बुधवार, 1 जनवरी 2014

सौभाग्य के आँसू

सौभाग्य के आँसू 
(१/१/२०१४ पर विशेष )

सुबह की सैर के बाद मैं एक पेड़ के निचे बैठा था ,पास पड़ी बेंच पर दौ नौजवान युवा
बैठे थे। उनका वार्तालाप मेरे कानों तक पहुँच रहा था। एक दोस्त दूसरे से पूछ रहा था
"क्या बात है आज सुबह-सुबह मूड उखड़ा हुआ लग रहा है "

दूसरा बोला -"कुछ खास नहीं दोस्त ,मेरे माँ -बाप पुराने ख्यालों के और कम पढ़े -लिखे
हैं। हर समय टोकते रहते हैं जैसे मैं कोई बच्चा हूँ "

पहला बोला -"हुआ क्या? "

दूसने ने बताया -"मेरी माँ मुझे क्या खाना और नहीं खाने पर हर दिन टोकती है ,थोड़ी
ठंडी बढ़ी कि हिदायत देती है ,घर से निकलने से पहले गाडी धीरे चलाने को कहती है।
घर के छोटे छोटे काम की लिस्ट थमा देती है ,किससे कैसे आदर पूर्वक बोलना है जैसी
नसीहत देती है और पिताजी समाज में कैसे रहना है उस पर भाषण झाड़ते हैं ,दाढ़ी
कभी बढ़ा ली तो टोकते हैं ,सुबह देर से उठने पर बार-बार जगाते हैं। पढ़ाई कैसी चल
रही का ध्यान करते हैं ,देर रात बाहर घूमने नहीं देते। पिज्जा बर्गर खाने पर कंट्रोल
रखते हैं। रात को अपने संघर्ष के दिनों कि कहानियाँ या लोगों ने कैसे संघर्ष किया
उन पर बताते हैं। रात को इंटरनेट पर बैठने नहीं देते ,दिन भर समय का महत्व और
नैतिकता की बातें  …

वह बोलता जा रहा था पर पहला मित्र कुछ नहीं बोल रहा था तो उसने अपने मित्र की
ओर देखा और बोला -अरे ,तेरी आँखों में आँसू ,मेरे अच्छे दोस्त !मेरी बदनसीबी पर
आंसू मत बहा ,ये तो मेरा रोज की दिनचर्या है.......

उसकी बात काटता हुआ पहला मित्र बोला -ये आँसू तेरे सौभाग्य से ईर्ष्या होने के
कारण आ गए हैं दोस्त ,मुझे देख ,मेरे बाप के पास अच्छा व्यापार है ,माँ अच्छी पोस्ट
पर काम कर रही है। पापा सुबह सवेरे काम पर चले जाते हैं और देर रात लौटते हैं ,
उन्होंने अच्छे या बुरे के लिए कभी डाँटा तक नहीं ,कभी ये नहीं समझाया की संघर्ष
कैसे किया जाता है। वे तो पॉकेट मनी और नयी चीजे देकर अपना कर्तव्य को पूरा
हुआ समझते हैं और माँ खाना बनाकर रसोई में रख काम पर चली जाती है ,मैं
खाना खा रहा हूँ या नहीं उनको उससे कोई लेना देना नहीं। छः बजे घर आकर फोन
पर दोस्तों से गप्प करती है और शाम को किसी पार्टी में जाने की तैयारी। शनी -रवि
कि छुट्टी के दिन किट्टी पार्टी और रात में क्लब या किसी दोस्त के घर। मैं अपने मम्मी
पापा से डाँट खाने को तरस जाता हूँ,कभी भी उनके पास मेरे लिए समय नहीं होता
मैं सर्दी से परेशां हूँ या किसी अन्य बात से।  वो इतना ही कहते हैं कि अब तुम बड़े हो
गए हो अपने फ़ैसले खुद लो और अपना ग्रुफ खुद बनाओ। तुम बड़े सौभागयशाली हो
दोस्त !तेरी बात सुनकर ऐसा लगता है मैने तेरे घर जन्म लिया होता।

उनकी बात सुन मैं विचारों में खो गया ,मुझे अपने अनपढ़ माँ -बाप याद आ रहे थे
जो हमेशा हमे उच्छ्खलता पर डाँटते और समझाते रहते थे। मेरा दिल उन्हें मन ही
मन प्रणाम करने लगा भले ही वह पढ़े लिखे कम थे पर हमें सुयोग्य बनाने की हर
पल कोशिश किया करते थे।         

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