सोमवार, 20 जनवरी 2014

गणतन्त्र में अल्प संख्यक की परिभाषा ?

 गणतन्त्र में अल्प संख्यक की परिभाषा ?

यह गणतंत्र का महीना है और इतने गणतन्त्र देख चूका भारतीय आज दिशा विहीन क्यों हो
गया है ?क्या गणतंत्र में कमियाँ रह गयी थी उन्हें जानबूझ कर सुधारा नहीं गया या जान
बुझ कर उनका मनमाफिक उपयोग करने के लिए राजनेताओं ने बने रहने दिया ? या फिर
गण पर तन्त्र बैठा दिया गया।

गणतन्त्र जब हर भारतीय के लिए है तो जाति ,पंथ और धर्म के नाम पर हक़ में अंतर क्यों ?

         भारतीय संस्कृति में शुद्र कोई जन्म पर आधारित व्यवस्था नहीं थी यह तो कर्म पर
आधारित व्यवस्था थी लेकिन हमने जन्म आधारित जाति व्यवस्था को आधार बना
लिया,क्यों ?

जाति आधारित हक़ बढाकर क्या हमने भारतीयता को मजबूत किया है ?अगर हम इतने
सालों में उन भारतीयों को अविकसित श्रेणी से नहीं निकाल पाये हैं तो उसके क्या कारण
रहे हैं ?क्या हमारा आरक्षण भाई -भाई में प्रेम को बढ़ा रहा है ?क्या हम जाने -अनजाने
अपनी विपुल सामाजिक व्यवस्था के दर्द का ईलाज कर रहे हैं या दर्द को बढ़ा रहे हैं ?जिस
व्यवस्था को हमारे ऋषियों ने शुद्र की श्रेणी में रखा और उसे पैर स्तम्भ कहा उसका गलत
भाव ,उसकी गलत व्याख्या हम लोगों ने की है। जिस संस्कृति का पैर ही कमजोर हो उसे
लकवा मार जाता है ,वह संस्कृति विकलांग होती है। हमारे ऋषियों ने मजबूत सेवा क्षेत्र
को समाज का पाँव कहा क्योंकि उस क्षेत्र पर समाज का विकास टिका था ,मगर काल वश
हमने उस व्यवस्था को जन्म से जोड़ दिया और अपना संविधान पाने के बाद भी उसे जन्म
से जोड़े रखा ,क्या यह हमारी भूल नहीं है? फिर सब कुछ समझ कर भी हम जन्म से जीव
को शुद्र क्यों मान रहे हैं ?क्या हमें मजबूत भारत के लिए जन्म या जाति से जुड़ा रहने में
लाभ है या फिर हमें आर्थिक आधार पर भारतीयों की वर्ग व्यवस्था बनानी होगी और उसी
 नये मानदण्ड के तहत विकास की ओर बढ़ना होगा ?

जब यह देश भारत है और उसका नागरिक भारतीय कहलाता है तो किसी को बहुसंख्यक
और किसी को अल्प संख्यक क्यों माना जा रहा है ?क्या परिभाषा है अल्प संख्यक की ?
अगर हम भारतीय हैं तो सभी भारतीय हैं ,क्या भारतीयता धर्म या जाति जन्म के आधार
पर तय होगी ?क्या हम किसी को अल्प संख्यक कह कर उसमे खोटा भय बहुसंख्यक का
नहीं दिखा रहे हैं ?भारतीयों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक कह कर उन्हें आपस में लड़ा
तो नहीं रहे हैं ,उनमे वैमनस्य तो नहीं बढ़ा रहे हैं ?क्या भारतीयों के धर्म और आस्था के
विभिन्न प्रतीकों को मानने के आधार पर राष्ट्र निर्माण की योजना सफल रही है या रहेगी ?

    हम यदि गणतन्त्र इस देश में लाना चाहते हैं तो हमे नए मार्ग बनाने होंगे ,हमे बदलनी
होगी जन्म आधारित व्यवस्था ,हमें बदलनी होगी धर्म आधारित व्यवस्था। हमें सब में 
भारतीयता की स्थापना करनी होगी। हमारी पहचान भारतीयता बने ना कि हिन्दू ,मुस्लिम ,
सिक्ख,ईसाई ,जैन या अन्य। हमें सत्ता प्राप्ति के लिए या उस सत्ता से चिपके रहने के
लिए भारतीयों को आपस में लड़ाना बंद करना होगा।  हमें धर्म आधारित तुष्टिकरण की
राजनीति को दूर करना होगा ,अब भारतीयों को समता की राजनीति करनी होगी ,सद्भाव
कि राजनीति करनी होगी। हम आम भारतीयों को निश्चय करना पडेगा कि जो नेता एक
भारतीय से अधिकार छीन कर दूसरे को देता है उस सोच से बच कर रहना होगा ?जो सोच
हमारी आस्था को सत्ता पाने के लिये साधना चाहती है उस सोच के पँख काटने होंगे।

हे भारतीयों,तुम न तो अल्पसंख्यक हो और न ही बहुसंख्यक ;तुम सब भारत माता की
संतान हो। वर्ग भेद,जाति भेद,धर्म भेद से ऊपर उठ कर मिलझुल कर आगे बढ़ो।           

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