही भ्रष्ट होते जा रहे हैं ओर भ्रष्ट आचरण स्वीकार्य हो चूका है।

     आज भ्रष्टाचार को मथने के लिए हर दल के नेता कसमें खाते हैं ,वादे करते हैं लेकिन
कोई यह नहीं बताता कि इस बिमारी का माकुल ईलाज यह होगा। हम भारतीय आज भी
प्राथमिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाले दल को सत्ता सौंपने को मजबुर हैं !! क्या यही
गणतंत्र की अवधारणा थी ?क्या हम अपने पर अपना शासन देश को दे पाये हैं ?बहुत से
नेता अपने -अपने स्वराज,सुशासन और विकास के दावे करते हैं ,भारत निर्माण की
बातें करते हैं मगर फिर भी हम वहीँ के वहीँ रह जाते हैं,क्यों ?क्या नेताओं के वादे सिर्फ
दिखावा या आडम्बर है या हम खुद अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है ?

  " हम जागरूक बन जाए ,हम भारतीय बन जाए,हम कर्तव्य पारायण बन जाए ,हम
राष्ट्रप्रेमी बन जाए" यह बात हम सबके आचरण में आनी चाहिए। हम जातिगत विकास
की केंचुली को जब तक उतार कर नहीं फेकेंगे तब तक हम सरपट दौड़ नहीं पायेंगे। हमें
विकास का नक्शा जाति ,पंथ और धर्म को हटाकर फिर से बनाना होगा जिसमे अति
निर्धन भारतीय ,निर्धन भारतीय ,मध्यम भारतीय ,उच्च मध्यम और सम्पन्न भारतीय
का वर्ग हो और उसी वर्ग के अनुसार काम की योजना तय हो।

                     जय गणतंत्र -जय भारत           

शनिवार, 25 जनवरी 2014

गणतंत्र और न्याय के दोहरे मापदंड

गणतंत्र और न्याय के दोहरे मापदंड

गणतंत्र का मजबूत स्तम्भ है न्याय तंत्र ,हम भारत के नागरिक इसका सम्मान
करते हैं। हमारा भरोसा इस स्तम्भ पर टिका हुआ है ,मगर प्रश्न यह है कि क्या
सर्व साधारण को सहज उपलब्ध है ?क्या कारण है कि न्याय भी खास और आम
लोगों में फर्क कर देता है ?क्यों दोहरे मापदंड देखने को मिलते है ?

         क्यों पद पर बैठा जनसेवक संविधान को चुनौती दे देता है और न्याय उसके
सामने घुटने टेक देता है ?आम भारतीय जब कुछ भूल कर बैठता है तो न्याय का
यह चक्र सुदर्शन कि तरह उस पर मंडराने लगता है और उसे यथोचित दंड देकर
ही रुकता है और खास भारतीय जब जानबूझ कर उसको ढेंगा दिखाता है तो यह
चक्र घूमना बंद कर देता है या दिखावे के लिए उसके इर्द-गिर्द मंडराता रहता है
मगर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता।

           जब आम भारतीय कर्ज समय पर नहीं चूका पाया तो कानून बड़ी जल्दी
से उसके गिरेबान को झकड़ लेता है और बड़े लोग मोटी धन राशि डकार जाते हैं
तब न्याय पकड़ छोड़ देता है।

         न्याय की  किसी छोटी सी धारा का उल्लंघन आम आदमी को तुरंत हवालात
में भेज देता है मगर जनसेवक धारा पर धारा तोड़ता है तब न्याय पंगु बन जाता है।

      न्याय जब आम नारी के साथ हादसा होता है तो उससे अभद्र सवाल पूछ उसे
लज्जित कर देता है पर जनसेवक की लड़की के हादसे पर देशद्रोहियों को भी
छोड़ देता है।

     न्याय जब गरीब के साथ होता है तो उसे सालों तक तारीख पर तारीख देता
है और जब रसूखदार के साथ होता है तो पवन वेग से दौड़ता है।

      क्या कारण है कि न्याय छोटे व्यापारी की भूल को उसका अपराध मानता है
और बड़े आदमी के घोटालों पर सफेद चददर लगा देता है।

     न्याय व्यवस्था के दोहरे मापदण्ड क्या हमारे गणतन्त्र को मजबूत कर पाये
हैं ? आम आदमी के लिए कानून हाथ में लेना जुर्म है मगर देश के मंत्री या मुख्य
मंत्री उस कानून की छड़े चौक अवहेलना करता है तो भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता।

    ऐसी कौनसी बिमारी लग गई है न्याय तंत्र को कि कभी तो उसे दूर का तिनका
भी नजर आने लगता है और कभी आँख में पड़ा तिनका भी सुख की अनुभूति
कराता है ?
   

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

फूलों का गणतन्त्र

फूलों का गणतन्त्र 

एक विशाल बगीचे में विभिन्न तरह के फूलों के पौधे लगे थे ,सब में अलग-अलग
सौरभ और सब खिले-खिले से। एक दिन बगीचे में एक बड़े फूल ने सब पौधोँ से
कहा- हम अलग-अलग किस्म और जाति के फूल हैं और हमारी खुशबु भी भिन्न -
भिन्न है इस गुण के कारण हमारे में विभिन्नता में एकता के दर्शन नहीं होते हैं ,
क्यों नहीं हम सब सुगंध निरपेक्ष हो जाए ताकि हमारे में सभी को एकता नजर
आये। कुछ पौधों को समझा कर ,कुछ को धौंस दिखाकर ,कुछ को समाज द्रोह
का डर दिखा कर सुगंध निरपेक्ष बना दिया गया। अब उस बगीचे से मीठी सुगंध
गायब हो गयी। भँवरे ,मधुमक्खियाँ ,तितलियाँ ,पक्षी सब अगले दिन हतप्रभ
रह गये। उन सबने फूलों से पूछा -अरे!तुम लोग सुगंध विहीन क्यों हो गए हो ?

बड़े फूल ने कहा -इस बगीचे में हम विभिन्न प्रजाति के पुष्प साथ -साथ रहते हैं
हमारे रंग और सुगंध भी अलग-अलग है ,अलग-अलग सुगंध के कारण हम
एकता के सूत्र में नहीं बंध पा रहे थे इसलिए हमने सुगंध निरपेक्ष हो जाने का
निर्णय लिया है।

  उस बड़े फूल का निर्णय सुन तितलियों ने उस बगीचे में मंडराना छोड़ दिया ,
भँवरे बगीचे से दूर हो गए ,मधुमक्खियों ने दूसरी जगह छत्ता बनाना शुरू
कर दिया ,कुछ दिनों में बगीचा वीरान हो गया। यह सब बदलाव देख मोगरे
के छोटे फूल ने बड़े फूल से पूछा -ज्येष्ठ श्री ,क्या इसी का नाम निरपेक्षता है ?
क्या यह हमारी एकता की सही और सच्ची पहचान है ?इस निरपेक्षता से हमें
क्या मिला ?हमने अपना गुण खोया और साथी तितलियों ,भंवरों, मधुमक्खियों 
को खोया ?हम को देख कर प्रसन्न होने वाले मानव की प्रसन्नता को खोया ?

बड़े फूल ने कहा -एकता के दर्शन के लिए कुछ तो क़ीमत चुकानी होती है  …

मोगरे ने कहा -ज्येष्ठ ,मुझे आपकी निरपेक्षता जँच नहीं रही है ,मैं तो अपने
सुगन्धित स्वरुप से खुश हूँ और उस स्वरुप में जाना चाहता हूँ।

मोगरे की बात का बड़े फूल ने विरोध किया मगर मोगरा नहीं माना और पुरानी
तरह से फिर खुशबु बिखरने लग गया.मोगरे कि मिठ्ठी खुशबु देख भँवरे उस
के आस पास गीत गाने लगे,तितलियाँ फुदकने लगी ,मधुमक्खियाँ पराग
चूसने लगी। बाकी फूल एक दो दिन ये सब देखते रहे और फिर साथी भँवरों से
पूछने लगे -तुम सब मोगरे को गीत सुनाते हो ,हमारे पास क्यों नहीं फटकते ?

भँवरे ने उत्तर दिया -आप झूठी एकता का प्रदर्शन करने लगे हैं ,जब आप
साथ रहकर खुशबु बिखरते थे तब हम लोग आपसे प्रेरणा लेते थे कि आप
अलग-अलग किस्म के होते हुए भी सब मिलकर के वायु मंडल को सुगंधित
कर देते हैं ,आपके सामीप्य से निकल कर पवन देव भी अपनी निरपेक्षता
छोड़ देते हैं और आपके गुणों को दूर तक अपने साथ फैलाते रहते हैं।
महत्व निरपेक्षता का नहीं अपने गुणों की सुगंध को फैलाने का है।

उसकी बात सुन कर सभी पौधे पूर्ववत महकने लगे।
         

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

सर्व धर्म सद्भाव चाहिये या तथाकथित धर्म निरपेक्षता

 सर्व धर्म सद्भाव चाहिये या तथाकथित धर्मनिरपेक्षता 

"मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर करना" यह बात यदि सही है तो फिर धर्म में 
विश्वास नहीं रखने वाली सोच की देश को जरुरत क्यों है ?
मजहब कोई सा भी हो ,प्रेम की भाषा रखता है अगर यह बात सही है तो साम्प्रदायिकता 
कौन सीखा रहा है ?
धर्म सदाचार सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता   .... 
धर्म परोपकार सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता   .... 
धर्म नीति सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता    …
धर्म शुचिता सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता   … 
धर्म दया ,करुणा और मैत्री सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता  .... 
धर्म सत्य सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता   … 
धर्म समदृष्टि देता है और धर्मनिरपेक्षता   … 
धर्म न्याय सिखाता है और धर्मनिरपेक्षता   … 
धर्म सबके मंगल का भाव भरता है और धर्मनिरपेक्षता  … 
धर्म कल्याण का दीप जलाता है और धर्मनिरपेक्षता   … 
धर्म विकास का पथ है और धर्मनिरपेक्षता  … 
धर्म जो भी हो ,उसके सत्य स्वरुप की जय हो ,जय हो 
   

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

गणतन्त्र और बिका हुआ समाचार

गणतन्त्र और बिका हुआ समाचार 

गणतन्त्र का एक सशक्त आधार स्तम्भ है समाचार पत्र ,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इंटनेट
कि सामाजिक साईट।

आम आदमी जब समाचार पत्र खरीदता है तो वह यह सोच कर नहीं खरीदता है की इस पत्र
का मालिक कौन है ,किस दल के प्रति लगाव या द्वेष रखता है। आम आदमी को देश का
दैनिक सही चित्र चाहिए इसलिए वह समाचार पत्र खरीदता है ,टी वी पर खबरे देखता सुनता
है मगर बहुत अफसोस !! हम आँखों से जो चित्र देखते हैं और कानों से सुनते हैं वह भी यथार्थ
से कोसों दूर होते हैं और हम भ्रम में पड़ जाते हैं क्योंकि कोई चैनल उस खबर के पक्ष में
दलील कर रहा होता है और कोई विपक्ष में। कोई सत्य को गलत ठहराता है तो कोई झूठ को
सही ,ऐसा क्यों हो रहा है? पैसा कमाने का धन्धा नहीं होते हैं समाचार मीडिया। समाचार पत्र
और मीडिया खोट का धंधा होता है और उस खोट की पूर्ति जनता से दान लेकर पूरी की जा
सकती है ,मगर आज हमारे घर में झूठी खबरें दबे कदम से घुसती जा रही है ,मीडिया बार-
बार झूठी खबरों को ,सामान्य अव्यवस्था को इस तरह चटकारे लेकर पेश करता है जैसे
वह खबर ही देश कि मूल समस्या है। बच्चा खड्डे में गिर गया उसका जीवंत प्रसारण,किसी
नेता ने कुछ कहा तो चार पंडितों को बुलाकर उसकी सुविधापरक व्याख्या करवाना। एक
ही बात को साम ,दाम ,दण्ड और भेद से बार-बार तौलते रहना जब तक नयी सनसनी खबर
हाथ में नहीं आ जाती।

         मीडिया लम्पट साधू के कारनामे कई दिनों तक दिखाता रहा,क्या उससे आम भारतीय
के बौद्धिक ज्ञान का विकास हुआ ? फिर क्यों खुद के कमाने के चक्कर में देश के लोगों का
वर्किंग समय ख़राब किया। हमारा मीडिया नकारात्मक खबरों को हाथों हाथ ब्रेकिंग न्यूज के
नाम से गरमागरम परोसता है ,उन ख़बरों को दिखाने से पहले यह नहीं सोचता है कि क्या
इनको दिखाने से देश का भला होगा।

  बहुत से समाचार पत्र मुख्य पेज पर कम महत्व वाली मगर चटाके दार खबर छाप देते हैं।
नेताओं के सकारात्मक कथन की व्याख्या मनगढ़ंत तरीके से लिख देते हैं। कुछ दिन पहले
देश के एक नेता ने कुत्ते के बच्चे का उदाहरण दे दिया और मीडिया ने उसका बेज़ा मनगढ़ंत
भावार्थ निकाला कि देश के एक वर्ग को लगा जैसे उसे कुत्ता कहा हो ,क्यों बचकानी हरकतें
करता है मीडिया ,क्यों वास्तविक भाव नहीं खोजता है? क्यों जल्दबाजी में है ?

      क्या मीडिया अपरिपक्व है या हर खबर में खुद का लाभ देखता है? इस देश में हिन्दू -
मुस्लिम सोहार्द के किस्से हर दिन बनते हैं मगर वो खबरों में जगह नहीं पाते मगर छोटा
सा दँगा मुख्य खबर बन जाता है। फर्जी खबरे और गुणगान ,सामान्य गुण को बड़ा और
बड़े फैसले को छोटा हमारा मीडिया बता देता है। किसी के छींक देने से देश को फायदे बता
देता है और किसी के पसीने बहाने को वायु प्रदूषण का नाम दे देता है।

   मीडिया अपने कर्तव्य को समझे ,पत्रकार राष्ट्र धर्म का निर्वहन करें। सही और जनहित
की  खबरों का प्रसारण निर्भीक रूप से करें। सकारात्मक खबरों को ज्यादा समय दें तभी
देश को ताकत मिलेंगी।            

सोमवार, 20 जनवरी 2014

गणतन्त्र में अल्प संख्यक की परिभाषा ?

 गणतन्त्र में अल्प संख्यक की परिभाषा ?

यह गणतंत्र का महीना है और इतने गणतन्त्र देख चूका भारतीय आज दिशा विहीन क्यों हो
गया है ?क्या गणतंत्र में कमियाँ रह गयी थी उन्हें जानबूझ कर सुधारा नहीं गया या जान
बुझ कर उनका मनमाफिक उपयोग करने के लिए राजनेताओं ने बने रहने दिया ? या फिर
गण पर तन्त्र बैठा दिया गया।

गणतन्त्र जब हर भारतीय के लिए है तो जाति ,पंथ और धर्म के नाम पर हक़ में अंतर क्यों ?

         भारतीय संस्कृति में शुद्र कोई जन्म पर आधारित व्यवस्था नहीं थी यह तो कर्म पर
आधारित व्यवस्था थी लेकिन हमने जन्म आधारित जाति व्यवस्था को आधार बना
लिया,क्यों ?

जाति आधारित हक़ बढाकर क्या हमने भारतीयता को मजबूत किया है ?अगर हम इतने
सालों में उन भारतीयों को अविकसित श्रेणी से नहीं निकाल पाये हैं तो उसके क्या कारण
रहे हैं ?क्या हमारा आरक्षण भाई -भाई में प्रेम को बढ़ा रहा है ?क्या हम जाने -अनजाने
अपनी विपुल सामाजिक व्यवस्था के दर्द का ईलाज कर रहे हैं या दर्द को बढ़ा रहे हैं ?जिस
व्यवस्था को हमारे ऋषियों ने शुद्र की श्रेणी में रखा और उसे पैर स्तम्भ कहा उसका गलत
भाव ,उसकी गलत व्याख्या हम लोगों ने की है। जिस संस्कृति का पैर ही कमजोर हो उसे
लकवा मार जाता है ,वह संस्कृति विकलांग होती है। हमारे ऋषियों ने मजबूत सेवा क्षेत्र
को समाज का पाँव कहा क्योंकि उस क्षेत्र पर समाज का विकास टिका था ,मगर काल वश
हमने उस व्यवस्था को जन्म से जोड़ दिया और अपना संविधान पाने के बाद भी उसे जन्म
से जोड़े रखा ,क्या यह हमारी भूल नहीं है? फिर सब कुछ समझ कर भी हम जन्म से जीव
को शुद्र क्यों मान रहे हैं ?क्या हमें मजबूत भारत के लिए जन्म या जाति से जुड़ा रहने में
लाभ है या फिर हमें आर्थिक आधार पर भारतीयों की वर्ग व्यवस्था बनानी होगी और उसी
 नये मानदण्ड के तहत विकास की ओर बढ़ना होगा ?

जब यह देश भारत है और उसका नागरिक भारतीय कहलाता है तो किसी को बहुसंख्यक
और किसी को अल्प संख्यक क्यों माना जा रहा है ?क्या परिभाषा है अल्प संख्यक की ?
अगर हम भारतीय हैं तो सभी भारतीय हैं ,क्या भारतीयता धर्म या जाति जन्म के आधार
पर तय होगी ?क्या हम किसी को अल्प संख्यक कह कर उसमे खोटा भय बहुसंख्यक का
नहीं दिखा रहे हैं ?भारतीयों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक कह कर उन्हें आपस में लड़ा
तो नहीं रहे हैं ,उनमे वैमनस्य तो नहीं बढ़ा रहे हैं ?क्या भारतीयों के धर्म और आस्था के
विभिन्न प्रतीकों को मानने के आधार पर राष्ट्र निर्माण की योजना सफल रही है या रहेगी ?

    हम यदि गणतन्त्र इस देश में लाना चाहते हैं तो हमे नए मार्ग बनाने होंगे ,हमे बदलनी
होगी जन्म आधारित व्यवस्था ,हमें बदलनी होगी धर्म आधारित व्यवस्था। हमें सब में 
भारतीयता की स्थापना करनी होगी। हमारी पहचान भारतीयता बने ना कि हिन्दू ,मुस्लिम ,
सिक्ख,ईसाई ,जैन या अन्य। हमें सत्ता प्राप्ति के लिए या उस सत्ता से चिपके रहने के
लिए भारतीयों को आपस में लड़ाना बंद करना होगा।  हमें धर्म आधारित तुष्टिकरण की
राजनीति को दूर करना होगा ,अब भारतीयों को समता की राजनीति करनी होगी ,सद्भाव
कि राजनीति करनी होगी। हम आम भारतीयों को निश्चय करना पडेगा कि जो नेता एक
भारतीय से अधिकार छीन कर दूसरे को देता है उस सोच से बच कर रहना होगा ?जो सोच
हमारी आस्था को सत्ता पाने के लिये साधना चाहती है उस सोच के पँख काटने होंगे।

हे भारतीयों,तुम न तो अल्पसंख्यक हो और न ही बहुसंख्यक ;तुम सब भारत माता की
संतान हो। वर्ग भेद,जाति भेद,धर्म भेद से ऊपर उठ कर मिलझुल कर आगे बढ़ो।           

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

गणतंत्र ने क्या दिया ?

गणतंत्र ने क्या दिया ?

    गणतंत्र के भी साइड इफेक्ट हैं ,यह कोई निर्दोष जीवन प्रणाली नहीं है लेकिन  परहेज
का पालन करते हुये उपयोग में लायी जाने पर सुखद परिणाम देने वाली पद्धति जरुर है।

    गणतंत्र का एक बड़ा दोष यह है कि यह तंत्र बुद्धिबल से नहीं संख्या बल से चलता है।
इसमें हक़ मत देने के अधिकार का उपयोग करने करने पर मिलता है केवल सुन्दर,
शाब्दिक बहस भर से नहीं। लोकतंत्र में यदि संख्या बल नहीं होता है तो सेवाभावी व्यक्ति
कुछ नही कर पाते जो व्यक्ति या समुह येन केन प्रकारेण संख्या बल जुटा लेता है उसके
खोटे और तुष्टिकरण के विचार भी मान्य सिद्धांत बन जाते हैं ,कानून बन जाते हैं जिसका
49 लोगों को निर्वहन करना पड़ता है जो उससे भिन्न मत रखते हैं।

    गणतंत्र समता के सिद्धांत पर चलता है ,गणतंत्र समान न्याय व्यवस्था के सिद्धांत पर
चलता है ,गणतंत्र सर्व धर्म समभाव के आधार पर चलता है ,गणतंत्र सम्यक दृष्टि से
चलता है ,क्या हमने ऐसा कभी महसूस किया है ?

   हमने गणतंत्र को धर्म विभेद के साये में पलते देखा है,हमने गणतंत्र को जाति गत गणना
के आधार खिसकते देखा है,हमने गणतंत्र को स्वार्थ सिद्ध करने की पगडण्डी के रूप में देखा
है ,हमने गणतंत्र में निर्बल को अधिकार विहीन बेसाखी पर झूलता पाया है,हमने गणतंत्र में
राज कोष के धन का खुल्ला दुरूपयोग देखा है,हमने गणतन्त्र के नाम पर झूठी कसमें खाते
जनसेवकों को देखा है ,हमने गणतंत्र में ध्रुव विरोधी दलों को हाथ मिलाते और गले मिलते
देखा है ,हमने गणतंत्र में अवाम को पग पग पर ठगा हुआ पाया है।

           आज बहुसंख्यक समाज खुद को निरीह अवस्था में पाता है तो अल्प संख्यक समाज
खुद को ठगा हुआ पाता है। यही सच है  ................... इस परिस्थिति का जबाबदार कौन ?
निसन्देह ,जिसने भी शासन किया वो लोग।        

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

प्रयोग-तंत्र

प्रयोग-तंत्र 

सड़क पर ट्रक ड्राईवर गाडी चला रहा था ,नशे में धुत होने के कारण गाडी के स्टेयरिंग से
काबू खो दिया और ट्रक ने कुछ को कुचल दिया जिसमे एक -दो मर गए और सात -आठ
घायल हो गये। हादसा होते ही भीड़ इकट्टी हो गई। लोग काफी गुस्से में थे उनमें से एक
बोला -गाडी सड़क पर चलने से दुर्घटना होती है ,इसलिए ट्रको को सड़क पर नहीं उतारना
चाहिये।
दूसरा बोला -इन ड्राइवरों को गाडी चलाना ही नहीं आता।
तीसरा बोला -हमें ट्रको में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा ,हम ऐसी ट्रक का निर्माण
कर सकते हैं जिसे नौसिखिया भी बढ़िया तरीके से चलाये और दुर्घटना होने के पहले
ट्रक में लगे सेंसर हमें बता देंगे कि सावधान हो जाए।
भीड़ ने कहा -क्या ऐसा हो सकता है ?
उस व्यक्ति ने आत्मविश्वास से जबाब दिया -हाँ ,यह कोई बड़ी बात नहीं है। मैं और
मेरे दोस्त ऐसा कर सकते हैं।
भीड़ उत्साह और कोतुहल से भर गई और उन्होंने उससे पूछा -बोल ,तुझे क्या चाहिए ?
वह व्यक्ति बोला -इस ड्राईवर को हटा दीजिये।
भीड़ ने पूछा -क्या दूसरा ड्राइवर लाये जो नशा नहीं करता हो ?
वह व्यक्ति बोला -नहीं ,दूसरे अनुभवी और योग्य ड्राइवर की जरूरत नहीं है ,बस आप
न तो दूसरा लाने कि बात करे न इसको रखने की।
भीड़ में से एक ने पूछा -फिर इस सड़क के बीच खड़ी ट्रक को कौन चलायेगा ?
वह व्यक्ति बोला -आपको किसने कहा ट्रक चलाने के लिए निपुणता कि आवश्यकता
होती है। आप सब हमारे पर विश्वास कीजिये ,हम कसम खाते हैं कि इस ट्रक में
आमूलचूल परिवर्तन कर देंगे ये स्वत: चलेगी।
भीड़ का कौतुहल बढ़ता गया ,कुछ उतावले लोगों ने उसके मत को योग्य बता दिया।
देखने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। सबने एक दूसरे को बताया कि यह व्यक्ति
कुछ नया करने को कह रहा है। जिसने भी नयी बात को सुना उसका कायल हो गया।
भीड़ ने तय किया कि हम इस व्यक्ति को अवसर देंगे ,भीड़ में से एक आवाज उठी -
अरे,इससे पूछ तो लो कि इसने कभी वाहन चालन किया है ?

उस व्यक्ति ने कहा -वाहन चालन सीखना निकम्मी बात है जी ,हम बिना सीखें भी
बढ़िया ट्रक बनायेंगे और चला के दिखायेंगे।
लोगों ने नशे में डूबे चालक को पीट कर निचे उतारा, योग्य ड्राइवर को किनारे किया
और उस व्यक्ति को बैठाया।

वह व्यक्ति चालक सीट पर जा बैठा और गाडी का इन्जन चेक किया और बोला -
आज यह गाडी सड़क पर पड़ी रहेगी इसके इन्जन को कल खोल के देखना है।

दूसरे दिन भी गाडी सड़क पर पड़ी थी वह ड्राइवर बोला इसके ईंधन को बदलना होगा।

तीसरे दिन भी गाडी सड़क पर पड़ी रही वह व्यक्ति बोला -गाडी चलाने से पहले सड़क
की फाईल की जाँच आवश्यक है।

चौथे दिन वह व्यक्ति बड़ी भीड़ इकट्टी करके ड्राईवर की सीट पर बैठा ,इंजन स्टार्ट किया
ट्रक को गति दी ,कुछ ही फीट चल कर ट्रक डिवाइडर से टकरा गयी। वह व्यक्ति सीट
से उतर कर ट्रक की छत पर चढ़ गया और बोला -माफ करना ,मैं अभी ट्रक में पुरे
परिवर्तन नहीं कर पाया ,मुझे समय दीजिये ,मैं और नए तरीके आजमाता हूँ।

यह कह कर वह व्यक्ति चला गया और सड़क जो पहले से संकड़ी थी उस ट्रक में नए
बदलाव के कारण और जाम हो गयी।     

विकसित होते गुजरात के पंख हैं "हम "

विकसित होते गुजरात के पंख हैं "हम "

भारत के टुच्चे राजनीतिज्ञ वर्तमान और भविष्य को नहीं देख पा रहे हैं उन्हें केवल
दिखाई देता है सालों पहले हुआ गुजरात का दँगा ,अतीत के उस पन्ने को बार -बार
खोल कर वो देश के सामने रखते रहते हैं जैसे वह दँगा अभी तक चल रहा हो!!

          क्या गुजरात झूठे मिडिया ,उल्लू  गुणों वाले राजनीतिज्ञों,स्वार्थी NGO से
निराश हुआ ?नहीं। गुजरात पर दैविक और लोक सृजित आपदायें आयी और
हर बार गुजरात स्वयं के बल से बाहर निकला ,कैसे ?सब लोग पूछते हैं यह हुआ
कैसे ?इसके पीछे परिपक्व नेतृत्व कि मेहनत है।

    गुजरात के टूटे हुये दिलों में एक नयी आशा का संचार हुआ जब यहाँ के नेतृत्व 
ने एक महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने बड़ी कुशलता से हिंदुओं से "ह "लिया और 
मुस्लिमों से "म "और फिर इन दोनों को नेक नियत से जोड़ कर "हम "बना दिया।

यह बात बहुत से बुद्धिजीवियों के गले नहीं उतरी होगी क्योंकि उन्होंने इस प्रयोग
को देखा नहीं था और आज तक समझा भी नहीं है। वो तो बस एक रट लगा के बैठे
हैं कि यहाँ का विकास बड़बोलापन है। वो लोग झूठ बोल कर खुद भी सच को समझ
नहीं पा रहे हैं और देश के अवाम को भी गुमराह कर रहे हैं। गुजरात में बारह साल
से कोई दँगा क्यों नही हुआ ,टुच्चे नेता गुजरात में आपाधापी देखना चाहते हैं पर
"हम "के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। गुजरात के नेतृत्व ने बड़े धीरज
से विकास के आकाश में "ह "और "म "के दोनों पंखों से मुक्त आकाश में उड़ान
भरी और देखते ही देखते गुजरात विकास की बुलंदियों को छूने लगा।

     आज जब देश के अधिकाँश नेता तुष्टिकरण की खोटी कुनीति से बाहर कुछ
नहीं देख पा रहे हैं वहीं गुजरात ने समता कि नीति में विश्वास कर सबको प्रगति
का समान अवसर प्रदान किया ,समता की नीति से दोनों समुदायों का द्वेष खत्म
हुआ और हर गुजराती पुरे दम ख़म के साथ विकास के पथ पर ,कुछ अच्छा कर
गुजरने के लिये दौड़ने लगा और परिणाम यह आया कि गुजरात विश्व के नक़्शे
पर छा गया।

एक के मुँह से छीनकर दूसरे के मुँह में ग्रास डालने कि कुनीति जैसे ही खत्म हुयी
वैसे ही अलग-अलग मजहब ,अलग-अलग प्रान्त के लोगों ने एक दूसरे के हाथ
मजबूती से थाम लिये और चल पड़े विकास की  राह पर।

    आज वोट बैंक की राजनीती के युग में , जातिवाद और धर्मवाद की राजनीति
के युग में, पक्षपात और तुष्टिकरण के युग में  "हम " की संस्कृति दुर्लभ है।

  आज "हम" ने गुजरात को स्थिर सरकार दी और बदले में नेतृत्व ने विकास के
नए रास्ते बनाएँ। आज हम गुजराती आगे बढ़ रहे हैं ,दंगे फसाद ,लड़ाई -झगड़े
सब भूल गए क्योंकि अब हमारे हाथों में काम है हम निकम्मे नहीं रहे। हमारा
काम "हम "अकेले अकेले पूरा नहीं कर सकते इसलिये पुरुषार्थ ने हमें मिलजुल
कर रहने को बाध्य कर दिया।
            

सोमवार, 13 जनवरी 2014

अपना हिंदुत्व ,विश्व बंधुत्व (स्वामी विवेकानंद के चरित्र से )

अपना हिंदुत्व ,विश्व बंधुत्व  (स्वामी विवेकानंद के चरित्र से )

स्वामी विवेक नन्द जी को प्रणाम। 

हमारे देश को आज किसकी ज्यादा जरूरत है। क्या राष्ट्र भक्ति के नाम पर पग-पग
पर हिंदुत्व को कटटरवाद से जोड़ने वाले नेताओं की जरूरत है ?

क्या तुष्टिकरण को सर्वोच्च मानने वाले हल्के नेताओं की देश को जरुरत है ?

हिन्दूधर्म के टुकड़े जाति के नाम पर ,छूत-अछूत के नाम पर,आरक्षण के नाम पर
करने वाले नेताओं का कोई औचित्य है ?

 अगर ऐसे नेताओं की देश को जरूरत नहीं है तो उनके विचारों का अस्तित्व क्यों है ?

-इसका कारण हिंदुत्व में भेद डालने की नीति,लोकतंत्र की सँख्या बल की आधारशिला,
और स्वार्थ सीधा करने की संकुचित मानसिकता है।

हर दिन देश की बहस सम्प्रदायवाद के जहर से शुरू होती है ,हिंदुओं को साम्प्रदायिक
ठहराकर अन्य धर्म के अनुयायियों में हिंदुओं के प्रति नफरत और भय का भाव दिखाया
जाता है ,क्यों ?क्या इस कुकृत्य से देश का हित हो जायेगा ?कटटरता के भाव धर्म में नहीं
होते हैं,मनुष्य के मन में होते हैं।जिनका भाव खोटा उनका आचरण खोटा।
           
 स्वामी विवेक नन्द के जीवन से जुड़ी एक घटना -एक दिन खेतड़ी राज्य के सेक्रेटरी श्री 
जय मोहनलाल उनके दर्शन करने आए। उस समय स्वामीजी एक खाट पर कोपीन 
पहने लेटे थे। सेक्रेटरी ने उनसे पूछा -"महाराज ,क्या आप हिन्दू हैं ?
स्वामीजी बोले-"हाँ ,मैं हिन्दू ही हूँ "  
सेक्रेटरी ने पूछा-"फिर आप मुसलमान के यहाँ क्यों खा लेते हैं "?
स्वामीजी ने कहा -"इसीलिए कि मैं हिन्दू हूँ "
सेक्रेटरी ने कहा -"पर हिन्दू तो मुसलमान के हाथ का नहीं खाते "?
स्वामीजी ने कहा -"वे अज्ञानी हिन्दू हैं ?"
सेक्रेटरी ने कहा-"अज्ञानी हिन्दू कैसे ?"
स्वामीजी ने कहा -"क्योंकि उन्हें वेदों का ज्ञान नहीं है। वेदों में कहीं इस तरह का प्रसंग 
नहीं है कि किसके हाथ का छुआ खाना खाया जाए और किसके हाथ का नहीं "
यह है हिंदुत्व जो सबमें सम भाव रखता है ,सम देखता है। 

हमारे वेद मनुष्य-मनुष्य में अन्तर नहीं करते और ना ही हमारे शास्त्र जन्म से किसी
जाति को मानते हैं। हमारे शास्त्र कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था का बखान करते हैं और
एक सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने का निर्देश देते हैं। हमारे शास्त्र ने पूरी
सामाजिक व्यवस्था को मनुष्य के शरीर के चित्र के माध्यम से समझाया -मनुष्य के
शरीर के अग्र भाग मस्तिष्क को ब्राह्मण ,वक्ष स्थल को क्षत्रिय ,उदर स्थल को वैश्य तथा
पैरो को शुद्र कहा है ,जो मनुष्य ज्ञान देकर अर्जन करेगा विवेक का उपयोग करेगा वह
ब्राह्मण,जिसके ह्रदय में साहस और संवेदना होगी वह क्षत्रिय ,जो वाणिज्य कर्म करके
पशुपालन करके अर्जन करेगा वह वैश्य और जो सेवा के क्षेत्र से उदर पूर्ति करेगा वह शुद्र।
अब यहाँ जन्म से जाति का सवाल कहाँ से आया ?जो संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् में
विश्वास करती है ,सर्वे भवन्तु सुखिन की  भावना से सुबह की शुरुआत करती है और
विश्व बन्धुत्व का अनुकरण करती है वह कैसे कटटरवाद को जन्म दे सकती है ?

"अपना हिंदुत्व ,विश्व बंधुत्व" का दीया जलाने का समय आ गया है, आनेवाला समय
भारत के भाग्य को तय करेगा। यह अब हम भारतीयों के हाथ में है कि हम इस देश
को किस दिशा में ले जाना चाहेंगे। क्या झूठा जातिवाद, मजहब वाद पसंद करेंगे और
आपस में एक दूसरे से पद लोलुप नेताओं के कहने से झगड़ते रहेंगे या अपना हिंदुत्व,
विश्व बन्धुत्व का मैत्री भाव रख अंधकार से प्रकाश की ओर आगे बढ़ेंगे ?     

शनिवार, 11 जनवरी 2014

हिन्दुत्व की टहनी है धर्मनिरपेक्षता

हिन्दुत्व की टहनी है धर्मनिरपेक्षता 

हिंदुत्व के दर्शन को पढ़े समझे बिना उसे संकुचित अर्थ देना मूढ़ और अज्ञानी लोगों
का काम है,यह काम यदि पथ भ्रष्ट हिन्दू करता है तब तो बड़ी मायूसी होती है क्योंकि
वे हिंदुत्व में पैदा भले ही हुये हो पर उसमें जी नहीं रहे हैं।
हिन्दू धर्म का संस्थापक कौन ? संस्थापक उसका होता है जो सम्प्रदाय से जुड़ा हो,जिसमें
किसी विशेष मत को मानने वाले अनुयायी हो। हिंदुत्व तो सनातन है ,एक जीवन पद्धति
है जो सृष्टि के साथ विकसित हुई। हिन्दू धर्म के वेद कब और किसने लिखे ? जिन वेदों
की सूक्तियों के भाव को समझने में बड़े विद्धवान भाष्य लिखते रहे हैं और नेति-नेति
कहते रहे हैं। बड़ा आश्चर्य होता है जब अपने को बड़ा समझने वाले किंकर लोगों के मुँह
से हिंदुत्व को साम्प्रदायिक कह कर उसकी भत्सर्ना करते देखते हैं,क्या हो गया उन
अधम हिंदुओं को जो खुद की सभ्यता को सरे आम गाली देकर गर्व महसूस करते हैं ?
क्यों करते हैं वे ऐसा ?सिर्फ राज्य सत्ता को हासिल करने के लिए या तुच्छ स्वार्थ की
पूर्ति के लिए। खेर  … यह बात फिर कभी  ………
हिंदुत्व की जीवन पद्धति के कुछ गुण -

 हिंदुत्व सम दृष्टि में जीता है उसके लिए मनुष्य और कीट सबमे एक ईश्वर तत्व को
देखता है। फिर मनुष्य-मनुष्य में भेद की रेखा किस सम्प्रदाय ने खेंची ?

हिंदुत्व सद्गुणों को धारण करने का नाम है। हमारे ऋषियों ने पूर्वजों ने हर सद गुण
को कहा ही नहीं ,जीया है। सद्गुणों की स्थापना कहने भर से नहीं होती है उसको
आचरण में लाना पड़ता है ,विश्व में जिसने भी मर्यादा की स्थापना में अपने निजी
स्वार्थो की आहुति दी और नैतिकता की स्थापना में हर क्षण तत्पर रहा वही तो राम
कहलाता है ,हिंदुत्व ने यह आदर्श जी कर हर काल में बताया है।

हिन्दुत्व ने विश्व कल्याण से आगे समस्त ब्रह्माण्ड के सुख की प्रार्थना ईश्वर से की।
सबका भला हो ,सब का कल्याण हो ,सब अँधेरे से उजाले की ओर बढ़े यह संकल्प
हिंदुत्व से निकला ,इस उम्दा भाव में कोई मुर्ख ही संकीर्णता देख सकता है।

हिंदुत्व ने मानव सभ्यता को विकास का मार्ग दिखाया -हमारे वेदों ने मनुष्य को
मिलझुल कर आगे बढ़ने का सूत्र दिया। चरैवेति -चरैवेति। यह शब्द नहीं है विकास
का मूल मन्त्र है।

हिंदुत्व ने सबसे पहले धर्म को विज्ञान से जोड़ा, वेदों से लेकर रामायण तथा गीता में
यही तो लिखा है। जो सिद्धांत जाँचा ,परखा गया हो और सर्वकालिक हो तथा सत्य हो
उसे ही विज्ञान कहा जाता है। हमारे सिद्धांत गीता से निकल कर समस्त विश्व में यूँ
ही फैल गये।

हमारी सँस्कृत भाषा जो सब भाषाओँ की जननी मानी जाती है उसे सीखने के लिए
अमेरिकी लालायित हैं,वे इस भाषा के महत्व को समझ रहे हैं ,कुछ ही शब्दों में गहन
बात कह देना यह संस्कृत की उपादेयता है।

स्वस्थ रहकर सौ बरस जीये ,किसने सिखाया विश्व को ?हिन्दू धर्म के आयुर्वेद ने।
आज योग और प्राणायाम की ओर विश्व भाग रहा है।

सदाचार हमारा दैनिक जीवन जीने का मार्ग है और उस सदाचार से निकली एक
शाखा है धर्म निरपेक्षता।

हमें अपने हिंदुत्व पर गर्व करना सीखना होगा ,महात्मा गाँधी ने कहा था मुझे अपने
धर्म पर गर्व है और उनका प्रिय गान था -वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीर परायी
जाणे रे  …। हिंदुत्व कि ही ताकत है कि वो दूसरों कि पीड़ा को भी समझ सकता है ,
महसूस कर सकता है और संवेदनशील हो सकता है।       
              




शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

मोदी जी से सात वचन

मोदी जी से सात वचन

यह गणतंत्र का महीना है और आजादी के बाद से आम भारतीय अब तक सच्चे गणतंत्र
के लिए तरस रहा है। आज तक जितने भी दल राजनीति करने आये वे सब आम जन से
दूर बैठी पार्टी के चरणों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उस पार्टी को कोसते हुए भी उसकी
लय में खुल कर या चोरी छिपे नाच रहे हैं। इस अँधेरे समय में देशवासियों को प्रकाश की
आशा भरी किरण नरेंद्र मोदी में दिखाई दे रही है। भारत का आम नागरिक हर समय
किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़ा हुआ नहीं रहता है ,यह आम नागरिक दिन भर मेहनत
करता है और शांति के साथ अपने परिवार के साथ जीता है। यह पहला अवसर है जब
मैं देख रहा हूँ कि लोग नरेंद्र मोदी की ओर आशा और विश्वास के प्रतीक के रूप में देख
रहे हैं। भारतीय नागरिक होने के नाते मैं भी उनसे सात वचन चाहता हूँ -

1. वो भगवान विष्णु के काम को पुरे मनोयोग से करते रहे ,भगवान विष्णु का काम
सबका पालन पोषण सुचारु रूप से हो ,बिना पक्षपात के हो ,निरंतर हो।

2. इस देश की सीमाओं की निष्ठा के साथ सुरक्षा हो ,क्योंकि यह सिर्फ जमीन का टुकड़ा
भर नहीं है ,यह देश हमारी माँ है।

3. इस देश की जनता भारी कर से दब चुकी है वो जो कमाती है उसका बड़ा हिस्सा राजा
के द्वारा हथिया लिया जाता है और उस कर के पैसे की बर्बादी होती है ,जनता के कर
के भार को संतुलित करो ताकि वह ख़ुशी-ख़ुशी अपना कर राष्ट्र को समर्पित कर सके
और नैतिक हो कर जी सके।

4. रोजगार उन्मुख शिक्षा की व्यवस्था करें,ये मेकाले की पद्धति युवाओं को मेहनती नहीं
बना पायी है। विज्ञानं और तकनीक शिक्षा का मूलमंत्र हो।

5. न्याय व्यवस्था को कम खर्चीली और त्वरित और पारदर्शीबनाये,ताकि प्रजा के मन में
कानून के प्रति स्वत: श्रद्धा उत्पन्न हो। कानून सब के लिए समान हो। 

6. कृषि का आधुनिकीकरण हो ,देश भर में तहसील स्तर पर कृषि विश्व विद्यालय हो।
कृषि को उद्योग का दर्जा मिले।

7. अपराधी तत्वो को किसी का सरंक्षण ना मिले ,उसे कठोर सजा मिले।           

बुधवार, 8 जनवरी 2014

फैसला ???

फैसला ???

एक पेड़ पर मधुमक्खियों ने अपना छत्ता जमाया और सब मिलझुल कर काम करने
लगी। मधुमक्खियाँ जँगल में उड़ती रहती और पराग इकट्टा करती रहती। सब मिल
कर काम करते रहने से देखते ही देखते उनके छाते में ढेर सारा शहद जमा हो गया।
एक दिन एक बन्दर कहीं से कूदता फाँदता उस पेड़ पर आ गया। बन्दर को वह पेड़
सुरक्षित लगा इसलिए उसने वहीं डेरा जमा दिया।

               एक दिन बन्दर को जोर से भूख लगी तो उसने सोचा मधुमक्खियों ने जो
शहद इकट्टा किया है उससे पेट भर लिया जाये। वह छत्ते के पास गया और अपना
हाथ छत्ते में डाल दिया। अपने छत्ते के शहद पर बंदर का आक्रमण देख बहुत सारी
सैनिक मधुमक्खियों ने बंदर के शरीर पर जगह-जगह डंक मारने शुरू कर दिये।
बन्दर दर्द से बिलबिलाता हुआ वहाँ से भाग गया। बंदर के हाथ न तो शहद लगा और
शरीर भी डंक के विष से दर्द करने लगा।वह मधुमक्खियों को सबक सिखाने के उपाय
पर विचार करने लगा और लोकतंत्र की लकीर पर चलने का फैसला कर राजा शेर के
पास पहुँच गया।

          बंदर ने शेर से कहा -महाराज ,आपके जंगल में लोकतंत्र से शासन चलता है,
मगर लोकतंत्र को अपने हाथ में लेते हुये मधुमक्खियों ने मुझे डंक मार मार कर
घायल कर दिया।

शेर ने पूछा -मधुमक्खियाँ तो मेहनती स्वभाव की होती है और अकारण किसी पर
हमला नहीं करती है फिर तुमको बेवजह डंक क्यों मारा। चलो ,वहाँ चल कर निपटारा
करते हैं।

       पेड़ के पास आकर शेर ने मधुमक्खियों से पूछा- तुम सब ने मिलकर इस
बन्दर को घायल क्यों किया ?

मधुमक्खियों ने कहा -महाराज, इस बन्दर ने हमारा इकट्टा किया हुआ शहद खाना
चाहा और शहद पाने के लिये छत्ते में हाथ डाल दिया ,अगर हम हमला नहीं करती
तो यह सारा शहद खा जाता।

शेर ने कहा -बात तुम्हारी सही है मगर यह जँगल लोकतंत्र के कानून से चलता है,
आपको कोई परेशानी थी तो शिकायत लेकर हमारे पास आती,कानून अपने हाथ
में लेने कि कहाँ जरूरत थी ,बन्दर को सजा देने का कानून को हक़ है मगर तुम
सबने मिलकर बन्दर को सजा दी इसलिये तुम सब अपराधी हो।

शेर का फैसला सुन कर मधुमक्खियाँ तिलमिला गयी और रानी मधुमक्खी ने
आक्रमण करने का निर्णय ले लिया। देखते ही देखते सब मधुमक्खियाँ शेर और
बन्दर पर डंक मारने लगी। मक्खियों के विषैले डंक के दर्द से बंदर और शेर भाग
खड़े हुये।

       कहानी एक सवाल छोड़ जाती है कि क्या ताकतवर बंदर को मनचाहा करने का 
हक़ था ?क्या बंदर को सजा देने का हक़ मधुमक्खियों को था?  राजा शेर के निर्णय
पर मधुमक्खियों की रानी का लिया गया निर्णय योग्य था या अयोग्य ?          

बन्दर और उस्तरा

बन्दर और उस्तरा 

यह कहानी काफी पुरानी है मगर हम भारतीय पुनरावर्तन कर समय -समय पर परख
करते रहते हैं कि हमारी लोक कहानियाँ अनुभवों के आधार पर तैयार की जाती है या
नहीं।

  पुरानी कहानी में नकलची बन्दर ने आदमी को हिजामत करते देखा और उसका उस्तरा
उठा कर खुद भी अपने गाल पर घूमाने लगा और उस्तरे कि तेज धार से खुद लहूलुहान हो
गया। नकल नहीं करने का सन्देश देकर यह कहानी खत्म हो जाती थी मगर  …

देश के विशेष स्थान पर इस कहानी को नए सिरे से लोगों ने दोहराया। दक्षिण से एक
बुलंद आवाज आयी -"मत आजमाना",मगर लोग उस वृद्ध सन्त की बात को टाल गये।
लोगों ने पैसे इकट्टे कर के कुछ उस्तरे ख़रीदे और सब मिलकर उसकी धार तेज करने
लगे। लोग उस्तरों कि धार तेज करते जाते और खुश होते रहते कि अब निकम्मी घास
पतवार को कटवा देना है। तेज धार के उस्तरे देख पारखी लोग भी लेने के लिए आये और
बंदर भी आये। लोगों ने पारखी लोगों और बंदरों दोनों में उस्तरे बाँट दिये। पारखी लोग
लोगों के इस अजीब व्यवहार पर हेरान रह गये।

लोगों ने कौतुहल से पारखी लोगों की ओर देखा तो पाया उन्होंने अपने-अपने उस्तरों को
फोल्ड करके रख लिया है। लोगों ने बंदरों की ओर देखा तो पाया उनके हाथों में उस्तरे
चमचमा रहे थे। मगर इस बार के बंदर और पुरानी कथा के बंदरों में फर्क था। पुरानी
कहानी में बंदर ने अपनी अनुभव हिनता के कारण खुद को घायल किया था और इस
समय के बंदरो ने ना खुद कॊ घायल किया और ना निकम्मी घास पतवार को काटा ,
उन्होंने उस्तरों कि धार वाले भाग को लोगों की ओर कर दिया। लोगों ने समय का
इंतजार करना मुनासिब समझ बंदरों से उस्तरे वापिस लेने का निर्णय कर लिया।        

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

धूर्त नीति

 धूर्त नीति  

एक जँगल के धूर्त सियार सभा कर रहे थे। सबके मन में डर था और लालसा भी। डर
इस बात का था कि जंगल पर सिंह का राज हो गया तो बेघर होना पड़ जायेगा और
लालसा यह थी कि किस उपाय से सिंह को परास्त कर मौज का जीवन जीये।

 एक सियार बोला -काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती ,हमने अपनी धूर्तता के कौशल
से दो बार चढ़ा दी। पिछली बार छल कपट से दूर रहने वाली गाय को अपने पक्ष में
लिया और उसका राजतिलक कर सब जानवरों को समझाया कि गाय एक अहिंसक
जंतु है उसके नेतृत्व में जँगल में शान्ति रहेगी। सब जानवरों ने यह बात मान ली
और हम गाय के नेतृत्व में गुलछरे उडाते रहे।

तभी दूसरा सियार बोला -क्यों ना तीसरी बार ही गाय को आगे कर दिया जाए?

 इस बात का उत्तर देता हुआ पहला सियार बोला -जब हमने उस गाय को पहली
बार आगे किया था तब उसका रँग सफेद था मगर अब उसका रँग काला हो गया है
हमने जितनी कालिख पोतनी थी उस पर पोत दी अब तो वह इतनी डरावनी दिखती
है कि उसका नेतृत्व किसी को स्वीकार न होगा।

कुछ देर की  चुप्पी के बाद एक मोटा सियार बोला - गाय जैसा कोई दूसरे प्राणी को
खोज जाए ताकि सिंह को मांद में बंद रखा जा सके और हम निर्विघ्न ताजा गोस्त
उडाते रहे।

काफी सोच विचार करने के बाद एक बुड्ढा सियार बोला -जँगल के मुर्ख और लालची
बकरे का नेतृत्व स्वीकार कर लेना चाहिये। आज तक बकरे के ऊपर हिँसा फैलाने का
आरोप नहीं लगा है।

सब सियारों ने एकराय होकर बकरे के नाम पर मुहर लगा दी। जब बकरे को मालूम
हुआ की उसका नेतृत्व बहुमत से स्वीकृत हो गया है तो वह उछलने लगा। कुछ
सियारो को अपने साथ लेकर वह शेर की मांद की ओर बढ़ने लगा।

शेर ने अपने आसपास सियारों और बकरे की आवाज सुनी तो मांद से बाहर निकला।
शेर को देखते ही सियार तो भाग खड़े हुये और बकरा शेर के पंजे से मारा गया।  

बहुत ऊँची महत्वाकाँक्षा की लालसा और धूर्त की मित्रता संकट में डालती है     

रविवार, 5 जनवरी 2014

मजबुत हिंदुत्व मजबुत राष्ट्र

मजबुत हिंदुत्व मजबुत राष्ट्र 

विश्व बंधुत्व की राह पर चलने वाला हिंदुत्व , करुणा और मैत्री की परछाया वाला 
हिंदुत्व,दूसरे धर्मांवलम्बियों को आदर देने वाला हिंदुत्व ,अनाचार के सामने गर्जना 
करने वाला हिंदुत्व ,सर्व धर्म सद्भाव में आस्था रखने वाले हिंदुत्व को कमजोर 
किसने किया ? 

        सिर्फ सत्ता के सिँहासन पर काबिज होने के लिए हम अपनी विरासत भूल 
गये ,हम अपने महान पूर्वजों की जीवनशेली भूल गये। वोटों के लालच में हमने 
खुद को गाली देना सीख लिया। पद पर बने रहने के लिये हमने खुद पर अनाचार 
करना सीख लिया। सत्ता लोलुप बनकर हम दुष्टों को साथ देना सीख गये। जो 
व्यक्ति खुद की जाती को विध्वंसक बताता है वह विश्व को अपनी कैसी घटिया 
पहचान करा रहा है। अगर विश्व में आदर पाने की तंमन्ना है तो पहले खुद को 
हीन ,घटिया ,नपुंसक मानना छोडो। सारे विश्व में हिंदुस्तानी ही ऎसे नेता है जो 
अपने ही देश के हिंदुस्तानी नेता को अपने ही धर्म के नाम पर संकीर्ण बताते हो। 
किससे वाहवाही लूटोगे खुद को कमजोर और विध्वंसक बता कर ? क्या अपनी 
माँ को गाली देकर मासी के कसीदे पढ़ने से कोई व्यक्ति बड़ा बन जाता है ?

            यह भारत तब तब ही कमजोर हुआ है जब-जब हमने हिंदुत्व को कमजोर 
किया है। हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है जो सर्वे भवन्तुः सुखिन  … के मूल पर 
टिकी है। सिर्फ मत प्राप्ति के लिए खुद को कोसने वाले नेता क्या दूसरे मतावलम्बियों 
का विश्वास जीत पाये हैं ?दूसरों के सामने खुद को ओछा बताकर यदि सत्ता 
हासिल कर भी ली तो क्या तुम्हे कभी इतिहास गौरव से देखेगा ?

      हिंदुत्व कभी आक्रमण कारी नहीं रहा ,हिंदुत्व ने किसी राष्ट्र को नहीं लूटा ,हिंदुत्व 
ने किसी को त्रास नहीं दिया और ना ही हिंदुत्व ने कभी त्रास सहन किया। क्या हम 
उस हिंदुत्व के पक्षधर हैं जो दुनियाँ से मार खाता रहे,दूसरों से भयभीत रहे ,दूसरों 
के रहमो करम पर पलता रहे ?

     कोई भी राष्ट्र उसकी प्रजा से जाना जाता है ,विश्व का कोई भी देश अपने बहुसंख्यक 
समुदाय के साथ अन्याय नहीं करता,उस पर झूठी तोहमत नहीं लगाता;लेकिन शर्म 
आती है तब जब हम खुद अपनों पर चीख चीख कर झूठे आरोप लगाते हैं।  इससे 
क्या मिल जायेगा ?दुनियाँ कमजोर समझ कर लूट लेगी।
 
     आज कौए छाप नेताओं से लोग दुःखी हो गये हैं। ये लोग अपनों को ही गाली 
देकर अपनों से ही वोट लेकर देश चलाना चाहते हैं,मगर समय बदल रहा है ,युवा 
पढ़ लिख कर इतना तो समझदार हो गया है कि कौओं की कांव-काँव और सिँह की 
गर्जना को पहचानना सीख गया है। 

     भारत के चार राज्यों के चुनाव बहुत कुछ कह रहे हैं,युवा शक्ति थोड़ी सी चूक 
भी भविष्य के चुनाव में करने वाली नहीं है। जो लोग शेर की खाल ओढ़ कर मुर्ख 
बनाते हैं वो सियार हर बार पैंतरे आजमाने में सफल नहीं होंगे।

          राष्ट्र मजबूत हिंदुत्व की राह पर चल पड़ा है। राष्ट्र विश्व बंधुत्व,समदृष्टि,
करुणा,मैत्री,निर्भयता,विकास ,सहयोग सर्व धर्म समान वाले वाले हिंदुत्व के पक्ष 
में मोर्चा सम्भाल चूका है। तुष्टिकरण और पक्षपात बहुत पुरानी बातें हो चुकी है। 
इस नए और मजबूत हिंदुत्व से ही भारत मजबूत राष्ट्र बनेगा,इसमें कोई संदेह 
नहीं है।                       

शनिवार, 4 जनवरी 2014

मैं धर्म निरपेक्ष हूँ

मैं धर्म निरपेक्ष हूँ

मेरा परिचय यही
कि-
मैं धर्म निरपेक्ष हूँ।
मौका परस्त नेताओं की गोद में,
फलता हूँ -फूलता हूँ।
मेरा आतंक
मेरी अराजकता
मेरा राष्ट्रद्रोह
मेरा अनाचार
मेरा अत्याचार
सत्ता के दलालों को नहीं दीखता
उन्हें दीखता है -सिर्फ
सत्ता की ओर ले जाने वाला
मेरा कुटिल चेहरा
जो फूलों के आवरण में लिपटा है।
लोग पूछते हैं-
मेरे मजहब पर सवाल ?
होता है मेरा जबाब -
ना मैं हिन्दू हूँ
ना मैं मुस्लिम हूँ
ना ईसाई हूँ
ना मैं इन्सान हूँ
क्योंकि-
हर मज़हब जुड़ा है सद्भाव से।
कोई भगवान में मानता है
कोई पैग़म्बर में मानता है
कोई यीशु में मानता है
जबकि मैं तो कुटिल हूँ
गंदे राजनेता
अपना उल्लू सीधा करने
मुझे धर्म से जोड़ देते हैं
जाति से जोड़ देते हैं
जबकि
मैं खुद को जानता हूँ
खुद को पहचानता हूँ
मैं जहाँ भी रहता हूँ
वहाँ के संप्रदायों को
आपस में लड़ा देता हूँ        

बुधवार, 1 जनवरी 2014

सौभाग्य के आँसू

सौभाग्य के आँसू 
(१/१/२०१४ पर विशेष )

सुबह की सैर के बाद मैं एक पेड़ के निचे बैठा था ,पास पड़ी बेंच पर दौ नौजवान युवा
बैठे थे। उनका वार्तालाप मेरे कानों तक पहुँच रहा था। एक दोस्त दूसरे से पूछ रहा था
"क्या बात है आज सुबह-सुबह मूड उखड़ा हुआ लग रहा है "

दूसरा बोला -"कुछ खास नहीं दोस्त ,मेरे माँ -बाप पुराने ख्यालों के और कम पढ़े -लिखे
हैं। हर समय टोकते रहते हैं जैसे मैं कोई बच्चा हूँ "

पहला बोला -"हुआ क्या? "

दूसने ने बताया -"मेरी माँ मुझे क्या खाना और नहीं खाने पर हर दिन टोकती है ,थोड़ी
ठंडी बढ़ी कि हिदायत देती है ,घर से निकलने से पहले गाडी धीरे चलाने को कहती है।
घर के छोटे छोटे काम की लिस्ट थमा देती है ,किससे कैसे आदर पूर्वक बोलना है जैसी
नसीहत देती है और पिताजी समाज में कैसे रहना है उस पर भाषण झाड़ते हैं ,दाढ़ी
कभी बढ़ा ली तो टोकते हैं ,सुबह देर से उठने पर बार-बार जगाते हैं। पढ़ाई कैसी चल
रही का ध्यान करते हैं ,देर रात बाहर घूमने नहीं देते। पिज्जा बर्गर खाने पर कंट्रोल
रखते हैं। रात को अपने संघर्ष के दिनों कि कहानियाँ या लोगों ने कैसे संघर्ष किया
उन पर बताते हैं। रात को इंटरनेट पर बैठने नहीं देते ,दिन भर समय का महत्व और
नैतिकता की बातें  …

वह बोलता जा रहा था पर पहला मित्र कुछ नहीं बोल रहा था तो उसने अपने मित्र की
ओर देखा और बोला -अरे ,तेरी आँखों में आँसू ,मेरे अच्छे दोस्त !मेरी बदनसीबी पर
आंसू मत बहा ,ये तो मेरा रोज की दिनचर्या है.......

उसकी बात काटता हुआ पहला मित्र बोला -ये आँसू तेरे सौभाग्य से ईर्ष्या होने के
कारण आ गए हैं दोस्त ,मुझे देख ,मेरे बाप के पास अच्छा व्यापार है ,माँ अच्छी पोस्ट
पर काम कर रही है। पापा सुबह सवेरे काम पर चले जाते हैं और देर रात लौटते हैं ,
उन्होंने अच्छे या बुरे के लिए कभी डाँटा तक नहीं ,कभी ये नहीं समझाया की संघर्ष
कैसे किया जाता है। वे तो पॉकेट मनी और नयी चीजे देकर अपना कर्तव्य को पूरा
हुआ समझते हैं और माँ खाना बनाकर रसोई में रख काम पर चली जाती है ,मैं
खाना खा रहा हूँ या नहीं उनको उससे कोई लेना देना नहीं। छः बजे घर आकर फोन
पर दोस्तों से गप्प करती है और शाम को किसी पार्टी में जाने की तैयारी। शनी -रवि
कि छुट्टी के दिन किट्टी पार्टी और रात में क्लब या किसी दोस्त के घर। मैं अपने मम्मी
पापा से डाँट खाने को तरस जाता हूँ,कभी भी उनके पास मेरे लिए समय नहीं होता
मैं सर्दी से परेशां हूँ या किसी अन्य बात से।  वो इतना ही कहते हैं कि अब तुम बड़े हो
गए हो अपने फ़ैसले खुद लो और अपना ग्रुफ खुद बनाओ। तुम बड़े सौभागयशाली हो
दोस्त !तेरी बात सुनकर ऐसा लगता है मैने तेरे घर जन्म लिया होता।

उनकी बात सुन मैं विचारों में खो गया ,मुझे अपने अनपढ़ माँ -बाप याद आ रहे थे
जो हमेशा हमे उच्छ्खलता पर डाँटते और समझाते रहते थे। मेरा दिल उन्हें मन ही
मन प्रणाम करने लगा भले ही वह पढ़े लिखे कम थे पर हमें सुयोग्य बनाने की हर
पल कोशिश किया करते थे।