शनिवार, 11 जनवरी 2014

हिन्दुत्व की टहनी है धर्मनिरपेक्षता

हिन्दुत्व की टहनी है धर्मनिरपेक्षता 

हिंदुत्व के दर्शन को पढ़े समझे बिना उसे संकुचित अर्थ देना मूढ़ और अज्ञानी लोगों
का काम है,यह काम यदि पथ भ्रष्ट हिन्दू करता है तब तो बड़ी मायूसी होती है क्योंकि
वे हिंदुत्व में पैदा भले ही हुये हो पर उसमें जी नहीं रहे हैं।
हिन्दू धर्म का संस्थापक कौन ? संस्थापक उसका होता है जो सम्प्रदाय से जुड़ा हो,जिसमें
किसी विशेष मत को मानने वाले अनुयायी हो। हिंदुत्व तो सनातन है ,एक जीवन पद्धति
है जो सृष्टि के साथ विकसित हुई। हिन्दू धर्म के वेद कब और किसने लिखे ? जिन वेदों
की सूक्तियों के भाव को समझने में बड़े विद्धवान भाष्य लिखते रहे हैं और नेति-नेति
कहते रहे हैं। बड़ा आश्चर्य होता है जब अपने को बड़ा समझने वाले किंकर लोगों के मुँह
से हिंदुत्व को साम्प्रदायिक कह कर उसकी भत्सर्ना करते देखते हैं,क्या हो गया उन
अधम हिंदुओं को जो खुद की सभ्यता को सरे आम गाली देकर गर्व महसूस करते हैं ?
क्यों करते हैं वे ऐसा ?सिर्फ राज्य सत्ता को हासिल करने के लिए या तुच्छ स्वार्थ की
पूर्ति के लिए। खेर  … यह बात फिर कभी  ………
हिंदुत्व की जीवन पद्धति के कुछ गुण -

 हिंदुत्व सम दृष्टि में जीता है उसके लिए मनुष्य और कीट सबमे एक ईश्वर तत्व को
देखता है। फिर मनुष्य-मनुष्य में भेद की रेखा किस सम्प्रदाय ने खेंची ?

हिंदुत्व सद्गुणों को धारण करने का नाम है। हमारे ऋषियों ने पूर्वजों ने हर सद गुण
को कहा ही नहीं ,जीया है। सद्गुणों की स्थापना कहने भर से नहीं होती है उसको
आचरण में लाना पड़ता है ,विश्व में जिसने भी मर्यादा की स्थापना में अपने निजी
स्वार्थो की आहुति दी और नैतिकता की स्थापना में हर क्षण तत्पर रहा वही तो राम
कहलाता है ,हिंदुत्व ने यह आदर्श जी कर हर काल में बताया है।

हिन्दुत्व ने विश्व कल्याण से आगे समस्त ब्रह्माण्ड के सुख की प्रार्थना ईश्वर से की।
सबका भला हो ,सब का कल्याण हो ,सब अँधेरे से उजाले की ओर बढ़े यह संकल्प
हिंदुत्व से निकला ,इस उम्दा भाव में कोई मुर्ख ही संकीर्णता देख सकता है।

हिंदुत्व ने मानव सभ्यता को विकास का मार्ग दिखाया -हमारे वेदों ने मनुष्य को
मिलझुल कर आगे बढ़ने का सूत्र दिया। चरैवेति -चरैवेति। यह शब्द नहीं है विकास
का मूल मन्त्र है।

हिंदुत्व ने सबसे पहले धर्म को विज्ञान से जोड़ा, वेदों से लेकर रामायण तथा गीता में
यही तो लिखा है। जो सिद्धांत जाँचा ,परखा गया हो और सर्वकालिक हो तथा सत्य हो
उसे ही विज्ञान कहा जाता है। हमारे सिद्धांत गीता से निकल कर समस्त विश्व में यूँ
ही फैल गये।

हमारी सँस्कृत भाषा जो सब भाषाओँ की जननी मानी जाती है उसे सीखने के लिए
अमेरिकी लालायित हैं,वे इस भाषा के महत्व को समझ रहे हैं ,कुछ ही शब्दों में गहन
बात कह देना यह संस्कृत की उपादेयता है।

स्वस्थ रहकर सौ बरस जीये ,किसने सिखाया विश्व को ?हिन्दू धर्म के आयुर्वेद ने।
आज योग और प्राणायाम की ओर विश्व भाग रहा है।

सदाचार हमारा दैनिक जीवन जीने का मार्ग है और उस सदाचार से निकली एक
शाखा है धर्म निरपेक्षता।

हमें अपने हिंदुत्व पर गर्व करना सीखना होगा ,महात्मा गाँधी ने कहा था मुझे अपने
धर्म पर गर्व है और उनका प्रिय गान था -वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीर परायी
जाणे रे  …। हिंदुत्व कि ही ताकत है कि वो दूसरों कि पीड़ा को भी समझ सकता है ,
महसूस कर सकता है और संवेदनशील हो सकता है।       
              




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