सोमवार, 13 जनवरी 2014

अपना हिंदुत्व ,विश्व बंधुत्व (स्वामी विवेकानंद के चरित्र से )

अपना हिंदुत्व ,विश्व बंधुत्व  (स्वामी विवेकानंद के चरित्र से )

स्वामी विवेक नन्द जी को प्रणाम। 

हमारे देश को आज किसकी ज्यादा जरूरत है। क्या राष्ट्र भक्ति के नाम पर पग-पग
पर हिंदुत्व को कटटरवाद से जोड़ने वाले नेताओं की जरूरत है ?

क्या तुष्टिकरण को सर्वोच्च मानने वाले हल्के नेताओं की देश को जरुरत है ?

हिन्दूधर्म के टुकड़े जाति के नाम पर ,छूत-अछूत के नाम पर,आरक्षण के नाम पर
करने वाले नेताओं का कोई औचित्य है ?

 अगर ऐसे नेताओं की देश को जरूरत नहीं है तो उनके विचारों का अस्तित्व क्यों है ?

-इसका कारण हिंदुत्व में भेद डालने की नीति,लोकतंत्र की सँख्या बल की आधारशिला,
और स्वार्थ सीधा करने की संकुचित मानसिकता है।

हर दिन देश की बहस सम्प्रदायवाद के जहर से शुरू होती है ,हिंदुओं को साम्प्रदायिक
ठहराकर अन्य धर्म के अनुयायियों में हिंदुओं के प्रति नफरत और भय का भाव दिखाया
जाता है ,क्यों ?क्या इस कुकृत्य से देश का हित हो जायेगा ?कटटरता के भाव धर्म में नहीं
होते हैं,मनुष्य के मन में होते हैं।जिनका भाव खोटा उनका आचरण खोटा।
           
 स्वामी विवेक नन्द के जीवन से जुड़ी एक घटना -एक दिन खेतड़ी राज्य के सेक्रेटरी श्री 
जय मोहनलाल उनके दर्शन करने आए। उस समय स्वामीजी एक खाट पर कोपीन 
पहने लेटे थे। सेक्रेटरी ने उनसे पूछा -"महाराज ,क्या आप हिन्दू हैं ?
स्वामीजी बोले-"हाँ ,मैं हिन्दू ही हूँ "  
सेक्रेटरी ने पूछा-"फिर आप मुसलमान के यहाँ क्यों खा लेते हैं "?
स्वामीजी ने कहा -"इसीलिए कि मैं हिन्दू हूँ "
सेक्रेटरी ने कहा -"पर हिन्दू तो मुसलमान के हाथ का नहीं खाते "?
स्वामीजी ने कहा -"वे अज्ञानी हिन्दू हैं ?"
सेक्रेटरी ने कहा-"अज्ञानी हिन्दू कैसे ?"
स्वामीजी ने कहा -"क्योंकि उन्हें वेदों का ज्ञान नहीं है। वेदों में कहीं इस तरह का प्रसंग 
नहीं है कि किसके हाथ का छुआ खाना खाया जाए और किसके हाथ का नहीं "
यह है हिंदुत्व जो सबमें सम भाव रखता है ,सम देखता है। 

हमारे वेद मनुष्य-मनुष्य में अन्तर नहीं करते और ना ही हमारे शास्त्र जन्म से किसी
जाति को मानते हैं। हमारे शास्त्र कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था का बखान करते हैं और
एक सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने का निर्देश देते हैं। हमारे शास्त्र ने पूरी
सामाजिक व्यवस्था को मनुष्य के शरीर के चित्र के माध्यम से समझाया -मनुष्य के
शरीर के अग्र भाग मस्तिष्क को ब्राह्मण ,वक्ष स्थल को क्षत्रिय ,उदर स्थल को वैश्य तथा
पैरो को शुद्र कहा है ,जो मनुष्य ज्ञान देकर अर्जन करेगा विवेक का उपयोग करेगा वह
ब्राह्मण,जिसके ह्रदय में साहस और संवेदना होगी वह क्षत्रिय ,जो वाणिज्य कर्म करके
पशुपालन करके अर्जन करेगा वह वैश्य और जो सेवा के क्षेत्र से उदर पूर्ति करेगा वह शुद्र।
अब यहाँ जन्म से जाति का सवाल कहाँ से आया ?जो संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् में
विश्वास करती है ,सर्वे भवन्तु सुखिन की  भावना से सुबह की शुरुआत करती है और
विश्व बन्धुत्व का अनुकरण करती है वह कैसे कटटरवाद को जन्म दे सकती है ?

"अपना हिंदुत्व ,विश्व बंधुत्व" का दीया जलाने का समय आ गया है, आनेवाला समय
भारत के भाग्य को तय करेगा। यह अब हम भारतीयों के हाथ में है कि हम इस देश
को किस दिशा में ले जाना चाहेंगे। क्या झूठा जातिवाद, मजहब वाद पसंद करेंगे और
आपस में एक दूसरे से पद लोलुप नेताओं के कहने से झगड़ते रहेंगे या अपना हिंदुत्व,
विश्व बन्धुत्व का मैत्री भाव रख अंधकार से प्रकाश की ओर आगे बढ़ेंगे ?     

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