रविवार, 26 जनवरी 2014

गणतंत्र केवल वोट का अधिकार नहीं

गणतंत्र केवल वोट का अधिकार नहीं 

हमारी आजादी और गणतंत्र की रक्षा का दायित्व केवल चुनी हुई सरकार की जबाबदारी
ही नहीं हर नागरिक का कर्तव्य है।  वह हर दिन भगवान् के बाद उनको भी नमन करें
उनके बलिदान को याद करें और समय पर अनुसरण करें जिनके त्याग के कारण हम
स्वतन्त्रता की साँसे ले रहे हैं।

     हमने जब अपना संविधान लिखा तब अधिकांश भारतीय अशिक्षित और गरीब थे
तब देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने सबको जीने की आजादी मिल सके इस बात को प्रमुख
रूप से संविधान में भारत के कर्तव्य के रूप में लिखा ,प्रश्न हर भारतीय के जेहन में
घूमता रहता है कि इतने सालों बाद भी सबको जीने का अधिकार ( जिसमे रोटी ,कपडा
मकान,शिक्षा ,स्वास्थ्य और रोजगार शामिल है) क्यों नहीं मिला ,क्यों करोड़ों लोग
32/-प्रतिदिन भी नहीं कमा पा रहा है ?

    एक भारत में दो भारत कैसे बन गए ,एक ओर ५%लोगों के हाथ में सम्पन्नता है
१०%लोग  मध्यम जीवन जी रहे हैं और बाकी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं
कमी कहाँ है ?संविधान में या सरकार की  इच्छा शक्ति में या नेताओं की सत्ता लोलुप
प्रवृति में ? आप खुद चिंतन करें और अपनी सरकार चुने जो हँगामा खड़ा नहीं करे बल्कि
काम करें।     

       बात संविधान की करेंगे- संविधान ने कुछ समय के लिए जातियता के आधार पर
जीवन स्तर को सुधारने का मत रखा जो उस समय जरुरी था और उस व्यवस्था को
सुधारने का समय भी तय किया लेकिन हम आज तक उन भारतीयों के जीवन स्तर को
सुधार नहीं पाये,क्यों ?क्या देश की आज तक की सरकारें इसके लिए जबाबदार नहीं हैं ?
क्या सत्ता लोलुप लोगों की ईमानदार कोशिश वंचित वर्ग के प्रति आज तक झलक पायी
है ?

     हम आज तक गरीबी नहीं हटा पाये,प्राथमिक सुविधाएँ नहीं दे पाये ,शिक्षा का गुणवत्ता
युक्त ढांचा नहीं बना पाये ,करोडो हाथों को काम नहीं दे पाये ,क्यों ?क्या हमने पैसा खर्च
करने में कंजूसी की ? फिर  …। क्या पैसे को सही जगह खर्च नहीं किया या फिर अधिकांश
धन भ्रष्ट नेताओं ,अफसरों या नौकरशाही ने लूट लिया ?क्या कारण रहा है कि जनता खुद
जनता के हित से परहेज कर स्वार्थ साधने के खातिर अनाचार और भ्रष्ट मार्ग पर बढ़ रही
है। हमारे देश में नेता कोई आकाश से नहीं टपकते,हम लोग ही चुनते हैं सवाल यह है कि
क्या हम खुद ही भ्रष्ट होते जा रहे हैं ओर भ्रष्ट आचरण स्वीकार्य हो चूका है।

     आज भ्रष्टाचार को मथने के लिए हर दल के नेता कसमें खाते हैं ,वादे करते हैं लेकिन
कोई यह नहीं बताता कि इस बिमारी का माकुल ईलाज यह होगा। हम भारतीय आज भी
प्राथमिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाले दल को सत्ता सौंपने को मजबुर हैं !! क्या यही
गणतंत्र की अवधारणा थी ?क्या हम अपने पर अपना शासन देश को दे पाये हैं ?बहुत से
नेता अपने -अपने स्वराज,सुशासन और विकास के दावे करते हैं ,भारत निर्माण की
बातें करते हैं मगर फिर भी हम वहीँ के वहीँ रह जाते हैं,क्यों ?क्या नेताओं के वादे सिर्फ
दिखावा या आडम्बर है या हम खुद अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं है ?

  " हम जागरूक बन जाए ,हम भारतीय बन जाए,हम कर्तव्य पारायण बन जाए ,हम
राष्ट्रप्रेमी बन जाए" यह बात हम सबके आचरण में आनी चाहिए। हम जातिगत विकास
की केंचुली को जब तक उतार कर नहीं फेकेंगे तब तक हम सरपट दौड़ नहीं पायेंगे। हमें
विकास का नक्शा जाति ,पंथ और धर्म को हटाकर फिर से बनाना होगा जिसमे अति
निर्धन भारतीय ,निर्धन भारतीय ,मध्यम भारतीय ,उच्च मध्यम और सम्पन्न भारतीय
का वर्ग हो और उसी वर्ग के अनुसार काम की योजना तय हो।

                     जय गणतंत्र -जय भारत           

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